Tuesday, May 1, 2018

वहां लबों की आज़ादी पर अनगिनत पहरे हैं!


हममें से बहुतों के लिए इण्टरनेट की लगभग निशुल्क सुलभता आज के समय के सबसे बड़े वरदानों में से एक है. यह इस बात के बावज़ूद कि समय-समय पर इसकी सहायता से संचालित होने वाली बहुत सारी गतिविधियों, विशेषत: सोशल मीडिया के दुरुपयोग और दुष्प्रभावों की ख़बरें भी आकर हमें चिंतित कर जाती हैं. इधर हम अपने देश में एक नई प्रवृत्ति यह भी देख रहे हैं कि जैसे ही किसी शहर-कस्बे-गांव वगैरह में कोई दंगा-फसाद होता है, सरकार पहला काम वहां इण्टरनेट सेवाओं को बंद कर देने का करती है. कुछ लोगों को डिजिटल बनाए जा रहे भारत में यह काम विडम्बनापूर्ण लग सकता है, लेकिन प्रशासन को लगता है कि दुर्भावनापूर्ण ख़बरों और अफ़वाहों  को फैलने से रोकने के लिए यह प्रतिबंध  ज़रूरी है. वैसे इस माध्यम को लेकर बहसें भारत से बाहर, पश्चिम में भी कम नहीं हो रही हैं. इधर फ़ेसबुक के डेटा के दुरुपयोग  के बारे में आई ख़बरों ने वहां भी अच्छी खासी हलचल पैदा की है और विशेष रूप से अमरीकी समाज में कैम्ब्रिज एनेलिटिका जैसी कम्पनी द्वारा वहां के चुनावों में दखलंदाज़ी के प्रयासों को बहुत गम्भीरता से लिया गया है. लेकिन इन तमाम बातों के बावज़ूद पश्चिम में, और मोटे तौर पर भारत में भी, हर कोई इण्टरनेट की निर्बाध सुलभता के हक़ में नज़र आता है.

लेकिन हमारा ध्यान इस बात की तरफ़ शायद ही जाता हो कि हमारी इसी दुनिया में कम से कम एक महाद्वीप ऐसा है जहां के नागरिकों को हमारी तरह यह सुख मयस्सर नहीं है. यथार्थ तो यह है कि जहां भारत सहित दुनिया के कई देशों की सरकारें अभी इण्टरनेट के निर्बाध उपयोग को थोड़ा-सा सीमित करने का इरादा कभी-कभार प्रकट करती है (और इसके लिए भी उनकी आलोचना कम नहीं होती है!) वहीं तंज़ानिया और युगाण्डा जैसे अफ्रीकी देशों की सरकारें अपने देशों में पिछले कुछ समय से  व्यवस्था, स्थायित्व और उत्तरदायित्वपूर्ण नागरिकता का नाम लेकर इण्टरनेट के इस्तेमाल पर काफी कड़े प्रतिबंध लगा चुकी हैं. हो सकता है यह बात पढ़ने में काफी कड़वी  लगे लेकिन सच यही है कि इन देशों की सरकारें इण्टरनेट की निशुल्क उपलब्धता पर वैसे कड़े प्रहार करके, जिनकी  हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, उसे करीब-करीब ध्वस्त कर चुकी है. उदाहरण के लिए आप तंज़ानिया को लीजिए. वहां की सरकार ने  एक नियम बनाया है कि हर ब्लॉगर को और यू ट्यूब चैनल्स जैसे विविध मंचों के एडमिनिस्ट्रेटरों को करीब नौ सौ डॉलर का शुल्क चुकाकर स्वयं को एक नियंत्रक अधिकारी के यहां पंजीकृत कराना होगा. वैसे तो  नौ सौ डॉलर की रकम कोई छोटी रकम नहीं है जिसे हर ब्लॉगर चुकाना चाहे या  चुका सके, सरकारी शिकंजा इतने पर ही नहीं रुकता है. वह यह भी चाहता है कि आवेदक अपने तमाम  शेयरहोल्डरों, शेयर पूंजी, स्टाफ की योग्यताओं, उनके लिए चलाए जाने प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि की पूरी जानकारी दे और इस आशय का प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत करे कि उसके खिलाफ कोई टैक्स राशि बकाया नहीं है. बहुत स्पष्ट है कि यह सारा उपक्रम न केवल मुक्त विचार विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने वाला है, अप्रत्यक्ष रूप से लोगों में भय भी जगाने वाला है. उन्हें लगता है कि सरकार इतनी सारी जानकारियां जुटाकर उनका न जाने कैसा इस्तेमाल कर ले. इसका परिणाम यह हुआ है कि तंज़ानिया  में गिने चुने ब्लॉगर हैं!

तंज़ानिया जैसा ही हाल  युगाण्डा का भी है. वहां के नागरिकों को अपने मोबाइल फोनों पर फ़ेसबुक, ट्विटर या वॉट्सएप जैसे सोशल मीडिया माध्यमों का इस्तेमाल करने के लिए हर दिन करीब दो पेंस का शुल्क अदा करना होता है. बकौल वहां के वित्त मंत्री जी, देश की सुरक्षा के निमित्त यह बहुत छोटी-सी राशि है. युगाण्डा के राष्ट्रपति का कहना है कि लोग सोशल मीडिया का प्रयोग गप्पबाज़ी के लिए करते हैं, इसलिए उनसे इतनी-सी धनराशि ले लेना कोई अनुचित  बात नहीं है. अपनी सदाशयता दर्शाने के लिए वे यह कहने से भी नहीं चूकते  कि मैं तो बहुत ही वाज़िब इंसान हूं और शैक्षिक, शोध अथवा संदर्भ के लिए इण्टरनेट के प्रयोग पर कभी कोई टैक्स आयद नहीं करूंगा. लेकिन तंज़ानिया की ही एक बेहद लोकप्रिय वेबसाइट के संचालक मेक्सेंस मेलो ने जो बताया, उससे इस कथन की निरर्थकता स्वत: सिद्ध हो जाती है. उनका कहना है कि उनके देश में अगर आप एक फ़ेसबुक पोस्ट भी लिखते हैं तो उस पर वे ही नियम कानून आयद होते हैं जो किसी किताब को लिखने वाले पर होते हैं. और इस तरह आपकी  अभिव्यक्ति की हर आज़ादी प्रतिबंधित है.

एक तरफ़ बाकी दुनिया है जो इस माध्यम की तमाम सीमाओं के बावज़ूद इस पर कोई भी प्रतिबंध लगाने के खिलाफ़ है और दूसरी तरफ यह दुनिया है जहां कोई आज़ादी है ही नहीं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

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