Tuesday, November 18, 2014

कला, विवाद और तकनीक

कलाओं की दुनिया भी बड़ी मज़ेदार है. सभी कलाओं की. आए दिन कोई न कोई दंगा फसाद होता ही रहता है. वैसे यह मज़ेदारी कलाकारों के लिए नहीं हाशिये के लोगों के लिए होती है. दो प्रसंग आपके सामने रखता हूं. सर्दी का मौसम आते ही तमाम कलाकार भी जाग जाते हैं और एक के बाद एक कला-गतिविधियों का सिलसिला चल निकलता है. गोष्ठियां, प्रदर्शनियां, सम्मेलन और भी न जाने क्या-क्या! बहुत सारे कारणों से यह शहर इस तरह की गतिविधियों का बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है. इधर शहर में जैसे ही एक बड़ी कला हलचल की सुगबुगाहट हुई, विघ्न संतोषी भी जाग उठे. किसी ने इस आयोजन में प्रदर्शित होने वाली कुछ कलाकृतियों की ऐसी व्याख्या कर दी कि लगा जैसे वे धर्म विशेष के लिए अपमानजनक हैं. बस फिर क्या था! जिन्होंने धर्म की रक्षा का सारा भार अपने कन्धों पर उठा रखा है वे दौड़े चले आए और अपने चिर परिचित तरीके से अपना दायित्व निर्वहन कर गए. जब इतना कुछ हुआ तो कलाकारों और कला में रुचि रखने वालों को भी कुछ न कुछ तो बोलना ही था. अच्छी बात यह है कि कला की दुनिया में शब्द ही चलते हैं, हाथ पांव नहीं. हाथ पांव चलाने वाले तो वे होते हैं जिनका कला से कोई लेना-देना नहीं होता. मुझे अनायास बरसों पहले का एक मंज़र याद आ रहा है. वो साइकिलों का ज़माना था. किसी की साइकिल से टकरा कर एक युवक गिर पड़ा. भीड़ इकट्ठी हो गई. तभी एक दादा किस्म का नौजवान जाने कहां से आया, भीड़ को चीर कर अन्दर  घुसा, उस युवक को, जो गिरा था, दो ज़ोरदार थप्पड रसीद किए, और फिर घूम कर वहां खड़े लोगों से पूछा, ‘क्या हुआ?’ कुछ यही हाल हमारे देश में हर विवाद में एक उत्साही वर्ग का होता है. उनका मुख्य उद्देश्य होता है अपनी ताकत का प्रदर्शन करना. सही ग़लत से न तो उन्हें कोई लेना-देना होता है और न उसकी उन्हें समझ होती है.

अब ज़रा साहित्य की तरफ़ मुड़ें. हिन्दी की एक मासिक पत्रिका ने एक लोकप्रिय मंचीय कवि का लम्बा इण्टरव्यू क्या छाप दिया, साहित्य की दुनिया में गहरी उथल पुथल मची हुई है. इधर जब से सोशल मीडिया पर साहित्यिकों की आवाजाही बढ़ी है इस तरह के हालात अक्सर बनते रहते हैं. असल में सोशल मीडिया त्वरित प्रतिक्रिया का माध्यम है और इसकी प्रकृति हमारे परम्परिक मुद्रण माध्यमों से बहुत भिन्न है, इसलिए यहां जो कुछ होता है उसका रूप,  रंग और स्वाद भी अलहदा ही होता  है. यह माध्यम आपको सोचने का अधिक वक़्त नहीं देता और उकसाता है कि आप तुरंत ही प्रतिक्रिया करें, तो बहुत स्वाभाविक है कि वे प्रतिक्रियाएं सुविचारित न होकर क्षणिक उत्तेजना या आवेग का परिणाम होती हैं. इस मंचीय कवि के इण्टरव्यू पर आने  वाली अधिकतर प्रतिक्रियाएं भी इसी किस्म की हैं और उन्हें गम्भीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन जो लोग साहित्य की दुनिया से बहुत अधिक परिचित नहीं हैं वे न केवल इस कीचड़-उछाल में रस लेते हैं, वे इस तरह के विवादों को ही साहित्य का मूल स्वर भी मानने की ग़लती कर बैठते हैं. और यह बात बहुत चिंता की है. 

इधर सोशल मीडिया हमारे व्यवहार के नए प्रतिमान गढ़ रहा है. असल में, जैसा कि किसी भी नए  माध्यम के साथ होता है, हम सब भी अभी इसके साथ जीना और इसको बरतना सीख रहे हैं. और इस क्रम में हम सब से भी बहुत सारी चूकें हो रही हैं. लेकिन इसे स्वाभाविक माना जाना चाहिए. यह मीडिया हमारे लिए नई दिक्कतें भी पेश कर रहा है. इधर फेसबुक के अधिग्रहण के बाद उसी के अनुकरण पर व्हाट्सएप्प ने एक बड़ा बदलाव किया है जिससे बहुत लोग दुखी हैं. बदलाव यह कि जब आप किसी को कोई सन्देश भेजेंगे तो आपको यह भी पता चल जाएगा कि पाने वाले ने उस सन्देश को देख लिया है. यानि अगर जवाब न मिले तो आपके पास नाराज़ होने की एक वैध वजह होगी. वैसे तकनीक के उस्तादों ने इसका भी हल तलाश लिया है, लेकिन सब तो उस्ताद नहीं होते ना! और इस नई आई मुसीबत के सन्दर्भ में याद आ रहा है एक पुराना लतीफा. जब मोबाइल नया नया आया था, एक साहब ने जैसे तैसे पैसे जुटा कर खरीद लिया. एक दिन वे किसी सिनेमाघर में अपने दोस्त के साथ फिल्म देख रहे थे कि घण्टी बजी. दूसरी तरफ उनकी श्रीमतीजी थी. बात करने के बाद वे सज्जन अपने दोस्त से बोले, ‘यार, और सब तो ठीक लेकिन यह बात बड़ी गड़बड़ है कि इस मोबाइल से बीबी को यह भी मालूम हो जाता है कि हम कहां हैं. अब देखो ना, उसे पता चल गया कि हम सिनेमा देख रहे हैं, तभी तो उसने यहां फोन किया.’

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 नवम्बर, 2014 को कला-साहित्य में तकनीक ने बढ़ाए विवाद शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल  पाठ. 
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