Tuesday, October 18, 2016

एक सार्थक पहल ताकि ज़िन्दगी में बना रहे मक़सद

कोई बहुत गम्भीर नाटक चल रहा है. मुख्य अभिनेता पूरे मनोयोग से अपनी लम्बा भावपूर्ण संवाद अदा कर रहा है, तभी हॉल  में किसी दर्शक का मोबाइल घनघनाता है. अन्य दर्शकों के आनंद में तो ख़लल  पड़ता ही है,  वह अभिनेता भी विचलित हो जाता है. अपने बिखरे सूत्रों को सहेजने में उसे कुछ क्षण लगते हैं. जाने-माने गायक-अभिनेता शेखर सेन की लगभग हर  प्रस्तुति में ऐसा हुआ है. वे लगभग दो घण्टे की  एक पात्रीय प्रस्तुति  देते हैं और कभी तुलसी, कभी सूर, कभी कबीर और कभी स्वामी विवेकानंद का पूरा जीवन सजीव कर देते हैं. हालांकि  वे अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति से पहले भी दर्शकों से अपने मोबाइल स्विच ऑफ करने का अनुरोध कर देते हैं, लेकिन दर्शक तो अपनी मर्ज़ी के मालिक ठहरे. वे भला ऐसे अनुरोधों को क्यों सुनें! किसी भी संवेदनशील कलाकार के लिए  यह मंज़र बहुत कष्टप्रद होता है कि वह अपनी प्रस्तुति दे रहा है और सामने बैठा  या बैठे दर्शक उस प्रस्तुति को मनोयोग से देखने की बजाय या तो उसे अपने कैमरे में कैद करने में लगे हैं या कोई संदेश टेक्स्ट कर रहे हैं या फेसबुक/व्हाट्सएप में घुसे हुए हैं. यानि वे वहां होकर भी वहां नहीं हैं. 

लेकिन कलाकारों का यह त्रास अब बहुत जल्दी अतीत हो जाने वाला है. अमरीका के ऑरेगॉन राज्य के पोर्टलेण्ड  शहर में जन्मे उनत्तीस वर्षीय डुगोनी ने एक ऐसा उपकरण बना डाला है जो कलाकारों के लिए बहुत बड़ी  राहत का कारण बनने जा रहा है. डुगोनी द्वारा निर्मित यह उपकरण असल में एक मोबाइल रखने का एक पाउच है. जैसे ही आप किसी कंसर्ट-नाटक  आदि में जाते हैं प्रवेश द्वार पर आपसे आपका मोबाइल लेकर इस पाउच में रख दिया जाता है और पाउच को सील करके आपको सौंप दिया जाता है. पाउच इस तरह से बनाया गया है कि अगर आपका कोई कॉल आता है तो अपको पता चल जाता है और अगर आप चाहें तो सभा कक्षा से बाहर जाकर, पाउच खुलवा कर उसे सुन सकते हैं. जब सभा  समाप्त होती है तो दरवाज़े पर उपस्थित कर्मचारी पाउच में से आपका फोन निकाल कर आपको सौंप देते हैं. इस सुविधा का नाम है यॉण्डर. और यह तेज़ी से लोकप्रिय होती जा रही है. डुगोनी इस सेवा के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दो डॉलर शुल्क लेते हैं. अभी उन्होंने  इस तरह के पाउच बेचना शुरु नहीं किया है, लेकिन निकट भविष्य में वे ऐसा भी कर सकते हैं.

डुगोनी की इस सेवा का उपयोग करने वाले जाने-माने कॉमेडियन डेव चैपल का कहना है कि इस सुविधा के आ जाने के बाद से उन्हें अपनी प्रस्तुतियों में नया ही आनंद मिलने लगा है. लेकिन जहां कलाकार इस सुविधा से प्रसन्न हैं वहीं दर्शक इससे नाखुश भी हैं. उनमें से अनेक का कहना है कि अगर आप अपने प्रोग्राम  को रिकॉर्ड  नहीं करने देते हैं तो फिर मज़ा ही क्या है! इस तरह की प्रतिक्रिया देने वाले दर्शकों में ऐसे भी अनेक उत्साही दर्शक हैं जिनका दावा है कि पिछले बीस बरसों में वे  जितने भी कंसर्ट्स  में गए हैं, उन सबको उन्होंने रिकॉर्ड भी किया है. ज़ाहिर है कि लोग कंसर्ट्स को रिकॉर्ड कर अपने सोशल मीडिया के पन्नों पर पोस्ट भी करते हैं. इतना ही नहीं, कम प्रसिद्ध बैण्ड्स तो इस बात से  खुश भी होते हैं कि उनके उत्साही दर्शकों की वजह से उन्हें मुफ्त में प्रचार भी मिल रहा है. 

लेकिन इस सुविधा का निर्माण करने के पीछे डुगोनी का सोच यह भी रहा है कि लोगों का इस तरह से अपने मोबाइल फोनों में डूबे रहना उनके सामाजिक सम्बन्धों पर प्रतिकूल असर डाल रहा है. इसके अलावा उन्हें यह  भी लगा कि बहुत सारे लोग अपने मोबाइल फोनों के कैमरों  का इस्तेमाल दूसरों की निजता में अवांछित घुसपैठ करने के लिए भी करते हैं. इए प्रसंग साझा करते हुए वे बताते हैं कि किसी पार्टी में एक युवक धुत्त हो गया, और दो अन्य युवकों ने बिना उसकी जानकारी और अनुमति के उसकी हरकतों को न केवल कैमरे में कैद कर लिया, उस रिकॉर्डिंग को यू ट्यूब पर पोस्ट भी कर दिया. 

लेकिन जहां डुगोनी का यह सोच सकारात्मक है और कलाकार उसकी इस पहल का खुले मन से स्वागत कर रहे हैं, बहुत सारे दर्शक हैं जो इसके खिलाफ़ है. कुछ्के दर्शकों ने तो गेट पर अपना मोबाइल सौंपने की बजाय टिकिट के पैसे तक वापस  लौटाने की मांग कर डाली, और एक महाशय तो इतने क्रुद्ध हुए कि उन्होंने पाउच को ही चबा डाला. लेकिन डुगोनी अभी भी आश्वस्त और आशान्वित हैं. वे अपने इस काम को एक सामाजिक आन्दोलन की तरह देखते हैं और कहते हैं कि इससे लोग डिजिटल युग में कुछ इस तरह जी सकेंगे कि उनकी ज़िन्दगी बेमक़सद न हो जाए! 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 अक्टोबर, 2016 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

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