Sunday, July 24, 2011

बाज़ार: क्या यही है सारी बुराइयों की जड़?

हाल ही में मेरे एक सुधी अति संवेदनशील और बहु पठित मित्र ने अपना एक नया लेख मुझे मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजा. हम मित्रों के बीच यह एक सामान्य बात है कि अपने लिखे को प्रकाशनपूर्व अपने मित्रों को पढ़वा कर उनकी प्रतिक्रिया जान लें और यदि आवश्यक हो अपने लिखे में सुधार भी कर लें. मैं भी अक्सर ऐसा ही करता हूं. उस लेख का लब्बो-लुआब यह था कि आज बाज़ार का बहुत अधिक विस्तार हो गया है और वर्तमान की अधिकांश सामाजिक तथा नैतिक विकृतियों के मूल में बाज़ार का यह विस्तार ही है. बाज़ार के विस्तार को उन्होंने बहुत सारे उदाहरण देकर स्थापित किया था.

उस लेख को पढ़कर मैं गहरे सोच में पड़ गया हूं. सोच रहा हूं क्या बाज़ार का विस्तार हमारे अपने ही समय में हुआ है? क्या पहले बाज़ार नहीं था? या अगर था तो तब उसका कोई फैलाव नहीं हो रहा था? और अगर हो रहा था तो क्या बीते हुए कल में उस फैलाव की वजह से कोई संकट नहीं आ रहे थे, और अगर आ रहे थे तो क्या अब वे संकट बहुत ज्यादा गहरा गए हैं? मुझे अनायास ही याद आया कि हमारे कबीरदास भी बाज़ार में ही लुकाठी हाथ में लिए खड़े थे. ग़ालिब भी आश्वस्त थे कि बाज़ार खुला हुआ है और अगर ज़रूरत पड़ी तो वे जाकर दिलो-जां और ले आएंगे. के एल सहगल ने अगर यह गाया था कि ‘बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीददार नहीं हूं’ तो जिस शायर ने यह लिखा था वह अगर उनसे पहले का नहीं तो उनका समकालीन तो रहा ही होगा. जैनेंद्र कुमार का एक बहुत बेहतरीन लेख ‘बाज़ार दर्शन’ मैं अपने अध्यापन काल के शुरुआती दिनों में पढ़ाता रहा हूं. अब तो मैं रिटायर भी हो चुका हूं. यानि वह लेख भी पचासेक बरस पुराना तो होगा ही. आप कोई नाराज़ प्रतिक्रिया दें उससे पहले ही मैं स्वयं यह कह दूं कि मैं भी इस बात से भली-भांति परिचित हूं कि कबीर या गालिब जिस बाज़ार की बात कर रहे थे वह बाज़ार निश्चय ही आज के बाज़ार का सटीक पर्याय नहीं था. लेकिन फिर भी, यह आप भी स्वीकार करेंगे कबीर अगर बाज़ार में लुकाठी हाथ में लिए खड़े होने की घोषणा कर रहे थे तो वह बाज़ार कोई ऐसी जगह ही होगी जहां खरीद फरोख्त होती होगी. ग़ालिब के बाज़ार को लेकर तो कोई संशय हो ही नहीं सकता. कहने का अभिप्राय यह बाज़ार कोई हाल ही में आई मुसीबत नहीं है, अगर वो मुसीबत है भी तो. चीज़ें पहले भी बेची खरीदी जाती रही हैं. हमारी जो वर्ण व्यवस्था है उसमें वैश्य समुदाय अंतत: व्यापार ही तो करता था, और व्यापार निश्चय ही बाज़ार में होता होगा. हां, कभी उस बाज़ार में मुद्रा का चलन नहीं रहा होगा, चीज़ों का आदान-प्रदान होता रहा होगा. लेकिन चीज़ें बनती भी होंगी, और प्रयोग में भी आती होंगी – इस बात को लेकर कोई संशय नहीं हो सकता.

लेकिन इधर हाल ही में लेखकों में और वो भी खास तौर पर हिंदी के लेखकों में बाज़ार को लेकर रोना-धोना करने का एक खास प्रचलन हुआ है. बाज़ार की इतनी बुराइयां की गई हैं और बाज़ारवाद को इतनी बार कोसा गया है कि अब किसी के मन में इनके प्रति कोई सद्भावना रह ही नहीं गई है. हमने मान लिया है कि बाज़ार नाम की यह मुसीबत जो हाल ही में आई है, असल में सारी बुराइयों की जड़ है. यानि अगर बाज़ार खत्म हो जाए तो सब कुछ भला-भला और साफ सुथरा हो जाएगा. कहना अनावश्यक है कि मेरे उक्त मित्र का लहज़ा भी कुछ इसी तरह का था और है.

अगर मैं पिछले पचास साठ बरसों में आए बदलाव पर एक नज़र डालूं और कुछ अपने अनुभवों को स्मरण करूं तो शायद कोई तस्वीर बने. मैं 1967 में कॉलेज लेक्चरर बना था. उस ज़माने में सारे लेक्चरर, और करीब-करीब सारे ही प्रिंसिपल, एकाध अपवाद को छोड़कर साइकिलों पर कॉलेज आते थे. किसी के पास कार या टेलीफोन का होना बहुत बड़ी बात थी. मुझे अब भी याद है कि उस ज़माने में भारतीय बाज़ार में शेविंग के लिए कोई ठीक-ठाक सी ब्लेड भी नहीं मिलती थी. धीरे-धीरे समय बदला. और आज, उस समय के लगभग 45 बरस बाद, कॉलेजों में, एकाध अपवाद को छोड़कर अधिकांश प्राध्यापक कार में आते हैं. और प्राध्यापक ही क्यों बहुत सारे विद्यार्थी भी चमचमाती कारों में आते हैं. हमारे बाज़ार हर तरह के सामान से पटे पड़े हैं. दुनिया के तमाम ब्राण्डों का सामान भारतीय बाज़ारों में सुलभ है. अब किसी विदेश जाने वाले को वहां से कुछ लाने की जरूरत नहीं रह गई है. सब कुछ भारतीय बाज़ारों में आसानी से उपलब्ध है. न केवल सामान उपलब्ध है, सेवाओं की सुलभता में भी अद्भुत विस्तार और विकास हुआ है. पिछले दिनों मुझे दो दफा अस्पताल का मुंह देखना पड़ा और मैंने पाया कि हमारे निजी अस्पतालों में सही मानों में विश्व स्तरीय सेवाएं उपलब्ध हैं. यही हाल शिक्षण संस्थाओं का भी है. यही हाल आतिथ्य उद्योग का भी है. यही हाल मनोरंजन की दुनिया का भी है. और इन सबके साथ-साथ सरकारी सेवाएं भी हैं जो अपेक्षाकृत सस्ती हैं, लेकिन स्वाभाविक रूप से इतनी उत्कृष्ट और विश्वसनीय नहीं हैं. तो स्वाभाविक ही है कि जिनके पास साधन और सुविधा है वे इन महंगी निजी सेवाओं की तरफ बढ रहे हैं.

बाज़ार में यह सब हो रहा है. और इसके प्रोत्साहन तथा संवर्धन के लिए विज्ञापन भी खूब हो रहे हैं. मीडिया का विस्तार हुआ है और वह विस्तृत मीडिया इस बाज़ार की भी सेवा जम कर कर रहा है. मीडिया हमें न केवल नए उत्पादों और सेवाओं का परिचय देता है, वह हमारे मन में उनके प्रति लालसा भी जगाता है. यह काम प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरहों से होता है. बाज़ार और मीडिया मिलकर बहुत सारे लोगों को रोज़गार दे रहे है. आखिर जब सामान बनता और बिकता है तो लोगों को काम तो मिलता ही है. इतना ज़रूर है कि मीडिया अपने हितों की साधना करते हुए कृत्रिम आवश्यकता भी पैदा करता है और लोगों को वस्तु प्रेमी भी बनाता है. आपको जिस चीज़ की ज़रूरत नहीं है, विज्ञापन आपको उस चीज़ के लिए भी लालायित करते हैं. मीडिया आज सामान ही नहीं जीवन-शैली भी बेच रहा है. जो कच्चे मन के हैं वे इससे अधिक प्रभावित होते हैं और जिनके मन दृढ़ हैं उन पर इन चीज़ों का बहुत कम या शून्य असर होता है. लेकिन इस बुराई को अगर थोड़ी देर के लिए एक तरफ कर दें तो बाज़ार का विकास देश की अर्थ व्यवस्था के लिए सहायक दिखाई देता है. आज अगर देश में पहले से बेहतर आर्थिक हालात दिखाई दे रहे हैं तो उनका काफी श्रेय बाज़ार के इस विकास को भी दिया जाना चाहिए.

यह सही है कि देश में जो आर्थिक विकास हो रहा है वह संतुलित नहीं है. एक बहुत बड़ा तबका है जो अभी भी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन बसर करने को विवश है. लेकिन उस तबके की बदहाली के लिए बाज़ार नहीं, दोषपूर्ण सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं, यह बात भी समझी जानी चाहिए. सरकारी सेवाओं का निम्न स्तरीय होना इस तबके के जीवन त्रासों को और सघन करता है. और यहीं एक बात और कहना चाहूंगा. पिछले कुछ बरसों में हमारे देश में सरकारी नौकरियों में बहुत कमी हुई है. जैसे-जैसे विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण बढ़ा है, यह होना स्वाभाविक भी था. लेकिन सरकारी नौकरियों में आई कमी को प्राय: बढती बेरोजगारी के रूप में प्रक्षेपित कर दिया जाता है. कहा जाता है कि देखो इतने सारे लोग बी ए, एम ए पास हैं लेकिन सरकार इन्हें नौकरी नहीं दे पा रही है. निश्चय ही अब उस आसानी से सरकारी नौकरियां नहीं मिलती हैं जिस आसानी से कुछ बरसों पहले मिल जाती थीं. लेकिन सरकारी नौकरियां न मिलने का अर्थ बेरोजगारी का बढ़ जाना मान लेना भी उचित नहीं है. हमारे यहां अनेक कारणों से लोगों के मन में सरकारी नौकरी के प्रति एक खास तरह का मोह रहा है. और उसी मोह के चलते वे कम वेतन पर भी सरकारी नौकरी करने को प्राथमिकता देते हैं. सरकारी नौकरी एक निश्चित उम्र तक रोज़गार की गारण्टी दे देती है. आप काम करें न करें, आपको कोई निकाल नहीं सकता. सरकारी नौकरी में, जो चाहें उनके लिए, भ्रष्टाचार की भी काफी गुंजाइश होती है, सरकारी नौकरी, चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो आपको एक अधिकार बोध देती है, वगैरह. इनके विपरीत निजी क्षेत्र आपसे जी तोड़ काम करवाता है और जैसा प्राय: कहा जाता है, आपका तथाकथित शोषण भी करता है. वहां अगर आपकी ड्यूटी सुबह से शाम तक की है तो आपको ड्यूटी बजानी ही है. जो काम करते हैं वे ही वहां टिक पाते हैं, शेष को दरवाज़ा दिखाने में कोई संकोच नहीं किया जाता. हमारी अब तक बनी हुई मानसिकता को यह बात ज़रा कम ही रास आती है. इसलिए हम निजी क्षेत्र के रोज़गार को तो रोज़गार ही नहीं मानते, और सरकारी नौकरियों के कम होते जाने का ही रोना रोते रहते हैं.

एक और बात यह है कि हमारी मुख्यधारा की जो शिक्षा है, वह नाममात्र की शिक्षा है. आप बी ए, एम ए कर लेते हैं लेकिन आप में किसी भी किस्म की दक्षता नहीं होती है. आप एक सामान्य अर्जी नहीं लिख सकते, आप पोस्ट ऑफिस में जाकर मनी ऑर्डर फॉर्म नहीं भर सकते, आप बिजली का फ्यूज नहीं बदल सकते, आप किसी विषय पर दो मिनिट सलीके से अपनी बात नहीं कह सकते, लेकिन इसके बावज़ूद आप एम ए पास होते हैं. अब सोचिये कि इस तरह के एम ए पास को कोई क्यों अपने यहां काम पर रखे? असल में पास बुक्स पढ़कर, पांच सवालों के जवाब रट कर और उन्हें जैसे तैसे उत्तर पुस्तिका के पन्नों पर उगल कर जो बहुत बड़ी फौज स्नातक या अधिस्नातक बन रही है, उसकी दारुण हकीकत यही है. इस फौज के विपरीत ऐसे भी युवा हैं जिनके पास बी ए, एम ए की डिग्री तो नहीं है लेकिन उनके पास कोई न कोई दक्षता है. वह दक्षता कपड़ों पर प्रैस करने की हो सकती है, कम्प्यूटर पर टंकण की हो सकती है, इंजेक्शन लगाने की हो सकती है, गाड़ी चलाने की हो सकती है, खाना बनाने की हो सकती है, या ऐसी ही कोई और दक्षता हो सकती है. इनके लिए रोज़गार की कमी नहीं है. ये लोग बड़े मज़े में काम करते हैं और पैसा कमाते हैं. हम पाते हैं कि तमाम शिक्षा के बावज़ूद ऐसे युवा बहुत कम हैं जो कम्प्यूटर पर ठीक से टाइप कर सकें. जो कर सकते हैं उनके पास काम का अम्बार लगा रहता है. और यही हालत और तमाम क्षेत्रों की भी है.

चलिये, फिर बाज़ार की तरफ लौटें. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि जो मित्र बाज़ार को कोसते हैं, उन्हीं से पूछूं कि अगर किसी चमत्कार से बाज़ार को खत्म कर दिया जाए तो क्या होगा? उनसे पूछने का मन करता है कि वे अतीत के किस काल खण्ड में लौटना चाहेंगे? पाषाण युग में? या उसके थोड़ा बाद वाले कृषि युग में, या और भी बाद के किसी काल खण्ड में? चलिए हम बहुत पीछे नहीं लौटते हैं और दो-एक सौ साल पहले के ज़माने में लौट जाते हैं. बाज़ार में बहुत कम उत्पाद हैं और हमारी जरूरतें भी बहुत सीमित हैं. न कार है न स्कूटर, न फोन हैं न मोबाइल, न टीवी है न सिनेमा. न फ्रिज हैं न ए सी. सादा जीवन उच्च विचार! पहली बात तो यह कि क्या इस तरह घड़ी की सुइयों को पीछे लौटा ले जाना मुमकिन होगा? क्या दुनिया के किसी भी देश में आज यह स्थिति है? और दूसरी बात, क्या ऐसा करना उचित होगा? आप कहेंगे कि यह तो अतिवादी नज़रिया है. जी हां. मैं भी इस बात को मानता हूं. और यह भी मानता हूं कि इस तरह का अतिवादी नज़रिया उचित नहीं होता.

और इसीलिए, अपनी बात को समेटता हुआ यही कहना चाहूंगा कि बाज़ार को दोष देना उचित नहीं है. बाज़ार है और रहेगा, बल्कि रहना चाहिए. यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस हद तक उसके बुरे प्रभावों से खुद को बचाए रख सकते हैं.
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दैनिक नवज्योति में दिनांक 24 जुलाई को प्रकाशित आलेख.



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