Tuesday, August 30, 2016

माता-पिता और बच्चों के रिश्तों में दूरी लाता होमवर्क

उस हर घर परिवार में जहां स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे होते हैं शाम होते-होते मां-बाप और बच्चों के बीच संघर्ष शुरु हो जाता है. मां-बाप चाहते हैं कि बच्चा स्कूल से मिला होमवर्क कर ले और बच्चा चाहता है कि वह खेले-कूदे, मस्ती करे और फिर सो जाए! इस संघर्ष का पटाक्षेप  कभी आंसुओं में होता  है तो कभी हिंसा में. यह घर-घर  की कहानी है. मां-बाप सोचते हैं कि अगर बच्चे ने होमवर्क नहीं किया तो वो पढ़ाई में पीछे रह जाएगा! बच्चा क्या सोचता है, पता नहीं. लेकिन इधर अमरीका में ड्यूक यूनिवर्सिटी के एक होमवर्क रिसर्च गुरु हैरिस कूपर ने खासे लम्बे शोध कार्य के बाद जो कुछ कहा है वह इन सभी मां-बापों के लिए विचारणीय है. कूपर ने कोई 180 अध्ययनों के बाद यह निष्कर्ष दिया है कि “ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि होमवर्क से प्राथमिक कक्षाओं  के बच्चों की पढ़ाई लिखाई में कुछ फायदा होता है.” कूपर का यह कहना  है कि हां, होमवर्क के फायदे हैं लेकिन उन फायदों का सीधा रिश्ता होमवर्क करने वालों की उम्र के साथ है. इस बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि उनकी शोध के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए कक्षा में पढ़ लेना पर्याप्त है और उन्हें घर पर करने के लिए दिया गया होमवर्क उन पर अतिरिक्त बोझ मात्र है. मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों के मामले में भी होमवर्क और अकादमिक कामयाबी का रिश्ता न्यूनतम है. हां, जब बच्चा हाई स्कूल तक पहुंच जाए तब होमवर्क उसके लिए लाभप्रद होता है. लेकिन इसकी भी अति नहीं होनी चाहिए. हर रोज़ दो घण्टे का होमवर्क पर्याप्त है. अगर इससे ज़्यादा दिया  जाएगा तो उससे होने वाला लाभ घटने लगेगा.


कूपर की इस शोध की  पुष्टि अमरीका की लोकप्रिय ब्लॉगर और छह वर्षीय बच्चे की मां ने भी की है.  हीथर शुमाकर नामक इस युवती की एक किताब ‘इट्स ओके नोट टू शेयर’ पहले प्रकाशित हो चुकी है और इनकी हालिया प्रकाशित किताब ‘इट्स ओके टू गो अप द स्लाइड’ खूब चर्चा में है. हीथर  का कहना है कि छोटे बच्चों की सबसे बड़ी ज़रूरत यह होती है कि वे खेले-कूदें और परिवार के साथ समय बितायें, जिस काम में उनका मन लगे वह करें, और जल्दी सो जाएं ताकि उन्हें दस ग्यारह घण्टों की भरी-पूरी नींद मिल सके. अगर ऐसा होगा तो वे स्कूल में भी बेहतर प्रदर्शन करेंगे. करीब सात  घण्टे स्कूल में बिताकर उन्हें उतनी अकादमिक खुराक पहले ही मिल चुकी होती है जितनी की उन्हें ज़रूरत होती है. इसके बाद उन पर होमवर्क  का बोझ लादना अनुचित है. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए हीथर कहती हैं कि होमवर्क की वजह से बच्चों की घर पर होने वाली शिक्षा में बाधा पहुंचती है. बहुत कम उम्र में दिये जाने वाले होमवर्क की वजह से बच्चों के मन में स्कूल और शिक्षा के प्रति अरुचि का भाव घर करने लगता है. वे उसकी महत्ता समझने की बजाय उसके प्रति अवमानना पालने लग जाते हैं. इसके अलावा, अगर बहुत छोटी उम्र में बच्चों को होमवर्क दिया जाने लगता है तो उनमें विकसित होने वाली ज़िम्मेदारी की भावना भी अवरुद्ध होती है. इसलिए होती है कि उस उम्र में तो मां-बाप ही उनसे होमवर्क करवाते हैं. और यह बात उनकी आदत में शुमार होने लगती है. बच्चों  को आदत पड़ जाती है कि उनके मां-बाप उनसे होमवर्क करवाएं और कई मामलों में तो खुद मां-बाप ही उनका होमवर्क कर देते हैं. जबकि  होना यह चाहिये कि जब बच्चों में पर्याप्त ज़िम्मेदारी का भाव विकसित हो जाए तब उन्हें होमवर्क दिया जाने लगे.  अभी तो यह हो रहा है कि बच्चों से होमवर्क करवाते हुए हम उसके मुख्य उद्देश्य, कि बच्चों में ज़िम्मेदारी का भाव विकसित  हो, को ही पराजित किये दे रहे हैं. हीथर का कहना है कि वे बच्चों के लिए सिर्फ एक होमवर्क का समर्थन करती हैं और वह है रीडिंग यानि पठन.


इन शिक्षाविदों ने एक और बेहद महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया है. इनका कहना है कि कम आयु के बच्चों को  दिया गया होमवर्क उनके और उनके मां-बाप के बीच के रिश्तों को भी प्रतिकूलत: प्रभावित करता है. ये कहते हैं कि हर शाम हज़ारों घरों में मां-बाप अपने बच्चों को होमवर्क करने के लिए डांटते-फटकारते-मारते-पीटते हैं और बेचारे थके-मांदे  बच्चे अपनी तरह से उनका प्रतिरोध करते हुए रोते-झींकते हैं. इस तरह जो शामें जो बच्चों के साथ हंसते-खेलते बीतनी चाहिए थीं वे गुस्से और अवसाद में खत्म होती हैं.


इन शोधकर्ताओं की बातें तर्क संगत तो लगती हैं! देखना है कि हमारे शिक्षण संस्थानों का और मां-बापों का ध्यान इस तरफ़ जाता है या नहीं!    


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 अगस्त, 2016 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  
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