Tuesday, September 18, 2007

कहीं यह जंगल राज तो नहीं

अपने शहर की कुछेक घटनाओं से बहुत व्यथित हूं. ये घटनाएं तो मेरे शहर की हैं लेकिन जानता हूं कि देश के हर शहर में ऐसा ही होता रहता है. इसीलिए अपनी चिंता में आप सबको शरीक कर रहा हूं.
कल राजस्थान विश्वविद्यालय के एक कॉलेज ने एक सांसद वृंदा करात के अपने यहां परमाणु संधि पर व्याख्यान के लिए बुलाया था. वे अपना व्याख्यान दे पातीं इससे पहले ही एक दल विशेष के युवा वहां घुस आए और उनकी कोशिश थी कि वृंदा अपना व्याख्यान न दे. उनका तर्क था कि वृंदा उस विचारधारा से ताल्लुक रखती हैं जो राम को नहीं मानती, वृंदा ने पहले बाबा रामदेव का विरोध किया था, वगैरह.
कुछ दिन पहले मेरे इसी शहर में, और तमाम देश में राम सेतु के समर्थन में तीन घण्टे का बन्द रखा गया. इससे पहले गुर्जरों के समर्थन में, कभी ब्राह्मणों के समर्थन में ऐसा होता ही रहा है.
मैं मानता हूं कि जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का, अपने विचार रखने का, औरों से सहमत और असहमत होने का समान अधिकार होता है. सिद्धांत रूप में तो सब यही कहेंगे. लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है?
क्या वृंदा को अपनी बात कहने का कोई हक़ नहीं है? और आगे चलें तो क्या यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति राम और राम सेतु के बारे में वही विचार रखे जो आपके हैं? आपसे भिन्न सोच भी तो किसी की हो सकती है? जिसकी सोच भिन्न हो वह देशद्रोही होगा, यह तै करने वाले आप कौन हैं?
और इसी तरह, मामला चाहे आरक्षण का हो या कोई और, जो इन मुद्दों के समर्थन में होते हैं, उनसे भिन्न मत भी तो किसी का हो सकता है! अगर आप आरक्षण मांगते हैं तो मैं उसके विरोध में भी तो हो सकता हूं. आप अगर अपनी मांग के समर्थन में मुझे भी शामिल करते हैं तो यह तो ज़बर्दस्ती है, यह तो प्रजातंत्र नहीं है.
होना यह चाहिये कि हम अपनी बात कहें, लेकिन दूसरों को भी अपनी बात कहने का हक़ दें. हम विरोध प्रदर्शन करें लेकिन दूसरों को भी यह हक़ दें कि अगर वे न चाहें तो उस प्रदर्शन से अलग रह जाएं.
एक कॉलेज में कुछ विद्यार्थी किसी मुद्दे को लेकर हडताल करते हैं और अपनी हडताल के लिए यह ज़रूरी मानते हैं कि सारे ही विद्यार्थी उसमें शरीक हों. उनके लिहाज़ से यह ठीक हो सकता है, लेकिन जिन्हें अनचाहे उस हडताल में भागीदारी निबाहनी पड रही है, उनके लिहाज़ से भी तो सोचिये? क्या उनका कोई हक़ नहीं है? या हक़ तो सिर्फ ताकतवर का ही होता है?
क्या इसी को जंगल राज नहीं कहा जाएगा?
दुर्गाप्रसाद
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