Tuesday, August 11, 2015

नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह :                        
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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