Thursday, January 26, 2012

मीडिया: कल, आज और कल

मीडिया की आज़ादी की बात अभिव्यक्ति की आज़ादी के समानांतर है. जितनी ज़रूरी अभिव्यक्ति की आज़ादी है उतनी ही ज़रूरी मीडिया की आज़ादी भी है. और मुझे यह कहने में गर्व का अनुभव हो रहा है कि भारत में कुछ छुट-पुट अपवादों को छोड़कर ये दोनों ही आज़ादियां विद्यमान हैं. इन छुट-पुट अपवादों का भी समुचित विरोध होता है और इसलिए उन्हें नज़रन्दाज़ कर दिया जाना चाहिए. लेकिन जब हम बदलते परिवेश में मीडिया की आज़ादी की बात करना चाहते हैं तो पहला सवाल तो यही उठता है कि यह बदलता परिवेश क्या है. वैसे तो इसके अनेक सन्दर्भ हो सकते हैं लेकिन मैं फिलहाल बाज़ार और पूंजी के सन्दर्भ में इस परिवर्तित परिवेश को देखते हुए कुछ कहना चाहूंगा. पिछले कुछ बरसों में, मुक्त अर्थव्यवस्था और उदारीकरण के प्रसार से देश में काफी कुछ बदला है, और उस काफी कुछ में मीडिया भी शामिल है. एक समय था जब इस मीडिया को पत्रकारिता के नाम से जाना जाता था और उसे एक मिशन माना जाता था. लेकिन अब सिर्फ उसके नाम में ही नहीं चरित्र में भी बदलाव हुआ है और वह मिशन न रहकर एक व्यवसाय में तब्दील हो गया है. और जब वह व्यवसाय बन गया है तो ज़ाहिर है कि उसका लक्ष्य भी लाभ अर्जित करना हो गया है. अब इसी बदले हुए परिवेश में हम मीडिया की भूमिका पर विचार कर सकते हैं. मेरा ऐसा मानना है कि लाभ के बावज़ूद एक आधारभूत नैतिकता और आदर्श का भाव तो बना ही रहना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से कई दफा ऐसा नज़र नहीं आता है. चाक्षुष मीडिया में, खास तौर पर निजी चैनलों में, जहां टीआरपी ही सर्वोपरि हो गई है, और मुद्रण माध्यमों में भी, कई बार लगता है कि मुनाफा ही सब कुछ हो गया है. समाचारों पर विज्ञापन हावी दिखाई देते हैं और पेड न्यूज़ वाली बात भी इतनी पुरानी नहीं हुई है कि हमारी स्मृति से विलुप्त हो जाए. समाचारों के चयन में लाभ-हानि का नज़रिया साफ लक्षित होता है. मुद्रण माध्यमों में हमारी भाषा के साथ जो सुलूक हो रहा है उसके मूल में भी यही लाभ की प्रवृत्ति काम करती दिखाई देती है. लगता है कि अखबारों के मालिकों को भाषा की शुचिता की नहीं कोई चिंता नहीं है. बल्कि वे तो यह सोचकर कि इससे उनको ज़्यादा लाभ होगा, भाषा को और भी विकृत करने ज़रा भी संकोच नहीं कर रहे हैं. कोई भी माध्यम जड़ होकर नहीं जी सकता, लेकिन यह देखा जाना चाहिए कि वह किस तरह बदल रहा है. इधर अधिकांश अखबारों में गम्भीर, विचारोत्तेजक और सकारात्मक सामग्री का अनुपात निरंतर घट और हल्की-फुल्की, चटपटी, अश्लीलता की तरफ झुकी हुई और एक हद तक विकृत रुझान वाली सामग्री का अनुपात बढ रहा है. बहुत बार लगता है कि मीडिया को जिन चीज़ों के प्रतिपक्ष में होना चाहिए वह उन्हीं के समर्थन और सेवा में खड़ा है. निश्चय ही यह स्थिति चिंताजनक है. दृश्य माध्यमों में तो अर्थशास्त्र का वह नियम बहुत स्पष्ट नज़र आता है कि जब अच्छी और बुरी मुद्रा एक साथ चलती है तो बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से हटा देती है. निजी चैनलों ने दूरदर्शन को लगभग अदृश्य ही कर दिया है. निजी चैनल मतलब केवल और केवल फिल्मी सामग्री. यहां भी जैसे नीचे गिरने की एक होड़ लगी है. रियलिटी शोज़ के नाम पर न जाने क्या-क्या दिखाया जा रहा है. अब सवाल यह रह जाता है कि ऐसे में मीडिया से हमारी अपेक्षाएं क्या हों? मैं जानता हूं कि बेशर्म पूंजी के इस दौर में मुनाफे की बात को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी मैं यह उम्मीद करना चाहता हूं कि मीडिया अपने सामाजिक दायित्व को विस्मृत न करे. वह लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही उन्हें शिक्षित और संस्कृत करने के अपने दायित्व का भी निर्वहन करे. मनोरंजन का अर्थ केवल फूहड़ नाच ही नहीं है, मनोरंजन सुरुचिपूर्ण भी हो सकता है. लाभ खबरों के विवेकपूर्ण चयन और संतुलित प्रस्तुतिकरण से भी कमाया जा सकता है. मैं उदास तो हूं, लेकिन निराश नहीं हूं. मुझे विश्वास है कि मीडिया अपने भटकाव के इस दौर से जल्दी ही उबरेगा और फिर से वह भूमिका अदा करने लगेगा जो उससे अपेक्षित है. ◙◙◙ जयपुर के समाचार पत्र डेली न्यूज़ में 26 जनवरी, 2012 को प्रकाशित. Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा
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