Tuesday, August 4, 2015

थोड़ी-सी बेवफ़ाई......

कुछ बातें  ऐसी होती हैं जिनकी उड़ती-उड़ती-सी ख़बर तो होती है लेकिन जिनके बारे में आपको कोई पुष्ट प्रामाणिक जानकारी नहीं होती है,  और जब वो जानकारी आपको मिलती है तो आप न सिर्फ  चौंक जाते हैं, आहत भी महसूस करते हैं.  हाल ही में जब मैंने कनाडा में अवस्थित एक ऑनलाइन डेटिंग और सोशल नेटवर्किंग सर्विस के हाईजैक हो जाने की ख़बर पढ़ी और सहज जिज्ञासावश इसके विस्तार में गया तो मेरे साथ यही हुआ. दो महिलाओं के लोकप्रिय नामों एशले और मैडिसन को जोड़कर बनाई गई यह सशुल्क सर्विस इतनी फैली हुई है कि दुनिया के 46 देशों में इसके करीब चार करोड़ सदस्य हैं. इस साल के आंकड़ों की मानें तो हर माह इसे करीब सवा करोड़ विज़िट्स मिलती हैं और इसे दुनिया की एडल्ट वेबसाइट्स में अठारहवां स्थान हासिल है. यह तो कोई ख़ास बात नहीं है. दुनिया में इस तरह की बहुत सारी सर्विसें और साइट्स मौज़ूद हैं. मेरा ध्यान तो इस साइट की तरफ इस खबर की वजह से गया कि इम्पैक्ट टीम नामक हैकरों के एक समूह ने यह दावा किया कि उन्होंने इस साइट के उपभोक्ता खज़ाने से लोगों की निजी जानकारियां चुरा लीं हैं और अगर इस साइट को फौरन बन्द नहीं कर दिया गया तो इस जानकारी को सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

पड़ताल की तो मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह साइट हिन्दी में भी उपलब्ध है और इसकी टैग लाइन है: जीवन अल्प है. एक अफ़ेयर कर लें. इतना ही नहीं, भारत में फरवरी 2014 में लॉंच की गई इस सेवा के फिलहाल करीब पौने तीन लाख सशुल्क सदस्य हैं. इन सदस्यों में लगभग पचास हज़ार तो वे स्त्रियां हैं जो मुख्यत: दिल्ली और राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में रहती हैं और इस सर्विस के लॉंच होने के पहले ही दिन इससे जुड़ गई थीं. भारतीय स्त्री पुरुषों और उनके वैवाहिक सम्बन्धों की एकनिष्ठता के बारे में जो आम छवि प्रचलित है, उसे वे आंकड़े जो इस सर्विस ने पिछले बरस जारी किए थे, छिन्न भिन्न कर देते हैं. सर्विस के एक सर्वे के अनुसार अब 76 प्रतिशत भारतीय स्त्रियां और 61 प्रतिशत भारतीय पुरुष बेवफाई को गुनाह या अनैतिक नहीं मानते हैं. यह सर्वे दस शहरों में 75,321 स्त्री-पुरुषों पर किया गया था और इसके उत्तर दाताओं में से 80 प्रतिशत विवाहित थे. अगर यह पढ़कर आप चौंके नहीं हैं तो फिर यह बात और जान लीजिए कि उत्तरदाताओं में से 80 प्रतिशत वे थे जिनकी पारम्परिक यानि अरेंज्ड शादी हुई थी और इन उत्तर दाताओं में से 81 प्रतिशत पुरुषों और 68 प्रतिशत स्त्रियों ने न केवल यह स्वीकार किया कि  उनके विवाहेत्तर सम्बन्ध हैं, उन्होंने यह भी माना कि इन सम्बन्धों  का उनके वैवाहिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. इस सर्वे में जिन स्त्री पुरुषों को शामिल किया गया उनकी औसत उम्र क्रमश: 31 और 45 वर्ष थी. कहना अनावश्यक है कि ये तमाम जानकारियां बेहद चिंतित और क्षुब्ध करने वाली हैं.

असल में पति पत्नी के साथ  ‘वो’ की मौज़ूदगी  की बात हमारे फिल्म और टीवी धारावाहिक जैसे  लोकप्रिय मनोरंजन माध्यम तो काफी समय से करते आ रहे हैं और यह सिलसिला अभी भी जारी है. वरिष्ठ गांधीवादी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार कभी तब  के  बेहद लोकप्रिय एक साप्ताहिक में  पत्नी के अलावा एक अदद प्रेमिका की वकालत कर चुके हैं, यह बात बहुतों को याद होगी. लेकिन जिस सर्विस की मैंने चर्चा की है उस पर जो प्रवृत्ति सामने आ रही है वह मूलत: हमारे सामाजिक ढांचे में आ रहे बदलाव की चिंताजनक देन है. काम काज के तौर तरीके तेज़ी से बदल रहे हैं. पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियां भी ज़्यादा डिमाण्डिंग और चैलेंजिंग़ दायित्व स्वीकार करने लगी हैं, ज़्यादा यात्राएं, ज़्यादा समय तक ऑफिस में रुकना और अपने सहकर्मियों से निकटता के अवसर बढ़ना आम होता जा रहा है. इसी के साथ दाम्पत्य जीवन में साथ रहने के समय में भी स्वभावत: कमी आती जा रही है. मुझे याद आती है यह बात कि नीदरलैण्ड की टिलबर्ग यूनिवर्सिटी में  2011 में एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि बढ़ती जा रही आर्थिक और सामाजिक सशक्तता अब स्त्रियों को भी वही सुविधा दे रही है जिसका उपभोग पुरुष सदियों से करते आ रहे थे. लेकिन क्या यह ऐसी बात है जिस पर गर्व किया जाए? और क्या ऐसा ही हमारे अपने देश में भी नहीं हो रहा है?

सोचने की बात यह है कि चाहे एक छोटे और सीमित वर्ग में ही सही, विवाह संस्था के प्रति लोगों के नज़रिये में यह जो परिवर्तन आ रहा है क्या उसे हमारी परम्पराओं, हमारे मूल्यों  और सामाजिक संरचना की सेहत के लिए खतरे की घण्टी के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 अगस्त, 2015 को पति पत्नी और वो, बज रही है ख़तरे की घण्टी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    
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