Thursday, February 7, 2008

जीवन का तर्क : अर्थशास्त्र के माध्यम से






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अर्थशास्त्र को प्राय: एक मनहूस विज्ञान कहा जाता रहा है. गैर अर्थशास्त्री इसे नीरस, अमूर्त और एक हद तक अनुपयोगी ज्ञान-शाखा मानते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में अर्थशास्त्रियों ने अपने लेखन से इन धारणाओं को बदलने के प्रयास किए हैं. फ्रीकोनोमिक्स के रूप में किए गए एक ऐसे ही प्रयास में अर्थशास्त्र को अधिक रुचिकर रूप में प्रस्तुत किया गया था. उसके बाद तो जैसे दिलचस्प किताबों की एक श्रंखला ही बन गई. यहां तक कि स्पोर्ट्स अर्थशास्त्र पर भी दो किताबें आ गईं. अर्थशास्त्र विषयक दिलचस्प किताबों की श्रंखला में जुडी ताज़ा कडी है टिम हार्फर्ड की द लॉजिक ऑफ लाइफ: द रेशनल इकॉनोमिक्स ऑफ एन इर्रेशनल वर्ल्ड.

हार्फर्ड की इस दिलचस्प किताब का प्रस्थान बिन्दु यह विचार है कि इंसान इंस्ट्रुमेंटल रेशनलिटी (करणात्मक बुद्धिसंगतता) का इस्तेमाल करते हुए लागत और लाभ की गणना कर अपने जीवन के फैसले करता है. हार्फर्ड कहते हैं कि रेशनल लोग इंसेण्टिव्ज़ से परिचालित होते हैं. अगर उन्हें कोई काम महंगा लगता है तो वे उसे कम करते हैं और अगर सस्ता व अधिक लाभप्रद लगता है तो ज़्यादा करते हैं. जब कोका कोला की कीमत बढती है तो लोग पेप्सी ज़्यादा पीना शुरू कर देते हैं. जब शहरों में अपार्टमेण्ट्स की कीमतें बढती हैं तो लोग उपनगरों का रुख करने लगते हैं. इस तर्क को आगे बढाते हुए हार्फर्ड उन बहुत सारे मुद्दों पर विचार करते हैं जो सामान्यत: अर्थशास्त्र की परिधि में नहीं आते. जैसे, विवाह, नशे और जुए की लत, आपके बॉस को बहुत ज़्यादा तनख्वाह क्यों मिलती है, पडोसियों का पृथ्क्करण, अपराध का अर्थशास्त्र आदि. ज़ाहिर है, किताब बहुत व्यापक क्षेत्र में विचरण कर यह सिद्ध करती है कि अर्थशास्त्र एक बहुमुखी ज्ञान-शाखा है.

अपनी बात कहने के लिए हार्फर्ड जीवन के ऐसे अनेक प्रसंग लाते हैं जो ऊपरी तौर पर बुद्धिसंगत नहीं लगते. आखिर किसी का ड्रग लेना, असुरक्षित यौन सम्बन्ध स्थापित करना वगैरह बुद्धि संगत कैसे हो सकता है? प्रेम या तलाक़ के पीछे भला क्या आर्थिक तर्क हो सकते हैं? सच तो यह है कि हमारा पूरा जीवन ही एक अबूझ पहेली है. एक बस्ती बहुत विकसित हो जाती है और उसके ठीक बगल वाली अविकसित रह जाती है. एक निकम्मा आदमी जीवन की तमाम सीढियां चढ कर जाने कहां पहुंच जाता है! इन और ऐसी अनेक गुत्थियों को टिम हार्फर्ड सुलझाते हैं. वे एक ही बात कहते हैं – हमारे हर कृत्य के पीछे किसी न किसी इंसेण्टिव का हाथ होता है.
हार्फर्ड ने अपनी इस किताब में वैवाहिक सम्बन्धों पर भी अर्थशास्त्र के नज़रिए से विचार किया है. अर्थशास्त्री गेरी वेबर के हवाले से वे कहते हैं कि विवाह समबन्धों के मूल में भी तीन आर्थिक ताकतों की अंत:क्रिया देखी जा सकती है: श्रम विभाजन, माप तोल की अर्थ व्यवस्था और तुलनात्मक लाभ का आकलन. गेरी स्त्री-पुरुष के बीच पारम्परिक श्रम विभाजन की चर्चा करते हुए एक मज़ेदार बात यह कहते हैं कि पुरुष आजीविका अर्जन का काम इसलिए नहीं करता कि वह यह काम बेहतर तरीके से कर सकता है, वह यह काम इसलिए करता है कि गृह प्रबन्धन का काम अगर वह करेगा तो ज़्यादा ही खराब तरह से करेगा.

हार्फर्ड जब आज के वैवाहिक परिदृश्य का विश्लेषण करते हैं तो वे कुछ विचारोत्तेजक तथ्य भी सामने लाते हैं. स्वाभाविक है कि ये तथ्य पश्चिमी दुनिया से हैं. वे कहते हैं कि आज औरतें कामकाजी केवल इसीलिए नहीं होती जा रही हैं कि उन्हें इसमें मज़ा आता है या इससे उन्हें खर्च करने की आज़ादी मिलती है. वे काम इसलिए भी करती हैं कि आज उनके सामने तलाक़ के खतरे बढ गए हैं. इसलिए, हार्फर्ड का तर्क है कि, आज बढते तलाकों के मूल में प्रेम के मनोविज्ञान में आ रहा बदलाव नहीं बल्कि परिस्थितियों के प्रति बुद्धिसंगत प्रतिक्रिया है. आज की औरत के प्रति अधिक संवेदनशील होते हुए हार्फर्ड कहते हैं कि अधिक शक्तिशाली पदों पर स्त्री की पहुंच ने आज उसे यह आज़ादी दी है कि अगर उसके वैवाहिक रिश्ते ठीक-ठाक न हों तो वह तलाक़ ले ले, और इसके उलट यह भी कि तलाक़ का यह विकल्प शक्तिशाली सेवाओं में स्त्रियों की भागीदारी में इज़ाफा कर रहा है.

यह अर्थशास्त्र की ऐसी किताब है जो आंकडों या समीकरणों की बजाय व्यक्तियों के माध्यम से अपनी बात कहती है. हार्फर्ड का सन्देश बहुत स्पष्ट है. अगर आप अपनी दुनिया को समझना या बदलना चाहते हैं तो पहले उन बुद्धिसंगत विकल्पों को समझिए जिन्होंने इसे इसकी मौज़ूदा शक्ल बख्शी है.
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Discussed book:
The Logic of Life: The Rational Economics of an Irrational World
By Tim Harford
Published by Random House
Hardcover, 272 pages
US $ 25.00
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 07 फरवरी 2008 को प्रकाशित
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