Tuesday, October 16, 2007

लेखक का मनोजगत

साहित्य के लिए वर्ष 2006 का नोबल पुरस्कार पाने वाले, 1952 में जन्मे तुर्की लेखक ओरहान पामुक के निबन्धों और कहानी की नई किताब “अदर कलर्स : एस्सेज़ एण्ड अ स्टोरी” हमें एक बडे लेखक के मनोजगत में झांकने का विरल अवसर प्रदान करती है. पामुक पिछले तीन दशकों से साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं. उनके सात उपन्यास और अनेक निजी, चिंतनपरक और आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित हो चुके हैं. नोबल पुरस्कार मिलने के बाद प्रकाशित इस पहली किताब में उनके इसी लेखन का एक उत्कृष्ट चयन संजोया गया है.

इस किताब में वे जैसे एक खिडकी खोलकर अपने जीवन की कुछ झांकियां हमें दिखाते हैं. बचपन में स्कूल के प्रति उनकी अरुचि, उनकी बेटी का अकाल अवसाद, धूम्रपान छोडने का उनका सफल संघर्ष, न्यूयॉर्क में अनायास टकरा गए एक फटीचर-से लुटेरे के खिलाफ बयान देने की आशंका से उपजा त्रास ऐसी ही कुछ झांकियां हैं. लेकिन वे केवल झांकियां ही नहीं देते. पासपोर्ट के लिए आवेदन करने या रिश्तेदारों के साथ किसी भोज में सहभागिता करने का विवरण देते-देते वे बहुत सहजता से आपको कल्पना की अद्भुत उडान पर भी ले जाते हैं. इसी तरह इस्ताम्बुल में आए एक भीषण भूकम्प के बाद के दिनों के हालात का वर्णन करते-करते वे हमें मनुष्य के मन के आदिम भय और उम्मीद के विशाल आकाश के सामने भी ले जाकर खडा करते हैं. पामुक ने खुद लिखा है कि “इस किताब में मेरे विचार, बिम्ब और जीवनांश हैं जो अब तक मेरे उपन्यासों में रूपायित नहीं हो पाये हैं”. लेकिन, इन सारे अंशों को एक साथ पढकर हम बहुत सघनता से जान पाते हैं कि उनके उपन्यासों की रचना किस गारे-मिट्टी से और किस चाक पर हुई है. अपने इस गैर-कथात्मक लेखन की अहमियत से पामुक अपरिचित नहीं हैं. तभी तो उन्होंने लिखा है, “इन अंशों को मैंने एक आत्मकथात्मक परिप्रेक्ष्य को केन्द्र में रखते हुए एक नई किताब के रूप में संजोया है.”
वैसे, पामुक बार-बार कथा की सामर्थ्य का बखान करते हैं, लॉरेंस स्टर्न और फ्योदोर दॉस्ताएवस्की जसे पुरोधाओं के लेखन के हवाले देते हैं, अपनी लिखी डायरियों से अंश उद्धृत करते हैं और खुद के उपन्यासों पर भी टिप्पणियां करते हैं. पामुक ने इस किताब में उपन्यास के महत्व पर बहुत बढिया टिप्पणी की है: “उपन्यास, कहानियां और मिथक पढकर हम उन विचारो से परिचित होते हैं जो हमारी दुनिया को संचालित करते हैं. कथा साहित्य हमें उन सच्चाइयों तक पहुंचाता है जिन्हें हमारे परिवार, हमारा स्कूल और हमारा समाज हमसे छिपाता रहा है. और, उपन्यास कला हमें खुद से यह पूछने की इज़ाजत देती है कि असल में हम कौन हैं?”

किताब के 75 से ज़्यादा अंशों में जो “जीना और सोचना”, “राजनीति, यूरोप और स्व की अन्य समस्याएं” जैसे खण्डों में विभक्त हैं, आत्म निरीक्षण और सांस्कृतिक विकास ये दो बिन्दु केन्द्रीय चिंता के रूप में उभरते हैं. उदाहरण के लिए, सहस्र रजनी चरित पर विचार करते हुए वे कहते हैं, “उन दिनों खुद को आधुनिक समझने वाले मुझ जैसे तुर्की पूर्वी साहित्य के क्लैसिक्स को एक गहन और अभेद्य जंगल की मानिन्द देखते थे.” पामुक का यह सोच उन्हें अंतत: राजनीतिक चिंताओं से जोडता है. एक जगह वे लिखते हैं, ”इराक में युद्ध के बारे में झूठी बातों और गुप्त सीआईए(CIA) कारागारों ने तुर्की में पश्चिम की विश्वसनीयता को इतना आहत किया है कि...देश के इस भाग में अब मुझ जैसे लोगों के लिए सही पश्चिमी जनतंत्र के लिए समर्थन जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है.”
जगहों, परिवार-जन और मिलने-जुलने वालों, लेखकों, संस्कृति, कला और राजनीति पर केन्द्रित ये लेख स्वतंत्र रूप से तो पठनीय और मननीय हैं ही, अपनी समष्टि में ये एक रचनाकार के रूप में पामुक की मानसिक संरचना से परिचित कराते हैं. पामुक बार-बार पढने और लिखने के समृद्धि कारक अनुभवों का गुणानुवाद करते हैं और अपनी इस पसन्द का ज़िक्र करते हैं कि टेबल के सामने अकेले बैठ कर सोचा जाए. उनके अनुसार लेखक का निर्माण एकांत, कल्पना और परकाया प्रवेश से होता है. पामुक के शब्द हैं, “ जब मैं लिखने की बात करता हूं तो सबसे पहले मेरे जेहन में कोई उपन्यास, कविता या साहित्यिक परम्परा नहीं आते, बल्कि एक ऐसा आदमी आता है जिसने खुद को एक कमरे में बन्द कर लिया है, वह टेबल के सामने बैठ गया है और अपने में डूब गया है. अनेकानेक छायाओं के बीच वह शब्दों से एक नई दुनिया रचता है...धैर्य से, ज़िद से, और उल्लास से.” और जब वह यह नई दुनिया रचता है तो उसके मन में यह खयाल बराबर बना रहता है कि उसकी अपनी जडें कहां हैं! जहां जडें हैं, वहां पूर्व और पश्चिम के बीच गहन संघर्ष है. यही कारण है कि प्रबुद्ध पाठक को पामुक के लेखन में ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की अनुगूंजें सुनाई पडती हैं. पश्चिम की साहित्यिक परम्पराओं से भली-भांति परिचित पामुक अपने देश की साहित्य धारा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि “तुर्की को दो प्रवृत्तियों, दो भिन्न संस्कृतियों, दो आत्माओं से व्यथित नहीं होना चाहिए. खण्डित मानसिकता (स्किज़ोफ्रेनिया) तो आपको बुद्धिमान ही बनाती है”. क्या पामुक का यह सम्बोधन भारत में भी नहीं सुना और गुना जाना चाहिए?


Discussed book:
Other Colors: Essays and a Story
By Orhan Pamuk
Translated by: Maureen Freely
Publisher: Knopf

यह आलेख राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ठ ' जस्ट जयपुर' में दिनांक 16 अक्टूबर 2007 को प्रकाशित हुआ है.
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