Wednesday, November 7, 2007

लडकी क्यों लडकों-सी नहीं होती?

स्त्रियां पुरुषों की तुलना में ज़्यादा बातूनी क्यों होती हैं? क्यों औरतें उन विवादों को तफसील से याद रख लेती हैं जिन्हें मर्द क़तई याद नहीं रख पाते? क्या कारण है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं अपनी दोस्तों से ज़्यादा घनिष्ठता से जुडती हैं? इन और ऐसे अनेक सवालों का जवाब देती है न्यूरो साइकियाट्रिस्ट लुआन ब्रिजेण्डिन की नई किताब ‘द फीमेल ब्रेन’. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में कार्यरत लुआन, जो चिकित्सा विज्ञान का प्रयोग अपनी महिला रोगियों के सशक्तिकरण के लिए करती हैं, की यह किताब मानवीय व्यवहार की जीव वैज्ञानिक पडताल की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है.

येल में एक मेडिकल छात्रा के रूप में शोध करते हुए और फिर हारवर्ड में रेजिडेण्ट और फैकल्टी मेम्बर के रूप में काम करते हुए लुआन का ध्यान इस बात की तरफ गया कि न्यूरोलॉजी, मनोविज्ञान और न्यूरो-बायोलॉजीमें करीब-करीब सारा क्लिनिकल डाटा पुरुषों कर ही आधारित है. इस असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए उन्होंने अमरीका का पहला ऐसा क्लिनिक स्थापित किया जो स्त्री मस्तिष्क का अध्ययन करता है. इस किताब में वहां किए गए अध्ययन, शोध और नवीनतम सूचनाओं को इस तरह संजोया गया है कि इसे पढने के बाद स्त्रियां तो अपने खास मस्तिष्क, शरीर और व्यवहार को बेहतर तरीके से समझ ही पाती हैं, पुरुषों को भी सिगमण्ड फ्रायड के उस मशहूर सवाल का एक हद तक जवाब मिल जाता है कि आखिर स्त्रियां चाहती क्या है! किताब यह भी बताती है कि स्त्री और पुरुष की मानसिक बनावट में क्या फर्क़ है!
ब्रिजेण्डिन ने जन्म से लेकर रजो-निवृत्ति तक स्त्री मस्तिष्क की जीवन यात्रा की पडताल की है. वे बताती हैं कि एक कन्या शिशु जिस तरह लगाव अनुभव करती है, विपरीत लिंगी शिशु उस तरह नहीं करता. इसी तरह मातृत्व स्त्री की मस्तिष्क संरचना में आमूल चूल और अपरिवर्तनीय परिवर्तन करता है. ब्रिजेण्डिन यह भी बताती हैं कि स्त्री-पुरुष मस्तिष्कों की केमिस्ट्रियां ताकतवर हारमोन्स से इस तरह संचालित होती हैं कि हर जेण्डर की यथार्थ की अवधारणा ही अलग तरह से निर्मित हो जाती है. लेकिन वे आगाह करना नहीं भूलतीं कि इस भेद का योग्यता से कोई सम्बन्ध नहीं है.
ब्रिजेण्डिन बताती हैं कि आम धारणा यह है कि लडके-लडकियों का व्यवहार अलग-अलग होता है. हम घरों में, खेल के मैदानों में, कक्षाओं में, सभी जगह उनके व्यवहार की भिन्नता देखते हैं. यह भी माना जाता है कि व्यवहार की यह भिन्नता उनके पालन-पोषण की भिन्नता की वजह से होती है. लेखिका इस धारणा का, कि हमारी जेण्डर की अवधारणा हमारे पालन-पोषण से निर्मित होती है, खण्डन करते हुए बताती हैं कि इस भेद का कारण मस्तिष्क की बनावट का अलग होना है. वे एक दिलचस्प उदाहरण देती हैं. उनकी एक मरीज़ ने अपनी साढे तीन साल की बेटी को कई यूनीसेक्स खिलौने दिए. उनमें एक लाल रंग की दमकल गाडी भी थी. एक दिन वह मरीज़ अपनी बेटी के कमरे में जाने पर पाती हैं कि बिटिया उस गाडी को एक छोटे-से कम्बल में लपेटकर झुला रही है और कह रही है, “चिंता मत करो मेरी गाडी, जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा!” लेखिका समझाती है कि उस नन्हीं बच्ची का यह बर्ताव उसके सामाजिकरण की वजह से न होकर उसके स्त्री मस्तिष्क की वजह से है. हमारा मस्तिष्क ही यह तै करता है कि हम कैसे देखते, सुनते, सूंघते, चखते हैं. वस्तुत: हमारी महसूस करने वाली इन्द्रियां सीधे मस्तिष्क से जुडी होती हैं. हमारे अनुभवों की व्याख्या मस्तिष्क ही करता है. मस्तिष्क का यह लिंग भेद जन्मजात होता है. लगभग आठ सप्ताह के गर्भ के मस्तिष्क का लिंग निर्धारित हो चुकता है.
ब्रिजेण्डिन एक रोचक बात यह भी बताती हैं कि मादा मस्तिष्क शिशु को सबसे पहले चेहरों का अध्ययन करने का निर्देश देता है. इसके विपरीत नर मस्तिष्क चेहरों से अलग अन्य चीज़ों जैसे रोशनी, वस्तुओं वगैरह में रुचि लेता है. वे यह भी बताती हैं कि अपने अस्तित्व के पहले तीन महीनों में मादा शिशु की चेहरों को ताकने और दृष्टि सम्पर्क (आई कॉंटेक्ट) की क्षमता में 400 गुना वृद्धि होती है. मज़े की बात कि इसी अवधि में नर-शिशु में यह क्षमता ज़रा भी नहीं बढती. एक बहुत महत्वपूर्ण बात वे यह बताती हैं कि मादा शिशु को भावहीन चेहरे ज़रा भी अच्छे नहीं लगते. कारण, ऐसे चेहरे उन्हें यह संकेत देते हैं कि वे कुछ गलत कर रही हैं. किताब एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताती है कि आदमी लगभग सात हज़ार शब्द प्रतिदिन इस्तेमाल करता है, जबकि औरत हर रोज़ बीस हज़ार शब्द इस्तेमाल करती है.
एक उपन्यास की मानिंद दिलचस्प यह किताब हमें इस विषय में और गहरे उतरने के लिए प्रेरित करती है, यही इसकी सबसे बडी खासियत है.

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Discussed Book:
The Female Brain
By Louann Md Brizendine
Paperback: 304 pages
Published by Broadway
US $ 14.95

यह आलेख राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में 06 नवम्बर 2007 को प्रकाशित हुआ.
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