Tuesday, July 25, 2017

कुछ समुदायों की घटती जनसंख्या भी है समस्या

सामान्यत: इस बात से सभी सहमत हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है इसकी बढ़ती हुई जनसंख्या. आज़ादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाने के प्रयास किए हैं और उन प्रयासों को आंशिक सफलता भी मिली है. सोचा जा सकता है कि अगर वे प्रयास न किए गए होते तो आज हम किस हाल में होते. इसके बावज़ूद कुछ संगठन और लोग ऐसे भी हैं जो इस बात पर चिन्तित होते हैं कि कुछ जातियों/धर्मों को मानने वालों की जनसंख्या उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी उनकी बढ़ रही है जिनसे उनको ख़तरा है. लेकिन अगर ऐसों की  बात न भी करें तो हमारे विविधता भरे देश में कम से कम एक समुदाय ऐसा मौज़ूद है जिसकी संख्या निरंतर छीजती जा रही है और यह समाज तेज़ी से विलुप्त होने की तरफ बढ़ रहा है. संकट इतना गहरा है कि अब सरकार की तरफ से और खुद इस समुदाय  के लोगों की तरफ से भी इस समुदाय की जनसंख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं.

मैं बात पारसी समुदाय की कर रहा हूं. वही पारसी समुदाय, जिसकी चर्चा अपनी ख़ास जीवन शैली, सुरुचि, उच्च शैक्षिक स्तर और समृद्धि के लिए होती है. 1941 में देश में जहां पारसियों की संख्या 114,000 थी वहीं 2001 की जनगणना में ये 69 हज़ार से भी कम रह गए थे और 2011 की जनगणना में तो इनकी संख्या और भी  घटकर मात्र 57, 264 ही रह गई थी. इसी बात से चिंतित होकर भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को अपनी आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के लिए सन 2013 से जियो पारसी’  नाम से एक अभियान चला रखा है.  इस अभियान के पहले चरण में, जो जल्दी ही पूरा होने वाला है, सरकार ने एक बड़ी राशि इस निमित्त प्रदान की है कि जिन पारसी युगलों की आय एक निश्चित सीमा से कम है उन्हें संतानोत्पत्ति विषयक उपचार कराने के लिए आर्थिक सहायता दी जा सके. इसके अलावा इस अभियान के अंतर्गत विज्ञापन, काउंसिलिंग और अन्य तरीकों से भी पारसियों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. अभियान के शुरुआती समय में कई विज्ञापन ज़ारी किये गए जिनमें पारसियों से गर्भ निरोधक इस्तेमाल न करने का भी अनुरोध किया गया. ये तमाम बातें भारत सरकार की परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के खिलाफ़ हैं. एक तरफ जहां इस अभियान का जम कर उपहास हुआ वहीं दूसरी तरफ इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये, लेकिन तीसरी तरफ़ खुद पारसी समुदाय के भीतर से कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. यहां तक कहा  गया कि यह अभियान स्त्री को मात्र संतानोत्पत्ति करने वाली मान कर चलता है.

यह समझना भी ज़रूरी होगा कि आखिर क्यों पारसी जनसंख्या इतनी घटती जा रही है. असल में पारसी समुदाय एक सुगठित लेकिन बंद समुदाय है जहां जो कुछ भी बाहरी है वह सब निषिद्ध  है. अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी कर लेती है तो वह पारसी नहीं रह जाती है, और अगर कोई किसी अन्य समुदाय से हो और किसी पारसी से विवाह कर ले तो उसके बच्चों को भी पारसी का दर्ज़ा नहीं दिया जाता है. किसी भी ग़ैर पारसी के लिए पारसी मंदिर में आना वर्जित  होता है. यही नहीं लगभग तीस प्रतिशत पारसी स्त्री-पुरुष तो विवाह ही नहीं करते हैं. देश में जो पारसी आबादी है उसमें से कम से कम तीस प्रतिशत की उम्र साठ से ऊपर है. और जैसे यह सब पर्याप्त न हो, देश में पारसियों की फर्टिलिटी दर मात्र 0.8 है जबकि औसत भारतीयों में यह दर 2.3 है. यहीं यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि जब फर्टिलिटी दर 2.1 होती है तो जनसंख्या स्थिर  हो जाती है.

इस अभियान का विरोध करने वालों का कहना है कि पारसियों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसाने की बजाय पारसी संस्कृति की रक्षा और उसके संवर्धन के लिए प्रयास किये जाने चाहिए. लेकिन समझा जा सकता है कि यह तर्क  महज़ विरोध करने के लिए दिया गया तर्क है. अगर पारसी संस्कृति का बहुत ज़्यादा समर्थन किया जाएगा तो यह समुदाय सिकुड़ते-सिकुड़ते लुप्त ही हो जाएगा. जब आप अपने तमाम खिड़की दरवाज़े बंद कर देंगे तो यही होगा. और यही वजह है कि पारसी समुदाय के भीतर से भी आम तौर पर इस सरकारी पहल का स्वागत हो रहा है और समझदार लोग कहने लगे हैं कि यह अभियान काफी पहले शुरु कर दिया जाना चाहिए  था. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह सरकारी अभियान पारसी समुदाय को बचा पाने में कितना सफल रहता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 जुलाई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  
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