Tuesday, December 9, 2014

किस तरफ हो तुम

जिन्होंने कभी भी, किसी भी स्तर पर हिंदी साहित्य पढ़ा है वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के नाम से अपरिचित  नहीं हो सकते हैं. आचार्य शुक्ल बहुत बड़े निबन्धकार भी थे. आज इनकी चर्चा से अपनी बात इसलिए शुरु कर रहा हूं कि इनके एक बहुत प्रसिद्ध निबन्ध ‘कविता क्या है’ की एक बात मुझे बहुत याद आ रही है. शुक्ल जी ने कविता की ज़रूरत क्यों है यह बताने के लिए कहा है कि सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ  मनुष्य के आचरण इतने जटिल हो गए हैं कि वे सीधे-सीधे तो समझ में नहीं आते हैं. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अनेक उदाहरण भी दिए हैं. लेकिन मैं यहां उनकी चर्चा नहीं करूंगा. असल में आचार्य शुक्ल जी की यह बात मेरे जेह्न पर इसलिए दस्तक दे रही है कि आज के समय में यह तै करना मुश्क़िल होता जा रहा है कि क्या सच है और क्या झूठ, कौन सही है और कौन ग़लत! 

वैसे यह एक शाश्वत  मुश्क़िल है. हमारे समय के एक बड़े राजनेता राममनोहर लोहिया ने यह कहने के लिए कि जीवन में तटस्थता जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, एक प्राचीन कथन ‘देह धरे का दण्ड’ का सहारा लिया था. आप जब भी किसी चीज़ को देखते हैं, एक ख़ास कोण से ही उसे देख सकते  हैं. जब मैं आपके सामने खड़ा होकर आपको देखता हूं तो मुझे आपका चेहरा नज़र आता है, और जब मैं आपके पीछे जाकर आपको देखता हूं तो मुझे आपकी पीठ नज़र आती है. मैं पेट और पीठ दोनों को एक साथ देख ही नहीं सकता. यही तो देह धरे का दण्ड है. और यही बात हम जीवन में भी देखते हैं. मेरी सहानुभूति जिसके साथ होती है मैं उसी के नज़रिये से चीज़ों को देखता हूं, दावा भले ही तटस्थता का करूं. हो सकता है मेरा  झुकाव कभी कम और कभी ज़्यादा हो, लेकिन यह स्थिति शायद ही कभी आ पाती हो कि झुकाव हो ही नहीं. और यह झुकाव, यह अपने नज़रिये से चीज़ों को देखना इतना सहज-स्वाभाविक होता है कि हमें उसका एहसास तक नहीं होता.

ये सारी बातें मुझे उस रोहतक काण्ड के सन्दर्भ में याद आई जिस पर पिछले सप्ताह मैंने अपने इस कॉलम में चर्चा की थी. इस बीच  अलग-अलग संचार माध्यमों पर उस प्रकरण पर इतनी अधिक चर्चाएं हुई हैं और हो रही हैं कि अब यह कहना बहुत कठिन हो गया है कि असल में हुआ क्या था! कोई एक पक्ष पर आरोप लगा रहा है तो कोई दूसरे पक्ष पर. और ऐसा अन्य बहुत सारे मामलों में भी हम देखते रहते हैं. कभी यह सब इतने बेबाक तरीके से होता है कि बहुत आसानी से यह बात समझ में आ जाती है कि अगर कुछ कहा जा रहा है तो क्यों कहा जा रहा है, उससे किसको लाभ होगा और किसकी हानि होगी; और कभी यह काम इतनी बारीकी से किया जाता है कि आपको तनिक भी सन्देह नहीं होता कि सच बयान करने के आवरण में कोई खेल खेला जा रहा है. इधर के बरसों में बहुत सारे मामलों में हमने यह देखा है कि आज जिसे महान कहकर प्रचारित और स्थापित किया गया, उसकी हक़ीक़त तो कुछ और ही थी. इधर जैसे-जैसे संचार माध्यमों की संख्या और सक्रियता बढ़ी है छवि निर्माण और छवि विध्वंस ने बाकायदा एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप ले लिया है.  लेकिन मैं इसे पूरी तरह माध्यम का दुरुपयोग भी नहीं कह सकता. इसलिए नहीं कह सकता कि अभी कुछ क्षण पहले ही तो मैंने दृष्टिकोण की बात की है, और मैं उस बात में पूरा विश्वास रखता हूं. जब मेरा अपना कोई दृष्टिकोण होगा तो बहुत स्वाभाविक है कि मैं चीज़ों को उसी की मार्फत देखूंगा. और जब मैं किसी चीज़ को अपने कोण से देखता हूं तो फिर बस इतना-सा काम और रह जाता है कि उसका वर्णन करते हुए किसी चीज़ को थोड़ा हलका कर दूं और किसी चीज़ पर कुछ अतिरिक्त बल दे दूं. यही हम आजकल  अपने चारों तरफ घटित होते देख रहे हैं. 

एक व्यक्ति कुछ ग़लत करता है और बाद में क्षमा याचना कर लेता है. अब यह आप पर निर्भर है, यानि आपके नज़रिये पर कि आप उसके ग़लत किए पर बल देते हैं या क्षमा याचना पर! लेकिन इतना सब कह चुकने के बाद भी बात जब निष्कर्ष की आती है तो मुझे अपने समय के एक प्रखर रचनाकार बल्ली सिंह चीमा के ये शब्द  याद आ जाते हैं:   
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी   के  पक्ष  में हो  या कि आदमखोर हो ।।
क्या आपको नहीं लगता कि अगर कोई आदमी के पक्ष में है तो फिर उसकी पक्षधरता का स्वागत ही होना चाहिए?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे सात्पाहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 09 दिसम्बर 2014 को 'देह धरे का दण्ड: अपना-अपना नज़रिया'  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


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