Saturday, October 20, 2007

दुनिया हमारे बगैर

तेज़ी से बढती दुनिया की आबादी और तकनीक का कल्पनातीत प्रसार. कहीं ऐसा तो नहीं कि मनुष्य प्रकृति से भी ज़्यादा शक्तिशाली बन गया है? हम बहुत तेज़ी से, हालांकि अनचाहे ही, मौसम को बदल रहे हैं, पारिस्थितिकी को बदल, प्रदूषित और यहां तक कि नष्ट कर रहे हैं, और अपने तथाकथित विकास को कुछ इस तरह धकिया रहे हैं कि इस पृथ्वी के अन्य जीवों को भी एक नए मानव-निर्मित विश्व से तालमेल बिठाने को मज़बूर होना पड रहा है.
ऐसे में, यह कल्पना कि अगर अचानक पूरी मानव-जाति लुप्त हो जाए तो क्या होगा?

यह दुष्टतापूर्ण कल्पना की है ‘ईको इन माय ब्लड’ (1999) पुस्तक के लेखक, जाने-माने और बहु पुरस्कृत पत्रकार एलन वाइज़मैन ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब ‘द वर्ल्ड विदाउट अस’ में. वाइज़मैन ने सवाल किया है कि अगर कोई विषैला वायरस या किसी भी तरह की कोई हलचल रातों-रात हमारी इस पृथ्वी को जन-विहीन कर दे तो जो कुछ मानव ने अब तक बनाया-संजोया है वह और कब तक बचा रह सकेगा. बेशक वाइज़मैन की यह कल्पना शरारती है, एक हद तक रुग्ण भी, लेकिन है विचारोत्तेजक. और यह भी कि किताब इस सवाल पर ही खत्म नहीं हो जाती, इससे आगे भी जाती है. किताब की उपादेयता इस बात से और बढती है कि अपने इस सवाल का जवाब पाने के लिए लेखक ने सॉलिड साइंस और कल्पना का जो मिश्रण तैयार किया है वह हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.

वाइज़मैन कहते हैं कि मानव जाति के विलुप्त हो जाने के दो दिन बाद ही मैनहट्टन के सबवे’ज़ को सूखा रखने वाले पम्प काम करना बन्द कर देंगे, कुछ ही दिनों बाद टनल्स में पानी भर जाएगा, सडकों के नीचे की सारी मिट्टी बह जाएगी और सदियों तक बने रहने के लिए निर्मित गगन चुम्बी अट्टालिकाओं की नींवें ढहने लगेंगी. रोज़मर्रा काम में आने वाली चीज़ें फॉसिल बन जायेंगी और सारी धातुएं गल-पिघलकर लाल रंग की चट्टानों जैसी दीखने लगेंगी. हो सकता है कि मनुष्य के शुरुआती दौर की कुछ इमारतें ही स्थापत्य के अवशेष के बतौर बची रह जाएं. यह सारी कल्पना वाइज़मैन ने बगैर किसी आधार के नहीं कर डाली है. इसके लिए उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों से चर्चा की, पर्यावरण वैज्ञानिकों, कला संरक्षकों, प्राणी वैज्ञानिकों, तेल शोधकों, यहां तक कि धर्म गुरुओं से भी गम्भीर विमर्श किया और विश्व भर के महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा की. तब जाकर तैयार हुई है यह 336 पन्नों की रोमांचक, उत्तेजक, अवसादक और सम्मोहक किताब. किताब के पन्नों से गुज़रते हुए वाइज़मैन की नीयत साफ हो जाती है. हालांकि वे एक भयावह तस्वीर उकेरकर आगत से हमें डराते हैं लेकिन उनका मक़सद है हमें अपने अंधाधुंध विकास के खतरों के प्रति सजग करना.

वाइज़मैन ने अपने वृत्तांत को इस सोच के साथ बुना है कि अगर पृथ्वी पर से सारा मानवीय दबाव एकबारगी ही खत्म हो जाए तो उस की प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी ! हमने जबसे और जो-जो ज़्यादतियां उस पर की हैं, उनसे पहले का महौल पुनर्स्थापित होने में कितना समय लगेगा. मानव-निर्मित कंकरीट का जंगल नष्ट हो जाने के बाद असली जंगल कितने समय में उग सकेगा? और, आदम के इस धरा पर अवतरित होने से पहले के हालात और स्वर्गोपम धरा की वापसी होगी भी या नहीं. क्या प्रकृति मनुष्य के सारे पद चिह्न मिटा पायेगी?
पर्यावरण के बारे में ज़्यादातर समकालीन किताबें स्यापा करके खत्म हो जाती हैं. वे यह बताने के लिए कि हम उसे कैसे और कितना बरबाद कर रहे, प्राकृतिक विश्व का गुणगान करती हैं. निश्चय ही उनका उद्देश्य तो परिवर्तन होता है पर उस उद्देश्य में वे प्राय: कामयाब नहीं हो पातीं, बल्कि कभी-कभी तो होता यह है कि ऐसी किताबें नींद की गोली बन कर रह जाती हैं. ऐसे में वाइज़मैन की इस किताब का महत्व और भी अधिक है . यह हमारे समय की सबसे बडी समस्या पर सर्जनात्मक और दिलचस्प तरीके से विचार करती है. किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से वाइज़मैन ने खुद का इलाज़ करने की पृथ्वी और मानवता की अद्भुत क्षमता को उजागर किया है. जब वे चेर्नोबिल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि 1986 के भीषण विकीरण रिसाव के बाद अब वहां जंतुओं की वापसी होने लगी है, या उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच के असैन्यीकृत क्षेत्र में लगभग विलुप्त हो चुके पहाडी बकरे और चीते 1953 से ही दिखाई देने लगे हैं, तो अन्धेरे में प्रकाश की किरण नज़र आती है. इसी तरह जब वे यह कहते हैं कि मानवीकृत विनाश के बावज़ूद हमारी कला-संस्कृति के कुछ उत्कृष्ट नमूने तो बचे ही रहेंगे तो वे बहुत बारीकी से विनाश की विभीषिका के खिलाफ एक ऐसा मूलभूत और कारगर विकल्प सुझाते हैं जो हमारे अपने विलोपन पर निर्भर नहीं है. इस तरह यह किताब हमारे अपने चतुर्दिक के बारे में सार्थक चिंता के उम्दा प्रयास के रूप में सामने आती है.

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