Thursday, November 29, 2007

समतल नहीं हुई है दुनिया

लगभग दो साल पहले न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तम्भकार थॉमस फ्रीडमेन की एक किताब आई थी, ‘द वर्ल्ड इज़ फ्लैट’. इस किताब में स्थापित किया गया था कि कई घटकों ने, जिनमें तकनोलोजी प्रमुख है, बेहतर कनेक्टिविटी देकर और पारस्परिक सहयोग को बढाकर दुनिया को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए समतल बना डाला है. किताब बहुचर्चित रही और अभी भी बेस्ट सेलर सूचियों में जगह बनाये हुए है. शायद ही किसी ने फ्रीडमेन की इस स्थापना से असहमति जताई हो कि वैश्वीकरण हो चुका है. अधिकतर असहमतियां वैश्वीकरण के पक्ष-प्रतिपक्ष को लेकर हुई हैं.

लेकिन हाल ही में आई भारतीय मूल के प्रोफेसर पंकज घेमावत की किताब ‘रीडिफाइनिंग ग्लोबल स्ट्रेटेजी: क्रॉसिंग बॉर्डर्स इन अ वर्ल्ड व्हेयर डिफरेंसेस स्टिल मैटर’ इस अवधारणा का पुरज़ोर तरीके से खण्डन करती है. पंकज बार्सीलोना के आई ई एस ई बिज़नेस स्कूल और हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल में प्रोफेसर हैं. अपने एक लेख के लिए 2005 में उन्हें मैक किंसे अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है.

पंकज ने यह किताब फ्रीडमेन की किताब के जवाब में नहीं लिखी है. वे तो इस विषय पर पिछले दस सालों से काम कर रहे थे. उनकी दिलचस्पी यह जानने में थी कि क्यों कई शक्तिशाली उत्पाद वैश्विक बाज़ार में पिट जाते हैं, बावज़ूद इसके कि उनके ब्राण्ड नाम सुस्थापित होते हैं और उन्हें सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोडी जाती है. अपने सवाल का जवाब तलाशते हुए पंकज ने उन कई घटकों की पडताल की जिन्हें वैश्वीकरण का सूचक माना जाता है, जैसे लोगों, सूचना और धन का प्रवाह. इसके बाद उन्होंने यह पडताल की कि इनमें से कितने घटक देशों की सीमाओं के भीतर प्रवाहित होते हैं और कितने सीमाओं के पार! तभी उन्हें ज्ञात हुआ कि ज़्यादा संचरण तो देशों की सीमाओं के भीतर ही होता है. इससे पंकज इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम प्राय: सीमा पर के भेदों की अनदेखी कर जाते हैं. बडे उत्पादक बडे बाज़ार में अपना माल बेच डालने के लालच में, दुनिया को सीमा रहित मानने का भ्रम पालते हुए, सारी दुनिया के लिए मार्केटिंग की यकसां रणनीति तैयार करते हैं और फिर मुंह के बल गिरते हैं. पंकज ज़ोर देकर कहते हैं कि हमें दुनिया के देशों में जितनी समानताएं दिखाई जाती हैं असमानताएं उनसे बहुत अधिक हैं. यही कारण है कि दुनिया को फ्लैट मानकर अपना माल बेचने की रणनीतियां प्राय: असफल हो जाती हैं.

व्यापारिक रणनीतिकारों की एक बडी चूक पंकज को यह भी दिखाई देती है कि वे प्रवृत्तियों की बजाय छिट-पुट छवियों के आधार पर अपनी धारणाएं बनाते हैं और आंख मूंदकर वैश्वीकरण को स्वीकार कर लेते हैं. इस चूक को दुरुस्त करने के लिए पंकज आंकडा-आधारित प्रवृत्ति विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं. वे बताते हैं कि पूरी दुनिया की आबादी का महज़ 2.9 प्रतिशत ही इमिग्रेट हुआ है. इसी तरह पूरी दुनिया के पूंजी निवेश का मात्र दस प्रतिशत ही फॉरेन डाइरेक्ट इंवेस्टमेंट में लगा है और सबसे खास बात इण्टरनेट पर सूचनाओं की आवाजाही: पंकज तथ्यों के हवाले से बताते हैं कि तमाम सूचनाओं का मात्र बीस प्रतिशत अंश ही देशों की सीमाओं को लांघ पाता है. यानि 80 प्रतिशत सूचनाएं तो देशों की सीमाओं के भीतर ही संचारित होती हैं.

इन आधारों पर पंकज फ्रीडमैन की स्थापनाओं को खारिज करते हुए कहते हैं कि दुनिया अभी भी मोटे तौर पर असमतल ही है और संस्कृति, भौगोलिक स्थितियां, प्रशासनिक व आर्थिक संरचनाएं वगैरह अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं.
दरअसल पंकज की यह किताब बडे व्यवसायों के हित चिंतन के लिहाज़ से लिखी गई है. पंकज उन्हें बताना चाहते हैं कि वे यह भ्रम कतई न पालें कि सारी दुनिया यकसां हो गई है और उसे एक ही तरह का उत्पाद एक समान तरीके से बेचा जा सकता है. इसीलिए पंकज उन्हें समझाते हैं कि दुनिया अभी भी सेमी-ग्लोबलाइज़ेशन (अर्ध वैश्वीकरण) की अवस्था में है. इस तथ्य को समझकर ही व्यावसायिक कामयाबी की मंज़िल तक पहुंचा जा सकता है. यहीं पंकज यह कहना भी नहीं भूलते कि दुनिया के देशों के बीच के ये भेद व्यवाय के लिए कोई बाधा नहीं हैं. बल्कि, अगर कम्पनियां चाहें तो इन भेदों से और अधिक फायदे भी उठा सकती हैं.

ऐसा करने के लिए वे उन्हें एक रणनीति भी सिखाते हैं. इसके तीन मुख्य घटक हैं : ट्रिपल ए ट्राएंगल, केज और एडिंग. पंकज समझाते हैं कि किस तरह इन घटकों का इस्तेमाल कर कार निर्माता टोय़ोटा, सीमेण्ट निर्माता सीमेक्स, रिटेल श्रंखला वाल मार्ट, हेल्थकेयर उत्पादक प्रॉक्टर एण्ड गेम्बल, आई टी वाले आई बी एम, कोका कोला आदि ने सफलता प्राप्त की है. किताब का केन्द्र बिन्दु यह रणनीति ही है,

किताब का महत्व इस बात में है कि यह फ्रीडमेन के सोच पर एक अन्य कोण से विचार करने को प्रेरित करती है.
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Discussed Book:

Re defining Global Strategy: Crossing Borders in a World Where Differences Still Matter
By: Pankaj Ghemawat
Hardcover: 304 pages
Published by: Harvard Business School Press

$ 29.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में 29 नवम्बर 2007 को प्रकाशित.
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