Tuesday, July 8, 2014

काश! उसने मुझे न पहचाना होता

बेचारी मारिया शारापोवा! क्या हुआ जो वे टेनिस स्टार हैं और रूसी हैं! वे भगवान को चाहे जानें या न जानें,  लेकिन इस बात को कि वे क्रिकेट के भगवान को नहीं जानती हैं,  हम भारतीय क्रिकेट प्रेमी भला कैसे माफ़ कर सकते हैं? एक से एक विकट और अप्रिय टिप्पणियों के पत्थर उनकी तरफ फेंके जा रहे हैं! हमारी भक्ति एक तरफ़, उनका अज्ञान दूसरी तरफ़ और बीच में दौड़ रहा है मेरा दिमाग़. जगजीत की गाई गुलज़ार साहब की एक ग़ज़ल का शे’र याद आ रहा है: “आईना देखकर तसल्ली हुई/ हमको इस घर में जानता है कोई!” और मन कर रहा है कि क्रिकेट के भगवान के इन भक्तों से कहूं कि यारों अजनबीपन और बेगानेपन के इस विकट समय में बेचारी शारापोवा पर इतना गुस्सा मत करो. और यह अजनबीपन कौन  आज की बात  है?  सन साठ के दशक में हिन्दी में नई कहानी आन्दोलन के तीन तिलंगे और उनके बहुत सारे अनुयायी इसी अजनबीपन को अपनी बहुत सारी कहानियों का विषय बनाकर तारीफ़ पा चुके हैं.  लेकिन यह अजनबीपन और न पहचानने की पीड़ा एक तरफ, कई बार इसका उलट भी तो होता है. किसी का आपको पहचान लेना आपको असहज कर जाता है. मेरे साथ एक बार ऐसा ही हो चुका है.    

अब तक तो मेरे पाठक जान ही चुके हैं कि मेरी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा छोटी जगहों पर गुज़रा है. राजस्थान के एक अपेक्षाकृत छोटे ज़िले के मुख्यालय पर लगभग पच्चीस साल नौकरी की. ऐसे छोटे कस्बों की ज़िन्दगी कैसी होती है, इसे आप वहां रहे बग़ैर नहीं जान सकते. वैसे, खट्टे और मीठे दोनों तरह के ज़ायके मिलते हैं वहां. सभी सबको जानते हैं, यानि हर व्यक्ति एक सेलेब्रिटी होता है. किसी का कोई काम रुकता नहीं. सब कुछ बहुत आसानी से हो जाता है. जीवन संघर्ष अपेक्षाकृत कम होते हैं. मसलन अपने काम के लिए या सामाजिक सम्बन्धों के निर्वाह के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़ता. बहुत सारी चीज़ें जिन्हें हम ज़रूरी मानते हैं, वे सुलभ नहीं होती हैं. मेरे उस कस्बे में बहुत लम्बे समय तक ब्रेड नहीं मिलती थी, कोई ठीक-ठाक सा रेस्टोरेण्ट नहीं था, और आज भी वहां एक भी सिनेमाघर नहीं है. ज़ाहिर है कि इन वजहों से खर्चे कम होते हैं. बहरहाल. बात जब मैंने रेस्टोरेण्ट न होने की की तो बता दूं कि रेस्टोरेण्ट न सही, सड़क छाप ढाबे दो-तीन हुआ करते थे, और कुछ भोजनालय भी थे. हम लोग उन्हीं ढाबों को रेस्टोरेण्ट का मान देते हुए यदा-कदा अपने नीरस जीवन को सरस कर लिया करते थे. फिर धीरे-धीरे उन ढाबों में से कुछ ने अपना स्तर सुधार लिया और उनकी कीर्ति गाथा दूर-दूर तक फैल गई. 
  
उस कस्बे से निकल कर प्रांत की  राजधानी में आ जाने और अपने विभाग में एक उच्च प्रशासनिक पद पर आसीन हो जाने के बाद एक बार सरकारी दौरे पर उसी कस्बे में जाने का मौका मिला. कस्बे के अधिकारी महोदय ने आग्रह किया कि दोपहर का भोजन मैं उनके साथ करूं, जिसे मैंने सहजता से स्वीकार कर लिया. उन्होंने संकोच के साथ कहा कि चूंकि कस्बे में कोई ठीक-ठाक रेस्टोरेण्ट नहीं है, इसलिए जहां वे मुझे ले जा रहे हैं वहां ले जाना उनकी मज़बूरी है और मैं इसका बुरा न मानूं. वे उस पद पर नए नए आए थे और शायद इस बात से अपरिचित थे कि उस कस्बे को मैं और मुझे वो कस्बा कुछ ज़्यादा ही अच्छी तरह जानता है. हम पांच छह लोग वहां पहुंचे. जगह मेरी तो जानी पहचानी  थी लेकिन  वे अधिकारी महोदय ज़रूर संकोच अनुभव कर रहे थे. थोड़ी देर में उस ढाबे का एक पुराना कर्मचारी आया, उसने शायद मुझे तो देखा नहीं और सीधे उन अधिकारी महोदय से मुखातिब हो बोला, “आपने तो कहा था कि आपके बहुत बड़े साहब आएंगे. क्या वे आये नहीं?”  अधिकारी जी ने मेरी  तरफ इंगित करते हुए कहा – “ये रहे हमारे बड़े साहब! खयाल रखना कि ये यहां से खुश होकर जाएं!”   ढाबे का वो कर्मचारी मुड़ा, उसने एक नज़र मुझे देखा, और बेसाख़्ता बोला  “ये? ये  काहे के बड़े साहब! ये तो अपने अग्रवाल साहब हैं! इनकी पसन्द नापसन्द सब मुझे मालूम है!”  अब आप कल्पना कर सकते हैं कि मेरी क्या हालत हुई होगी! उन अफसर महोदय ने हवा भर-भरकर मेरे अहं के जिस गुब्बारे को खूब फुला दिया था, उसमें इस पुराने कर्मचारी ने अपनी आत्मीयता के कथन की एक महीन सुई चुभा कर सब मटियामेट कर डाला.  अजीब हालत थी मेरी.  मैं सोच रहा था, काश! इसने मुझे न पहचाना होता!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 08 जुलाई 2014 को काश! ढाबे वाले ने मुझे उस दिन न पहचाना होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.              
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