Tuesday, November 6, 2018

कृत्रिम बुद्धि की नैतिक उलझनें भी कम नहीं हैं!


जैसे जैसे हमारी ज़िन्दगी में कृत्रिम बुद्धि का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है उसे अधिक त्रुटिरहित बनाने के प्रयास भी तेज़ होते जा रहे हैं. सन 2016 में अमरीका की एमआईटी की मीडिया  लैब के शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग की शुरुआत की. उन्होंने एक वेबसाइट बनाई जिस पर जाकर कोई भी व्यक्ति अपने आप से ड्राइव होने वाली यानि ड्राइवर रहित कार के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति  में तेरह सम्भावनाओं में से किसी एक का चुनाव कर सकता था. सारे जवाब हां या ना में दिये जाने थे. दो बरसों में इस साइट पर दुनिया के 233 देशों के लोगों ने कोई चार करोड़ जवाब दिये. ये जवाब  दरअसल हमारे नैतिक अंतर्द्वन्द्व  को उजागर करते हैं. पहले ज़रा यह देखें कि इस शोध में किस तरह के सवाल पूछे गए थे. कुछ सवाल ये थे: अगर अचानक आपकी कार के सामने कोई आ जाए तो आप कार को दूसरी लेन में मोड़ लेंगे या उसी लेन में चलाते रहेंगे? अगर आपके पास बूढ़े और जवान में से,  स्त्री और पुरुष में से, मनुष्य और पालतू जानवर में से, एक बच्चे या दो बुज़ुर्गों में से, एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों में से    किसी एक को बचा सकने का विकल्प हो तो आप किसे बचाएंगे? इसी तरह यह पूछा गया कि अगर आप पैदल चलने वाले या कार चलाने वाले में से किसी एक को बचा सकते हों तो किसे बचाएंगे? सड़क को सही तरह से पार करने वाले और ग़लत तरह से पार करने वाले में से किसे बचाएंगे? उच्च सामाजिक स्तर वाले जैसे डॉक्टर या व्यापारी और निम्न सामाजिक स्तर वाले जैसे मज़दूर में से किसे बचाएंगे? ये सवाल मनुष्यों से किये गए, लेकिन इन सवालों का मकसद यह था कि इनके आधार पर कुछ सामान्य मानदण्ड तैयार किये जा सकें जिनके आधार पर कृत्रिम बुद्धि चालित यंत्र काम करें.

इन तेरह सवालों के जो जवाब मिले उनका कई तरह से वर्गीकरण और विश्लेषण किया गया. वैसे तो करीब करीब सारे ही जवाबों का सार यह था कि जहां  कम और ज़्यादा जानों को बचाने में से किसी एक का चयन करना हो, हर कोई ज़्यादा जान बचाने का ही पक्षधर था. इसी तरह पालतू पशुओं और मनुष्यों में से किसी एक को बचाना हो तो आम राय मनुष्य के पक्ष में थी और अगर जवान और बूढ़े में से किसी एक को चुनना हो तो लोग जवान को  बचाने के पक्ष में थे. लेकिन इन कुछ समानताओं के अलावा जवाबों में बहुत ज़्यादा असमानताएं पाई गईं. रोचक बात यह कि जवाबों में असमानता का एक आधार भौगोलिक भी था. यानि दुनिया के एक हिस्से में रहने वालों की प्राथमिकता दुनिया के  दूसरे हिस्से में रहने वालों से अलहदा  पाई गई. अब यही बात देखिये ना कि फ्रांस, युनाइटेड किंगडम और अमरीका वासी जहां युवाओं को बचाने के पक्ष में थे वहीं चीन और ताइवान के रहने वाले वृद्धों को बचाने के पक्ष में थे. इसी तरह जापान के जवाब देने वालों ने कार में बैठे  हुए लोगों की तुलना में पैदल चलने वालों को बचाने की बात की तो चीन से जवाब देने वालों ने इसका उलट विकल्प चुना, यानि वे कार में बैठे हुओं  को बचाना चाहते थे. इस शोध का विश्लेषण करने वालों ने पाया कि इन  जवाबों के हिसाब से दुनिया को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला हिस्सा है पश्चिमी, जिसमें मुख्यत: उत्तरी अमरीका और यूरोप  आता है और  जो ईसाई नैतिकता से परिचालित है. दूसरा हिस्सा है पूर्वी जिसमें जापान, ताइवान और मध्यपूर्वी देश आते हैं और जो कन्फ्यूशियसवाद और इस्लाम से प्रभावित है, तथा तीसरा हिस्सा है दक्षिणी जिसमें मध्य और दक्षिणी अमरीका आते हैं और जिस पर तीव्र फ्रांसिसी प्रभाव है. यह हिस्सा मुखर रूप से स्त्री का पक्षधर है. पूर्वी हिस्सा युवाओं को बचाने का ज़ोरदार पैरोकार है. जब इन जवाबों का एक और तरह से विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि जो उत्तरदाता अधिक धार्मिक थे वे पशुओं की तुलना में मनुष्यों को बचाने के समर्थक पाए गए, जबकि जहां स्त्री और पुरुष में से किसी को बचाने की बात आई  तो स्त्री और पुरुष दोनों ही स्त्री के पक्ष में पाए गए. 

जिन्होंने यह शोध की वे भी इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि उत्तरदाताओं की इतनी  बड़ी संख्या के बावज़ूद यह सर्वेक्षण प्रतिनिधि नहीं है क्योंकि यहां अधिकांश  उत्तरदाता पढ़े लिखे और युवा समूह से ही ताल्लुक रखने वाले हैं. इस सर्वेक्षण की और भी अनेक खामियां हैं लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही है कि इसने कृत्रिम बुद्धि की नैतिकता के मुद्दे पर एक सार्थक बहस शुरु कर दी है. हममें से हरेक इस बात से परिचित है कि आने वाला समय कृत्रिम बुद्धि का है और इसलिए उसके विभिन्न पक्षों पर गम्भीर विमर्श की शुरुआत का यह सही समय है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत  मंगलवार, 06 नवम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

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