Thursday, May 15, 2008

जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी

पति पत्नी कार में कहीं जा रहे हैं. पत्नी पूछती है, “आप कॉफी के लिए कहीं रुकना चाहेंगे?” ”नहीं, धन्यवाद!” पति ईमानदारी से जवाब देता है और यात्रा जारी रहती है.
परिणाम? दरअसल पत्नी जो खुद कॉफी के लिए रुकना चाहती थी, यह सोच कर नाराज़ हो जाती है कि पति ने उसकी इच्छा का मान नहीं रखा. उधर, पत्नी को नाराज़ देख पति भी परेशान हो जाता है और समझ नहीं पाता कि पत्नी कॉफी पीना ही चाहती थी तो साफ-साफ क्यों नहीं बोली?

इस प्रकरण में पति तो यह नहीं समझ सका कि पत्नी ने जो पूछा था, उसका असल मक़सद पूछना नहीं, संवाद शुरू करना था, और पत्नी यह नहीं महसूस कर सकी कि पति ने जब कॉफी के लिए मना किया तो उसने महज़ अपनी पसन्द ज़ाहिर की थी, कोई हुक्म नहीं दिया था.
हम सब की ज़िन्दगी में अक्सर ऐसा होता है. जब स्त्री और पुरुष अपनी-अपनी तरह से भाषा को बरतते हैं तो उसकी परिणति एक दूसरे पर स्वार्थी और ज़िद्दी होने का इलज़ाम लगाने में होती है.

जॉर्ज़ टाउन विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की प्रोफेसर और विख्यात समाज-भाषा वैज्ञानिक डेबोराह तान्नेन ने अपनी नई किताब यू जस्ट डॉण्ट अण्डर स्टैण्ड : वुमन एण्ड मेन इन कन्वर्सेशन में स्त्री और पुरुष द्वारा भाषा के इसी भिन्न व्यवहार पर गहन किंतु रोचक विमर्श किया है. उनका स्पष्ट मत है कि ज़्यादातर स्त्रियां बातचीत को सम्पर्क और संवाद के लिए प्रयोग करती हैं जबकि पुरुष इसका प्रयोग सामाजिक हैसियत अर्जित करने या बनाए रखने के लिए और ज्ञान देने के लिए करते हैं. डेबोराह ने स्त्रियों की बातचीत को निजी बातचीत (रैपो टॉक) और पुरुषों की बातचीत को सार्वजनिक बातचीत (रिपोर्ट टॉक) की संज्ञा दी है.
लेखिका ने अनेक उदाहरणों से यह समझाया है कि स्त्रियां सहेलियों और प्रेमियों से बात करके निकटता स्थापित करती हैं. वे अपनी समस्याओं का साझा भी करती हैं. लेकिन पुरुष प्राय: ऐसा नहीं करते. अगर स्त्री उनके सामने कोई समस्या रखती है तो वे तुरंत उसका समाधान पेश करते हैं. तब, स्त्री को लगता है कि पुरुष उसकी समस्या में रुचि नहीं ले रहा है. स्त्री को सुनने वाले की चाहना थी, न कि समाधान देने वाले की. तब, पुरुष शिकायत करता है कि स्त्री तो अपना ही रोना रोती रहती है, और समाधान में उसकी कोई रुचि नहीं है. पुरुष की इस शिकायत के मूल में है स्त्री की आधारभूत प्रकृति से उसका अपरिचय. खुद पुरुष किसी से अपनी समस्या की चर्चा तब तक नहीं करता जब तक कि उसे समाधान की ज़रूरत न हो.
इस बात के उदाहरण के रूप में डेबोराह लिखती हैं, “जब मेरी मां मेरे पिता से कहती हैं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो मेरे पिता उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास चलने को कहते हैं. उनकी यह प्रतिक्रिया मेरी मां को अच्छी नहीं लगती. पिता समस्या का समाधान पेश करते हैं जबकि मां केवल उनकी सहानुभूति चाहती हैं.”

स्त्री और पुरुष भाषा की भिन्नता की खोज करते हुए डेबोराह ने लडके और लडकियों के खेलने के तौर-तरीकों का भी विश्लेषण किया है. वे बताती हैं कि लडके बडे समूहों में और प्राय: बाहर खेलने में रुचि रखते हैं. उनके समूह में एक पदानुक्रम भी होता है, यानि एक ग्रुप लीडर होता है जो सबको हुक्म देता है. लडकों के खेल-में हार-जीत भी होती है. इसके विपरीत, लडकियां अक्सर छोटे समूह में या जोडियों में ही खेलना पसन्द करती हैं और हरेक की कोई न कोई बेस्ट फ्रेंण्ड होती है. उनके यहां कोई आदेश नहीं दिए जाते. लडकियों के लिए निकटता महत्वपूर्ण होती है. उनके खेलों में हार-जीत भी नहीं होती. उनकी प्रकृति का यह अंतर उनकी संवाद शैली का भी निर्माण करता है.

लेखिका ने स्त्री और पुरुष संवादों की तह में जाकर खोजा है कि हर स्त्री अंतत: एक ही बात पूछती है: क्या तुम मुझे पसन्द करते हो? और इसी तरह हर पुरुष भी एक ही बात पूछता है: क्या तुम मेरा सम्मान करते/करती हो?

निष्कर्ष के रूप में डेबोराह सलाह देती हैं कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे की संवाद शैली की मूलभूत भिन्नताओं को समझना चाहिए. जैसे, स्त्रियां जैसी बातें अपनी सहेलियों से करती हैं वैसी ही बातें अगर अपने पुरुष मित्रों से भी करेंगी तो यह उन्हें अपनी सहेली में तब्दील करने जैसा होगा. और इसी तरह, पुरुष को भी यह समझना चाहिए कि जब कोई स्त्री उससे मुखातिब है तो वह दर असल कुछ कह नहीं रही बल्कि अपने रिश्ते को मज़बूत करने की चेष्टा कर रही है. वे कहती हैं कि दोनों को किसी मध्य बिन्दु तक आने का प्रयास भी करना चाहिए. कुल मिलाकर, अगर स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे से यह उम्मीद करना बन्द कर दें कि वे उन्हीं की तरह संवाद करेंगे तो ज़िन्दगी ज़्यादा खूबसूरत हो सकती है.
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Discussed book:
You Just Don’t Understand: Women and Men in Conversation
By Deborah Tannen
Published by Harper Collins Publishers
352 pp
US $ 13.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 15 मई 2008 को प्रकाशित.








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