Tuesday, June 3, 2014

परीक्षा परिणामों के मौसम में

परीक्षा  परिणामों के इस मौसम में दो बातें ख़ास तौर पर याद आ रही हैं. बहुत वक़्त नहीं बीता है जब परीक्षा परिणाम जानने के लिए अख़बार का इंतज़ार करना होता था, और आप अख़बार के प्रकाशन वाले शहर से जितनी  दूर होते यह इंतज़ार भी उतना ही लम्बा होता जाता था. मुझे याद है कि उदयपुर में मेरे भाई साहब बड़े यत्नपूर्वक किसी को रेल्वे स्टेशन भेजकर ब्लैक में बोर्ड के रिज़ल्ट वाला  अख़बार मंगवाया करते और फिर अपनी दुकान पर लोगों से पर्चियों पर उनके रोल नम्बर लिखवा कर लाउड स्पीकर पर परिणाम बताया करते थे. उस ज़माने में उनकी यह जन सेवा बेहद लोकप्रिय थी. अब कोई इस बात की कल्पना भी नहीं करेगा.  दूसरी बात यह कि आज जब बच्चों को 97-98 प्रतिशत लाते देखता हूं तो यह बात याद आती है कि हमें जिन प्रोफेसरों ने पढ़ाया उनमें शायद ही कोई प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण रहा हो!

निश्चय ही आज की पीढ़ी पहले वाली पीढ़ियों की तुलना में  ज़्यादा सजग, ज़्यादा मेहनती, ज़्यादा सुविधा सम्पन्न, ज़्यादा प्रतिभाशाली  और ज़्यादा प्रखर है. इस बात की पुष्टि के लिए किसी शोध की ज़रूरत नहीं है. आप किसी चार पाँच बरस के बच्चे से थोड़ी देर बात कीजिए, ख़ुद जान जाएंगे. लेकिन इस ‘ज़्यादा’  ने इस पीढ़ी के सामने संकट भी कम खड़े  नहीं किए हैं. आज रोज़गार देने वाले के सामने एक से बढ़कर एक रोज़गाराकांक्षी खड़े हैं, और जो औसत दर्ज़े का है उसे कोई पूछने को तैयार नहीं है. संकट वाकई बड़ा और गहरा है, लेकिन अपने आस पास नज़र दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि इसी संकट में लोग नई राहें भी निकाल रहे हैं.

यहां बैंगलोर में रहते हुए और नई पीढ़ी के बहुत सारे चमकते सितारों से बातें करते हुए समझ में आता है कि  कैसे ये लोग अपनी सूझ-बूझ और नई सोच की मदद से अपने लिए नई राहों का निर्माण कर रहे हैं. रोज़गार और काम के अवसर आपके चारों तरफ मौज़ूद हैं, बस ज़रूरत उनको देखने की और उनका इस्तेमाल करने की है. यहां मुझे पता चला कि एक पूरी स्ट्रीट ही स्टार्ट अप स्ट्रीट के नाम से जानी जाने लगी है. यानि एक ऐसी गली जिसमें तमाम नई शुरु हुई कम्पनियों के दफ्तर हैं. युवा लोग अपने साधनों के अनुरूप नई कम्पनियां बनाते हैं और आहिस्ता आहिस्ता उनका विस्तार करते जाते हैं. उनके काम  भी कम मज़ेदार  नहीं हैं. मसलन कुछ लोगों ने यह देखकर कि अलग-अलग जगहों से आए युवा घर जैसे खाने को तरसते हैं, एक कम्पनी बना दी जो गृहिणियों से सम्पर्क  स्थापित कर उनका बनाया खाना इन लोगों तक पहुंचा देती है. बहुत सारी गृहिणियां खुद अपनी पाक कला के बूते पर काफी अच्छी कमाई कर रही हैं. कोई पार्टियों के लिए खाना सप्लाई करती हैं तो कोई उत्सवों के लिए केक वगैरह बना कर अपने समय का सदुपयोग और अपने संसाधनों का विस्तार करती हैं. इन्हीं नई पहलों के ज़्यादा कामयाब और सुपरिचित रूप हैं फ्लिपकार्ट और ग्रुपऑन जैसी कम्पनियां. 

और ऐसा भी नहीं है कि रोज़गार के ये मौके तकनीकी रूप से समृद्ध या अभिजात वर्ग के लोगों को ही मिल रहे हैं. बल्कि मैं तो अपने चारों तरफ़ देखता हूं कि जिसमें किसी भी तरह की कोई योग्यता है और जो निष्ठा से काम करने को तैयार है उसके पास काम की कोई  कमी नहीं है. घरों में काम करने वाली बाइयां, खाना बनाने वाले, ड्राइवर सभी अपनी-अपनी काबिलियत और मेहनत के बल पर सम्मान और स्वाभिमानपूर्वक अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. बल्कि अगर कभी आप काम देने वालों की नज़र से देखें तो पाएंगे कि वे अच्छा काम करने वालों की खोज में हमेशा रहते हैं और  ठीक मानदेय देने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है. लेकिन इसके बावज़ूद अच्छा काम करने वालों की उनकी तलाश पूरी नहीं होती है.

ऐसे में कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या हमारे देश में वाकई बेरोज़गारी है? बात थोड़ी कड़वी  लग सकती है लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि जो लोग बेरोज़गारी का शोर मचाते हैं वे बिना काम किए तनख़्वाह के या कम काम के लिए ज़्यादा तनख़्वाह के  तलबगार हैं? उन्हें सिर्फ और सिर्फ वो सरकारी नौकरी चाहिए जिसमें वेतन की तो गारण्टी हो लेकिन काम करने की कोई ख़ास बंदिश न हो! निश्चय ही यह अति सामान्यीकरण है. सारे लोग ऐसे नहीं हैं. और बेशक कुछ हैं जिनके पास योग्यता है लेकिन कोई उस योग्यता को देख,  सराह और ले नहीं रहा है. लेकिन अपने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाएंगे तो आपको भी लगेगा कि हमारे यहां काम खूब है, काम करने के मौके भी खूब हैं, लेकिन काम करने की इच्छा ज़रा कम है! 
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 03 जून, 2014 को चाह से बन जाते हैं रोज़गार लेने की जगह देने वाले शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल  पाठ.    
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