Tuesday, July 7, 2015

विज्ञापन में प्रतिरोध की अनुगूंज

इधर दो बातें  ऐसी हुईं जिनका परस्पर सम्बन्ध न होते हुए भी है. हम सबने लक्षित किया कि फेसबुक पर बहुत सारे मित्रों की प्रोफाइल छवियां सतरंगी हो गईं. पता चला कि अमरीका में सेम सेक्स विवाह का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत और अभिनंदन करने के लिए फेसबुक ने यह इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल उपलब्ध कराया था. दूसरी बात अपने देश में हुई. एक भारतीय एथनिक पोशाक कम्पनी ने ‘द विज़िट’ नामक  तीन मिनिट इक्कीस सेकण्ड की  एक विज्ञापन फिल्म जारी की जिसे अकेले यू ट्यूब पर दस दिनों में दो लाख से ज़्यादा लोगों ने और विविध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीस लाख से ज़्यादा लोगों ने देखा. इस फिल्म में एक खूबसूरत अपार्टमेण्ट में दो युवतियों को दिखाया गया है. इनमें से एक के मां-बाप आने वाले हैं और उनके स्वागत में दोनों तैयार हो रही हैं. एक उत्तर भारतीय है, दूसरी दक्षिण भारतीय. एक लम्बी है दूसरी नाटी. एक गोरी है दूसरी कृष्णवर्णा. लेकिन हाव-भाव से दोनों के बीच का गहरा अनुराग अच्छी तरह व्यक्त हो जाता है. फिल्म ख़त्म होते-होते आप समझ जाते हैं कि यह भी सेम सेक्स के बीच के रिश्ते का मामला है, दोनों लिव इन जैसे रिश्ते में हैं और एक लड़की इसी रूप में दूसरी को अपने मां-बाप से मिलाने वाली है. इस बात को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट भी सामने आती है लेकिन तब वह जिसके मां-बाप आ रहे हैं दो-टूक लफ्ज़ों में कह देती है कि ‘आई एम श्योर अबाउट अस एण्ड आई डोण्ट वॉण्ट टू हाइड इट एनीमोर’. और इसके बाद दोनों मुस्कुराते हुए लिपट जाती हैं. 

कहा गया है कि यह भारत की पहली ऐसी विज्ञापन फिल्म है जिसमें एक लेस्बियन कपल को दिखाया गया है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि 1983 की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के आलीशान नाव वाले एक दृश्य में हेमा मालिनी और परवीन बाबी के बीच भी ऐसे ही रिश्ते का संकेत था. इसी सिलसिले में  दीपा मेहता की 1996 की फिल्म ‘फायर’ को भी याद किया जा सकता है. जानकार पाठकों के लिए इतना संकेत पर्याप्त होगा कि शबाना आज़मी नन्दिता दास अभिनीत यह फिल्म इस्मत चुगताई की 1942 की बहु चर्चित कहानी ‘लिहाफ़’ पर आधारित थी.  और बात जब साहित्य की आ ही गई है तो राजकमल चौधरी के एक क्षीणकाय उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ को भी याद करना होगा. लेकिन ‘द विज़िट’ इस विवादास्पद विषय पर आधारित पहली विज्ञापन फिल्म है.

हम सभी जानते हैं कि विज्ञापनों की, और खास तौर पर भारतीय विज्ञापनों की दुनिया खासी पारम्परिक और एक हद तक प्रतिगामी भी है. यहां बेटी के लिए दहेज जमा करने वाले और काले रंग को गोरे में तब्दील करने का वादा करने वाले विज्ञापन आम हैं. लेकिन इधर विज्ञापनों की दुनिया में बड़े बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं. आपको हाल के ऐसे बहुत सारे विज्ञापन  याद आ जाएंगे जिनमें काफी कुछ गैर पारम्परिक और लीक से हटकर है, मसलन एक आभूषण कम्पनी का वो विज्ञापन जिसमें एक मां अपनी बेटी की उपस्थिति में पुनर्विवाह करती दिखाई गई थी, या एक साबुन कम्पनी की ‘रियल वुमन’ विज्ञापन श्रंखला... 

लेकिन ‘द विज़िट’ निस्संदेह इन सबसे आगे है. असल में यह विज्ञापन अपनी तमाम खूबसूरती और कलात्मक कोमलता के बावज़ूद एक कठोर प्रतिरोधात्मक वक्तव्य के रूप में सामने आया है. सन्दर्भ यह है कि 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता के समलैंगिकता को अपराध  करार देने वाले खण्ड 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया  था, लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में इस फैसले को उलट दिया. अब स्थिति यह है कि भारतीय कानून की इस धारा के तहत जेल भी हो सकती है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि ब्रितानी शासन के खिलाफ़ हुए 1857 के विद्रोह  के दमन के बाद 1861 में हमारे देश में एक नई भारतीय दण्ड संहिता लागू हुई थी और वही अब तक चली आ रही है. इस दंड संहिता की बहुत सारी बातें क्वीन विक्टोरिया के  रूढ़िवादी सोच की भी परिणति थीं,  अन्यथा इससे बहुत पहले यानि करीब दो हज़ार साल पहले की मनु की संहिता में समलैंगिकता के दण्ड के लिए मात्र कपड़े पहले हुए स्नान का प्रावधान है, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उस पर मामूली आर्थिक दण्ड का प्रावधान है और इन सबसे बढ़कर है 600 ईसा पूर्व रचित सुश्रुत संहिता जिसमें समलैंगिकता को जन्मजात प्रवृत्ति बताया गया था.

तो यह ‘द विज़िट’ विज्ञापन एक उत्पाद का प्रचार मात्र न होकर एक बोल्ड स्टेटेमेण्ट भी है. और इसका यह पक्ष ही इसे फेसबुक के उस इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल से जोड़ता है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जुलाई, 2015 को 'द विज़िट'  विज्ञापन फिल्म में प्रतिरोध की अनुगूंज शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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