Sunday, January 20, 2013

विश्वविद्यालयों में शोध: कोई उम्मीद नहीं


आपने तो मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. एक फोड़ा जो पका हुआ था और काफी कष्ट दे रहा था आपने उसे छेड़ कर मेरा दर्द और बढ़ा दिया है. करीब चार दशक बिताए हैं उच्च शिक्षा के काम में और अब सेवा निवृत्त हो जाने के बाद भी इस क्षेत्र से रिश्ता पूरी तरह टूटा नहीं है. बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ का हिस्सा रहा हूं. अब मैदान में नहीं हूं लेकिन उससे पूरी तरह जुदा भी नहीं हो गया हूं. ऐसे में जब आपने शोध की वर्तमान स्थितियों के बारे में सवाल  उठाया काफी ऊहा पोह के बाद लगा कि सच कह ही दूं. इस छोटे-से आलेख में जो कह रहा हूं वह सामान्यीकृत  कथन है. अपवाद सर्वत्र होते हैं, यहां उच्च शिक्षा में भी हैं. लेकिन वे अपवाद इतने कम हैं कि उनके आधार पर कोई बात नहीं की जा सकती. इसलिए मैंने बार-बार अपवाद का ज़िक्र छेड़ने से खुद को रोका है.

जैसे जैसे विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, उनमें नौकरी के अवसर भी बढ़े हैं. और बहुत स्वाभाविक है कि नौकरी चाहने वालों की संख्या में भी बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है. विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन की नौकरी पाने के लिए शोध उपाधि अपरिहार्य है इसलिए नौकरी पाने के लिए शोध करने वालों की संख्या में जो वृद्धि हुई है उसे असामान्य नहीं माना जा सकता. जब तक शोध का सीधा सम्बन्ध नौकरी से नहीं था, बहुत सारे लोग ऐसे थे जो विशुद्ध अकादमिक कारणों से शोध कार्य में रत होते थे. हम सबने अपने अध्ययन काल में ऐसे अनेक शोध कार्यों से अपने ज्ञान में वृद्धि की है. लेकिन अब स्थितियां बदलने से उस तरह के लोग लगभग अदृश्य हो गए हैं और बच रहे हैं सिर्फ वे जिन्हें शोध इसलिए करना है कि उसे दिखा कर एक अदद नौकरी पाई जा सके. यानि शोध के पीछे जो भाव होता था या होना चाहिए वह तो लुप्त हो गया है, रह गई है महज़ खाना पूर्ति.

अब इस स्थिति की परिणति वही हो सकती है जिसकी तरफ आपने इशारा किया है. जिसे नौकरी पानी है वो चाहता है कि जल्दी से जल्दी, जैसे-तैसे करके ‘डॉक्टर’ हो जाए, और उस उपाधि को दिखाकर नौकरी पा ले. जल्दी से जल्दी की बात समझ में आती है, जैसे-तैसे वाली बात को थोड़ा और स्पष्ट करना होगा. पिछले कुछ  बरसों में हमारे यहां उच्च शिक्षा का ज़बर्दस्त विस्तार हुआ है. इस बात की तारीफ की जा सकती थी, बशर्ते इस विस्तार में गुणवत्ता की बलि न दे दी गई होती. हुआ यह कि सरकारों (यानि केन्द्र और राज्य सरकारों) ने लोकप्रियता पाने के लिए अनाप-शनाप कॉलेज और विश्वविद्यालय खोल दिए. इनमें से अधिकांश में न पढ़ने वाले थे और न पढ़ाने वाले,  और न पढ़ने-पढ़ाने का कोई माहौल. पुस्तकालय नहीं, प्रयोगशाला नहीं, कमरे नहीं. फिर भी कॉलेज और विश्वविद्यालय खड़े कर दिए गए. मुझे ऐसे बहुत सारे कॉलेजों की व्यक्तिगत जानकारी है जहां प्राध्यापक अपनी जेब से फीस भरकर विद्यार्थियों का नामांकन करते रहे हैं ताकि क्लास बनी रहे, वर्कलोड बना रहे और उनका अस्तित्व बना रहे. सरकारी कॉलेजों में तबादले की तलवार बड़ी मारक होती है. जो न करवा ले वही ठीक. अगर एम ए में दस या  बीस विद्यार्थी न्यूनतम न हुए तो क्लास टूट जाएगी, वर्क लोड घट जाएगा, तबादला हो जाएगा इसलिए जो भी मिले उसे जैसे तैसे भर्ती कर लो. और जिसे जैसे तैसे भर्ती कर लिया उसे जैसे तैसे पास भी कर दो, करवा दो. एम ए के पेपर बनाने और कॉपियां जांचने में भी प्राय: यही मानसिकता काम करती है कि अगर ज़्यादा विद्यार्थी फेल हो गए तो हमारे विषय का धन्धा मन्दा पड़ जाएगा, इसलिए पास तो करना ही है. मैं तो कई बार कहता हूं कि अगर हम ईमानदारी से अपनी कॉपियां जांचें तो परिणाम शायद दस प्रतिशत भी न रहे. लेकिन अगर ऐसा हो गया तो जो हड़कम्प  मचेगा, जो बावेला मचेगा उसकी सहज ही  कल्पना की जा सकती है. आज ही देश के एक अग्रणी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष का बयान छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे अपने यहां चल रही केन्द्रीय बोर्ड की पाठ्यपुस्तकें इसलिए हटवाना और नई किताबें इसलिए लिखवा कर लागू करवाना चाहते हैं कि उनके प्रांत के अधिकांश  विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और उन्हें केन्द्रीय बोर्ड की पुस्तकें पढ़ने समझने में दिक्कत होती है. यानि आप नहीं चाहते कि आपके प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थी देश के अन्य प्रांतों के विद्यार्थियों के बराबर वाले स्तर पर आएं. आप उनकी सुविधा के लिए अपने स्तर को नीचा करने को तैयार हैं. यह एक प्रांत का उदाहरण है लेकिन स्थिति कमोबेश हर जगह यही है. तो ये ही लोग बी ए (या बी एस-सी या बी कॉम) करते हैं और ये ही एम ए वगैरह पास हो जाते हैं और ये ही शोध करते हैं.

जिन्हें एम ए की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने का मौका मिला है वे जानते हैं कि अधिकांश विद्यार्थियों का स्तर कैसा होता है. मेरा विषय हिंदी है लेकिन जब मैं अन्य विषयों के अपने साथियों से बात करता हूं तो पाता हूं कि स्थिति हर जगह करीब-करीब एक-सी है. अब जिस विद्यार्थी ने एम ए करते हुए कभी मूल ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ या ‘गोदान’  के दर्शन नहीं किए, जिसे यह पता नहीं कि कवि और लेखक में कोई अंतर भी होता है या नहीं,  उससे आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि जब वह शोध करेगा तो कोई चमत्कार कर देगा!  अभी कल ही एक विश्वविद्यालय के मेरे प्रोफेसर मित्र बता रहे थे कि उनके विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में किताबों की क्या स्थिति है. मज़ाल है कि कोई किताब वहां मिल जाए. मतलब स्तरीय किताब. अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की लाइब्रेरियां  जिस स्थिति में  है उसमें कोई विद्यार्थी अगर चाहे तो भी कुछ अच्छा नहीं कर सकता. ज़्यादातर जगहों पर तो पाठ्य पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं होती हैं. मेरे प्रांत राजस्थान के सौ से ज़्यादा सरकारी कॉलेजों में लाइब्रेरियन ही नहीं हैं. नए खुले कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में पुस्तकालयों की जो स्थिति है उसके बारे में कुछ न कहा जाना ही सबसे अच्छी बात  होगी. और यही बात प्रयोगशालाओं के बारे में सच है. कमरा है तो उपकरण नहीं, उपकरण है तो सामग्री नहीं, और सामग्री है तो स्टाफ  नहीं. सबसे अच्छा यही है कि एक कमरा लो, उसपर बोर्द लगाओ ‘लाइब्रेरी’ या ‘लैबोरेट्री’. और फिर ठोक तो उस पर एक भारी ताला. यानि है भी और नहीं भी है.  

लेकिन इस सबके बावज़ूद विद्यार्थीगण हायर सैकण्ड्री करते हैं, बी ए करते हैं,  एम ए करते हैं और फिर बेहतर नौकरी पाने के लिए या जब तक और कुछ न हो जाए, मसलन शादी वगैरह, तब तक का वक़्त सम्मानजनक रूप से काटने के लिए शोध करने का काम करते हैं. इनमें से अधिकांश  जब अपने भावी शोध निदेशक से मुखातिब होते हैं तो उनके मन में शायद ही यह स्पष्ट होता हो कि वे किस विषय पर शोध करना चाहते हैं और क्यों करना चाहते हैं. बहुत सारे तो बहुत बेबाक रूप से कह भी देते हैं कि जो विषय सबसे आसान हो उसी पर उन्हें शोध करवा दिया जाए. इस बीच अनेक विश्वविद्यालयों ने चाहे एम फिल और पूर्व शोध परीक्षाओं की व्यवस्था करके गुणवत्ता सुनिश्चित करने के अनेक प्रयास किए हों, स्थिति में बहुत बदलाव इसलिए नहीं आ सका है कि नींव बहुत ही कमज़ोर है. जहां ये प्रयास हुए हैं वहां ‘समझदार’ लोगों ने इनकी भी काट निकाल ली है.

अब इस तरह की  कमज़ोर नींव वाले युवा जब शोध कार्य करते हैं तो उस कार्य का स्तर कैसा होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं. और यह स्थिति केवल हिंदी विषय में नहीं है, सारे ही विषयों में है. प्रसंगवश यहां एक निजी प्रसंग लाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. कई बरस पहले, मेरे एक पूर्व विद्यार्थी ने, जो तब तक विधि विषय के प्राध्यापक बन कर मेरे ही सहकर्मी बन चुके थे, अपने शोध प्रबंध का प्रारूप मुझे इस अनुरोध के साथ दिया कि मैं उसको भाषिक दृष्टि से देख लूं. उस शोध प्रबंध की स्थिति यह थी कि उसमें कहीं भी कोई वाक्य जहां से शुरू होता वहां खत्म नहीं हो रहा था. लगता था कि किसी ने अंग्रेज़ी से अनुवाद करने की बचकानी कोशिश की है और वह कोशिश भी असफल रही है. मैंने घुमा-फिराकर यह बात जब उन्हें कही तो वे बोले कि हमारे विषय में तो ऐसा ही होता है. कहना अनावश्यक है कि कुछ समय के बाद उनके नाम के आगे डॉक्टर लगने लगा था. मुझे लगता है कि हिंदी में शोध की स्तरहीनता की ज़्यादा चर्चा की एक वजह यह भी है कि हम लोगों का ताल्ल्लुक लिखने पढ़ने से है और हम लोग इस मुद्दे पर भी काफी लिख-पढ़ लेते हैं, जबकि अन्य अधिकांश विषयों वाले सार्वजनिक मंचों पर प्राय: ऐसी  कोई चर्चा नहीं करते हैं, इसलिए उनकी अकादमिक दुनिया की भीतरी जानकारी दूसरों को  नहीं मिल पाती है.

अब इस तरह जो शोध होता है उसके परीक्षण-मूल्यांकन  में बहुत बड़ी भूमिका आपसी रिश्तों की होती है. जन्नत की हक़ीक़त सबको पता है इसलिए ‘तुम मेरे विद्यार्थी को पास कर दो, मैं तुम्हारे विद्यार्थी को पास कर दूंगा’ का खुला खेल निर्बाध रूप से चलता है. और इसी खेल  के पहले वो सब भी जहां-तहां चलता है जिसका ज़िक्र आपने किया है. मेरा इशारा पेशेवर शोध लेखकों से शोध प्रबंध लिखवाने, अन्य शोध प्रबंधों की नकल करने, रुपये पैसों के लेन-देन और यौन शोषण आदि की तरफ है. असल में ये सारी बातें उसी स्थिति का विस्तार है जिसका ज़िक्र हम शुरू से कर रहे हैं.

जो स्थिति है उसे लेकर कोई असहमति नहीं है. बहुत बुरी स्थिति है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में बदलाव की, सकारात्मक बदलाव की भी कोई उम्मीद है? मेरा स्वर आपको बहुत निराशाजनक लग सकता है, लेकिन मेरी तो स्पष्ट राय है कि फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है. आदर्श की बातें बहुत की जा सकती हैं, कि ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए. लेकिन उनका अर्थ क्या है? हम जिस तरह के समाज में रह रहे हैं उस समाज में अगर यह नहीं होगा तो क्या होगा? ऐसा कैसे मुमकिन है कि सारा समाज तो सड़ांध मारता रहे, और शोध का क्षेत्र पवित्रता की खुशबू बिखेरे? नीचे से ऊपर तक सब कुछ तो गड़बड़ है. कौन-सी चीज़ है जो ठीक चल रही है? क्या चुनाव ठीक हो रहे हैं? ठीक लोग चुने जा रहे हैं? अस्पतालों में इलाज़ ठीक  हो रहा है? पुलिस अपना काम कर रही है? मां-बाप ठीक से अपनी संतान को पाल-पोस रहे हैं? वे जहां और जो भी काम करते हैं, वो काम ठीक  से कर रहे हैं? अख़बार ठीक से निकल  रहे हैं? मीडिया अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है? प्रधानमंत्री जी वो सब कर रहे हैं जो करने के लिए हमने उन्हें चुना था? एक सफाई कर्मी  ठीक से सफाई कर रहा है? प्राइमरी  स्कूल का मास्टर ठीक से पढ़ा रहा है? कॉलेज का विद्यार्थी अपनी 75 प्रतिशत कक्षाएं अटैण्ड कर रहा है? आप बताइये तो सही कि क्या ठीक चल रहा है? कॉलेजों विश्वविद्यालयों में पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हैं, बरसों से भर्ती  नहीं हुई है जबकि लोग लगातार  रिटायर होते जा रहे हैं.  पढ़लिखकर भी लोगों  को जो नौकरी मिलेगी उसमें उन्हें उचित वेतन भी नहीं मिलने वाला है. हमारे ज़्यादातर शिक्षण संस्थानों में ठेके पर अध्याप्क रखे जा रहे हैं. मेरे प्रांत में बहुत सारे निजी कॉलेजों में पाँच पाँच हज़ार रुपये में  लोग पढ़ा रहे हैं. तो जिनके सामने कोई उज्ज्वल भविष्य भी नहीं है उनसे आप कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे बहुत निष्ठा से अपना काम करके शोध कार्य करेंगे?   तो इन सब बातों को अनदेखा करते हुए कोई भला कैसे शोध के स्तर को ऊँचा उठाने की बात कर सकता है? कम से कम मैं तो नहीं कर सकता. इसलिए नहीं कर सकता कि इस दुनिया को भीतर से मैंने देखा है और इसकी रग-रग से वाक़िफ हूं.

बहुत चाहा कि अपनी यह टिप्पणी इस निराशाजनक  स्वर पर ख़त्म न करूं लेकिन जब अपनी देखी दुनिया को याद किया तो बस, यह हुआ कि बकौल साहिर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया.
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'समकालीन सरोकार' के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित. 
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