Tuesday, October 11, 2016

किस्सा पेरिस के एक अनूठे बुक स्टोर का

हाल ही में पेरिस के बांये किनारे पर स्थित किताबों की एक अनूठी दुकान की रोचक दास्तान चार सौ पृष्ठों की एक किताब का विषय बनी है. शेक्सपियर एण्ड कम्पनी नामक यह दुकान छोटी-सी और जीर्ण-शीर्ण है लेकिन इसकी अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि इसी दुकान ने उस समय जब उसे कोई छापने को तैयार नहीं था,  जेम्स जॉयस की अब अमर हो चुकी कृति यूलिसिस को प्रकाशित करने का जोखिम उठाया था. कहा जाता है कि यह दुकान आधुनिक साहित्य के कुछ सबसे प्रखर लेखकों जैसे अर्नेस्ट हेमिंग्वे, एफ स्कॉट फिट्ज़ेरल्ड, जैक कैरुआक और एलेन गिंसबर्ग का अनौपचारिक बैठक कक्ष, और कभी-कभार तो  उनका शयन कक्ष भी रही है.
इस दुकान का अतीत बड़ा दिलचस्प है. इसके मालिक थे अमरीका में जन्मे जॉर्ज  व्हिटमैन जो सन 2011 में 98 साल की उम्र में दिवंगत होने तक इसी दुकान के ऊपर एक छोटे-से कमरे में रहते थे. उनके लिए यह दुकान महज़ एक व्यापारिक स्थल न होकर और भी बहुत कुछ थी. असल में वे इसे बुकस्टोर के आवरण में एक समाजवादी सपना मानते थे जिसके दरवाज़े हरेक के लिए खुले थे. वे इसे एक सजीव कलाकृति मानते थे. उन्होंने कहा था, “मैंने इस बुकस्टोर को ठीक वैसे ही सिरजा है जैसे कोई लेखक उपन्यास लिखता है. मैंने इसके हर कक्ष को उपन्यास के एक अध्याय की तरह रचा है. मैं चाहता हूं कि लोग इसके दरवाज़ों को वैसे ही खोलें जैसे वे वे किसी किताब को खोलते हैं,  उस किताब को जो उन्हें उनकी कल्पनाओं के जादुई लोक में ले जाती है.” 
वैसे व्हिटमैन इस दुकान के मूल संस्थापक नहीं थे. इस दुकान को इसके वर्तमान ठिकाने के नज़दीक ही सिल्विया बीच नामक एक युवती ने शुरु किया था. उसने 1941 तक इसका संचालन किया. इस साल पेरिस पर नाज़ी कब्ज़े के दौरान अन्य हज़ारों लोगों के साथ सिल्विया को भी नज़रबन्द कर दिया गया. पचास के दशक के उत्तरार्ध  में सिल्विया ने अपनी इस दुकान का मालिकाना हक़  जॉर्ज व्हिटमैन को दे दिया. जॉर्ज सिल्विया से इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी इकलौती संतान के नामकरण में भी उन्हें याद रखा. वही सिल्विया बीच व्हिटमैन अब 35 बरस की हैं और अपने साथी डेविड डिलानेट के साथ मिलकर इस दुकान को चलाती हैं. डेविड से उनकी पहली मुलाकात इसी दुकान में हुई थीं. सिल्विया का कहना है, मेरा खयाल है कि डेविड जल्दी ही इस बात को समझ गया कि अगर हमें साथ रहना है तो उसे इस दुकान को भी अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना होगा. सिल्विया के पिता जॉर्ज द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पेरिस आए थे और यहीं के होकर रह गए. उनके पास खुद की किताबों का इतना बड़ा संग्रह था कि अंतत: उन्होंने किताबों की एक दुकान ही खोल डाली. अपनी डायरी में पचास के दशक में उन्होंने लिखा है, “मेरी तमन्ना है कि मैं कोई ऐसा ठिकाना बना सकूं जहां  से मैं दुनिया के त्रास और सौन्दर्य को एक साथ निहार सकूं.”  और यही कल्पना  उन्होंने शेक्सपियर एण्ड कम्पनी के रूप में साकार की. यहां लेखक अपनी रचनाओं का पाठ करते, डिनर पार्टियां होती और बाद के बरसों में ये जॉर्ज महाशय आगंतुक विशिष्ट जन के साथ अपने पाजामे में या कि उस बेल बूटेदार ब्लेज़र में, जो शायद ही कभी  ड्राइक्लीन हुआ हो, तस्वीरें भी खिंचवाते.
और आहिस्ता-आहिस्ता जॉर्ज का यह ठिकाना दुनिया भर के घुमंतू लेखकों की शरणगाह बन गया. जॉर्ज ऐसे लेखकों को टम्बलवीड्स कहते थे. यानि वे पौधे जो पतझड़ में हवाओं के साथ इधर-उधर भटकते रहते हैं. जॉर्ज कुछ शर्तों पर इन लेखकों को यहां टिकने की इजाज़त देते थे. मसलन, हर लेखक को हर रोज़ दो घण्टे काम करना होगा, साथ ही उसे हर रोज़ कम से कम एक किताब पढ़नी होगी. इन शर्तों को पूरा करने के वादे पर कोई भी लेखक यहां मुफ्त में ठहर  सकता था, किताबों की अलमारियों के बीच फंसाई  गई खाटों में से किसी  पर सो सकता था और पास के सार्वजनिक नल पर जाकर नहा सकता था. दुकान में एक बोर्ड लगा हुआ है जिस पर अंकित है: “अजनबियों के प्रति असत्कारशील न हों, क्या पता कोई देवदूत ही उनका छद्म वेश धर कर चला आया हो.” . और हां, यह बुक स्टोर अपने यहां ठहरने  वाले लेखकों  पर एक और शर्त लागू करता है.  शर्त यह है कि यहां ठहरने के बदले में उन्हें एक पृष्ठ की आत्मकथा लिख कर देनी  होगी, जिसे वे वहां रखे हुए हल्के नीले रंग के कागज़ पर दुकान के टाइपराइटर पर टाइप करके  दे सकते हैं. कहना अनावश्यक है कि शेक्सपियर एण्ड कम्पनी के पास ऐसे हज़ारों पन्नों का विशाल संग्रह है. वस्तुत: इस संग्रह की बहुत सारी रोचक सामग्री ‘द रैग एण्ड बोन शॉप ऑफ द हार्ट’  शीर्षक वाली इस किताब में शामिल की गई है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 अक्टोबर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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