Tuesday, January 31, 2017

विचलित कर देने वाले समय में भी जल रही है साहित्य की मशाल

कथा सम्राट प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के उद्घाटन के अवसर पर अपने व्याख्यान में कहा था कि साहित्य “देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है.” प्रेमचंद के इस कथन की बहुत ज़्यादा याद मुझे यह समाचार पढ़ते हुए आई कि हाल में सम्पन्न हुए अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान में डोनाल्ड ट्रम्प के कुछ भाषणों के स्वर ने अमरीकी जन मानस को इतना चिंतित कर दिया कि उनकी दिलचस्पी अचानक डिस्टोपियन (मनहूसियत भरे) उपन्यासों में बहुत ज़्यादा बढ़ गई. अमरीकी जनता शायद काफी पहले लिखे गए भविष्य का चित्रण करने वाले इस तरह के उपन्यासों को पढ़कर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश कर रही है. ऐसे में एक डिस्टोपियन उपन्यास सुपर सैड ट्रु लव स्टोरीके रचनाकार गैरी श्टाइन्गार्ट  का यह कथन तर्क संगत प्रतीत होता है कि “एक औसत अमरीकी के वास्ते इनमें से बहुत सारी किताबें इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है कि वह यह जानना चाहता है कि अब आगे क्या होगा.” स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी  के एक प्रोफ़ेसर अलेक्स वॉलॉच ने कहा कि अमरीकी प्रशासन के कुछ कृत्यों से लोगों के जेह्न  में खतरे की घण्टियां बजने लगी हैं और वे इस नए यथार्थ को समझने के लिए इन कृतियों का रुख कर रहे हैं.

जानी-मानी उपन्यासकार मार्गरेट एटवुड के कोई तीन दशक पहले आए उपन्यास द हैण्डमेडस टेलजिसके अब तक 52 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं,  की बिक्री 2016 में तीस प्रतिशत बढ़ गई और पिछले तीन महीनों में तो इसके प्रकाशक को इसकी एक लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं, क्योंकि लोगों को नए  रिपब्लिकन निज़ाम की सम्भावित रीति नीतियों और इस उपन्यास में वर्णित दमनात्मक समाज में बहुत सारे साम्य दिखाई दिये थे. इधर हाल के दिनों में राष्ट्रपति ट्रम्प, उनके प्रेस सेक्रेटरी सीन स्पाइसर और उनकी  सलाहकार कॉनवे ने जब राष्ट्रपति  के पदग्रहण समारोह में उपस्थित लोगों की संख्या को लेकर समाचार माध्यमों के आकलन पर प्रतिकूल  टिप्पणियां कीं तो इस पर काफी बावेला मचा और तब कॉनवे को यह सफाई देने पर मज़बूर होना पड़ा कि वे तो महज़ वैकल्पिक तथ्यप्रस्तुत कर रही थीं. लेकिन उनकी इस टिप्पणी ने बहुतों को जॉर्ज ऑरवेल के प्रख्यात उपन्यास ‘1984’ के उस सर्वसत्तावादी समाज की याद दिला दी जिसमें भाषा एक राजनीतिक अस्त्र बन जाती है और यथार्थ को सत्ताधारियों के नज़रिये से व्याख्यायित किया जाने लगता है. आसानी से पुष्टि किये जा सकने काबिल तथ्यों को भी संदेह के घेरे में लाने की यह प्रवृत्ति अमरीकी समाज के लिए नई और चौंकाने वाली थी. शायद यह भी एक  कारण रहा होगा कि अकेले इस एक सप्ताह में ट्विटर पर लगभग तीन लाख बार इस उपन्यास का ज़िक्र किया गया. यह उपन्यास अमेज़ॉन की बेस्ट सेलर सूची में तेज़ी से ऊपर चढ़ता जा रहा है. हमें यह बात चकित करने वाली लग सकती है कि राष्ट्रपति ट्रम्प के शपथ  लेने के बाद इस उपन्यास की बिक्री में 9500 गुना इज़ाफा हुआ है और अनेक बेस्ट  सेलर सूचियों में यह निरंतर ऊपर चढ़ता जा रहा है. वैसे यह उपन्यास सदा से ही बेस्ट सेलर रहा है. 1949 में अपने प्रकाशन के बाद से अमरीका में हर बरस इसकी चार लाख प्रतियां बिकती रही हैं, लेकिन हाल में इसकी मांग इतनी ज़्यादा बढ़ गई कि प्रकाशक को  न सिर्फ इसकी दो लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं, जॉर्ज ऑरवेल के ही एक अन्य उपन्यास एनिमल फार्मकी भी एक लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं.

अमरीका में इस तरह के उपन्यासों में तेज़ी से बढ़ी दिलचस्पी का आकलन दो-तीन तरह से किया जा रहा है. कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर माइकल मेयेर का कहना है कि वैसे तो ये किताबें पहले भी पढ़ी जाती थीं, लेकिन अब इनमें बढ़ी हुई दिलचस्पी की वजह यह है कि लोग इनमें  वर्तमान से काफी पीड़ादायक समानता  पा रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि इन उपन्यासों में पाठकों को न सिर्फ अपने समय का प्रतिबिम्ब देखने को मिल रहा है इनसे उन्हें वो नैतिक स्पष्टता भी प्राप्त हो रही है जो ख़बरों और सूचनाओं के घटाटोप में खो-सी गई है. कथाकार गैरी श्टाइन्गार्ट का यह कथन उपयुक्त प्रतीत होता है कि कदाचित नॉन फिक्शन हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है और पत्रकारिता समय के साथ तालमेल बनाये रख पाने में असफल हो रही है. इस पूरे परिदृश्य पर सबसे मार्मिक टिप्पणी तो यह है कि लोग इन डिस्टोपियन उपन्यासों को इसलिए पढ़ रहे हैं कि यह एहसास उन्हें सुखद लगता है कि जो हो रहा है, उससे भी बुरा हो सकता था.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 31 जंवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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