Tuesday, November 14, 2017

लाओ, तुम्हारा कचरा हम खरीद लेते हैं!

अगर मैं बग़ैर किसी भूमिका के आपसे यह कहूं कि दुनिया में कम से कम एक देश ऐसा है जिसका संकट हमारी कल्पना से भी परे है, तो निश्चय ही आप चौंक जाएंगे. मैं बात कर रहा हूं एक करोड़ से कम आबादी वाले स्कैण्डिनेवियाई देश स्वीडन की. यह देश आजकल एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है, और संकट यह है कि इसके पास कूड़े की इतनी भीषण कमी हो गई है कि इसे अपने पड़ोसी देशों की ओर याचना भरी निगाहों से देखना पड़ रहा है. लेकिन इस बात में एक पेच और है. स्वीडन के पास कूड़े की कमी है, लेकिन यह देश पड़ोसी देशों से कूड़ा खरीद नहीं रहा है. उल्टे वे देश अपना कूड़ा लेने के उपकार के बदले स्वीडन को भुगतान कर रहे हैं. है ना ताज्जुब की बात!

दरअसल स्वीडन ने अपने कूड़े को बरबाद न कर उसको जलाकर अपने रीसाइक्लिंग संयंत्रों को  धधकाए रखने का एक बेहद कामयाब और प्रभावशाली तंत्र विकसित कर लिया है और इस तंत्र के कारण देश की आधी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं. यहीं यह भी जान लें कि स्वीडन के कचरे का महज़ एक प्रतिशत ही है जो अनुपयोगी रहकर अपशिष्ट भराव क्षेत्रों में डाला जाता है. पिछले कुछ बरसों में स्वीडन ने अपनी राष्ट्रीय रीसाइक्लिंग नीति को इतना मुकम्मल बना लिया है कि बहुत सारी निज़ी कम्पनियां अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण कर उसे जलाकर जो ऊर्जा उत्पन्न करती है वह एक केंद्रीय हीटिंग नेटवर्क के माध्यम से ठिठुरते हुए मुल्क को सुखद ऊष्मा प्रदान करती है. स्वीडन ने 1991 से ही  से जीवाश्म ईंधन पर भारी कर लगाकर उसके प्रयोग को हतोत्साहित करने की नीति लागू कर रखी है. वहां की सरकार ने लोगों को इस बात के लिए भी पूरी तरह शिक्षित और प्रशिक्षित कर दिया है कि वे किसी भी किस्म का कचरा बाहर फेंकने की बजाय उसे रीसाइक्लिंग के लिए दे दिया करें. न सिर्फ इतना, स्वीडन की नगरपालिकाओं ने कचरा संग्रहण का काम भी इतना व्यवस्थित और सुगम कर दिया है कि उसके लिए  कम से कम श्रम और  प्रयत्न करना होता है. वहां की  रिहायशी  इमारतों में स्वचालित वैक्यूम सिस्टम लगा दिये गए हैं जिसके कारण कचरे के संग्रहण और उसे एक से दूसरी जगह ले जाने पर होने वाले खर्च में भी भारी कमी आ गई है. अब हालत यह हो गई है कि स्वीडन का सारा कचरा ऊर्जा पैदा करने में प्रयुक्त हो जाता है लेकिन स्वीडन ने कचरा जलाने के जो संयंत्र अपने देश में लगाए हैं उनकी क्षमता  इतनी ज़्यादा है कि उन्हें चलाए रखने के लिए स्वीडन का अपना कचरा कम पड़ रहा है. 

ऐसे में कुछ पड़ोसी देशों, विशेषकर नॉर्वे और इंगलैण्ड  से  कचरा आयात करके इन संयंत्रों को कार्यरत रखना पड़  रहा है. विदेशों से स्वीडन जो कचरा आयात करता है उसकी मात्रा में लगातार वृद्धि होती जा रही है. सन 2005 से अब तक यह  वृद्धि चार गुना हो  चुकी है. माना जाता है कि अभी लगभग 900 ट्रक कूड़ा प्रतिदिन आयात किया जा रहा है.   लेकिन इसमें भी मज़ेदार बात यह है कि क्योंकि स्वीडन के आस-पास के यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देशों में लोगों को अपने कचरे को घर से बाहर डालने पर भारी जुर्माना अदा करना होता है, अत: ये देश उससे कम राशि स्वीडन को चुका कर अपने कचरे से निजात पा रहे हैं. इस तरह उन देशों को तो अपने कचरे से मुक्ति मिल ही रही है, स्वीडन भी जलाने योग्य कचरे की कमी के अपने संकट से मुक्ति पाने के साथ-साथ  कमाई भी कर  रहा है. स्वीडन की यह रीसाइक्लिंग नीति उसके पड़ोसी देशों के लिए भी अनुकरणीय साबित हो रही है लेकिन वे अभी तक कामयाबी के उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाये हैं जो स्वीडन हासिल कर चुका है. मसलन, ब्रिटेन ने एक रीसाइक्लिंग नीति तो बना ली है लेकिन वह इतनी जटिल है कि वहां के नागरिक हमेशा भ्रमित ही रहते हैं.

लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि स्वीडन अपनी व्यवस्थाओं से पूरी तरह संतुष्ट है. अब वहां इस बात पर विमर्श चल  रहा है कि संग्रहीत कचरे को जलाने की बजाय उसकी ठीक से छंटाई  कर उसे समुचित तरह से  रीसाइकल किया जाए ताकि कार्बन डाई ऑक्साईड के उत्सर्जन में कमी लाई जा सके. उल्लेखनीय है कि अभी 85 से 90 प्रतिशत कचरे को ऊर्जा उत्पादन के लिए जलाया जाता है और इस प्रक्रिया में काफी सीओ2 उत्सर्जन होता है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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