Wednesday, October 10, 2007

भाषा के बारे में नया चिंतन

भाषिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में सुविख्यात और वैज्ञानिक प्रतिष्ठान को अक्सर झकझोरते रहने वाले 52 वर्षीय संज्ञानात्मक वैज्ञानिक स्टीवेन पिंकर ने अपनी नई किताब ‘द स्टफ़ ऑफ थॉट : लैंग्वेज एज़ अ विण्डो इण्टू ह्यूमन नेचर’ से एक बार फिर वैचारिक उत्तेजना का वातावरण उत्पन्न किया है. पिंकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं और टाइम पत्रिका वर्ष 2006 में उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल कर चुकी है. करीब पांच साल पहले प्रकाशित उन की किताब ‘द ब्लैक स्लेट : द मॉडर्न डिनायल ऑफ ह्यूमन नेचर’ बहु चर्चित रही है. अपनी इस नई किताब में उन्होंने अपने प्रिय दो क्षेत्रों – भाषा और मानव प्रकृति की अनूठी जुगलबन्दी प्रस्तुत की है. यहां पिंकर ने यह पडताल करने की कोशिश की है कि हमारे शब्द किस तरह हमारी प्रकृति (या स्वभाव) को उजागर करते हैं. अगर हम किसी को गाली भी देते हैं तो उससे हमारी भावनाएं अभिव्यक्त हो जाती हैं. हमारी वक्रोक्तियां हमारे रिश्तों को प्रकट कर डालती हैं. पिंकर कहते हैं कि हमारी भाषा के छोटे-से-छोटे उपकरण हमारे मनोभावों का परिचय दे देते हैं. यहां तक कि हम अपने बच्चों के जो नाम रखते हैं उनसे भी उनसे तथा समाज से हमारे रिश्ते प्रकट हो जाते हैं. पिंकर यहां एक शास्त्रीय प्रश्न से भी जूझते हैं कि क्या हमारी भाषा हमारे विचारों को प्रभावित करती है?पिंकर बताते हैं कि भाषा हमारे मस्तिष्क की संरचना का प्रतिरूप होती है. जब हम किसी चीज़ के बारे में बात करते हैं तो उसके पीछे हमारी मानसिक बनावट की बडी भूमिका होती है. यही कारण है कि हम एक ही बात को अलहदा-अलहदा स्थितियों में अलग-अलग तरह से कहते हैं. कभी हम कहते हैं कि मैं पानी पी रहा हूं, कभी – मैं गिलास से पानी पी रहा हूं, और कभी- मोहन मुझे पानी पिला रहा है. पिंकर कहते हैं कि मानव मस्तिष्क एक ही बात को अनेक तरह से अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता है.
किताब के अलग-अलग अध्यायों में वे कार्य-कारण सम्बन्ध, नामकरण, गाली देना, और विनम्रता प्रदर्शन की उन उपकरणों के रूप में विशद व्याख्या करते हैं जिनके द्वारा हमारा मस्तिष्क सूचनाओं के प्रवाह को व्यवस्थित करता है. इसी सन्दर्भ में वे भाषा के लाक्षणिक और आलंकारिक प्रयोग पर विशेष बल देते हैं. पिंकर बताते हैं कि हम भाषा से दो काम लेते हैं. एक तो यह कि हम कोई सन्देश या सूचना देते हैं, और दूसरा यह कि उसी के द्वारा अपनी सामाजिक अवस्थिति की भी अभिव्यक्ति करते हैं. इस बात को वे एक उदाहरण से और स्पष्ट करते हैं. मान लीजिये आप डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं और अपने पास बैठे व्यक्ति से कहते हैं : “क्या आप वह नमकदानी मुझे देने का कष्ट करेंगे?” पिंकर समझाते हैं कि यह वाक्य बोलकर आप न केवल नमकदानी मांग रहे हैं, आप यह भी जता रहे हैं कि आप दूसरे को ऐरा-गैरा नहीं मानते हैं, और आपका स्वभाव आदेश देने का नहीं है. इसलिए यह वाक्य बेवजह विनम्र और औपचारिक नहीं है, बल्कि आपके स्वभाव का द्योतक भी है.

किताब का एक रोचक अंश मनुष्य की गाली देने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित है. पिंकर बताते हैं कि हम अपना गुस्सा पांच तरह से व्यक्त करते हैं : सेक्स, धर्म, मल-मूत्र त्याग, तिरस्कृत समूहों, और बीमारी-अपंगता विषयक अभिव्यक्तियों से. इन अभिव्यक्तियों में भी समय और समाज के अनुरूप परिवर्तन होता रहता है. मसलन कभी अंग्रेज़ी में अभिशाप के लिए ‘तुझे चेचक हो जाए’ जैसी अभिव्यक्ति प्रचलित थी. अब यह अभिव्यक्ति गायब हो गई है. कारण ज़ाहिर है. पिंकर यह भी बताते हैं कि गुस्से या शाप के लिए वर्जित शब्दों का प्रयोग तीव्र नकारात्मक भाव उपजाता है. इन शब्दों को पढने-सुनने से हमरे मस्तिष्क के बादाम के आकार वाले एक हिस्से जिसे एमिग्डाला के नाम से जाना जाता है में हलचल होती है. मस्तिष्क के इसी भाग में आक्रामकता, भय आदि नकारात्मक भावों की अवस्थितित मानी जाती है.
किताब का बहुत रोचक भाग है भाषा में आलंकारिकता या लाक्षणिकता के विश्लेषण वाला. जी नहीं, कवियों-लेखकों वाली आलंकारिक भाषा नहीं, बल्कि हमारी, आम आदमी की रोज़मर्रा की भाषा. भला इस भाषा में भी कोई आलंकरिकता हो सकती है? पिंकर ध्यान दिलाते हैं कि आप एक बार अपना बोला-लिखा एक पैरेग्राफ पढकर तो देखिए. आप पाएंगे कि उसमें पांच छह उपमा रूपक वगैरह मौज़ूद हैं. अगर आप गहराई से पडताल करें तो पाएंगे कि हमारा बोला हुआ 95% अलंकार ही है. ऐसा क्यों है? इसका जवाब भी पिंकर के पास है. वे कहते हैं कि मेटाफर यानि अलंकार नए विचारों को प्रकट करने का सरलतम तरीका है, क्योंकि इस तरह आप नई अभिव्यक्ति गढने के श्रम से बच जाते हैं. वे यह भी कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क काम ही इसी तरह से करता है, यानि हम साम्यों के रूप में ही सोचते हैं, इसलिए स्वाभाविक ही है कि हमारी भाषा में भी साम्य (अलंकार) खुद-ब-खुद चले आते हैं. पिंकर यह भी कहते हैं कि आलंकारिकता का प्रयोग संवाद के लिए नहीं होता, बल्कि आलंकरिकता तो खुद ही संवाद है.
तो, अगली बार जब भी कुछ बोलें, ध्यान रखें कि आप महज़ एक सूचना ही नहीं दे रहे हैं, अपना परिचय भी दे रहे हैं.
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Discussed book:
The Stuff of Thought: Language as a Window Into Human Nature
By: Steven Pinker
Publisher: Viking Adult
Page: 512
$ 29.95
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