Wednesday, August 19, 2015

मरने का इरादा और जीने की तमन्ना

आम तौर पर चिकित्सकों को, चाहे वे किसी भी उपचार पद्धति का अनुसरण करते हों, जीवन रक्षक माना जाता है और इसी नाते समाज उनका औरों से अधिक सम्मान भी करता है, लेकिन इस दुनिया की बहुत सारी विचित्रताओं में से एक यह भी है कि चिकित्सकों की इसी बिरादरी के एक सदस्य की पहचान डॉ डेथ के रूप में है. कौन है यह व्यक्ति और क्यों इसकी इतनी चर्चा है आजकल? ऑस्ट्रेलिया के डॉ फिलिप निश्के को लम्बे अर्से से उन लोगों में से एक के रूप में जाना जाता है जो इच्छा मृत्यु के अधिकार के पक्षधर हैं. इन्हीं डॉ निश्के ने एक नई मशीन की इजाद की है और विडम्बना की बात यह कि उसका नाम रखा है – डेस्टिनी, यानि नियति. यह मशीन आत्महत्या करने में सहायता करती है. तो डॉ निश्के हाल में एडिनबरा में आयोजित हुए फ्रिंज फेस्टिवल में एक विशेष शो के अंत में अपनी इस  मशीन का एक प्रदर्शन भी करने वाले थे, लेकिन पहले तो स्कॉटिश अधिकारियों ने यह कहा कि वे शो से पहले इस मशीन का निरीक्षण करेंगे, फिर डॉ निश्के के इस प्रदर्शन में कुछ तरमीम के निर्देश दिए और आखिरकार इसके प्रदर्शन पर पूरी ही रोक लगा दी.

एडिनबरा के फ्रिंज फेस्टिवल में डॉ निश्के जो  शो प्रस्तुत करने वाले थे, ‘डाइसिंग विद डॉ डेथ’ वह  फेस्टिवल के आयोजकों के अनुसार मृत्यु के अधिकार पर चल रही बहस का मजाकिया पहलू सिखाने के लिए था. यह शो स्टैण्ड अप और नरेटिव का मिला-जुला  रूप था और इसमें हंसी मजाक के अलावा आत्महत्या के बारे में काफी गम्भीर चर्चाएं भी प्रस्तावित थीं.  इन चर्चाओं के बाद क्लाइमेक्स के रूप में  डॉ निश्के अपनी मशीन  डेस्टिनी को भी दिखाने वाले थे. इस डेस्टिनी मशीन के एक छोर पर एक गैस कनस्तर जुड़ा हुआ है जिसमें नाइट्रोजन और कार्बन डाइ ऑक्साइड का प्राणघातक मिश्रण होता है. लेकिन अधिकारियों ने निर्देश दिया कि डॉ निश्के अपने प्रदर्शन के दौरान केवल नाइट्रोजन का प्रयोग  करें जो घातक नहीं होती है. बाद में इस आदेश को  बदला गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे नाइट्रोजन का भी नहीं मात्र हवा का इस्तेमाल करें, और फिर इस आदेश को भी बदलते हुए कहा गया कि वे मशीन को निष्क्रिय ही करके रखें.  और इस सबके आखिर में पूरे शो को ही निरस्त  कर दिया गया.

स्वाभाविक है कि डॉ निश्के को यह बात नागवार गुज़री और उन्होंने अपनी तरह से इसकी आलोचना भी की. यहां इस बात को याद करना भी रोचक होगा कि इस शो को किसी और बिना पर नहीं, कम्प्रेस्ड गैस नियमों के तहत प्रतिबन्धित किया गया. हो सकता है अधिकारियों के ध्यान में भी यह बात रही हो कि किसी कानून का उल्लंघन न हो इस बात की पूरी परवाह करते हुए डॉ निश्के  ने अपने दर्शकों से इस आशय के एक डिस्क्लेमर पर पहले से हस्ताक्षर करवा लिए थे कि इस शो में दी गई जानकारी का इस्तेमाल वे किसी को आत्महत्या के लिए मदद देने के लिए नहीं करेंगे.

डॉ निश्के के बार में एक और जानकारी देना बहुत ज़रूरी  है. इन पर पिछले बरस पर्थ के एक व्यक्ति निजेल ब्रेली को आत्महत्या में मदद देने का आरोप  लगा था और इसके परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने उनके प्रैक्टिस करने के अधिकार पर रोक लगा दी थी. लेकिन असल और रोचक बात तो इसके बाद की है.  डॉ निश्के एक फ्लाइट में लॉस एंजिलस से सिडनी जा रहे थे. सुबह के चार बजे एयरलाइंस के कर्मचारियों ने इन्हें नींद से जगाया और यह अनुरोध किया कि उसी फ्लाइट में अपनी पत्नी और दो साल के शिशु के साथ यात्रा रहे एक 37 वर्षीय गम्भीर रोगी की जान बचाने में वे मदद करें. डॉ निश्के ने एयरलाइंस के अधिकारियों  को यह बता दिया कि उनका प्रैक्टिस अधिकार निलम्बित है, लेकिन वायु सेवा के अधिकारियों ने इसके बावज़ूद उनसे सहायता की प्रार्थना की. डॉ निश्के ने भी अपने चिकित्सकीय धर्म का निर्वहन करते हुए न केवल दो घण्टे की शेष बची हवाई यात्रा में उस रोगी को पर्याप्त  सार सम्हाल प्रदान की, फ्लाइट के सिडनी पहुंचने के बाद भी वे  वहां के रॉयल नॉर्थ शोर अस्पताल तक उसके साथ गए.

डॉ निश्के के इस कृत्य पर ऑस्ट्रेलिया में एक नई बहस शुरु हो गई है कि क्या एक ऐसे डॉक्टर को, जिसका प्रैक्टिस करने का अधिकार निलंबित है, किसी रोगी का उपचार करना चाहिए था? डॉ निश्के ने तो चुटकी लेते हुए कहा है कि वे ऐसे मानवीय कानून का समर्थन करेंगे जो किसी डी रजिस्टर्ड डॉक्टर को भी किसी की जान बचाने दे, सबसे ख़ास बात यह कि ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने भी कहा है कि डॉ निश्के के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी. यही तो है मृत्यु पर जीवन की विजय!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक (जो फिल्म गाइड के लोकप्रिय गीत- 'आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है' से प्रेरित  है) से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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