Tuesday, June 10, 2014

वक़्त की पाबन्दी के शिकार

हम लोगों में चाहे लाख बुराइयां हों, एक बात की तारीफ करनी पड़ेगी. हम समय के ग़ुलाम तनिक भी नहीं हैं. समय अपनी गति से चलता है और हम अपनी. भले ही अंग्रेजों ने हमें काफी समय गुलाम बनाए रखा और अपनी बहुत सारी बुराइयां हम पर थोप दीं, वक़्त की पाबन्दी न वे हमें सिखा सके और न हमने उनसे सीखने की कोई कोशिश की. अब तो हालत यह है कि अपनी तमाम अंग्रेज़ियत के बावज़ूद हम लेट लतीफी को बड़े गर्व के साथ इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम कह कर सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं. आप किसी भी कार्यक्रम के आयोजक से, जब वो आपको अपने आयोजन का निमंत्रण पत्र थमा रहा हो, बात कीजिए,  वो बड़े बिन्दास अन्दाज़ में आपसे कहेगा कि हालांकि कार्यक्रम का समय कार्ड में चार बजे छापा गया है, आप साढ़े  चार बजे तक आ जाएं. पिछले  दिनों एक आयोजन में एक बहुत बड़े नेता जी को तो यह कहते सुनने का भी सौभाग्य मुझे मिल चुका है कि अगर उन्हें बुलाना है तो इंतज़ार करने के लिए तैयार रहें. यहीं यह भी बताता चलूं  कि वे महज़ ढाई घण्टा देर से पधारे थे. इसे कहते हैं ऊंचे लोग ऊंची बात!

लेकिन इन सारे ऊंचे और बड़े लोगों के बीच, कुछ मूर्ख ऐसे भी हैं जिन पर इस पूरे माहौल का कोई असर नहीं होता है और स्वतंत्र भारत में जीते और सांस लेते हुए भी वे समय के ग़ुलाम बने रहते हैं. निर्धारित समय जैसे-जैसे निकट आता है उनकी हृदय गति तेज़ होने लगती है और घड़ी की सुई अगर उस निर्धारित समय को छू कर आगे बढ़ जाए तो उन्हें लगता है कि बस अब तो प्रलय दरवाज़े तक आ पहुंची है. ऐसे लोगों से  उनके घर  वाले तो तंग रहते ही हैं, वे खुद भी कम परेशान नहीं होते हैं. हमारे एक नज़दीकी  मित्र हैं जो समय के बड़े पाबन्द हैं. एक बड़े पद पर रह चुके हैं और समाज में थोड़ा मान है इसलिए गाहे-बगाहे, यानि जब कोई वर्तमान उच्च पदासीन नहीं मिलता है तो  लोग उन भूतपूर्व जी को भी अपने आयोजनों की शोभा बढ़ाने के लिए बुला लिया करते हैं. इस समय की पाबन्दी ने उन्हें कई दफा अजीब-अजीब हालात में डाला है और उन सबसे सबक लेते हुए अब तो वे भी अपने आयोजकों को ठोक बजाकर सही समय बताने के लिए विवश कर लेते हैं और कोशिश करते हैं कि वास्तविक समय पर, न कि कार्ड में दिए गए समय पर,  आयोजन स्थल पर पहुंचें. लेकिन फिर भी कभी-कभी हादसे हो ही जाते हैं. वो कहते हैं न कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी.

हुआ यह कि पिछले दिनों छोटे बच्चों के एक स्कूल ने उन्हें अपने  आयोजन में बुलाया. हमारे मित्र के बहुत पूछने पर आयोजकों ने उन्हें आश्वस्त किया कि मामला क्योंकि छोटे बच्चों का है, वे कार्यक्रम एकदम  सही समय पर शुरु और ख़त्म करना चाहेंगे, और इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से भी हमारे इस मित्र से आग्रह किया कि वे समय पर पहुंच जाएं. अब हमारे मित्र  ठहरे अपनी आदत से लाचार. पहुंच गए ठीक समय पर. लेकिन वहां ऐसा सन्नाटा पसरा था जैसे कोई आयोजन होना ही नहीं है. पन्द्रह  बीस मिनिट  इधर उधर घूम फिर कर जब वे फिर आयोजन स्थल पर पहुंचे तो सौभाग्य से दरवाज़े खुल चुके थे और वे अन्दर जा सके. सभागार तक पहुंचे तो वहां सफाई का काम चल रहा था. कुछ संकोच के साथ वे आगे की एक सीट की तरफ बढ़े तो वहां खड़े चौकीदार ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि वे सीटें तो ख़ास मेहमानों के लिए आरक्षित हैं. अब बेचारे वे उस चौकीदार को क्या कहते. मन मारकर और खुद को यह दिलासा देते हुए कि अभी जब आयोजक आकर ससम्मान उन्हें मंच पर ले जाएंगे तो इस चौकीदार को पता चलेगा कि उसने किस वी आई पी को रोका था, सातवीं कतार में बैठ गए. ख़ैर कोई आधे घण्टे बाद कुछ हलचल हुई, और आयोजक गण अपने मुख्य अतिथि स्थानीय विधायक जी के साथ   प्रकट हुए और बिना दांये-बांये देखे, चमचमाती फ्लैश लाइट्स के बीच सीधे मंच की तरफ बढ़ गए! न उन्होंने हमारे मित्र की तरफ देखा और न मित्रवर को यह उपयुक्त लगा कि वे खुद स्टेज पर चले जाएं! लेकिन इतना निश्चित  है कि उस वक़्त उनके मन में अपने समय पर पहुंचने की आदत को लेकर गुस्सा ज़रूर उमड़ा  होगा. अगर वे भी देर से पहुंचे होते तो उनकी ऐसी बेकद्री नहीं हुई होती! अब देखना है कि इस अनुभव से वे क्या सबक लेते हैं!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 10 जून 2014 को जब वक़्त की पाबन्दी ने कराई किरकिरी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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