Friday, March 9, 2018

सवाल मानवीय सम्बंधों में तकनीक की घुसपैठ का

अनिरुद्ध रॉय चौधरी द्वारा निर्देशित 2016 की हिन्दी फिल्म पिंक में अमिताभ बच्चन का एक बेहद प्रभावशाली डायलॉग है: “नो मीन्स नो. ना सिर्फ़ एक शब्द नहीं, अपने आप में एक पूरा वाक्य है. इसे  किसी तर्क, स्पष्टीकरण, एक्स्प्लेनेशन या व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती. ना का  मतलब ना ही होता है. माय क्लाएंट सेड नो युअर ऑनर!”  कहना  अनावश्यक है कि यहां चर्चा का संदर्भ स्त्री पुरुष के बीच का दैहिक सम्बंध है. इस  सम्बंध  को लेकर जितनी चर्चाएं और बहसें अपने देश में हुई हैं उनसे कम चर्चाएं परदेश में नहीं हुई हैं. इसी संदर्भ में यह जानना रोचक हो सकता है कि जहां भारत में ‘ना’ कहने के अधिकार को रेखांकित करना ज़रूरी समझा गया है, पश्चिम के कुछ देशों में इससे उलट ‘हां’ कहने के अधिकार को मान्यता प्रदान करने की भी ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी. कई देशों के शैक्षिक संस्थानों में 1990 से ही यह नीति बनाई जाने लगी थी कि वहां के विद्यार्थी अंतरंग क्षणों के  इन सम्बंधों  की स्थापना के लिए बाकायदा मौखिक अनुमति प्रदान करें. एक अपेक्षाकृत उन्मुक्त और उदार देश स्वीडन में तो पिछली दिसम्बर में एक  ऐसा कानून बनाने का भी प्रस्ताव किया गया है जिसके तहत मौखिक स्वीकृति प्रदान करने के बाद ही कोई युगल दैहिक सम्पर्क स्थापित कर सकेगा. 

इसी प्रस्तावित कानून से प्रेरित होकर लीगल फ्लिंग नामक एक वेबसाइट ने एक ऐसा एप बनाकर उसका बीटा वर्ज़न  बाज़ार में उतारा है जो नज़दीक आने के इच्छुक दो व्यक्तियों को उनकी निकटता की सीमाएं निर्धारित करने के अनेक विकल्प प्रदान करता है. यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे आप किसी रेस्तरां में जाएं और मेन्यू देखकर यह चयन करें कि आपको क्या-क्या खाना-पीना है. फर्क इतना है कि यहां विकल्पों का चुनाव मेन्यू की बजाय एप में से किया जाना है. इस एप में किया गया चयन उन दो व्यक्तियों के बीच किये जाने वाले एक अनुबंध के समतुल्य होगा और उम्मीद की जाती है कि इस अनुबंध को वैधानिक मान्यता भी प्राप्त होती. एप यह भी सुविधा देगा कि इसे इस्तेमाल करने वाले पार्टनर्स किसी भी समय अपने चयन को संशोधित कर सकें या बदल सकें. 

इस एप की उपादेयता को लेकर बहसें शुरु हो गई हैं. लोग पूछने लगे हैं कि क्या वाकई कोई एप इतना कारगर हो सकता है कि वो दो मनुष्यों के बीच के अंतरंग क्षणों के क्रियाकलाप को प्रभावी  तौर पर नियंत्रित कर सके? इस सवाल का जवाब तकनीक और मानवीय सम्बंधों के मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने देने  का प्रयास भी किया है. उनका कहना है कि यह एप सहमति को अंकित करने के मामले में तो कारगर साबित हो सकता है लेकिन क्षण भर में बदल जाने वाले मानवीय भावों के साथ तालमेल नहीं रख सकता. वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि किसी भी एप का प्रयोग पूर्व नियोजन की मांग करता है जबकि मनुष्य केवल अपने उस क्षण के मनोभाव ही अंकित कर सकेगा, वह खुद इस बात से अनभिज्ञ होगा कि अगले क्षण उसके मनोभाव क्या होंगे. इस एप के कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि दैहिक  सम्पर्क के मामले में सहमति-असहमति का मामला एक मानवीय मुद्दा है और इसका समाधान किसी मशीनी  एप में तलाश करना पूरी तरह अव्यावहारिक है. एप का मज़ाक उड़ाते हुए ऐसे लोगों का कहना है कि ज़रा इस बेहूदगी की कल्पना कीजिए को एक दूसरे के निकट आने को तत्पर दो में से कोई एक यह कहे  कि  “ज़रा एक सेकण्ड रुकना, पहले मैं एप को अपडेट कर दूं!” 

लेकिन एप बनाने वाली कम्पनी लीगल फ्लिंग इन तमाम आलोचनाओं से तनिक भी विचलित नहीं है. उसे अपने एप की सीमाओं का भली भांति पता है, लेकिन वह इसे भविष्य की एक सशक्त सम्भावना के रूप में विकसित करने को तत्पर है. उसका सोच यह है कि चाहे एप पर ही सही, अगर कोई अपने मनोभाव व्यक्त करता या करती है बाद में किसी भी वजह से दूसरा पक्ष उन मनोभावों की अवहेलना करता या करती है तो आहत पक्ष अपनी शिकायत तो अंकित कर ही सकता है, और उस शिकायत पर यथा कानून कोई कार्यवाही होने की सम्भावना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. कम्पनी का यह भी कहना है कि नशे जैसी किसी असामान्य स्थिति में भी अगर कोई ग़लती से अपनी सहमति दे दे तो यह एप उसके बाद  अपनी सहमति को तुरंत वापस लेने का विकल्प प्रदान करता है. 

यह देखना बहुत रोचक होगा कि नाज़ुक मानवीय सम्बंधों के मामले में तकनीक आधारित एप कितना प्रभावी  और कितना निर्णायक साबित होता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न   दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत गुरुवार, 08 मार्च,  2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

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