Sunday, March 8, 2009

आनन्द के पीछे छिपा अवसाद


अगर आपका यह खयाल है कि भ्रष्टाचार हिन्दी व्यंग्य लेखकों की कमज़ोरी है, तो कृपया विख्यात पत्रकार मैक्लीन जे स्टोरर की इस कृति, फॉर्वर्ड ओ पीजेण्ट को ज़रूर पढें. आप मान जाएंगे कि यह तो सर्वव्यापी है. अगर आप पहले से भी ऐसा मानते हैं तो भी कोई हर्ज़ नहीं. किताब फिर भी आपको निराश नहीं करेगी. तो, पहले किताब की ही बात कर ली जाए.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक काल्पनिक शाखा यू एन मेट एक युवा ब्रिटिश समाज विज्ञानी डॉ फिलिप स्नो को वियतनाम भेजना चाहती है. इस शाखा का एक कर्मी, एक युवा स्वीडी, वहां से लापता हो गया है और इस कारण वहां भेजी जाने वाली सहायता राशि रुक गई है. यह भी शिकायत मिलती रही है कि बर्ड फ्लू पर शोध के लिए जो राशि दी जाती रही है उसके उपयोग में अनियमितताएं बरती जा रही हैं. स्नो को इस सबकी पड़ताल करनी है. स्नो वियतनाम के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता. लेकिन उसने सुन रखा है कि वहां की धरती पर एक खास तरह का हानिप्रद रसायन, जिसका नाम एजेण्ट ऑरेंज है, पाया जाता है. यह रसायन कैंसर उपजाता है. ज़ाहिर है कि वह वियतनाम जाने को उत्सुक नहीं है. लेकिन उसे जाना पड़ता है.

स्नो के वियतनाम पहुंचने से वे सारे अधिकारी परेशान हो उठते हैं जो अपने-अपने तरीके से उस शोध राशि को खर्च करने की तैयारी में थे और हैं. वे लोग स्नो को अपनी जांच से विचलित करने के लिए अजीबो-गरीब हरकतें करते हैं, और वे हरकतें ही इस कृति को दिलचस्प बनाती हैं. किसम-किसम के ये अधिकारी बेहद लोलुप हैं और शुरू-शुरू में तो स्नो के प्रति लिजलिजी विनम्रता का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जब उन्हें लगता है कि स्नो उनके झांसे में आने वाला नहीं है और अपने काम को ईमानदारी से अंजाम देने की ज़िद्द पर अड़ा है तो वे हताश होकर जासूसी के गम्भीर आरोप में उसके घर पर आधी रात गए एक छापा पड़वा देते हैं. वियतनाम में स्नो खुद को जिन चरित्रों से घिरा पाता है वे किसी भी तरह उस तथाकथित रसायन एजेण्ट ऑरेंज से कम घातक नहीं हैं, चाहे वे आक्रामक मार्क्सिस्ट चिंतक हों, वियतनाम में रह रहे विदेशी नशेड़ी हों, ज़रूरत से ज़्यादा सजग भिखारी हों, पगले वेटर हों या कठपुतली नौकरशाह.

रचना की रोचकता उन सारी स्थितियों में है जिन्हें ये बेईमान लोग अपनी कारगुजारियों से या बचाव के लिए पैदा करते हैं. एक फुटबाल मैच के दौरान वान इम्स्ट द्वारा खराब हो चुके टीके लगाने और उनके द्वारा जर्मन खिलाड़ियों की तबियत खराब हो जाने का वर्णन हो या एक मेक्सिकी अधिकारी की वियतनाम यात्रा के दौरान उसे खुश करने के हास्यास्पद प्रयासों और खुद उस अधिकारी की बेहूदा हरकतों का वर्णन, लेखक एब्सर्ड स्थितियां रचकर स्थितियों की भयावहता उजागर करने में कामयाब रहता है.

उसके इन प्रयासों में उसकी व्यंग्यात्मक भाषा खूब मददगार सिद्ध होती है. कुछ बानगियां पेश हैं: ‘वियतनाम में रहना ऐसा ही था जैसे आपको ओमेन के बीच धकेल दिया गया है. चारों तरफ डरावनी बातें घटित हो रही थीं और उनके खत्म होने के कोई आसार भी दिखाई नहीं दे रहे थे.’ या ‘पूरा परिवार एक आउटडोर कैफे में एक बड़ी गोल टेबल के चारों तरफ बैठ कर फुटबाल के आकार की एक आइसक्रीम को निपटाने की कोशिश कर रहा था’ या डॉ स्नो के बारे में लेखक की यह टिप्पणी कि ‘वियतनाम में उसकी नियति यही थी कि या तो वह उपहास का पात्र बने या एक एटीएम मशीन बना रहे. अक्सर तो उसे दोनों ही भूमिकाओं में रहना पड़ता था.’

स्टोरर ने खुद 15 बरस वियतनाम में बिताये हैं इसलिए उन्हें वहां की अन्दरूनी स्थितियों की अच्छी जानकारी है, और उस जानकारी का उन्होंने इस किताब में बहुत उम्दा तरह से इस्तेमाल किया है. फार्वर्ड ओ पीजेण्ट की कथा निकोलाई गोगोल की विख्यात कृति ‘इंस्पेक्टर जनरल’ की याद ताज़ा करती है तो इसका अन्दाज़े-बयां श्रीलाल शुक्ल की अमर कृति ‘राग दरबारी’ का स्मरण कराता है. किताब आपको बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब है. आप पढते हुए आनंदित होते हैं, लेकिन उस आनंद के पीछे गहरा अवसाद भी घनीभूत होता रहता है.
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Discussed book:
Forward O Peasant
By Maclean J Storer
Published by Gauss Publishing
Paperback, 324 pages
Price US $ 16.95

राजस्थान पत्रिका के  रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 08 मार्च 2009 को प्रकाशित.



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