Tuesday, December 16, 2014

हनीमून और पुरुष मानसिकता

कुछ बातें ऐसी हैं जो एकबारगी तो चौंकाती हैं लेकिन जब उन पर तसल्ली से विचार करते हैं तो आपकी प्रतिक्रिया बदल जाती है. मेरे साथ ऐसा ही हुआ. हाल ही में जब मधु चन्द्रिका यानि हनीमून के बारे में किए गए एक सर्वे के परिणामों  के बारे में पढ़ा तो बहुत अजीब लगा. सर्वे ने बताया कि ज़्यादातर भारतीय पुरुष हनीमून पर किसी या किन्हीं और युगलों के साथ जाना पसन्द करते हैं और इस दौरान ली गई अपनी अंतरंग छवियों को सोशल मीडिया पर साझा करना भी उन्हें अच्छा लगता है. ये दोनों ही बातें खासी चौंकाने वाली हैं. विवाह के बाद का यह रिवाज़, जो हमने पश्चिम से आयात किया है अब हमारे रीतिरिवाज़ों का भी उसी तरह एक अभिन्न अंग बन चुका है जैसे ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद जूता चुराई हमारी रस्मों की लिस्ट में शामिल हो गई है. और इसमें चौंकने, दुखी होने या खुश होने जैसी कोई बात नहीं है. वो गाना है ना, ‘जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुब-हो  शाम...’  यानि जीवन में एक ही चीज़ स्थिर है और वो है परिवर्तन. आदि मानव के जीवन में तो विवाह  भी नहीं था, बल्कि परिवार भी नहीं था. ये सब बाद में ही तो आए. संयुक्त परिवार सिमट कर बहुत छोटे हो गए, और विवाह के रीति रिवाज़ भी काफी बदल गए. अलबत्ता, बहुत सारी चीज़ें अवशेष के रूप में बची हुई भी हैं जैसे वर का योद्धा वाला रूप, अश्वारोहण और  तलवार, कमरबन्द वगैरह और बारात के रूप में साथ चलती सेना. लेकिन इनका केवल प्रतीकात्मक रूप ही बचा है और पता नहीं कब वो भी लुप्त हो जाए. वैसे भी असल विवाह पर बहुत कम बल रह गया है, उससे ज्यादा महत्व तो वरमाला वाली रस्म का हो गया है और अधिकतर मेहमान तो उसके बाद खा-पीकर और वर वधू को आशीर्वाद देकर, जो कि एक लिफाफे के रूप में होता है, चले ही जाते हैं.

हां,  तो बात कर रहा था हनीमून की. इस प्रथा के मूल में यह भाव रहा होगा कि परिवार की भीड़-भाड़  से दूर नव युगल एक दूसरे को अच्छी तरह से जान समझ कर नव जीवन का शुभारम्भ करें. लेकिन जिस सर्वे की मैं बात कर रहा हूं वह तो इस प्रथा का यह रूप नहीं रहने दे रहा है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि सामाजिकता की जड़ें हमारे जीवन में इतने गहरे तक उतरी हुई हैं कि हम उससे दूर जाना ही नहीं चाहते हैं, अपने बहुत अन्तरंग पलों  में भी! लेकिन तस्वीरों को साझा करने की इच्छा को आप क्या कहेंगे? कुछ समय पहले मैं ऐसे ही एक प्रकरण का एक किरदार बन गया. फेसबुक पर मेरे एक युवा मित्र ने अपने हनीमून की कुछ ऐसी तस्वीरें पोस्ट कीं, जो कुछ ज्यादा ही निजी थीं. मैंने उन्हें इनबॉक्स में एक सन्देश भेज कर बहुत विनम्रता से यह अनुरोध किया कि वे उन तस्वीरों को हटा  दें, और आपको यह जानकर  आश्चर्य  होगा कि वे मुझ पर नाराज़ हो गए  और लगे पूछने कि मैंने उन्हें ऐसी सलाह क्यों दी? ज़ाहिर है कि मैंने क्षमा याचना करते हुए अपनी सलाह वापस लेने में ही कुशल समझी. शायद बदले वक़्त और बदली पीढ़ी का यही तकाज़ा हो! कहीं  ऐसा तो नहीं है कि ये तस्वीरें साझा करके हम इस बात का विज्ञापन करते हैं कि देखो, यह मेरी ‘उपलब्धि’  है (पुरुष वर्चस्व!) या मैं इतना समृद्ध  हूं कि अमुक जगह पर हनीमून मना रहा हूं!   

लेकिन जिस सर्वे की मैं बात कर रहा हूं उसमें एक बात अवश्य ऐसी हैं जो चौंकाती हैं. यह सर्वे कहता है कि विवाह के बाद हनीमून के लिए कहां जाया जाए, इस बात का फैसला प्राय: वर ही करता है और इस फैसले में वधू की भूमिका शून्य या नगण्य होती है. यह बात मुझे चौंकाने वाली इसलिए लगी कि सारे बदलावों के बावज़ूद जिन परिवारों में हनीमून पर जाने का रिवाज़ बढ़ा है वे ऐसे हैं जहां वर और वधू खासे शिक्षित हैं, और बहुत सारी वधुएं बारोज़गार यानि आर्थिक रूप से आत्म निर्भर भी होती हैं. लेकिन जब यह सर्वे कहता है कि अधिकांश वधुएं भी इस बात को स्वीकार करती हैं कि हनीमून के लिए कहां जाना है इसका निर्णय करने का हक़ पुरुष को है क्योंकि वही पैसा खर्च कर रहा है, और रिश्तों के निर्वहन में पुरुष की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है, तो न केवल चौंकना पड़ता है, दिल में दर्द भी होता है. इस उल्लास यात्रा की प्लानिंग में उनकी आवाज़ का न होना न सिर्फ चौंकाता है, हमारे पारम्परिक पारिवारिक ढांचे में स्त्री की हैसियत पर भी एक टिप्पणी करता है.  लेकिन इस हालत में बदलाव आएगा, यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए. 
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मंगलवार, दिनांक 16 दिसम्बर 2014 को मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में शुभचिंतक बनकर सलाह दी तो मांगनी पड़ी माफ़ी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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