Friday, October 19, 2007

लेखक का काम है सभ्यताओं को नष्ट होने से बचाना

कुछ असफ़लताओं की परिणति इतनी सुखद होती है कि उन्हें असफ़लता कहते भी संकोच होता है। 49 वर्षीय अमरीकी पर्वतारोही ग्रेग मोर्टेन्सन की असफ़लता का किस्सा कुछ ऐसा ही है। मिरगी ने ग्रेग की 23 वर्षीया बहिन क्रिस्टी को उससे जुदा कर दिया तो ग्रेग ने 1993 में एक पर्वतारोहण अभियान के द्वारा दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी, काराकोरम श्रंखला की के-2 पर विजय प्राप्त कर उसका नेकलेस वहां स्थापित करने की ठानी। दुर्भाग्य (या इसे सौभाग्य कहा जाए!) से ग्रेग अभियान में नाकामयाब रहे। इतना ही नहीं, इस जोखिम भरे अभियान से लौटते हुए वे अपने समूह से बिछड़ कर भटकते हुए उत्तरी पाकिस्तान के ऐसे दुर्गम क्षेत्र में जा पहुंचे जहां न पानी था, न खाना और न कोई आश्रय। तब उन्हें सात सप्ताह तक शरण और मदद देकर उनकी जान बचाई उस छोटे-से गांव के भोले-भाले बाशिन्दों ने। उसी दौरान ग्रेग ने देखा कि गांव इतना दरिद्र है कि एक शिक्षक का वेतन तक नहीं जुटा सकता और वहां के 84 बच्चे रेत पर लकड़ी की डंडियों से लिखने का प्रयास करते हैं। गांव वालों के प्रति प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्रेग ने वादा किया कि वे उस गांव का पहला स्कूल बनवायेंगे। और ग्रेग का यही वादा बन गया हमारे वक़्त की निहायत अविश्वसनीय मानवीय महागाथा जहां मात्र एक आदमी अपने विश्वास के बल पर ऐन तालिबान पैदा करने वाली धरती पर आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई में स्कूल और शिक्षा को हथियार बनाने में कामयाब होता है। ग्रेग खुद कोई अमीर नहीं थे। उन्होंने अपने घर सेन फ़्रांसिसको लौट कर अमरीका के 580 धनी मानी लोगों को खत लिखे। एन बी सी के टॉम ब्रोकॉ एकमात्र ऐसे सज्जन थे जिन्होंने जवाब में सौ डॉलर का चैक भेजा। ग्रेग ने अपना सब कुछ भी बेच डाला, लेकिन इससे भी महज़ दो सौ डॉलर ही जुट पाए। वे हताश होने ही को थे कि विस्कान्सिन के स्कूली बच्चों ने पेनी-पेनी जोड़कर 623 डॉलर उन्हें भेजे। इस बात से औरों को भी प्रेरणा मिली, अभियान ने गति पकड़ी और ग्रेग ने अगले एक दशक में सेण्ट्रल एशिया इन्स्टीट्यूट नामक अपने संगठन के माध्यम से पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के उस निहायत दुरूह, दुर्गम, दरिद्र और खतरनाक इलाके में खास तौर पर लड़कियों के लिए 58 स्कूल बनवा डाले। इस साल ये स्कूल कुल मिलाकर 24,000 बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं जिनमें से 14,000 लड़कियां हैं।
तो, एक असफ़ल पर्वतारोहण अभियान के सफ़ल शिक्षादान अभियान में परिणत होने की रोचक, रोमांचक और प्रेरक गाथा है ग्रेग मोर्टेन्सन की किताब ‘थ्री कप्स ऑफ़ टी : वन मेन्स मिशन टू प्रोमोट पीस……वन स्कूल एट अ टाइम’ । 6 मार्च 2006 को हार्ड कवर में प्रकाशित इस किताब का पेपर बैक संस्करण हाल ही में आया है। इस बीच इस किताब को किरियामा प्राइज़ फ़ॉर नॉन फ़िक्शन, न्यूयॉर्क टाइम्स का बेस्ट सेलर सम्मान, टाइम मैगज़ीन की ओर से एशियन बुक ऑफ़ द ईयर, मोण्टाना ऑनर बुक अवार्ड आदि मिल चुके हैं। मोर्टेन्सन के सह लेखक हैं डेविड ऑलिवर रेलिन। रेलिन विस्तार से ग्रेग के प्रयत्नों का वर्णन करते हैं, गांव के प्रेरक चेहरों को उकेरते हैं और मुज़ाहिदीन, तालिबान अफ़सरों तथा महत्वाकांक्षी लड़कियों से हमारी मुलाक़ात कराते हैं। जिन इलाकों में ये लोग काम कर रहे थे वहां अमरीकियों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। मोर्टेन्सन को भी अगवा करने की कोशिशें हुईं, नाराज़ मुल्लाओं ने दो बार उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी किए, 9/11 के बाद अमरीकियों ने उन्हें मुस्लिमों के बीच काम करने के लिए डराया धमकाया, लेकिन वे अपने मिशन से नहीं डिगे। नेल्सन मण्डेला ने कहा था कि दुनिया को बदलने के लिए शिक्षा से अधिक कारगर कोई हथियार नहीं है। अपने अनुभवों ने मोर्टेन्सन को भी यही सिखाया है कि आतंकवाद से लड़ाई बमों से नहीं किताबों से ही लड़ी जा सकती है। उन्होंने कहा भी है कि आप कण्डोम बांट सकते हैं, बम गिरा सकते हैं, सड़कें बना सकते हैं, बिजली ला सकते हैं, लेकिन लड़कियों को शिक्षित किए बगैर समाज को नहीं बदल सकते।
368 पन्नों की यह किताब दिलचस्प होने के साथ ही प्रेरक भी है। कुछ समीक्षकों ने इसे अपने समय की महत्वपूर्ण साहस गाथा कहा है तो कुछ ने कहा है कि यह हमारे समय को जानने-समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ‘तालिबान : मिलिटेण्ट इस्लाम, ऑयल एण्ड फ़ण्डामेण्टलिज़्म इन सेण्ट्रल एशिया’ नामक चर्चित किताब के लेखक अहमद रशीद ने तो यहां तक कहा है कि मोर्टेन्सन जो काम कर रहे हैं –निर्धनतम बच्चों को सन्तुलित शिक्षा देने का– उसकी वजह से अतिवादी मदरसों के लिए नए रंगरूट जुटाना मुश्क़िल होता जा रहा है। मुझे इस सन्दर्भ में अल्बेयर कामू याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि लेखक का काम है सभ्यताओं को नष्ट होने से बचाना। यह किताब इस कथन की पुष्टि करती है।
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