Tuesday, August 16, 2016

एक तस्वीर जो झकझोरती है रूढ़ मान्यताओं को

इधर रियो ओलम्पिक की एक तस्वीर बहुत चर्चा में है. रायटर की फोटोग़्राफर लूसी निकल्सन द्वारा ली गई इस तस्वीर में कोपाकबाना बीच पर जर्मनी की किरा वॉकेनहर्स्ट और मिश्र की डोआ एलघोबाशी बीच वॉलीबॉल खेल रही हैं. तस्वीर में नेट के बांयी तरफ़ हैं एलघोबाशी जिन्होंने अपनी देह को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहन रखे हैं – पूरी बांहों का शर्ट जैसा कुछ और फुल पैण्ट, तथा अपने केशों को हिजाब से ढक रखा है. नेट की दूसरी तरफ हैं वॉकेनहर्स्ट, बीच की चिर परिचित वेशभूषा यानि टू पीस बिकिनी में. कहा जा रहा है कि यह तस्वीर ओलम्पिक की खेलों को संस्कृति और शिक्षा के साथ एकाकार करने वाली  विचारधारा की नुमाइन्दगी  करती है. बीबीसी अफ्रीका ने इस तस्वीर को दुनिया की विविध संस्कृतियों और देशों को निकट लाने वाली ओलम्पिक संस्कृति की प्रतिनिधि बताते हुए इसकी सराहना करने के अतिरिक्त उत्साह में इसे ‘बिकिनी बनाम बुर्क़ा’  कहकर एक छोटी-सी ग़लतबयानी तक कर डाली. बुर्क़ा वह होता है जिससे पूरे शरीर को ढका जाता है, जबकि एलघोबाशी ने हिजाब पहना है. यहीं यह बता देना भी उचित होगा कि इस तस्वीर में दिखाई दे रही एलघोबाशी और उनकी एक साथिन नाडा मीवाड का नाम इतिहास की किताबों में मिश्र की पहली बीच ओलम्पियन्स  के रूप में दर्ज़ हो गया है. असल में 2012 के लन्दन ओलम्पिक्स के समय नियमों में बदलाव करके स्विमसूट्स के विकल्प के रूप में पूरी देह को ढकने वाले  पूरी बाहों के ऊपरी वस्त्र और फुल पैंट वाली इस वेशभूषा को बीच वॉलीबॉल की पोशाक के रूप में स्वीकृति दी गई थी.

जो तस्वीर चर्चा में है उस मैच के तुरंत बाद एक बयान में डोआ एलघोबाशी ने कहा कि मैं पिछले दस बरसों से हिजाब पहन रही हूं और अब जबकि खेलों के अंतर्राष्ट्रीय संघ ने हमें अपनी वेशभूषा के साथ खेलने की इजाज़त दे दी है, मैं बेहद खुश हूं. उन्होंने यह भी कहा कि हिजाब मुझे वे सारे काम करने से रोकता नहीं है जिन्हें करना मुझे बेहद पसन्द है और  जिनमें बीच वॉलीबॉल भी एक है. डोआ एलघोबाशी ही की तरह अमरीका की फेन्सर (तलवारबाज) इतिहाज मुहम्मद का नाम भी इतिहास की  किताबों में इसी वजह से अंकित हुआ है. उन्होंने भी हिजाब पहन कर इस स्पर्धा  में हिस्सा लिया, और बाद में कहा कि बहुत सारे लोग सोचते हैं कि मुस्लिम महिलाओं की अपनी कोई आवाज़ नहीं है और हम खेलों में शिरकत नहीं करती हैं. लेकिन मेरी यह शिरकत बाहरी दुनिया की इस ग़लत धारणा को चुनौती  है.

असल में पश्चिम वाले इसी तरह की छवियों का हवाला देकर खुद को आज़ाद और मुस्लिम स्त्रियों को पराधीन रूप में चित्रित करने के आदी रहे हैं. इन दो छवियों के बीच सामान्यत: न तो कोई संवाद है न एक दूसरे को समझने की कोशिश और इसी वजह से कई दफ़ा दोनों के रिश्ते हिंसक भी हो  जाते हैं. इसी बात से फिक्रमंद होकर न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तम्भकार रोजर कोहेन ने इस तस्वीर के सन्दर्भ में दो स्त्रियों के वृत्तांत प्रस्तुत किये हैं. इनमें से एक हैं नीदरलैण्ड्स में पली-बढ़ी मिश्री मां और डच पिता की बेटी चडीड्जा बुइज्स जो अपनी  आध्यात्मिक ज़रूरतों से प्रेरित होकर इबादत करती हैं, व्यसनों से दूरी बरतती हैं और हिजाब पहनती हैं. अपनी वेशभूषा की वजह से  वे कई दफा मुश्क़िलों में भी पड़ चुकी हैं और इसलिए उनकी यह शिकायत वाज़िब लगती है कि सेक्युलर पश्चिमी देशों में धार्मिक साक्षरता की बहुत कमी है. हालांकि वे यह भी कहती-मानती हैं कि खुद इस्लाम के भीतर भी इस वजह से बड़े संकट मौज़ूद हैं कि इराक़ और सीरिया में इस्लाम जैसा दीखता है उस पर पूरी तरह आईएसआईएस का नियंत्रण है. दूसरी स्त्री हैं नोरमा मूर जो खुद को बेहद धार्मिक मानती हैं और काफी समय तक इस्लामी पारम्परिक वेशभूषा में रहने के बाद अरब देशों की बेपनाह गरमी में अपने हिजाब को उतार फेंकने को मज़बूर हुईं. अब वे कहती हैं कि मेरे केश, मेरी देह के उभार सब कुछ खुदा की ही तो देन हैं. अपने केशों को ढक कर और बेढंगे कपड़े पहन कर जैसे मैं अपने स्त्रीत्व को ही नकारती हूं. 

इन दोनों स्त्रियों के वृत्तांत देने के बाद रोजर कोहेन बहुत महत्व की बात कहते हैं. वे कहते हैं कि पाश्चात्य संवेदनाओं के लिए पारम्परिक कपड़ों में ढकी मुस्लिम स्त्रियां ऐसी पराधीनता की प्रतीक है जिन्हें  मुक्ति मिलनी चाहिए. लेकिन यथार्थ के अनेक रंग होते हैं. यह कह सकना बहुत मुश्क़िल है कि कौन स्त्री अधिक रूढिवादी है, कौन ज़्यादा फेमिनिस्ट है और कौन ज़्यादा आज़ाद  है. हम तो बस यह जानते हैं कि ओलम्पिक जैसे अवसर और ज़्यादा आएं ताकि हम ये सवाल पूछने को और अपनी जड़, रूढ़  मान्यताओं से मुक्ति पाने को प्रेरित हों.

रोजर कोहेन की बात है तो विचारणीय!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 16 अगस्त, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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