Saturday, March 7, 2009

हम तो ऐसे हैं भैया

कोई चार बरस बाद फिर से दिल्ली के इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आना हुआ तो उसकी बदली शक्ल-सूरत देख कर बड़ा अच्छा लगा. चौबीस घण्टों के अंतराल में ही तीन अलग-अलग हवाई अड्डों को छूने का मौका मिला और अलग-अलग तरह के अनुभव हुए. दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर पहले से ज़्यादा चमक-दमक और सुविधाएं नज़र आईं लेकिन भीड़-भाड और अव्यवस्था में कोई बदलाव नहीं मिला. लंदन का हीथ्रो हवाई अड्डा अपनी विशालता की वजह से आतंकित करता लगा लेकिन यह भी महसूस हुआ कि उस विशालता के बावज़ूद वहां कोई अव्यवस्था नहीं है. अमरीका के सिएटल हवाई अड्डे को हालांकि उतना बड़ा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हमारे अपने हवाई अड्डे से काफी बड़ा होने के बावज़ूद वह अपनी सुविधाओं और व्यवस्थाओं में बहुत अंतरंग और आत्मीय लगा. इमिग्रेशन काउण्टर के ठीक पीछे बहुत बडी दीवार पर अमरीका में स्वागत की घोषणा देवनागरी लिपि में भी देखकर गर्व भी हुआ प्रसन्नता भी.

जयपुर से दिल्ली तक का टैक्सी का सफर यों तो ठीक था लेकिन बहरोड़ से निकलते ही जो भीषण ट्रैफिक जाम लगा मिला तो एक बार तो हमारे होश ही उड़ गए. गाड़ी से बाहर निकल कर पता किया तो बताया गया कि अगले दो-तीन घण्टे तो इस जाम के हटने की कोई सम्भावना नहीं है. यानि हमारी फ्लाइट तो मिस होनी ही है. गाड़ी में बैठे-बैठे ही अमरीका में बैठी बेटी से भी लगातार बात हो रही थी और हमारी चिंता के घेरे में वह भी आ रही थी. लेकिन जैसे कोई चमत्कार हुआ, जाम हटा और हम कुछ देर से ही सही, हवाई अड्डे पहुंच गये. फ्लाइट सात बजे थी, हम छह बजे पहुंच गए. वहां जाकर पता चला कि फ्लाइट भी एक घण्टा लेट है. इस बात से और ज़्यादा राहत मिली. चैक-इन हम जयपुर में अपने घर से ही कर चुके थे. तकनीक ने ज़िन्दगी को कितना आसान बना दिया है! जिस काम के लिए हवाई अड्डे पर लम्बी जद्दो-जहद करनी पड़ती थी, वह तो घर बैठे दो-चार मिनिट में ही हो गया था. न केवल दिल्ली की, लन्दन की चैक-इन भी हमने घर से ही कर ली थी और अपने बोर्डिंग पास हमारे हाथों में थे, अब तो बस सुरक्षा जांच और सामान जमा करवाने का काम बाकी था. ये काम भी आसानी से हो गए.

हम भारत में हैं और भारतीयों के बीच हैं यह एहसास हुआ कुछ देर बाद. ब्रिटिश एयरवेज़ की दिल्ली-लन्दन फ्लाइट में जहाज के अन्दर घुसने के इंतज़ार में हम जहां बैठे थे, उस जगह के ठीक सामने एक टेलीफोन बूथ था. नज़ारा यह था कि एक आदमी फोन पर बात करता और दस उससे करीब-करीब सटकर अपनी बारी का इंतज़ार करते. इंतज़ार करते हुए वे खूब जोर-जोर से बातें भी करते जा रहे थे. ज़ाहिर है ये दोनों स्थितियां टेलीफोन करने वाले के लिए कष्टप्रद थीं. थोडी देर बाद एक और नज़ारा सामने आया. जैसे ही यह घोषणा हुई कि बोर्डिंग शुरू हो रही है, लोग दरवाज़ों की तरफ उमड़ पडे. कुछ इस अन्दाज़ में कि अगर पहले नहीं घुसे तो सीट से हाथ धोना पड़ जाएगा, जबकि हरेक की सीट पूर्व निर्धारित होती है. आप पहले जाएं या बाद में, सीट वही रहती है. बार-बार कहा जा रहा था कि पहले अमुक-अमुक श्रेणी के लोग प्रवेश करेंगे, लेकिन इसके बावज़ूद दूसरी श्रेणियों के यात्री भी भीतर जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. बेचारी हवाई कम्पनी की लड़कियों की हालत उन्हें रोकने में खराब हो रही थी. मैं सोच रहा था, भारत में अभी भी हवाई यात्रा समाज के अपेक्षाकृत सम्पन्न और शिक्षित वर्ग तक सीमित है, लेकिन इस वर्ग के व्यवहार से यह कहीं भी नहीं लगता कि किसी तरह के अनुशासन और व्यवस्था के संस्कार इनमें हैं. ऐसा ही थोड़ी देर बाद फिर से महसूस हुआ. हवाई जहाज जब उड़ान भरने लगता है तो यात्रियों से अनुरोध किया जाता है कि वे अपने सेल फोन, लप टॉप वगैरह बन्द कर दें, सीट बेल्ट बांध लें और सीट अगर पीछे की हुई है तो उसे सीधा कर लें. ज़्यादातर यात्रियों ने इन निर्देशों की अनदेखी की और बेचारी एयर होस्टेसों को हर यात्री से अलग-अलग इस बात का अनुरोध करना पड़ा. लंदन से सिएटल की फ्लाइट में जहां, भारतीय यात्री अपेक्षाकृत कम थे, यह देखने को नहीं मिला. यात्रियों ने स्वत: निर्देशों का पालन किया बल्कि, जो थोड़े बहुत भारतीय भी फ्लाइट पर थे, देखा-देखी उनका व्यवहार भी बेहतर था. आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब हम भारत में होते हैं तो हमारा व्यवहार अलग होता है, और जब हम भारत से बाहर होते हैं तो अलग!

क्या भारत में हम भारतीय हमेशा ऐसे ही रहेंगे?








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