Tuesday, February 24, 2015

विवाह, विदाई और वर-वधू

कोई पांचेक साल बाद फिर अहमदाबाद जाने का सुयोग जुटा. पिछली बार गया था तो साबरमती आश्रम के माहौल और अदालज री बाव की सुखद स्मृतियां बहुत दिनों तक मन प्राण को मुदित करती रही थीं. इस बार अमदावाद नी गुफा, जिसे हुसैन दोषी गुफा के नाम से भी जाना जाता है,  सूची में सर्पोपरि थी. जाने की वजह इस बार भी वही थी:  एक विवाह समारोह में सहभागिता. हम मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन में अधिकांश यात्रा प्रसंग तो इन्हीं सामाजिक वजहों से आते हैं. याद आया कि पिछली बार की यात्रा में वरमाला के बाद वर-वधू को ‘आशीर्वाद’ यानि लिफाफा  देने और फोटो खिंचवाने के लोग किस तरह पंक्तिबद्ध अपनी बारी की शालीन प्रतीक्षा कर रहे थे! जब एक जन फोटो वगैरह खिंचवा कर हटता तभी दूसरा आगे जाता. मेरे लिए यह दृश्य विलक्षण और परम आनंदपूर्ण था. इस बार फिर इसी दृश्य को देख कर मुदित होने का आकांक्षी था. परिवार और आयोजन स्थल वही थे  अत: स्वाभाविक है कि अतिथि समुदाय भी कमोबेश वही था. लेकिन मेरे सुख की पुनरावृत्ति नहीं हुई. आप कुछ और समझें उससे पहले ही स्पष्ट कर दूं कि होस्ट परिवार ने वैसी कोई व्यवस्था रखी ही नहीं. और एक तरह से तो अच्छा ही हुआ. मैं तो हर शादी में जाकर बेचारे वर-वधू के बारे में सोच कर दुखी होता हूं कि इतने सारे मेहमानों के साथ फोटो खिंचवा कर स्माइल देते-देते वे कितने पस्त हो जाते  होंगे! असल में शादी का यह फोटो सेशन एक ऐसी बेकार की रिवायत है जिससे जितनी जल्दी छुटकारा पा सकें, पा लिया जाना चाहिये. न घर वाले कभी उन तस्वीरों को देखते होंगे न मेहमानों को कभी वे तस्वीरें देखने को मिलती होंगी! फिर इतनी ज़हमत किस लिए?

इस विवाह का एक दृश्य मुझे बहुत लम्बे समय तक याद रहेगा. हम लोग विवाह में वधू पक्ष की तरफ से सम्मिलित थे. अंतरजातीय विवाह था. वर और वधू दोनों पक्षों ने सहज स्वाभाविक उल्लास से इस रिश्ते को स्वीकार किया और पूरे मन से विवाह समारोह का आयोजन किया. विवाह की रस्में दोनों समाजों की प्रथानुसार सम्पन्न की गईं. दृश्य यह था. वर वधू मंच पर खड़े थे. वधू की मां ने कन्यादान की रस्म पूरी की और मंच से नीचे उतरते उतरते उनकी रुलाई बहुत ज़ोर से फूट पड़ी. उन्हें यह लगा होगा कि बस, अब इस क्षण से मेरी बेटी ‘पराई’ हो गई. इस प्रतीति पर भला कौन होगा जो द्रवित होने से खुद को रोक सके. बहुत स्वाभाविक था यह. लेकिन तभी मेरी नज़र दुल्हन की तरफ चली गई. और मुझे यह देखकर अत्यधिक अचरज हुआ कि वह  इस भाव प्रवाह से एकदम अछूती, अपने अनुराग में मुदित-मगन थीं. जी, आप ग़लत न समझें. यह लिखते हुए मेरे मन में उस युवती  के प्रति किसी भी तरह की शिकायत  का कोई भाव नहीं है. यह एक छवि भर है.

असल में, इस दृश्य के बारे में लिखने की ज़रूरत मुझे इसलिए महसूस हुई कि इसने दो एक महीने पहले सम्पन्न एक और विवाह की याद मेरे मन में ताज़ा कर दी. उस विवाह में हम लोग वर पक्ष की ओर से सम्मिलित थे. वह विवाह भी हमारे बाद वाली पीढ़ी की संतति का ही था, और प्रेम  विवाह ही था जो दोनों पक्षों के अभिभावकों की आनंदपूर्ण सम्मति से सम्पन्न हुआ था. उस विवाह के बाद वर या वधू किसी ने फेस बुक पर जो बहुत सारी तस्वीरें पोस्ट की थीं उनमें से एक तस्वीर और उस पर आई हुई बहुत सारी मज़ेदार प्रतिक्रियाओं की स्मृति ने मुझे इस दृश्य के बारे में लिखने को प्रेरित किया. वह तस्वीर विदाई के क्षणों  की थी जिसमें वधू के साथ-साथ वर भी लगभग रुदन मुद्रा में था. इसी बात को लेकर वर-वधू के मित्रों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में वर की मैत्रीपूर्ण खिंचाई की थी. हम सब जानते हैं कि रोना बहुत संक्रामक होता है. अगर आपके पास कोई रोने लगे तो आप अपने को भी वैसा ही करने से रोक नहीं पाते हैं. तो उस समय जब दुल्हन अपने मां-बाप से विदा लेते हुए रोने लगी होगी तो उसके वियोग भाव से दूल्हा भी अप्रभावित नहीं रहा होगा और उसी क्षण को फोटोग्राफर ने कैद कर लिया था. लेकिन हमारे यहां इस बात को कोई कैसे स्वीकार कर ले कि जब दुल्हन विदा हो रही  है तो दूल्हा भी रुंआसा हो जाए! तो ये थी विवाहों की दो छवियां. और हां, बात तो मैंने अमदावाद नी गुफा के ज़िक्र से शुरु की थी. गूगल कर चुकने के बाद भी हम यह न जान पाए थे कि उसे शाम चार बजे से पहले नहीं देख सकते, इसलिए भरी दोपहर वहां जाकर भी उसे देखे बिना लौटना पड़ा. यानि अहमदाबाद एक बार  और जाने का  कम से कम एक आकर्षण  तो मन में है ही!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 24 फरवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, February 17, 2015

जैसी दुनिया इधर है वैसी ही उधर भी है


इधर हाल ही में दूरस्थ देश हंगरी की एक ख़बर पढ़ी तो बड़े कष्ट के साथ यह अनुभूति हुए बग़ैर नहीं रही कि कुछ मामलों में दुनिया एक-सी है. पहले ख़बर तो बता दूं आपको. हंगरी के शहर माको में एक व्यवस्था है कि साल के पहले जन्मे बच्चे को मेयर द्वारा ढाई सौ पाउण्ड की राशि प्रदान की जाती है. इस साल इस राशि का हक़दार बना रिकार्डो रैक्ज़ नामक बच्चा, और उसके मां-बाप के साथ उसकी तस्वीर वहां के अखबारों में छपी. यहां तक तो सब ठीक था. इस तस्वीर के छपने के बाद हंगरी की दक्षिणपंथी जोब्बिक पार्टी के उपनेता इलोड नोवाक ने अपने फेसबुक पन्ने पर इस नवजात और इसकी मां की तस्वीर इस सूचना के साथ लगाई कि यह बालक  23 वर्षीया जिप्सी मां की तीसरी संतान है. उन्होंने यह भी लिखा कि “हंगरी मूल के लोगों की आबादी दिन पर दिन कम होती जा रही है और बहुत जल्दी हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक  बन जाएंगे. फिर एक दिन ऐसा आएगा जब वे हंगरी का नाम बदलने का फैसला लेंगे. उस वक़्त हम देश की सबसे बड़ी समस्या  से रू-ब-रू होंगे.” और यहीं आपको यह भी बता दूं कि इस जोब्बिक पार्टी के  समर्थक जिप्सियों के लिए अक्सर यह कहते हैं कि “ये चूहों और परजीवियों की तरह पैदा होते हैं.” इलोड नोवाक के इस वक्तव्य पर खूब  प्रतिक्रियाएं हुईं. आशा है कि आपको अब तक यह बात तो स्पष्ट हो ही गई होगी कि क्यूं इस प्रसंग से मुझे अपने देश की कष्टप्रद अनुभूति हुई. इस बात को और आगे बढाऊं उससे पहले क्यों न मशहूर शायरा फहमीदा रियाज़ की एक लोकप्रिय नज़्म की कुछ पंक्तियां आपको सुनाता चलूं? वे लिखती हैं:

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे 
अरे बधाई, बहुत बधाई।

इसी नज़्म के एक अन्य बंद में वे कहती हैं:

कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

यानि क्या भारत, क्या इसके पड़ोसी मुल्क और क्या अन्य देश – सबके हाल एक जैसे हैं. चलिये फिर से हंगरी वाले प्रसंग पर लौट जाएं!

इस पूरे प्रसंग का मानवीय पक्ष उभरता है इस बालक रिकार्डो के मां-बाप सिल्विया और पीटर के वक्तव्यों से. पीटर का परिवार मोका शहर के किनारे बसे एक छोटे-से गांव में रहता है और वहां का एकमात्र रोमा (जिप्सी) परिवार है. पीटर सामुदायिक काम करते हैं और ट्रैक्टर तथा  हार्वेस्टर चलाना सीख रहे हैं. उनकी दोनों बेटियां अभी किण्डरगार्टेन  में हैं. पीटर एक ऐसी सुकूनभरी ज़िन्दगी के आकांक्षी हैं जिसमें मीडिया और राजनीति का कोई दखल न हो. उनका कहना है कि हमें, यानि जिप्सियों और हंगेरियनों को,  सिर्फ चमड़ी के रंग के आधार पर अलग किया जाता है जबकि हमारे दिल, खून और हमारी आत्मा सब एक हैं. पीटर और सिल्विया दोनों ही बार-बार यह बात कहते हैं कि हो सकता है हंगरी में कोई नस्लवाद हो, लेकिन उन्होंने इससे पहले कभी उसका अनुभव नहीं किया. “हम इस शहर में रहना पसन्द करते हैं. यहां सभी हमारे प्रति बहुत दयालु हैं.”  लेकिन असल मार्के की बात कही सिल्विया ने. उनके एक-एक शब्द से उनकी पीड़ा व्यक्त होती है. उन्होंने कहा, “लोगों को उनके जन्म के वक़्त से ही निशाना नहीं बनाना  चाहिए. मेरा बच्चा जब 18 साल का हो जाएगा तो वह यह फ़ैसला लेगा कि उसे रोमा के रूप में पहचाना जाए या नहीं. इसमें उसकी क्या ग़लती अगर वो पिछले साल के आखिरी दिन मध्यरात्रि  के कुछ लमहों के बाद इस दुनिया  में आया.”

यह बात बहुत विडम्बनापूर्ण लगती है कि जिसे आपने नहीं चुना है, जैसे अपना जन्म, उससे  जुड़ी तमाम बातें बिना आपकी सम्मति के आप पर लाद दी जाएं! इस बालक रिकार्डो रैक्ज़ ने यह चुनाव नहीं किया है कि वो रोमा है या हंगेरियन, लेकिन इलोड नोवाक महोदय उसे रोमा होने का दण्ड देने के लिए ज़रा भी इंतज़ार नहीं करना चाहते. इसी सन्दर्भ में अपने  सुधि पाठकों को याद दिला दूं कि हिन्दी में बनी कम से कम दो फिल्में तो मुझे तुरंत याद आ रही  हैं जो इस तरह की विडम्बनापूर्ण स्थितियों को सामने लाती हैं. एक है आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इसी नाम के उपन्यास पर 1961 में यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई ‘धर्मपुत्र’ और दूसरी भावना तलवार निर्देशित 2007 में रिलीज़ हुई ‘धर्म’. फिलहाल हम तो यही आशा कर सकते हैं कि जब हंगरी का यह बालक रिकार्डो बड़ा होगा  तो उसे आज से बेहतर दुनिया मिलेगी.
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जयपुर से प्रकाशित  लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज 17 फरवरी, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, February 10, 2015

जो नापसन्द उसके भी हक़ में खड़ा हूं मैं

कॉमेडी के भी अनेक रूप हैं और उन रूपों  में से एक है रोस्टिंग. बताया जाता है कि इसकी शुरुआत 1949 में न्यूयॉर्क में हुई और फिर यह कॉमेडी रूप पूरी दुनिया में प्रचलन में आ गया. रोस्टिंग का अर्थ है भूनना, और इस कॉमेडी रूप में किसी जाने-माने व्यक्ति के साथ बतौर कॉमेडी यही सुलूक किया जाता है. मैं यहां रोस्टिंग का ज़िक्र वर्ली, मुम्बई में हाल ही में हुए एक बहुचर्चित कार्यक्रम के सम्बन्ध में कर रहा हूं. देश के एक जाने-माने स्टैण्डअप कॉमेडियन समूह जिसका पूरा नाम लिखने में मुझे संकोच हो रहा है, ने ए आई बी रोस्ट नाम से एक चैरिटी कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें दो फिल्म स्टारों अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह को रोस्ट किया गया. मास्टर  शेफ की भूमिका निबाही करण जोहर ने और उनका साथ दिया इस समूह ए आई बी की पूरी टीम ने, जिसमें एक महिला कॉमेडियन भी थीं. पता चला कि इस शो का टिकिट चार हज़ार रुपये का था और करीब चार हज़ार दर्शकों ने इस शो को लाइव देखा.

जैसा कि यह समूह हमेशा करता है, शो के बाद इसने शो की रिकॉर्डिंग यू ट्यूब पर अपने चैनल पर पोस्ट कर दी. और बस वहीं से हंगामे की शुरुआत हो गई. सोशल मीडिया पर तो इस कार्यक्रम को लेकर गरमा गरम बहसें हुई ही, कुछ लोग अदालत तक भी जा पहुंचे. कुछ की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं तो कुछ को इस कार्यक्रम की विषय वस्तु और भाषा शैली पर गम्भीर आपत्तियां थीं. जब बात निकली तो उसे दूर तक जाना ही था. वह अभिव्यक्ति की आज़ादी के जाने-पहचाने मुकाम तक भी जा पहुंची.

इस कार्यक्रम में ऊपर उल्लिखित दो कलाकारों का जी भर कर मखौल उड़ाया गया, बल्कि कहें उनकी ऐसी-तैसी की गई. न केवल उनके साथ ऐसा किया गया, वहां उपस्थित अनेक फिल्मी सितारों के साथ भी यही सुलूक किया गया. मंच पर मौज़ूद इस कॉमेडी ग्रुप के सदस्यों ने जहां औरों के साथ भरपूर बदतमीज़ी की, उन्होंने खुद पर भी कोई रहम नहीं किया. यानि कुछ-कुछ होली का-सा माहौल रहा वहां कि जो भी सामने आए उसे रंग दो. रंग नहीं तो कीचड़ ही सही. वहां न स्त्री-पुरुष का कोई लिहाज़ था, न भाषा का कोई संयम. आप जितनी खुली, नंगी और अशालीन भाषा की कल्पना कर सकते हैं उससे भी ज़्यादा निर्वसन और आहत करने वाली भाषा वहां थी.

लेकिन इसके बावज़ूद, अगर यू ट्यूब वाले उस वीडियो को, जिसे आपत्तियों के बाद अब हटा लिया गया है, प्रमाण मानें, तो वहां उपस्थित सभी लोगों ने इसका  भरपूर मज़ा लिया. जिन्हें रोस्ट किया गया वे तो इतना ज़्यादा उछल रहे थे कि लग रहा था यह उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ अवसर  है. हो सकता है उन्हें यही करने के लिए पैसे दिये गए हों! लेकिन वहां मौज़ूद दर्शक? वे भी तो भरपूर लुत्फ ले रहे थे!

और यहीं से मैं भी उलझन में पड़ जाता हूं. मैं बहुत दूर तक अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थक हूं. वहां तक जहां कि वह किसी और की आज़ादी का अतिक्रमण न करे. इन चार हज़ार लोगों को इस रोस्टिंग से कोई आपत्ति नहीं थी. बल्कि उन्होंने इसका खूब आनंद लिया. और ये कोई मासूम बच्चे नहीं थे. कार्यक्रम सार्वजनिक न होकर केवल उनके लिये था जो जानते हैं कि उसकी विषय वस्तु क्या है. यू ट्यूब पर जो वीडियो पोस्ट किया गया उसके प्रारम्भ में ही बहुत स्पष्टता से बाद की विषय वस्तु की सूचना देते हुए दर्शकों को सावचेत कर दिया गया था. ये ही बातें हैं जो मुझे उलझन में डाल रही हैं.

बेशक, मुझे इस कार्यक्रम की विषय वस्तु और भाषा आदि तनिक भी पसन्द नहीं आए. बल्कि मैंने आहत ही महसूस किया. लेकिन किसी ने मुझे बाध्य तो नहीं किया कि मैं उसे देखूं. बल्कि किसी ने निमंत्रित भी नहीं किया. मेरी मर्जी थी कि मैंने उसे देखा. जीवन में बहुत सारी चीज़ें होती हैं,  मसलन कोई फिल्म, कोई किताब, कोई गाना, कोई तस्वीर, कोई फल, कोई सब्ज़ी, कोई नेता, कोई अभिनेता - जिन्हें मैं देखता हूं और पसन्द नहीं कर पाता हूं, लेकिन क्या मैं उन पर रोक लगाने की मांग करता हूं? बहुत मुमकिन है कि जो मुझे पसन्द न आए उसे भी बहुत सारे लोग पसन्द करते हों!

हम यह देख रहे हैं कि असहिष्णुता तेज़ी से पैर पसार रही है. जो बात हमें पसन्द नहीं उसे हम समूल नष्ट कर देना चाहते हैं – यह भूलकर कि किसी को वो पसन्द भी हो सकती है. ऐसे में क्या एक बार फिर उस वाल्तेयर को याद नहीं किया जाना चाहिए जिसने कहा था कि “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा.” 

आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार दिनांक 10 फरवरी 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, February 3, 2015

वो कहते हैं ना कि हर चीज़ को देखने के दो नज़रिये होते हैं -   गिलास आधा खाली है, या गिलास आधा भरा हुआ है, तो जहां बहुत सारे मित्र इस बात से बहुत व्यथित हैं कि आज राजनीति में अभिव्यक्ति का स्तर बहुत गिर गया है और बड़े नेता भी बहुत छोटी बातें करने लगे हैं, मैं इस बात को इस तरह देख कर प्रसन्न हूं कि आज राजनीति के हवाले से भाषा और शब्दों पर भी गम्भीर विमर्श होने लगा है. लोग बहुत भावुकता के साथ उन दिनों को याद करते हैं जब बड़े नेता बड़े रचनाकार भी होते थे, गांधी, नेहरु राजेन्द्रप्रसाद आदि ने न केवल आत्मकथाएं लिखीं, साहित्यिक समुदाय ने भी उन आत्मकथाओं को हाथों-हाथ लिया. उस ज़माने के बहुत सारे राजनेता ऐसे थे जिनके साहित्य की दुनिया के बड़े हस्ताक्षरों से आत्मीय और अंतरंग रिश्ते थे. इनमें राममनोहर लोहिया का नाम बहुत ज़्यादा स्मरण किया जाता है. बहुत सारे राजनेताओं ने अपनी-अपनी तरह से साहित्य सृजन भी किया और साहित्यिक बिरादरी ने अगर लम्बा समय बीत जाने के बाद भी उन्हें याद रखा हुआ है तो माना जाना चाहिए कि उस सृजन में साहित्य भी रहा होगा, वर्ना जब आप कुर्सी पर होते हैं तो आपकी यशोगाथा गाने वाले आपको शून्य से शिखर पर पहुंचा कर भी दम नहीं लेते हैं, लेकिन आपके भूतपूर्व होते ही सारा मजमा उखड़ जाया करता है.


लेकिन मैं बात कुछ और कर रहा था. इधर हममें से बहुतों को लगता है कि हमारे बड़े (और छोटे भी) राजनेताओं को शायद अपनी तर्क क्षमता पर कम भरोसा रह गया है इसलिए वे फूहड़, अभद्र और अस्वीकार्य भाषिक अभिव्यक्ति का सहारा लेने को मज़बूर हो गए हैं. हममें से जो थोड़े बहुत भी पढ़े लिखे हैं वे अपने दैनिक जीवन में बहुत गुस्से की स्थिति में भी शायद कभी उस तरह की बातें नहीं करते हैं. आखिर शिक्षा आपको संस्कार तो देती ही है ना! वो आपको सलीके से बात कहने का कौशल भी सिखाती है. अगर आपको कभी भाषिक कौशल की बेहतरीन बानगियां देखने का मन करे तो मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को कहीं से भी पढ़ना शुरु कर दें. लेकिन इधर हमारे माननीय गण जिस तरह की  भाषा में अपनी बात कह रहे हैं वो एक तरफ़ और हममें से बहुत सारे उनकी कही बातों को जिस तरह समझ कर लाठियां या तलवारें भांजने में जुटे हैं वो दूसरी तरफ. बहुत बार तो वह हो जाता है जिसे फिल्म ‘प्यासा’  के उस गाने में मरहूम साहिर लुधियानवी साहब ने बखूबी  कह दिया था – जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी! असल में हो यह रहा है कि कहने वाला चाहे जो कहे, हम वही सुन रहे हैं जो हम सुनना चाहते हैं. फिर बेचारा वो लाख कहे कि ‘मैंने ऐसा तो नहीं कहा था’, हम अपने कानों में रुई डाल लेते हैं. और इधर जब से हमारे समाज में सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ा है स्थितियां और विकट होती जा रही हैं. अखबार तो चौबीस घण्टे में एक बार ही निकलता है, रेडियो दूरदर्शन पर बहुत संयम बरता जाता है, लेकिन यह जो नया औज़ार हमारे हाथों में आ गया है, बहुत बार लगता है जैसे वो  कहावत सही सबित हो गई है! कौन-सी? अरे भाई वही...आप समझ लीजिए ना. अगर मैं लिखूंगा तो पता नहीं किस-किस की भावनाएं आहत हो जाएं! इशारा कर देता हूं. वो कहावत जिसमें   किसी प्राणी के हाथ में दाढ़ी बनाने का औज़ार आ जाने वाली बात कही गई है. बेसब्री इतनी अधिक है कि पूरी बात पढ़े-सुने या समझे बिना ही वीर जन मैदान में कूद पड़ते हैं.

और शायद इसी बेसब्री का एक परिणाम यह भी हो रहा है कि जो बात एक बार कह दी जाती है, वही बार-बार गूंजती रहती है. जैसे किसी ने एक बार कह दिया कि पत्रकारों को तटस्थ होना चाहिए, तो बस जिसकी बात हमें पसन्द न आई उसपर हमने फौरन तटस्थ न होने का इल्ज़ाम मढ़ दिया. कोई यह सुनना या सोचना नहीं चाहता कि अखिर इस तटस्थ शब्द का सही अर्थ क्या है! तट पर स्थित. यानि जो धार में न हो, किनारे पर हो. यानि जो किसी एक का पक्ष न ले! अब, ज़रा एक बात सोचिये! क्या आप एक अपराधी और उसे दण्डित करने वाले में से किसी एक को नहीं चुनेंगे और तटस्थ रहेंगे? और यह भी याद रखिये कि ज़िन्दगी हमेशा स्याह और सफेद ही नहीं होती है. उसके और भी अनेक रंग होते हैं. तब आप अपने विवेक से ही चुनाव करते हैं. राष्ट्रकवि दिनकर ने क्या  खूब कहा है:

समर शेष है,  नहीं पाप का  भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

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लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 फरवरी, 2015 को असम्बद्ध  भाषा, राजनीति और हम लोग शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, January 27, 2015

जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो.........

साल 2015 के  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का भी समापन हो गया. यह आयोजन हमारे समय की सबसे बड़ी सफलताओं की गाथा है. सन 2005 में मात्र चौदह अतिथियों की उपस्थिति में प्रारम्भ हुआ यह आयोजन इतने कम समय में दुनिया का सबसे बड़ा निशुल्क साहित्यिक उत्सव  बन जाएगा – यह कल्पना तो इसके आयोजकों ने भी नहीं की होगी. एक मोटे अनुमान के अनुसार इस बरस भी इस उत्सव में कुल उपस्थिति ढाई  लाख के  करीब रही.  यह आयोजन एक तरफ जहां जयपुर और भारत को विश्व के मानचित्र पर प्रभावशाली तरीके से रेखांकित करता है, पर्यटन  और अन्य सम्बद्ध व्यवसायों की उन्नति में योगदान करता है वहीं साहित्य, कलाओं और विचारों पर मुक्त चिंतन का विरल अवसर भी प्रदान करता है. इस आयोजन  की सराहना इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि इसकी सफलता से प्रेरित होकर पूरे देश में साहित्य उत्सवों का सिलसिला चल निकला है. हमारे अपने प्रांत में भी अनेक नए साहित्य और कला उत्सव होने लगे हैं.

लेकिन गम्भीर साहित्य के कद्रदां इस आयोजन  से तनिक भी प्रभावित नहीं हैं. बल्कि वे तो इससे बहुत नाराज़ हैं. उन्हें न तो साहित्य का उत्सवीकरण पसन्द आता है न साहित्य की परिधि का इतना विस्तार कि उसमें सब कुछ समा जाए. उन्हें लगता है कि राजनीति, खेल, फिल्म, फैशन,  ग्लैमर आदि की चर्चाएं लोगों को भ्रमित और साहित्य  से विमुख करती हैं. हमारे समय के बेस्ट सेलर लेखकों की उपस्थिति  भी उन्हें पसन्द नहीं आती है, क्योंकि वे तो उन्हें लेखक ही नहीं मानते हैं. गम्भीर साहित्यिक बिरादरी को इस आयोजन से एक बड़ी शिकायत इसके अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत की तरफ झुकाव से भी है. वे इसे भारतीय भाषाओं के प्रति आक्रामक षड़यंत्र के रूप में भी देखते हैं. शुरु-शुरु में राजस्थानी साहित्यकार भी अपनी अवहेलना से नाराज़ थे लेकिन आयोजकों ने उनकी सहभागिता बढ़ाकर उन्हें तो एक सीमा तक संतुष्ट कर दिया है.

इन सब बातों के बावज़ूद, दुनिया भर के लेखकों और साहित्य  प्रेमियों का इतनी बड़ी तादाद में इस आयोजन में शरीक होना एक ऐसी परिघटना है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. पूरे पांच दिन तक हर रोज़ छह स्थानों पर छह सत्रों का एकदम समय की पाबन्दी के साथ होना और उनमें बहुत बड़े जन समूह का शिरकत करना साधारण बात नहीं है. इस साल सारे ही सत्र हाउस फुल से कम नहीं थे और चर्चा के विषय या चर्चा करने वालों के बारे में उपस्थित जन की जानकारियां चकित कर डालने वाली थी. उन्हें तमाशबीन कहना उनके असम्मान से अधिक अपने पूर्वाग्रह  का प्रदर्शन होगा. हां, इतने बड़े आयोजन में तमाशबीनों या मौज मज़े के लिए आने वालों की तादाद भी कम नहीं रही. और इसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए और न इस बात को भूला जाना चाहिए कि यह है तो उत्सव ही.

हममें से जितना ताल्लुक साहित्य से है वे प्राय: साहित्य में लोगों की घटती रुचि की शिकायत करते पाए जाते हैं. हम हिन्दी भाषी लेखकों (और हिन्दी शिक्षकों)  की शिकायत समाज अंग्रेज़ी के बढ़ते जा रहे प्रचलन और प्रभाव को लेकर भी होती है. किसी खासे बड़े शहर में भी आपको किताब की दुकान ढूंढनी पड़ती है और अगर दुकान मिल जाए तो वहां जाकर हिन्दी की किताब ढूंढनी पड़ती है. हिन्दी प्रकाशक की आम शिकायत यह होती है कि लोग हिन्दी की किताबें खरीदते ही नहीं हैं. और इसी के समानांतर हमारे ही समय और समाज में अंग्रेज़ी की किताबें धड़ल्ले से बिक रही हैं और उनके लेखक अमीर और स्टार बनते जा रहे हैं. यानि लोग किताबें तो खरीदते हैं मगर हिन्दी की नहीं, अंग्रेज़ी की.

क्या इस बात पर कोई विचार सम्भव है कि क्यों हिन्दी की किताबें कम और अंग्रेज़ी की किताबें अधिक बिकती हैं? और यह भी कि क्या वाकई  हिन्दी की किताबें कम बिकती हैं? पुस्तक मेलों और प्रकाशकों की हालत को देखकर तो यह भी नहीं लगता. तो क्या गम्भीर और साहित्यिक पुस्तकें कम बिकती हैं, और इतर किस्म की किताबें धड़ाधड़ बिक जाती हैं? और क्या यह बात भी है कि हिन्दी में लोकप्रिय लेखन का अभाव है? या इस बात के सूत्र प्रकाशकों के अपने गणित से जुड़ते हैं?  

मुझे लगता है कि जयपुर साहित्य उत्सव हमें बहुत सारी बातों पर गम्भीर विमर्श के लिए  भी प्रेरित करता है. इस उत्सव की सार्थकता, प्रासंगिकता, इसकी उपलब्धियों, इसकी खामियों इन सब पर विचार करते हुए क्या हर्ज़ है अगर हम इस बात  पर भी विचार करें कि कैसे लोगों को पुस्तकों की तरफ आकृष्ट किया जा सकता है और कैसे लेखक-पाठक के बीच की खाई को छोटा किया जा सकता है? इधर साहित्य उत्सवों के कारण पूरे देश में जो माहौल  बना है उसका अपनी भाषा के बेहतर और गम्भीर साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए भी किया जाना चाहिए.  
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 27 जनवरी, 2015 को जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो दूर तक जाएगी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, January 20, 2015

सेल्फी वेल्फी मैं क्या जानूं रे.....

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है. जीवन पहले की तुलना में निरंतर अधिक सुगम होता जा रहा है. यह बात अलग है कि उसे सुगम करने वाले साधनों को जुटाने के लिए हमें अधिक श्रम और प्रयास करने पड़ रहे हैं जिनकी वजह से सुगमता का आनंद लेने के अवकाश में कटौती भी होती जा रही है. कुछ समय पहले तक जिन चीज़ों और कामों के लिए हमें खूब पापड़ बेलने पड़ते थे वे या उनमें से अधिकांश अब हमारे एक हल्के-से इशारे पर होने लगे हैं. इन सब बातों के उदाहरण देकर मैं आपका कीमती वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहता. मैं तो आपके सोच को दूसरी तरफ ले जाना चाहता हूं.

हमारे सुख सुविधाओं को  बढ़ाने वाले इन साधनों के विस्तार में बाज़ार की बहुत बड़ी भूमिका है. असल में पूरा का पूरा बाज़ार इसी मूल मंत्र पर फल फूल रहा है कि वो अपने उपभोक्ताओं के जीवन को कैसे और अधिक सुगम बनाए. और इसी मूल मंत्र के इर्द गिर्द और बहुत सारी चीज़ें बड़े नामालूम तरीकों से बहुत कुशलता के साथ बुन दी जाती हैं. मसलन सुविधा को बड़े सुनियोजित लेकिन अदृश्य तरीकों से आपके स्टेटस के साथ जोड़ दिया जाता है. यह सब करने में विज्ञापन की भूमिका तो होती ही है, आजकल अन्य अनेक माध्यम भी यह सब करने में  जुटे नज़र आते हैं. बड़े और प्रभावी लोगों की जीवन शैली की चर्चा करके बहुत सारे उत्पादों और ब्राण्डों की ज़रूरत कब और कैसे आपके मन में जगा दी जाती है, आप खुद नहीं जान-समझ पाते हैं. अब उत्पाद ही नहीं बेचे जाते, जीवन-शैली भी बेची जाती है और  बेचने से पहले उसे खरीदने की चाह भी आपके मन में उगाई जाती है.

इस सारे खेल में रोचक बात यह रहती है कि कैसे किसी चीज़ को पहले बेकार या अनुपयोगी घोषित  किया  जाता है और फिर उसी को विण्टेज या दुर्लभ के नाम पर महंगे मोल में बेच दिया जाता है. और इसी तरह जिसकी आपको ज़रूरत न हो उसे भी आपकी ज़रूरत के रूप में स्थापित कर आपके मन में कृत्रिम अतृप्ति जगाकर एक अनुपयोगी उत्पाद को भी मनचाहे दामों पर आपको बेच दिया जाता है. अगर कभी शांत चित्त से आप इस सारे कारोबार को देखें तो बहुत रोचक चीज़ों की तरफ आपका ध्यान जाएगा.

बहुत पुरानी बात नहीं है जब लोग लम्बी चिट्ठियां लिखकर अपनी भावनाओं का इज़हार  किया करते थे. फिर टेलीफोन आया और आते ही उसने सुविधा का विस्तार करने के साथ-साथ पूरे मोहल्ले में आपकी इज़्ज़त में भी चार चांद लगा दिये. और फिर आया मोबाइल, यानि  पूरी दुनिया आपकी मुट्ठी में. लेकिन मोबाइल अपने साथ एक ब्राण्ड वैल्यू भी लेकर आया. आप किसी से बात कर पा रहे हैं, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया कि आपके हाथ में जो हैण्ड सेट है वह किस ब्राण्ड का और  कितना महंगा है. और इसी के साथ आहिस्ता-आहिस्ता उस हैण्ड सेट में और सुविधाएं भी जुड़ने लगीं और अब तो हाल यह है कि मनुष्य से अधिक उसका मोबाइल स्मार्ट हो गया है. मोबाइल आया तो कुछ समय बाद  एक कैमरा भी उसमें घुस गया. यहां तक तो ठीक. अब शुरु होता है वो मज़ेदार खेल  जिसकी बात मैं करना चाहता हूं. मोबाइल में पीछे की तरफ वाला एक कैमरा अपर्याप्त  लगा तो आगे भी एक कैमरा जोड़ दिया गया. और इसी के बाद एक नई चीज़ हमारे जीवन में घुसी – सेल्फी! घुसी नहीं, घुसाई गई. अपने कैमरे से अपना फोटो आप पहले भी ले  सकते थे, लेकिन बाकायदा विज्ञापन करके सेल्फी समर्थ मोबाइल बेचे जाने लगे. और जब सेल्फी आ गई तो भला वेल्फी को आने से कौन रोक सकता था? वेल्फी यानि  स्व-वीडियो. और जब सेल्फी-वेल्फी  आई तो  उनमें मददगार बहुत सारे एप्स भी आए और एक डण्डी भी आ गई – सेफी स्टिक.

लेकिन हाल ही में इस सेल्फी-वेल्फी परिवार में जिस नए सदस्य का आगमन हुआ है वो सबसे अधिक हास्यास्पद  है. इस सदस्य का नाम है बेल्फी. बेल्फी यानि अपनी खींची हुई अपने नितम्बों की छवि! कहा जाता है कि किम कार्दाशियां, जिन्हें अपनी देह के इस भाग के प्रदर्शन में विशेष रुचि रहती हैं इस नई प्रवृत्ति की मुख्य प्रेरिका  हैं. इस बेल्फी के लिए अलग से डण्डियां  भी बाज़ार में आने को हैं  और उनकी खूब बिक्री की सम्भावनाएं हैं. मैं बस यह सोच रहा हूं कि सेल्फी-वेल्फी-बेल्फी के बाद कौन-सी ‘–फी’   की बारी है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 जनवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.      

Tuesday, January 13, 2015

कला को कला ही रहने दो

सारी दुनिया में हंसने-हंसाने की और उसे लिपिबद्ध  कर बाद की पीढ़ियों के लिए सुलभ करा देने की  एक लम्बी  परम्परा रही है. बहुत पीछे न भी जाएं तो मुल्ला नसरुद्दीन और अकबर बीरबल के किस्सों को याद किया जा सकता है. अपने समय के एक मशहूर अंग्रेज़ी लेखक ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी, कि अगर आप लोगों को सच बताना चाहते हैं तो उन्हें हंसाओ, वर्ना वे तुम्हें मार देंगे! पता नहीं, वे ऑस्कर वाइल्ड अगर आज होते तो इसी बात को फिर से कहते या नहीं! बड़ी अजब दुनिया है. कार्टून जिसे हास्य और कला का ही एक रूप माना-बताया जाता है एकाधिक बार दुनिया में नृशंस  कृत्यों के कारण  बने हैं. पिछले दिनों फ्रांस में जो हुआ, और जिसकी पुरज़ोर निंदा सारी दुनिया में हो रही है उसके मूल में भी वहां की एक कार्टून पत्रिका शार्ली एब्डो में छपे कार्टून ही हैं. कहा गया कि फ्रांस का यह काण्ड इस लिए हुआ कि इस पत्रिका में छपे कुछ कार्टूनों से कुछ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं.

अभी हाल ही में गुलाबी नगरी में एक भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ, नाम था जयपुर लाफ्टर फेस्टिवल. देश भर के कॉमेडियन एकत्रित हुए और उन्होंने अपने लतीफों से, अपनी मिमिक्री से, और भी कई तरह से उपस्थित भारी जन समूह को खूब गुदगुदाया-हंसाया. जैसा कि   हम सब जानते हैं, मंच पर हास्य प्रस्तुत करने वालों के कुछ प्रिय विषय होते हैं और उनके अधिकतर प्रसंग इन्हीं के इर्द गिर्द बुने हुए होते हैं. इन प्रसंगों में पत्नी से सम्बद्ध प्रसंग शायद सबसे ज़्यादा होते हैं जिनका सार यह होता है कि पत्नियां दुनिया की सबसे क्रूर प्राणी होती हैं और दुनिया का हर पति उनसे  त्रस्त होता है. इसी तरह मारवाड़ियों, बनियों, पंजाबियों, बिहारियों, मद्रासियों (हमारे लिए तो हर दक्षिण भारतीय मद्रासी ही होता है ना!)  को लेकर खूब लतीफे सुनाए जाते हैं. लोगों की शारीरिक अक्षमताओं को, जैसे किसी के हकलाने को लेकर या किसी के एक नेत्र वाला होने पर या किसी के आंखे मिचमिचाने पर खूब चुटकियां ली जाती हैं. और नेताओं की तो बात ही मत कीजिए. कल्पना कीजिए कि अगर किसी तरह नेताओं को लेकर हंसी मज़ाक करने पर रोक लगा दी जाए तो शायद हमारे अधिकांश हास्य कलाकार बेरोज़गार हो जाएं. स्वाभाविक ही है कि जयपुर लाफ्टर फेस्टिवल में भी दो दिनों तक इन कलाकारों ने इन सब को जम कर उड़ाया. लेकिन मज़ाल है कि किसी की भावनाएं आहत हुई हों! यहां तक कि पत्नियों के बारे में किए गए हंसी मज़ाक का पत्नियों ने भी उतना ही आनंद लिया जितना उनसे पीड़ित बताए गए पतियों ने लिया.


तो, सोचने की बात यह है कि  एक तरफ ये सब हैं जो सर्व शक्तिमान भगवान की तुलना में बहुत कमज़ोर हैं, लेकिन ये अपने बारे में की गई मज़ाक से, जिसमें कई बार आलोचना भी शामिल होती है, आहत नहीं होते हैं. इनके समर्थक भी आहत नहीं होते हैं. लेकिन सर्व शक्तिमान भगवान के बन्दे उनके बारे में की गई टिप्पणी, उनके चित्रण, उनसे असहमति अदि से इतने क्रुद्ध हो जाते हैं कि वे अकल्पनीय और अस्वीकार्य हरकत तक कर बैठते हैं. ऐसा क्यों होता है? और जब-जब ऐसा होता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुदा ज़रूर उठता है. कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा, क्योंकि सृजन प्राय: कलाकार का ही होता है.

मुझे लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर मोटे तौर पर दो राय हैं. एक उन लोगों की राय है जो निर्बाध और शर्त विहीन स्वतंत्रता के पक्षधर हैं. वे मानते  हैं कि कलाकार जैसा चाहे वैसा रचने के लिए स्वतंत्र है. अगर उसका रचा किसी को पसन्द न हो तो वह उसे अनदेखा कर दे. दुनिया के अनेक समाज या देश  जिनमें से अधिकांश पश्चिमी प्रबोधन (एनलाइटमेंट) का हिस्सा रहे हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर शायद ही कोई पाबंदी लगाते हैं, अगर लगाते भी हैं तो बहुत ही मामूली. फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के अधिकार को 'मनुष्य के अधिकारों की घोषणा' के 'सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों' में एक माना गया था. यह माना जा सकता है कि फ्रांस की हाल की घटना  का जो लोग मुखर विरोध कर रहे हैं उनका सोच भी यही है. और इनके बरक्स भारत जैसे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निर्बाध और निरपेक्ष नहीं माना जाता है. यही वजह है कि हमारे यहां समय समय पर बहुत सारी पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं.

मेरा मानना है कि अगर कोई आपकी आलोचना करता है तो भी आपको यह अधिकार तो नहीं है कि आप उसको मार ही डालें, लेकिन कला को भी कला तो रहना ही होगा, और अगर वो कला रहेगी तो वो किसी को ठेस पहुंचा ही नहीं सकती है. ठेस पहुंचाने का काम तो हथियार करते हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय  अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 जनवरी, 2015 को कला को कला ही रहने दो, मारो मत शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.       

Tuesday, January 6, 2015

पड़िये ग़र बीमार तो....

अगर आप बीमार हो जाएं तो क्या करेंगे?
अजीब सवाल है!  डॉक्टर के पास जाएंगे, और क्या करेंगे?
सही भी है. जिन लोगों में मेरा उठना बैठना है वे किसी पीर-ओझा-बाबा के पास तो जाने से रहे. बेशक समाज का एक वर्ग है जो बीमार होने पर जादू-टोने-टोटकों वगैरह की शरण लेता है, लेकिन बहुत बड़ा वर्ग वह है जो बीमार होने पर अस्पताल भागता है और रोग की गम्भीरता तथा अपनी हैसियत के अनुरूप छोटे या बड़े डॉक्टर की सलाह लेता है. इसी वर्ग में वे लोग भी शामिल हैं जो अपने-अपने विश्वासों के अनुरूप एलोपैथिक से इतर किसी चिकित्सा पद्धति की शरण में जाते हैं.  वैसे यह बात आम तौर पर मान ली गई है कि किसी को तुरंत राहत चाहिये तो उसे एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की शरण में ही जाना होगा.

एलोपैथिक चिकित्सक आपकी बात सुनेगा, अगर उसे ज़रूरी लगा तो कुछ परीक्षण करवाएगा और फिर कुछ दवाइयां  लिख देगा. सरकार लाख कहे कि जेनेरिक दवाइयां लिखी जाएं, डॉक्टर आम तौर पर आपको ब्राण्डेड दवाइयां ही देगा. लेकिन अगर आपका रोग गम्भीर हुआ तो बहुत मुमकिन है कि डॉक्टर आपको शल्य चिकित्सा की सलाह दे. तब आप क्या करेंगे? डॉक्टर भगवान है, उसकी सलाह मानेंगे. ठीक  है ना?

लेकिन अभी हाल में नवी मुम्बई के एक सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसे पढ़ने के बाद शायद आप भी अपने इस जवाब पर पुनर्विचार करना चाहें! यह सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर दरअसल एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जो अपने आप को ई-  हॉस्पिटल कहता है और आप द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट्स आदि के आधार पर कुछ शुल्क लेकर आपको दुनिया भर में अवस्थित अपने विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह उपलब्ध कराता है. इस सेण्टर ने हाल में साढे बारह हज़ार ऐसे रोगियों का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट जारी की है जिन्हें शल्य चिकित्सा की सलाह दी गई थी. सेण्टर का कहना है कि इनमें से 44% को असल में शल्य चिकित्सा की ज़रूरत थी ही नहीं. अब ज़रा इसी बात को अगर अलग-अलग रोगों के सन्दर्भ में देखिये. जिन हृदय रोगियों को सलाह दी गई उनमें से पचपन प्रतिशत को स्टेण्ट  लगवाने की, सैंतालिस प्रतिशत कैंसर रोगियों को शल्य क्रिया की, और अड़तालीस प्रतिशत को घुटनों के प्रत्यारोपण की ज़रूरत नहीं थी. सोचिये, अगर आपकी जेब और आपकी देह दोनों ने ग़ैर ज़रूरी शल्य चिकित्सा का अत्याचार सहन किया होता तो?

वैसे यह जानकर आपको थोड़ी राहत महसूस हो सकती है कि सिर्फ अपने देश में ही ऐसा नहीं होता है. पिछले  दिनों हम लोग यह भी पढ़ चुके हैं कि अमरीका में किए गए घुटना प्रत्यारोपण के ऑपरेशनों में भी एक तिहाई अनावश्यक थे. अपने देश में भी, और अन्य देशों में भी, प्रसव के लिए सिज़ेरियन ऑपरेशनों की अधिकता और अनावश्यकता पर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं.

जानकार लोग अनावश्यक शल्य चिकित्सा के मूल में यह बात  देखते हैं कि निजी अस्पतालों में डॉक्टरों को मिलने वाली तनख्वाह का सीधा सम्बन्ध इस बात से होता है कि वे अपने अस्पताल को कितना ‘बिज़नेस’ देते हैं.  और कमोबेश यही बात हमें दी जाने वाली ग़ैर ज़रूरी दवाइयों के बारे में भी सच है. फर्क बस इतना है कि यहां डॉक्टर और अस्पताल की बजाय डॉक्टर और दवा कम्पनी का समीकरण काम करता है. दवा कम्पनियों द्वारा डॉक्टरों को उनके लिखे प्रेस्क्रिपशंस के अनुरूप ‘उपहार’ प्रदान करने की चर्चाओं से शायद ही कोई नावाक़िफ हो.

इस सारे खेल में एक और पक्ष अब तेज़ी से जुड़ता जा रहा है और वह है बीमा कम्पनियां. भारत में भी सरकारी अस्पतालों की बदहाली से तंग आए लोग निजी अस्पतालों का रुख करने और उन्हें बहुत ज़्यादा महंगा पाकर मेडिकल इंश्योरेंस में अपना संकट मोचक तलाश करने लगे हैं. निजी अस्पतालों और बीमा कम्पनियों की साठ गांठ इलाज का खर्चा दिन दूना रात चौगुना बढ़ाने में कोई कसर नहीं रख रही है. शायद इसी की परिणति इस बात में भी हुई है कि हाल ही में बीमा कम्पनियों ने कुछ महत्वपूर्ण रोगों के लिए शुल्क निर्धारित कर दिया जिसे ये अस्पताल मानने को तैयार नहीं हैं और परिणामत: अस्पतालों ने कैश लैस सुविधा को स्थगित कर रखा है.

लेकिन इस सारी चर्चा से यह न मान लिया जाए सारा दोष डॉक्टरों और अस्पतालों का ही है. इस चर्चा के शुरु में मैंने सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया, उसके सन्दर्भ में यह जान लेना भी ज़रूरी होगा कि दो डॉक्टरों की राय में अंतर सदा सम्भव है. इसलिए यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि हर मामले में पहली राय ग़लत और दूसरी राय ही सही होगी. दूसरी राय से भी असहमत होने की सम्भावनाओं को स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन ये तमाम बातें  हमारी चिंताओं को घटाते नहीं, बढ़ाते हैं, यह बात निर्विवाद है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 जनवरी, 2015 को आगे कुंआ, पीछे खाई, कोई राह न दे सुझाई शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, December 30, 2014

नव वर्ष मंगलमय हो!

हरिवंश राय बच्चन के एक बहुत प्रसिद्ध गीत का मुखड़ा है: जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं बैठ कभी यह सोच सकूं/ जीवन में जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा-भला! बच्चन जी ने जब यह गीत लिखा होगा तब से अब तक आते-आते जीवन की आपाधापी और बढ़ गई है. ‘सुबह होती है, शाम होती है उम्र यूं ही तमाम होती है’  की ताल   पर समय मार्च पास्ट करता है और दीवारों पर लटकाया गया नया कैलेण्डर देखते ही देखते कचरे के डिब्बे में डाला जाने काबिल बन जाता है. एक और साल बीत रहा है और हम नए साल के स्वागत के लिए प्रस्तुत  हैं. पता नहीं जीवन की आपाधापी में हम कितना विचार कर पाए कि एक साल में हमने क्या खोया और क्या पाया, और अगर विचार किया तो उसका कुल जमा हासिल क्या रहा!

वैसे, मुझे लगता है कि आप जहां भी जाएं, एक गिलास कभी आपका पीछा नहीं छोड़ता है! अरे,  वही गिलास, जो किसी को आधा भरा तो किसी को आधा खाली नज़र आता है! आप पूछेंगे कि यह आधा का क्या चक्कर है भाई? और मैं फौरन अपने निदा फाज़ली साहब को ला खड़ा  करूंगा. उन्हीं ने तो कहा  था:   कभी किसी को मुकम्मिल जहां नहीं मिलता/ कभी ज़मीन तो कभी आसमां नहीं मिलता. तो शायद यह हमारी नियति ही है कि हमें मुकम्मिल जहां न मिले, और यह भी हो सकता है कि असंतोष हमारी फितरत में ही शुमार हो. ‘जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया’ कहने वाले सिर्फ फिल्मों में ही होते हों और फिल्मों से बाहर असल ज़िन्दगी में ‘और ज़रा-सी दे दे साक़ी’ कहने वाले ही रहते हों! बहरहाल. समय का चक्र हर हाल में घूमता रहता है. ‘जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम’. और हम चलते  चले जा रहे हैं. उस साल का आकलन तमाम अखबार और संचार साधन कर रहे हैं जो हमारी मुट्ठी से बस फिसलने ही वाला है. और अपने-अपने साल का आकलन हम अपनी-अपनी तरह से कर रहे हैं. अगर अब तक नहीं कर सके तो अब जो समय शेष बचा है उसमें ज़रूर कर लेंगे.

हम सब चाहते हैं कि जो साल बीत रहा है आने वाला साल उससे बेहतर साबित हो. ग़ालिब बहुत पहले ही  हमें एक जुमला थमा गए हैं- ‘एक बिरहमन ने कहा है कि ये  साल अच्छा है...’  और फिर उन्हीं के नक्शे क़दम पर चलते हुए उनके वंशजों यानि बाद के कवियों ने भी ऐसी ही शुभ कामनाएं की हैं. इन कामनाओं में शुभ और कामना  दोनों शामिल हैं. अब देखिये ना, रूस  में रह रहे हिन्दी कवि अनिल जनविजय ने नए साल के शुभ को किस तरह शब्दों में संजोया है: 

नया वर्ष: संगीत की बहती नदी हो 
गेहूँ की बाली दूध से भरी हो 
अमरूद की टहनी फूलों से लदी हो  
खेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया वर्ष.

नया वर्ष: सुबह का उगता सूरज हो
हर्षोल्लास में चहकता पाखी
नन्हे बच्चों की पाठशाला हो
निराला-नागार्जुन की कविता

नया वर्ष: चकनाचूर होता हिमखंड हो
धरती पर जीवन अनंत हो
रक्तस्नात भीषण दिनों के बाद
हर कोंपल, हर कली पर छाया वसंत हो.

भला ऐसा नया साल कौन नहीं चाहेगा? और क्या यह सपना इतना बड़ा है कि पूरा ही न हो सके? शायद सारे स्वप्नदृष्टा ऐसे ही सपने देखते हैं. दुनिया का इतिहास उठाकर देख लीजिए, राजनीतिज्ञों ने, दार्शनिकों ने, कलाकारों ने, आध्यात्मिक गुरुओं ने – सभी ने इसी तरह के सपने देखे हैं. लेकिन जैसा टी एस एलियट ने कहा है, बिटवीन द आइडिया एंड द रियलिटी.... फॉल्स द शैडो! सोच जब तक कर्म में रूपांतरित होता है, बहुत कुछ  बदल जाता है. सारी दुनिया में यही  हुआ है.  विचार बहुत अच्छा होता है, सोच जनमंगलकारी होता है, रूपरेखा आदर्श होती है लेकिन ये जब क्रियारूप में परिणत होते हैं तब हम पाते हैं कि ‘क्या से क्या हो गया...’ 

तो क्या ऐसा सपना नहीं देखा जाना चाहिए कि जो अब तक होता रहा है वो आइन्दा न हो! हिन्दी के महान कवि मुक्तिबोध ने भी तो यही कहा था, कि जो है उससे बेहतर चाहिये!  जैसी दुनिया हमें मिली है, उसे बेहतर भी तो हम ही बनायेंगे! तो आइये, वर्ष 2015 के आगाज़ पर हम संकल्प करें कि जैसी दुनिया हमें मिली है उससे बेहतर दुनिया आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ कर जाएंगे. मैंने बात बच्चन की पंक्तियों से शुरू की थी, तो उपयुक्त होगा कि उन्हीं की पंक्तियों से आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं भी दूं:

वर्ष नव,
हर्ष नव
,
जीवन उत्कर्ष नव।

नव उमंग
,
नव तरंग
,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह
,
नवल राह
,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल
,
प्रीत नवल
,
जीवन की रीति नवल
,
जीवन की नीति नवल
,
जीवन की जीत नवल!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 30 दिसम्बर, 2014 को वर्ष नव हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल  पाठ.  

Tuesday, December 23, 2014

तालाब गन्दा है या मछली?

अपने लगभग पौने चार दशकों में फैले सेवा काल में मुझे बहुत सारे जन प्रतिनिधियों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला. 1967 से शुरु हुए मेरे सेवाकाल के प्रारम्भ में न तो मेरे काम की प्रकृति इस बात की ज़रूरत पैदा करती थी कि किसी जन प्रतिनिधि से सम्पर्क करना पड़े और न राज्य कर्मचारियों की आचार संहिता इस बात की अनुमति देती थी कि हम उनसे सम्पर्क साधें. बहुत लम्बे समय तक तबादलों वगैरह के लिए जन प्रतिनिधियों या राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना निषिद्ध था. लेकिन धीरे-धीरे हालात बदले और आज स्थिति यह है कि बिना जन प्रतिनिधिगण की ‘डिज़ायर’ के किसी तबादले की कल्पना ही नहीं की जा सकती.

अपनी नौकरी के उत्तर काल में, जब मैं शिक्षक से पदोन्नत होकर अधिकारी बना तो जन प्रतिनिधिगण से सम्पर्क के अवसर भी बढ़े. लेकिन इनके साथ सम्पर्क के मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे. मैं अब भी कृतज्ञतापूर्वक इस बात को स्मरण करता हूं कि जब मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था तो स्थानीय विधायक प्राय: मुझे किसी न किसी के प्रवेश की अनुशंसा में फोन करती थीं. लेकिन उनकी भाषा आदेशात्मक न होकर अनुरोधात्मक होती थी:  ‘देखिये, अगर ऐसा हो सके...’. एक दिन जब किसी सामाजिक आयोजन में उनसे मुलाकात हुई तो मैंने उनसे कहा कि हमारे यहां प्रवेश के नियम इतने सख़्त हैं कि प्राचार्य अपने स्तर पर कुछ भी नहीं कर सकता है. वे बोलीं, “मैं इस बात को जानती हूं. लेकिन क्या करें! हम जन प्रतिनिधियों को भी तो अपने समर्थकों के सामने अपनी छवि बनाये रखनी पड़ती है. इसीलिए मैं आपको फोन करती हूं. लेकिन आप तनिक भी फिक्र न करें, और जो आपके नियमानुसार सम्भव हो वो ही करें.” 

जिस कॉलेज का यह प्रसंग है, उसी नगर के एक अन्य कॉलेज में पदोन्नत होकर जब मैं प्राचार्य के रूप में पहुंचा तो दूसरे तीसरे दिन किसी काम से स्थानीय विधायक को फोन करना पड़ा. वे छूटते ही बोले कि “देखिये आप मेरी इच्छा के विरुद्ध इस कॉलेज में आ तो गए हैं, लेकिन मैं आपको यहां रहने नहीं दूंगा.” उनके इस कोप की पृष्ठभूमि यह थी कि जब मैंने उनसे उस कॉलेज में पदस्थापित होने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी तो उन्होंने यह कहते हुए अपनी असमर्थता व्यक्त की थी कि वे पहले से किसी और से वचनबद्ध हो चुके हैं. लेकिन मैंने फिर भी प्रयास किये और संयोग से मैं अपने प्रयासों में कामयाब भी हो गया. अपने कोप को उन्होंने बहुत जल्दी साकार भी कर  दिया, लेकिन हम दोनों की पारस्परिक सद्भावना को कोई आंच नहीं आई और इस प्रसंग के लगभग पन्द्रह बरस बाद भी हमारे रिश्ते जस के तस हैं.

राज्य की राजधानी में उच्च प्रशासनिक पद पर रहते हुए तीन बरसों में तो शायद ही कोई  दिन ऐसा बीता हो जब किसी जन प्रतिनिधि से भेंट न हुई हो. विभागीय मंत्रीगण से तो खैर दिन में एकाधिक बार भी सम्पर्क होता रहा, और कभी कोई बदमज़गी नहीं हुई, हालांकि बहुत बार उनकी इच्छा के अनुरूप काम न करने की विवशता भी रही. जन प्रतिनिधिगण मेरे ऑफिस में आते या फोन करते, सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह होता, और बस. वे अपना काम लेकर आते और हम यथानियम काम करते या नहीं भी कर पाते.  बल्कि सच तो यह है कि सामान्य और हो जाने वाले काम के लिए तो शायद ही कोई आता. वे आते ही ऐसे कामों के लिए जो किसी न किसी वजह से नहीं हो पाते, और उनके आने या कहने के बाद भी नहीं ही होते. लेकिन  मज़ाल है जो  किसी ने कभी ऊंची आवाज़ में भी बात की हो. हां, इतना ज़रूर कि अगर उनका काम न होने योग्य होता तो मैं स्पष्ट रूप से अपनी मज़बूरी बता देने में कोई संकोच नहीं करता.

पीछे मुड़ कर देखता हूं तो बस एक प्रसंग याद आता है जब किसी जन प्रतिनिधि ने मेरे साथ नाराज़गी भरा बर्ताव किया. इतना लम्बा अर्सा बीत गया है लेकिन वो मंज़र अभी भी मेरी यादों में सजीव है. मैं अपने ट्रांसफर के लिए स्थानीय विधायक के पास जयपुर आया था. हम लोग सचिवालय में मिले, जो करणीय था वह किया गया और मैं उनके साथ ऑटो में सर्किट  हाउस –जहां वे ठहरे थे-  लौटा. जैसे ही हम उतरने को हुए, मैंने ऑटोवाले को पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला. विधायक जी ने फौरन मेरा हाथ पकड़ा और गुस्से से बोले, “उतर जाइये आप. चले जाइये.” मुझे समझ में नहीं आया कि क्या ग़लती हो गई? बोले, “आप पैसे क्यों देंगे?” ओह! तो यह बात थी!  मैंने क्षमा याचना की. उन्होंने पैसे चुकाये, अपने कमरे में मुझे लेकर गये, चाय पिलाई और प्यार से विदा किया.

क्या इतनी जल्दी हालात इतने बिगड़ गये हैं? या फिर कुछ मछलियों की वजह से पूरा तालाब बदनाम हो  रहा है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 23 दिसम्बर, 2014 को हालात बिगड़े या कुछ की वजह से माहौल खराब हुआ शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 16, 2014

हनीमून और पुरुष मानसिकता

कुछ बातें ऐसी हैं जो एकबारगी तो चौंकाती हैं लेकिन जब उन पर तसल्ली से विचार करते हैं तो आपकी प्रतिक्रिया बदल जाती है. मेरे साथ ऐसा ही हुआ. हाल ही में जब मधु चन्द्रिका यानि हनीमून के बारे में किए गए एक सर्वे के परिणामों  के बारे में पढ़ा तो बहुत अजीब लगा. सर्वे ने बताया कि ज़्यादातर भारतीय पुरुष हनीमून पर किसी या किन्हीं और युगलों के साथ जाना पसन्द करते हैं और इस दौरान ली गई अपनी अंतरंग छवियों को सोशल मीडिया पर साझा करना भी उन्हें अच्छा लगता है. ये दोनों ही बातें खासी चौंकाने वाली हैं. विवाह के बाद का यह रिवाज़, जो हमने पश्चिम से आयात किया है अब हमारे रीतिरिवाज़ों का भी उसी तरह एक अभिन्न अंग बन चुका है जैसे ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद जूता चुराई हमारी रस्मों की लिस्ट में शामिल हो गई है. और इसमें चौंकने, दुखी होने या खुश होने जैसी कोई बात नहीं है. वो गाना है ना, ‘जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुब-हो  शाम...’  यानि जीवन में एक ही चीज़ स्थिर है और वो है परिवर्तन. आदि मानव के जीवन में तो विवाह  भी नहीं था, बल्कि परिवार भी नहीं था. ये सब बाद में ही तो आए. संयुक्त परिवार सिमट कर बहुत छोटे हो गए, और विवाह के रीति रिवाज़ भी काफी बदल गए. अलबत्ता, बहुत सारी चीज़ें अवशेष के रूप में बची हुई भी हैं जैसे वर का योद्धा वाला रूप, अश्वारोहण और  तलवार, कमरबन्द वगैरह और बारात के रूप में साथ चलती सेना. लेकिन इनका केवल प्रतीकात्मक रूप ही बचा है और पता नहीं कब वो भी लुप्त हो जाए. वैसे भी असल विवाह पर बहुत कम बल रह गया है, उससे ज्यादा महत्व तो वरमाला वाली रस्म का हो गया है और अधिकतर मेहमान तो उसके बाद खा-पीकर और वर वधू को आशीर्वाद देकर, जो कि एक लिफाफे के रूप में होता है, चले ही जाते हैं.

हां,  तो बात कर रहा था हनीमून की. इस प्रथा के मूल में यह भाव रहा होगा कि परिवार की भीड़-भाड़  से दूर नव युगल एक दूसरे को अच्छी तरह से जान समझ कर नव जीवन का शुभारम्भ करें. लेकिन जिस सर्वे की मैं बात कर रहा हूं वह तो इस प्रथा का यह रूप नहीं रहने दे रहा है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि सामाजिकता की जड़ें हमारे जीवन में इतने गहरे तक उतरी हुई हैं कि हम उससे दूर जाना ही नहीं चाहते हैं, अपने बहुत अन्तरंग पलों  में भी! लेकिन तस्वीरों को साझा करने की इच्छा को आप क्या कहेंगे? कुछ समय पहले मैं ऐसे ही एक प्रकरण का एक किरदार बन गया. फेसबुक पर मेरे एक युवा मित्र ने अपने हनीमून की कुछ ऐसी तस्वीरें पोस्ट कीं, जो कुछ ज्यादा ही निजी थीं. मैंने उन्हें इनबॉक्स में एक सन्देश भेज कर बहुत विनम्रता से यह अनुरोध किया कि वे उन तस्वीरों को हटा  दें, और आपको यह जानकर  आश्चर्य  होगा कि वे मुझ पर नाराज़ हो गए  और लगे पूछने कि मैंने उन्हें ऐसी सलाह क्यों दी? ज़ाहिर है कि मैंने क्षमा याचना करते हुए अपनी सलाह वापस लेने में ही कुशल समझी. शायद बदले वक़्त और बदली पीढ़ी का यही तकाज़ा हो! कहीं  ऐसा तो नहीं है कि ये तस्वीरें साझा करके हम इस बात का विज्ञापन करते हैं कि देखो, यह मेरी ‘उपलब्धि’  है (पुरुष वर्चस्व!) या मैं इतना समृद्ध  हूं कि अमुक जगह पर हनीमून मना रहा हूं!   

लेकिन जिस सर्वे की मैं बात कर रहा हूं उसमें एक बात अवश्य ऐसी हैं जो चौंकाती हैं. यह सर्वे कहता है कि विवाह के बाद हनीमून के लिए कहां जाया जाए, इस बात का फैसला प्राय: वर ही करता है और इस फैसले में वधू की भूमिका शून्य या नगण्य होती है. यह बात मुझे चौंकाने वाली इसलिए लगी कि सारे बदलावों के बावज़ूद जिन परिवारों में हनीमून पर जाने का रिवाज़ बढ़ा है वे ऐसे हैं जहां वर और वधू खासे शिक्षित हैं, और बहुत सारी वधुएं बारोज़गार यानि आर्थिक रूप से आत्म निर्भर भी होती हैं. लेकिन जब यह सर्वे कहता है कि अधिकांश वधुएं भी इस बात को स्वीकार करती हैं कि हनीमून के लिए कहां जाना है इसका निर्णय करने का हक़ पुरुष को है क्योंकि वही पैसा खर्च कर रहा है, और रिश्तों के निर्वहन में पुरुष की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है, तो न केवल चौंकना पड़ता है, दिल में दर्द भी होता है. इस उल्लास यात्रा की प्लानिंग में उनकी आवाज़ का न होना न सिर्फ चौंकाता है, हमारे पारम्परिक पारिवारिक ढांचे में स्त्री की हैसियत पर भी एक टिप्पणी करता है.  लेकिन इस हालत में बदलाव आएगा, यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए. 
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मंगलवार, दिनांक 16 दिसम्बर 2014 को मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में शुभचिंतक बनकर सलाह दी तो मांगनी पड़ी माफ़ी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 9, 2014

किस तरफ हो तुम

जिन्होंने कभी भी, किसी भी स्तर पर हिंदी साहित्य पढ़ा है वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के नाम से अपरिचित  नहीं हो सकते हैं. आचार्य शुक्ल बहुत बड़े निबन्धकार भी थे. आज इनकी चर्चा से अपनी बात इसलिए शुरु कर रहा हूं कि इनके एक बहुत प्रसिद्ध निबन्ध ‘कविता क्या है’ की एक बात मुझे बहुत याद आ रही है. शुक्ल जी ने कविता की ज़रूरत क्यों है यह बताने के लिए कहा है कि सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ  मनुष्य के आचरण इतने जटिल हो गए हैं कि वे सीधे-सीधे तो समझ में नहीं आते हैं. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अनेक उदाहरण भी दिए हैं. लेकिन मैं यहां उनकी चर्चा नहीं करूंगा. असल में आचार्य शुक्ल जी की यह बात मेरे जेह्न पर इसलिए दस्तक दे रही है कि आज के समय में यह तै करना मुश्क़िल होता जा रहा है कि क्या सच है और क्या झूठ, कौन सही है और कौन ग़लत! 

वैसे यह एक शाश्वत  मुश्क़िल है. हमारे समय के एक बड़े राजनेता राममनोहर लोहिया ने यह कहने के लिए कि जीवन में तटस्थता जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, एक प्राचीन कथन ‘देह धरे का दण्ड’ का सहारा लिया था. आप जब भी किसी चीज़ को देखते हैं, एक ख़ास कोण से ही उसे देख सकते  हैं. जब मैं आपके सामने खड़ा होकर आपको देखता हूं तो मुझे आपका चेहरा नज़र आता है, और जब मैं आपके पीछे जाकर आपको देखता हूं तो मुझे आपकी पीठ नज़र आती है. मैं पेट और पीठ दोनों को एक साथ देख ही नहीं सकता. यही तो देह धरे का दण्ड है. और यही बात हम जीवन में भी देखते हैं. मेरी सहानुभूति जिसके साथ होती है मैं उसी के नज़रिये से चीज़ों को देखता हूं, दावा भले ही तटस्थता का करूं. हो सकता है मेरा  झुकाव कभी कम और कभी ज़्यादा हो, लेकिन यह स्थिति शायद ही कभी आ पाती हो कि झुकाव हो ही नहीं. और यह झुकाव, यह अपने नज़रिये से चीज़ों को देखना इतना सहज-स्वाभाविक होता है कि हमें उसका एहसास तक नहीं होता.

ये सारी बातें मुझे उस रोहतक काण्ड के सन्दर्भ में याद आई जिस पर पिछले सप्ताह मैंने अपने इस कॉलम में चर्चा की थी. इस बीच  अलग-अलग संचार माध्यमों पर उस प्रकरण पर इतनी अधिक चर्चाएं हुई हैं और हो रही हैं कि अब यह कहना बहुत कठिन हो गया है कि असल में हुआ क्या था! कोई एक पक्ष पर आरोप लगा रहा है तो कोई दूसरे पक्ष पर. और ऐसा अन्य बहुत सारे मामलों में भी हम देखते रहते हैं. कभी यह सब इतने बेबाक तरीके से होता है कि बहुत आसानी से यह बात समझ में आ जाती है कि अगर कुछ कहा जा रहा है तो क्यों कहा जा रहा है, उससे किसको लाभ होगा और किसकी हानि होगी; और कभी यह काम इतनी बारीकी से किया जाता है कि आपको तनिक भी सन्देह नहीं होता कि सच बयान करने के आवरण में कोई खेल खेला जा रहा है. इधर के बरसों में बहुत सारे मामलों में हमने यह देखा है कि आज जिसे महान कहकर प्रचारित और स्थापित किया गया, उसकी हक़ीक़त तो कुछ और ही थी. इधर जैसे-जैसे संचार माध्यमों की संख्या और सक्रियता बढ़ी है छवि निर्माण और छवि विध्वंस ने बाकायदा एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप ले लिया है.  लेकिन मैं इसे पूरी तरह माध्यम का दुरुपयोग भी नहीं कह सकता. इसलिए नहीं कह सकता कि अभी कुछ क्षण पहले ही तो मैंने दृष्टिकोण की बात की है, और मैं उस बात में पूरा विश्वास रखता हूं. जब मेरा अपना कोई दृष्टिकोण होगा तो बहुत स्वाभाविक है कि मैं चीज़ों को उसी की मार्फत देखूंगा. और जब मैं किसी चीज़ को अपने कोण से देखता हूं तो फिर बस इतना-सा काम और रह जाता है कि उसका वर्णन करते हुए किसी चीज़ को थोड़ा हलका कर दूं और किसी चीज़ पर कुछ अतिरिक्त बल दे दूं. यही हम आजकल  अपने चारों तरफ घटित होते देख रहे हैं. 

एक व्यक्ति कुछ ग़लत करता है और बाद में क्षमा याचना कर लेता है. अब यह आप पर निर्भर है, यानि आपके नज़रिये पर कि आप उसके ग़लत किए पर बल देते हैं या क्षमा याचना पर! लेकिन इतना सब कह चुकने के बाद भी बात जब निष्कर्ष की आती है तो मुझे अपने समय के एक प्रखर रचनाकार बल्ली सिंह चीमा के ये शब्द  याद आ जाते हैं:   
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी   के  पक्ष  में हो  या कि आदमखोर हो ।।
क्या आपको नहीं लगता कि अगर कोई आदमी के पक्ष में है तो फिर उसकी पक्षधरता का स्वागत ही होना चाहिए?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे सात्पाहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 09 दिसम्बर 2014 को 'देह धरे का दण्ड: अपना-अपना नज़रिया'  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, December 2, 2014

कितनी गिरहें अब बाकी हैं!

हरियाणा के सोनीपत ज़िले की दो लड़कियों की खूब चर्चा हो रही है. मैं सोच रहा हूं कि आखिर हम कैसे समय और समाज में जी रहे हैं कि लड़कियों को यह सब करना पड़ रहा है! क्या उनकी ज़िन्दगी सतत संघर्ष का ही पर्याय नहीं है? कौन ज़िम्मेदार है इसके लिए? दो लड़कियां कहीं जाने के लिए बस अड्डे पर पहुंचती हैं और तीन लड़के उनके साथ बदतमीज़ी करना शुरु कर देते हैं. लड़कियां मना करती हैं तो उनकी बदतमीज़ी और बढ़ जाती है. चलती बस में भी यह बदसुलूकी जारी रहती है. सब मूक दर्शक बने रहते हैं. बस, एक लड़की विरोध करने की कोशिश करती है तो लड़के उसके साथ भी बतदमीज़ी से पेश आते हैं. इन दोनों लड़कियों के साथ वे लड़के मारपीट भी करते हैं. लेकिन बस का कोई यात्री उन्हें नहीं रोकता! आखिर इन लड़कियों में से ही एक अपना बेल्ट खोल कर उनको मारती और अपनी रक्षा करती है.

इस प्रकरण की कोई बहुत बुरी परिणति भी हो सकती थी. निर्भया  प्रकरण अभी भी हमारी यादों में ताज़ा है. अब इन लड़कियों और इनके परिवार वालों पर दबाव पड़ रहा है कि ये उन लड़कों को ‘माफ़’ कर दें! पंचायत भी बीच में आ गई है. वही सब जीवन नष्ट हो जाने वगैरह  की बातें. जीवन लड़कों का ही तो होता है! लड़कियों का भला क्या जीवन? वे पैदा ही क्यों होती हैं? दूधों नहाओ पूतों फलो वाले देश में भला लड़कियों की क्या ज़रूरत है? ये इतने सारे सोनोग्राफी केन्द्र आखिर किस दिन काम आएंगे? लिंग परीक्षण पर सरकारी रोक है तो क्या हुआ? चांदी का जूता है न अपने पास! और सोनोग्राफी नहीं तो और बहुत सारे तरीके भी हैं... और फिर भी बेशर्म अगर इस दुनिया में आ जाए तो उसका जीना मुहाल करने के अनगिनत तरीके हैं हमारे पास. घर में उसके साथ भेद भाव, स्कूल में भेद भाव और फिर सार्वजनिक जगहों पर यह सब. शादी के लिए दहेज की लम्बी चौड़ी मांग और फिर ससुराल में प्रताड़नाओं और यातनाओं का अंतहीन सिलसिला. बेशक इनके अपवाद भी हैं, लेकिन अपवादों के बावज़ूद यह एक बड़ा यथार्थ है. ठीक ही तो लिखा था राष्ट्रकवि ने – अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी! आंचल में है दूध और आंखों में पानी! और महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भी तो उसे ‘केवल श्रद्धा’ कहकर अलमारी में ही सजाया था, ठीक वैसे ही जैसे बहुत पहले का मनु स्मृति का एक आप्त वाक्य हमने आड़े वक्त काम आने के लिए संजो रखा है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते  तत्र देवता:
शायद कुछ लोगों की आत्मा को इस बात से बड़ी शांति मिले कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के मामले में हम अकेले नहीं हैं. हाल ही में सुदूर जर्मनी में भी एक लड़की को लड़कों की बदतमीज़ी का विरोध करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इस 23 साल की लड़की टुगसी अलबायर्क ने फ्रैंकफर्ट के पास ऑफनबाख में एक रेस्टोरेंट के शौचालय से लड़कियों के चिल्लाने की आवाज़ें सुनीं. उसने जाकर देखा कि वहां कुछ लोग दो लड़कियों से छेड़छाड़ कर रहे थे. टुगसी ने  इनका विरोध किया. बाद में इनमें से एक आदमी ने कार पार्किंग में टुगसी अलबायर्क के सिर पर पत्थर या बल्ले से हमला कर दिया. इस हमले के बाद वो अचेत हो गईं. डॉक्टरों ने उनके दिमाग को मृत घोषित कर दिया और कहा कि अब वो भी नहीं उठेंगी. कुछ समय उन्हें जीवन रक्षक उपकरणों पर रखा गया लेकिन फिर उनके परिवार वालों की इच्छा पर उन उपकरणों को हटा  लिया गया और अब टुगसी इस दुनिया में नहीं हैं. जर्मनी के राष्ट्रपति योआखिम गाउक ने इस छात्रा को औरों के लिए आदर्श बताया है.
इससे मेरा ध्यान इस बात की तरफ जाए बग़ैर नहीं रह रहा है कि हर छोटी बड़ी बात पर अपने मुखारविंद से कुछ न कुछ उवाचने वाले हमारे नेतागण हरियाणा की इन लड़कियों की बहादुरी पर मौन क्यों हैं? क्या इसलिए कि वे एक वर्चस्ववादी और रूढिबद्ध समाज को नाराज़ करने का ख़तरा नहीं उठाना चाहते? ये वे ही लोग हैं जो किसी न किसी बहाने से महिला आरक्षण बिल को रोके हुए हैं! ये वे ही लोग हैं जो आए दिन महिला विरोधी अटपटे बयान देते रहते हैं. कभी इन्हें उनके वस्त्रों से आपत्ति होती है कभी उनके बाहर निकलकर नौकरी करने से और कभी समानता की मांग से.

लेकिन इन सबके बावज़ूद, यह भी एक यथार्थ है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में औरत हमारे समाज में संघर्ष करती हुई आगे बढ़ रही है. गुलज़ार ने ठीक ही तो लिखा है: कितनी गिरहें खोली हैं मैने/ कितनी गिरहें अब बाकी हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 दिसम्बर, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.