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Tuesday, November 22, 2016

हर कोई त्रस्त है डिजिटल दुनिया के नए वायरस से

आजकल डिजिटल दुनिया में एक वायरस ने सबके नाकों में दम कर रखा है. उस वायरस  का नाम है –फ़ेक न्यूज़. यानि मिथ्या समाचार. यह वायरस इतना अधिक फैल चुका है कि लोग बरबस एक पुरानी कहावत को फिर से याद करने लगे हैं. कहावत है – झूठ तेज़ रफ़्तार  से दौड़ता है जबकि सच लंगड़ाता हुआ उसका पीछा  करने की कोशिश करता है.  हाल में सम्पन्न हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी ऐसा ही  हुआ, और खूब हुआ. सामाजिक मीडिया पर यह बात खूब चली कि पोप फ्रांसिस ने डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन किया है, या कि लोकप्रिय मतदान में ट्रम्प महाशय हिलेरी क्लिण्टन से आगे चल रहे हैं. कहना अनावश्यक है कि ये ख़बरें आधारहीन  थीं. लेकिन इन और इनकी तरह की अन्य ख़बरों के प्रसार का आलम यह था कि अमरीका में समाचारों का विश्लेषण करने वाली एक संस्था को यह कहना पड़ा कि फेसबुक पर बीस शीर्षस्थ वास्तविक और प्रमाणिक खबरों की तुलना में बीस शीर्षस्थ मिथ्या खबरों को शेयर्स, लाइक्स और कमेण्ट्स के रूप में अधिक समर्थन हासिल हुआ. आम तौर पर माना जाता है कि इस तरह की मिथ्या खबरों को फैलाने का काम या तो कुछ लालची स्कैमर्स करते हैं और या फिर भोले-भाले नासमझ लोग. लेकिन अमरीका में तो विभिन्न प्रत्याशियों और निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को भी इस तरह की आधारहीन खबरों को फैलाते हुए पाया गया है. मसलन नेब्रास्का के एक रिपब्लिकन सीनेटर ने हाल में ट्वीट करके कहा कि कुछ लोगों को पैसे देकर उनसे ट्रम्प के खिलाफ दंगे करवाए गए. यह एक झूठ था जिसे जान-बूझकर प्रचारित किया गया था. इस तरह की अनेक झूठी खबरों के निर्माता एक व्यक्ति ने तो वॉशिंगटन पोस्ट में यह बात लिख ही दी कि उसकी रची हुई बहुत सारी क्लिण्टन विरोधी खबरों को, बिना उनकी उनकी प्रमणिकता जांचे,  ट्रम्प के समर्थकों और उनके चुनाव अभियान के आयोजकों ने बढ़ चढ़कर प्रसारित किया. इस लेखक ने यह भी कयास लगाया है कि उसके  द्वारा रची गई इन मिथ्या  खबरों का भी रिपब्लिकन विजय में कुछ न कुछ योगदान अवश्य रहा है. 

लेकिन विचारणीय  बात यह है कि क्या झूठ के इस फैलाव के लिए सिर्फ इनके निर्माता ज़िम्मेदार हैं, या कि कुछ ज़िम्मेदारी उस सोशल मीडिया की भी है जिसके मंच का इस्तेमाल झूठ के फैलाव के लिए किया जाता है. यहीं यह बात भी याद कर लेना  उचित होगा कि सामाजिक मीडिया के मंचों के माध्यम से झूठ के प्रचार-प्रसार का यह कारोबार केवल अमरीका में ही नहीं चल रहा है. म्यांमार जैसे देश में शरारतपूर्ण खबरों की वजह से जातीय हिंसा फैलाई गई तो इण्डोनेशिया, फिलीपींस वगैरह में चुनाव जीतने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया. पश्चिमी अफ्रीका में इबोला वायरस  के बारे में झूठ फैलाया गया तो कोलम्बिया में शांति स्थापना प्रयासों के पक्ष में किए जाने वाले जनमत संग्रह के बारे में दुष्प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल  किया गया. खुद अपने देश में इसके इस्तेमाल के बारे में कुछ भी लिखना  इसलिए अनावश्यक है कि हम सब उससे भली-भांति परिचित हैं. सच और झूठ के  बीच फर्क़ करना ही मुश्क़िल होता जा रहा है. कभी-कभी तो लगता है कि भूसे के ढेर में जैसे सुई खो जाया करती है वैसे ही झूठ  के ढेर  में सच खो गया है. 

ऐसा वायरस फैलाने से जिनके किसी भी तरह के कोई हित सधते हैं, यानि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है या वे अपने पक्ष को सबल करने के उत्साहितिरेक में ऐसा करते हैं, उनको छोड़ शेष लोग तो स्वाभाविक रूप से इस प्रवृत्ति से चिंतित हैं और इसके खिलाफ़ हैं. ऐसे लोगों ने बार-बार सोशल मीडिया के नियंताओं के आगे गुहार लगाकर उनसे मदद भी मांगी है. और ऐसा भी नहीं है कि वे लोग इस बार में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. मार्क ज़ुकरबर्ग ने तो सन 2012 में ही अपने निवेशकों को लिखे एक पत्र में यह कहा था कि वे चाहते हैं कि सोशल मीडिया समाज के उत्थान में सहयोगी बने. अब भी फेसबुक के संचालक झूठ के खिलाफ़ लामबंद हैं. आर्थिक क्षति उठाकर भी वे मिथ्या ख़बरों वाली साइट्स पर फेसबुक पॉवर्ड  विज्ञापन नहीं दे रहे हैं. गूगल वाले भी ऐसा ही कर रहे हैं. इन्हीं गर्मियों में फेसबुक ने तकनीकी रूप से ऐसा करने का भी प्रयास किया है कि हमें अपनी न्यूज़ फ़ीड्स में समाचार संगठनों की फ़ीड्स की तुलना में दोस्तों और परिवार जन की ज़्यादा फ़ीड्स देखने को मिलें. ज़ाहिर है कि इस प्रयास से झूठ के फैलाव को रोकने में कुछ तो कामयाबी हासिल होगी. लेकिन लड़ाई लम्बी है और प्रतिपक्ष बहुत चालाक. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 23, 2016

दास्तान एक अजीब लड़ाई की

अपनी इस अजूबों भरी दुनिया में बहुत सारी लड़ाइयां ऐसी भी चलती रहती हैं जिनका असर तो हम पर होता है, लेकिन जिनकी कोई ख़बर हमें नहीं होती. ऐसी ही एक रोचक लड़ाई इन दिनों दुनिया के सबसे बड़े सोशल नेटवर्क अड्डे फेसबुक और ऑनलाइन विज्ञापन ब्लॉक करने वाले एक ऐप एडब्लॉक के निर्माताओं के बीच चल रही है. फेसबुक के साम्राज्य की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी हैसियत साढ़े तीन सौ बिलियन डॉलर (भारतीय मुद्रा में लगभग पैंतीस हज़ार करोड़)  की है. जिस अड्डे पर जाकर आप-हम जैसे साधारण जन अपने हाल-चाल, पसन्द नापसन्द साझा करते हैं उसकी इतनी बड़ी आर्थिक हैसियत के मूल में हैं वे विज्ञापन जो हमें अपने और अपने दोस्तों के हाल-चाल के बीच दिखा दिये जाते हैं. इन विज्ञापनों का दिखाया जाना आकस्मिक नहीं होता है. इनका सीधा रिश्ता हमारी दिलचस्पियों, जिज्ञासाओं, टिप्पणियों आदि और हमारी वेब ब्राउज़िंग आदतों के साथ होता है और इसी कारण ये हमारे लिए प्रासंगिक भी होते हैं. ऐसा भी नहीं है कि विज्ञापन दिखाने का यह काम केवल फेसबुक ही करती है. ऑनलाइन सेवा देने वाली अधिकांश सेवाएं, जिनमें गूगल भी शामिल है, अपने उपयोगकर्ताओं को किसम-किसम के विज्ञापन दिखाती हैं. इन तमाम कम्पनियों का सोच यही है कि उपयोग कर्ता उनकी सेवाओं का बिना कोई मोल चुकाये उपयोग करता है तो उसे  उन सेवाओं का व्यय भार वहन करने वालों  के विज्ञापन देखने पर कोई आपत्ति  नहीं होनी चाहिए. ऑनलाइन के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा होता है. हम लगभग मुफ़्त में जो टीवी चैनल देखते हैं उनका व्यय भार विज्ञापन देने वाले ही उठाते हैं और अपनी मूल लागत से काफी कम में जो समाचार पत्र हमें मिल पाता है उसके पीछे भी विज्ञापन दाताओं का ही आर्थिक सम्बल होता है.

ऑनलाइन सामग्री में विज्ञापन प्रदर्शित करने का मामला केवल अनचाही सामग्री हम पर आरोपित करने का मामला ही न होकर हमारी निजता के हनन  का मामला ही हो जाता है और इसलिए जागरूक ऑनलाइन सामग्री उपयोगकर्ता अनेक फिल्टर्स और ऐप्स की मदद से इन विज्ञापनों से बचने के रास्ते तलाश करते रहते हैं. ऐसे मददगारों में एडब्लॉक का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. बहुत सारे लोग अपने वेब ब्राउज़र में एक्स्टेंशन के रूप में एडब्लॉकर जोड़कर अनचाहे विज्ञापनों से मुक्ति पाने का प्रयास करते रहे हैं. लेकिन ज़ाहिर है कि यह बात फेसबुक को रास नहीं आई और उसने कुछ ऐसी तकनीकी जुगत की कि एडब्लॉक को ही ब्लॉक कर दिया. यानि एडब्लॉक इस्तेमाल करने वाले उपयोगकर्ताओं को भी विज्ञापन दिखाये जाने लगे. फेसबुक की इस कार्यवाही का जवाब उसी दिन दिया एडब्लॉक ने, यह कहते हुए कि उनका एडब्लॉक प्लस ऐप फेसबुक की कार्यवाही को नाकाम साबित कर देगा. यानि जो विज्ञापन नहीं देखना चाहते उन्हें विज्ञापन नहीं दिखाये जा सकेंगे. बहुत  रोचक बात यह कि इस कार्यवाही के तुरंत बाद फेसबुक ने फिर एक जवाबी कार्यवाही करते हुए एडब्लॉक प्लस को भी अप्रभावी कर डाला. और इस बार फेसबुक की तरफ से एक बयान भी ज़ारी किया गया जिसमें एडब्लॉक वालों पर यह आरोप लगाया गया कि वे फेसबुक उपयोगकर्ताओं को उनके मित्रों की पोस्ट्स और पेज देखने से भी वंचित कर रहे हैं. फेसबुक ने एडब्लॉक और इस तरह के टूल निर्माताओं पर यह भी इलज़ाम लगाया कि वे अपने इन प्रयासों से पैसा कमा रहे हैं. यानि यह उनकी निस्वार्थ सेवा नहीं है. फेसबुक का यह आरोप खारिज़ इसलिए नहीं किया जा सकता कि एडब्लॉक को गूगल जैसी बड़ी कम्पनियों से ‘स्वीकार्य विज्ञापनों’ को दिखाये जा सकने की अनुमति देने वाली श्वेत सूची में शामिल करने की एवज़ में धन मिलता है.

यह लड़ाई अभी ज़ारी है. दोनों ही पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं. एडब्लॉक वालों का तर्क यह है कि वे सारे विज्ञापन बाधित न करके केवल उन लोगों को अपनी सुविधा प्रदान कर रहे हैं  जो विज्ञापनों से मुक्ति चाहते हैं, जबकि फेसबुक ने थोड़ी उदारता दिखाते हुए यह कहा है कि वे भी अपने उपयोगकर्ताओं को अधिक निर्णयाधिकार प्रदान कर रहे हैं ताकि वे उन विषयों के विज्ञापन न देखें जिनमें उनकी रुचि नहीं है. तकनीकी जानकारों का खयाल है कि बावज़ूद इस बात के कि दोनों ही पक्ष अपने अपने मोर्चों पर डटे हुए हैं, इस लड़ाई में फेसबुक का पलड़ा भारी है. पलड़ा भारी होने की वजह शुद्ध तकनीकी है. असल में फेसबुक के हाथों में अपनी साइट पर दिखाई जाने वाली सारी सामग्री के तमाम सूत्र हैं इसलिए किसी भी ब्लॉकर को उन्हीं से गुज़र कर अपनी कार्यवाही करनी होगी.  लेकिन आज की तकनीकी दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं रह गया है. इसलिए यह देखना रोचक होगा कि इस लड़ाई का परिणाम क्या होता है!           


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत सोशल मीडिया v/s विज्ञापन : दास्तान एक अजीब लड़ाई की शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, July 7, 2015

विज्ञापन में प्रतिरोध की अनुगूंज

इधर दो बातें  ऐसी हुईं जिनका परस्पर सम्बन्ध न होते हुए भी है. हम सबने लक्षित किया कि फेसबुक पर बहुत सारे मित्रों की प्रोफाइल छवियां सतरंगी हो गईं. पता चला कि अमरीका में सेम सेक्स विवाह का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत और अभिनंदन करने के लिए फेसबुक ने यह इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल उपलब्ध कराया था. दूसरी बात अपने देश में हुई. एक भारतीय एथनिक पोशाक कम्पनी ने ‘द विज़िट’ नामक  तीन मिनिट इक्कीस सेकण्ड की  एक विज्ञापन फिल्म जारी की जिसे अकेले यू ट्यूब पर दस दिनों में दो लाख से ज़्यादा लोगों ने और विविध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीस लाख से ज़्यादा लोगों ने देखा. इस फिल्म में एक खूबसूरत अपार्टमेण्ट में दो युवतियों को दिखाया गया है. इनमें से एक के मां-बाप आने वाले हैं और उनके स्वागत में दोनों तैयार हो रही हैं. एक उत्तर भारतीय है, दूसरी दक्षिण भारतीय. एक लम्बी है दूसरी नाटी. एक गोरी है दूसरी कृष्णवर्णा. लेकिन हाव-भाव से दोनों के बीच का गहरा अनुराग अच्छी तरह व्यक्त हो जाता है. फिल्म ख़त्म होते-होते आप समझ जाते हैं कि यह भी सेम सेक्स के बीच के रिश्ते का मामला है, दोनों लिव इन जैसे रिश्ते में हैं और एक लड़की इसी रूप में दूसरी को अपने मां-बाप से मिलाने वाली है. इस बात को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट भी सामने आती है लेकिन तब वह जिसके मां-बाप आ रहे हैं दो-टूक लफ्ज़ों में कह देती है कि ‘आई एम श्योर अबाउट अस एण्ड आई डोण्ट वॉण्ट टू हाइड इट एनीमोर’. और इसके बाद दोनों मुस्कुराते हुए लिपट जाती हैं. 

कहा गया है कि यह भारत की पहली ऐसी विज्ञापन फिल्म है जिसमें एक लेस्बियन कपल को दिखाया गया है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि 1983 की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के आलीशान नाव वाले एक दृश्य में हेमा मालिनी और परवीन बाबी के बीच भी ऐसे ही रिश्ते का संकेत था. इसी सिलसिले में  दीपा मेहता की 1996 की फिल्म ‘फायर’ को भी याद किया जा सकता है. जानकार पाठकों के लिए इतना संकेत पर्याप्त होगा कि शबाना आज़मी नन्दिता दास अभिनीत यह फिल्म इस्मत चुगताई की 1942 की बहु चर्चित कहानी ‘लिहाफ़’ पर आधारित थी.  और बात जब साहित्य की आ ही गई है तो राजकमल चौधरी के एक क्षीणकाय उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ को भी याद करना होगा. लेकिन ‘द विज़िट’ इस विवादास्पद विषय पर आधारित पहली विज्ञापन फिल्म है.

हम सभी जानते हैं कि विज्ञापनों की, और खास तौर पर भारतीय विज्ञापनों की दुनिया खासी पारम्परिक और एक हद तक प्रतिगामी भी है. यहां बेटी के लिए दहेज जमा करने वाले और काले रंग को गोरे में तब्दील करने का वादा करने वाले विज्ञापन आम हैं. लेकिन इधर विज्ञापनों की दुनिया में बड़े बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं. आपको हाल के ऐसे बहुत सारे विज्ञापन  याद आ जाएंगे जिनमें काफी कुछ गैर पारम्परिक और लीक से हटकर है, मसलन एक आभूषण कम्पनी का वो विज्ञापन जिसमें एक मां अपनी बेटी की उपस्थिति में पुनर्विवाह करती दिखाई गई थी, या एक साबुन कम्पनी की ‘रियल वुमन’ विज्ञापन श्रंखला... 

लेकिन ‘द विज़िट’ निस्संदेह इन सबसे आगे है. असल में यह विज्ञापन अपनी तमाम खूबसूरती और कलात्मक कोमलता के बावज़ूद एक कठोर प्रतिरोधात्मक वक्तव्य के रूप में सामने आया है. सन्दर्भ यह है कि 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता के समलैंगिकता को अपराध  करार देने वाले खण्ड 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया  था, लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में इस फैसले को उलट दिया. अब स्थिति यह है कि भारतीय कानून की इस धारा के तहत जेल भी हो सकती है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि ब्रितानी शासन के खिलाफ़ हुए 1857 के विद्रोह  के दमन के बाद 1861 में हमारे देश में एक नई भारतीय दण्ड संहिता लागू हुई थी और वही अब तक चली आ रही है. इस दंड संहिता की बहुत सारी बातें क्वीन विक्टोरिया के  रूढ़िवादी सोच की भी परिणति थीं,  अन्यथा इससे बहुत पहले यानि करीब दो हज़ार साल पहले की मनु की संहिता में समलैंगिकता के दण्ड के लिए मात्र कपड़े पहले हुए स्नान का प्रावधान है, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उस पर मामूली आर्थिक दण्ड का प्रावधान है और इन सबसे बढ़कर है 600 ईसा पूर्व रचित सुश्रुत संहिता जिसमें समलैंगिकता को जन्मजात प्रवृत्ति बताया गया था.

तो यह ‘द विज़िट’ विज्ञापन एक उत्पाद का प्रचार मात्र न होकर एक बोल्ड स्टेटेमेण्ट भी है. और इसका यह पक्ष ही इसे फेसबुक के उस इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल से जोड़ता है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जुलाई, 2015 को 'द विज़िट'  विज्ञापन फिल्म में प्रतिरोध की अनुगूंज शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 5, 2015

तू डाल-डाल मैं पात-पात

फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर हमारे बहुत सारे मित्रों को यह शिकायत रहती है कि वहां उनकी तुलना में महिलाओं को अधिक अहमियत  मिलती है. कई लोगों ने तो बाकायदा आंकड़े देकर यह बात साबित करने की कोशिश की है.  उनका कहना है अगर वे कोई रचना या टिप्पणी पोस्ट करते हैं तो  उसे जितना सराहा जाता है उससे कई गुना वैसी ही या उससे बहुत हल्की उस टिप्पणी को सराहा जाता है जिसे किसी महिला ने पोस्ट किया होता है. प्रोफाइल पिक्चर्स के मामले में तो ऐसा और भी अधिक होता है. आप किसी भी महिला के नए  प्रोफाइल पिक्चर पर आई हुई टिप्पणियों को देखकर इस बात की पुष्टि  कर सकते हैं.  लेकिन  इस तरह ‘लाइक्स’ और प्रशांसात्मक टिप्पणियों की गिनती कर महिलाओं से ईर्ष्या  करने वाले लोग इस बात को नज़र अन्दाज़ कर जाते हैं कि घर परिवार बाज़ार गली मोहल्ले की ही तरह सायबर स्पेस में भी महिलाओं को बहुत सारी बदतमीजियों का और बदसुलूकियों का सामना करना पड़ता है. शालीन सराहना की शब्दावली कब अश्लील हो जाती है, और प्रशंसा कब अनचाहे प्रणय प्रस्ताव में तब्दील हो जाती है और महिला का एक नकार कब उसके प्रताड़न का प्रस्थान बिन्दु बन जाता है, पता ही नहीं चलता है. हम आये दिन अश्लील संदेशों, अभद्र छवियों और किसम किसम के अवांछित बर्तावों के बारे में पढ़ते रहते हैं. हमारी बहुत सारी साहित्यिक मित्र भी इस बात की पुष्टि कर सकती हैं कि ऐसा करने वाले कम पढ़े लिखे और संस्कार विहीन लोग ही नहीं हैं, वे भी हैं जो अपने पद, वय और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक हैसियत की वजह से समाज में सम्मानजनक बने हुए हैं.

और दुर्भाग्य की बात यह कि ऐसा केवल हमारे देश में ही नहीं होता है. अभी हाल ही में मैं एक प्रतिष्ठित विदेशी अखबार का ऑनलाइन संस्करण देख रहा था तो मुझे यह जानकर खासा आश्चर्य हुआ कि अमरीका जैसे  देश में भी, जहां स्त्री-पुरुष के मिलने-जुलने पर हमारे देश जैसे सांस्कृतिक अवरोध चलन में नहीं हैं, यह  सब कुछ होना आम है. वहां मैंने पढ़ा कि इकत्तीस साला एशले ब्राइन्सफील्ड नामक एक कस्टम इंस्पेक्टर ने जैसे ही एक डेटिंग साइट टिण्डर पर अपना खाता बनाया, उन्हें न सिर्फ अभद्र  संदेश मिलने लगे, विवाहित पुरुषों तक ने उनसे यौन सम्बन्ध बनाने की पेशकश कर डाली. कई पुरुषों ने तो उन्हें अपनी निर्वसन सेल्फियां भी भेज दीं. एशले ने वही किया जो कोई भी अन्य स्त्री करती. उन्होंने ऐसे लोगों को ब्लॉक किया, या उनकी  शिकायत टिण्डर प्रशासन से  की. लेकिन इससे भी उनकी समस्या हल नहीं हुई. जैसे ही वे कोई कदम उठातीं, ये लफंगे किसी और स्क्रीन नाम से उन्हें तंग करने लग जाते. तंग आकर उन्होंने एक और रास्ता अख्तियार किया. उन्होंने अपने नाम आए आपत्तिजनक संदेशों के  स्क्रीन शॉट्स लिये और उन पर ‘टिण्डर आपकी वैवाहिक समस्याओं का हल नहीं है’ या इसी तरह के अन्य संदेश सुपर इम्पोज करके उन्हें अपने प्रोफाइल पन्ने पर पोस्ट कर उन बदमाशों को लज्जित करना शुरु किया. एशले का कहना है कि अगर वे उन्हें ऐसे ही तंग करते रहेंगे तो वे भी उन्हें लज्जित करती रहेंगी.

लॉस एंजिलस की अलेक्ज़ेण्ड्रा ट्वेटन के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ. इस 27 वर्षीय महिला को ओके क्युपिड और दूसरी अनेक साइट्स पर जब पुरुषों की तरफ से मिलने वाले अश्लील संदेशों का सिलसिला उनके सारे प्रयत्नों से भी नहीं रुका, तो उन्होंने इंस्टाग्राम पर बाय फेलिपे जैसे अवमाननासूचक नाम वाले अपने खाते पर ये सारे संदेश पोस्ट कर दिये. बाय फेलिपे को आप ‘चल फूट’ का पर्याय  मान सकते हैं. लेकिन वे इतना करके ही नहीं रुक गईं. उन्होंने अन्य महिलाओं को भी आमंत्रित किया कि वे भी उन्हें मिले इस तरह के सन्देश इस खाते में पोस्ट कर दें. और आज हालत यह है कि इस खाते पर चार हज़ार प्रविष्ठियां आ चुकी हैं और इसके तीन लाख अठारह हज़ार फॉलोअर्स हैं.  यहां कई सन्देश तो इतने उग्र हैं कि उनका भाव करीब-करीब यह है कि तुम्हें तो मौत से भी कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. और जो काम अलेक्ज़ेण्ड्रा ने इस बाय फेलिपे से किया वही काम पच्चीस साला एना जेंसलर ने अपनी साइट इंस्टाग्रेनीपेण्ट्स पर किया. वे ओके क्युपिड पर प्राप्त अभद्र संदेशों को अपनी साइट पर कार्टून के रूप में तब्दील कर पोस्ट करती हैं. 

असल में सोशल नेटवर्किंग और डेटिंग साइट्स पर महिलाओं को परेशान किया जाना आम बात है, हालांकि वहां उनसे थोड़ी कम परेशानी पुरुषों को भी भुगतनी पड़ती है. इन  साइट्स के प्रबन्धक भी अपनी तरफ से इन परेशानियों के लिए आई शिकायतों पर समुचित ध्यान देते और इन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन शरारती तत्वों और इनके बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है. देखना है कि यह सिलसिला कभी खत्म होता भी है या नहीं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 मई, 2015 को इण्टरनेट का मायाजाल: तू डाल-डाल मैं पात-पात शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 14, 2015

समाज की दीवारों से टकराता सोशल मीडिया

समाज और इसके मीडिया यानी सोशल मीडिया में इन दिनों एक और  उफान आया हुआ है। हालांकि यह उफान अभी सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा कर अपने जोर की आजमाइश ही कर रहा है, पर नई पीढ़ी की मानसिकता के बदलाव की तेज़ गति को देखते हुए लगता नहीं कि यह उफान उन दीवारों को तोड़ कर वास्तविक सोशल लाइफ तक पहुंचने में बहुत देर लगाएगा। दरअसल यह उफान बहुत सारे मुद्दों से बन कर अपनी गति पकड़ रहा है। अगर आप यह अनुमान लगा रहे हैं कि इन में पहला मुद्दा माई चॉइस वीडियो के जरिए दिए जा रहे संदेश का है, तो आपका अनुमान सही है। यह संदेश कई मायनों में आजादी की बात कर रहा है। वैसे हमारे समाज के कुछ विद्रोही लोग अर्से से इस आजादी का उपभोग करते और इसे सम्मान देते रहे हैं। देह को आधार बना कर बनाए गए इस वीडियो पर मिली-जुली  प्रतिक्रियाएं आई हैं, पर एक तथ्य यह भी है कि आधुनिकतम समाज का तमगा हासिल किए पश्चिम में भी अभी विवाहेतर संबधों को स्वीकृति का सम्मान नहीं दिया गया है। 


माई चॉइस को फाइनली माई चॉइस ही रहने दिया जाए तो बेहतर है। इसके बाद एक और मुद्दा है जिसे संसार भर की आधी आबादी  अपनी आधी उम्र तक झेलती है और जिसके बारे में लगभग सभी वयस्कों को पता होता है पर सार्वजनिक रूप से जिसकी चर्चा करना लगभग शर्मिंदगी वाला मामला माना जाता है। यह मुद्दा भी आजकल सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा रहा है। महिलाओं के ‘उन दिनों’ का। हालांकि फेसबुक पर पिछले काफी समय से इस दौरान महिलाओं को होने वाली तकलीफों  और इसके प्रति सामाजिक नजरिए को कई महिलाओं ने अपनी कविताओं और अन्य पोस्ट्स के माध्यम से उठाया है। पर हाल ही में भारतीय मूल की एक कनाडाई लेखिका रूपी कौर  ने इस अनुभव से संबंधित एक फोटो इन्स्टाग्राम पर शेयर किया  लेकिन  इस साइट ने इस फोटो को  पॉलिसी विरुद्ध बता कर दो बार हटा दिया। इस पर रुपी कौर ने बहुत जायज सवाल उठाया कि आखिर इसमें शर्मिन्दगी की क्या बात है? और अंतत: साइट को भी रूपी कौर से क्षमा याचना करने और इस फोटो को फिर से स्वीकृति देने को विवश  होना पड़ा.


और इन बातों के बाद एक समाचार जिसने बरबस ही हमारे चेहरों पर एक मुस्कुराहट ला  दी। दरअसल समाचार ही कुछ ऐसा था कि यादों के कोठार से काफी कुछ निकल पड़ा। बात सत्तर के दशक के मध्य की है जब मैं नया-नया प्राध्यापक बन कर राज्य के एक मझोले कस्बे में पहुंचा था और अपने एक वरिष्ठ साथी की मेज़बानी का लुत्फ ले रहा था। एक दिन हम दोनों बाज़ार गए तो उन्होंने अन्य सारी खरीददारी कर चुकने के बाद उस दुकानदार से रहस्यपूर्ण अन्दाज़ में ‘चीज़’  भी देने का अनुरोध किया। सामान लेकर लौटते हुए मैंने अपनी बेवक़ूफी में उनसे पूछ लिया कि ‘चीज़’  जैसी चीज़ को उन्होंने इस तरह रहस्य भरे अन्दाज़ में क्यों मांगा? और तब उन्होंने घुमा फिराकर मुझे बताया कि चीज़ शब्द का प्रयोग असल में उन्होंने किस वस्तु के लिये किया था। उसके कुछ बरस बाद भी, जब सरकार की ‘हम दो हमारे दो’ नीति के उत्साहपूर्ण क्रियान्वयन के तहत विभिन्न सरकारी विभागों में वह चीज़ निशुल्क वितरण के लिए उपलब्ध कराई जाती थी तो हम अपने कॉलेज के बाबू से बिना संज्ञा का प्रयोग किए, सर्वनाम या संकेत की मदद से वह चीज़ मांगा करते थे। हममें से शायद ही कभी किसी ने नाम लेकर कहा हो कि मुझे यह चाहिये। अब इसे आप संस्कार कहें, संकोच कहें, शालीनता कहें, गोपनीयता कहें या और कुछ भी कहें. वस्तु स्थिति यही थी।


अब तक तो आप समझ ही गए  होंगे कि मैं किस ‘चीज़’  की बात कर रहा हूं। और यह प्रसंग मुझे याद आया इस बात से कि सरकार ने सरकारी उपक्रम से बन कर बिक रहे कंडोम की पैकेजिंग को सुधारने का निर्णय लिया है। वह भी उस दौर में जब उनके प्रतिद्वंद्वी पैकेजिंग और विज्ञापन में उससे कई गुना आगे निकल चुके हैं।  बहरहाल उदारीकरण से पहले के सरकारी सक्रियता के दौर में भी भारत की जनसंख्या को थामे रखने वाले उस ब्रांड को बचाने के लिए भी यदि अब सरकार कुछ करती है तो उसके लिए हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं। पर क्या एक सरकारी उत्पाद विज्ञापन और पैकेजिंग के मामले में अपने व्यावसायिक प्रतिद्वन्दियों को टक्कर दे सकेगा?  मर्यादा के बन्धन आड़े नहीं आएंगे? लेकिन आप भी सोचिये कि  जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जहां खजुराहो तराशा गया और इन सबसे ऊपर जहां काम को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया जितना धर्म, अर्थ और मोक्ष को माना गया, क्या वहां ऐसी कोई मज़बूरी होनी चाहिए
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 अप्रेल, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, February 24, 2015

विवाह, विदाई और वर-वधू

कोई पांचेक साल बाद फिर अहमदाबाद जाने का सुयोग जुटा. पिछली बार गया था तो साबरमती आश्रम के माहौल और अदालज री बाव की सुखद स्मृतियां बहुत दिनों तक मन प्राण को मुदित करती रही थीं. इस बार अमदावाद नी गुफा, जिसे हुसैन दोषी गुफा के नाम से भी जाना जाता है,  सूची में सर्पोपरि थी. जाने की वजह इस बार भी वही थी:  एक विवाह समारोह में सहभागिता. हम मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन में अधिकांश यात्रा प्रसंग तो इन्हीं सामाजिक वजहों से आते हैं. याद आया कि पिछली बार की यात्रा में वरमाला के बाद वर-वधू को ‘आशीर्वाद’ यानि लिफाफा  देने और फोटो खिंचवाने के लोग किस तरह पंक्तिबद्ध अपनी बारी की शालीन प्रतीक्षा कर रहे थे! जब एक जन फोटो वगैरह खिंचवा कर हटता तभी दूसरा आगे जाता. मेरे लिए यह दृश्य विलक्षण और परम आनंदपूर्ण था. इस बार फिर इसी दृश्य को देख कर मुदित होने का आकांक्षी था. परिवार और आयोजन स्थल वही थे  अत: स्वाभाविक है कि अतिथि समुदाय भी कमोबेश वही था. लेकिन मेरे सुख की पुनरावृत्ति नहीं हुई. आप कुछ और समझें उससे पहले ही स्पष्ट कर दूं कि होस्ट परिवार ने वैसी कोई व्यवस्था रखी ही नहीं. और एक तरह से तो अच्छा ही हुआ. मैं तो हर शादी में जाकर बेचारे वर-वधू के बारे में सोच कर दुखी होता हूं कि इतने सारे मेहमानों के साथ फोटो खिंचवा कर स्माइल देते-देते वे कितने पस्त हो जाते  होंगे! असल में शादी का यह फोटो सेशन एक ऐसी बेकार की रिवायत है जिससे जितनी जल्दी छुटकारा पा सकें, पा लिया जाना चाहिये. न घर वाले कभी उन तस्वीरों को देखते होंगे न मेहमानों को कभी वे तस्वीरें देखने को मिलती होंगी! फिर इतनी ज़हमत किस लिए?

इस विवाह का एक दृश्य मुझे बहुत लम्बे समय तक याद रहेगा. हम लोग विवाह में वधू पक्ष की तरफ से सम्मिलित थे. अंतरजातीय विवाह था. वर और वधू दोनों पक्षों ने सहज स्वाभाविक उल्लास से इस रिश्ते को स्वीकार किया और पूरे मन से विवाह समारोह का आयोजन किया. विवाह की रस्में दोनों समाजों की प्रथानुसार सम्पन्न की गईं. दृश्य यह था. वर वधू मंच पर खड़े थे. वधू की मां ने कन्यादान की रस्म पूरी की और मंच से नीचे उतरते उतरते उनकी रुलाई बहुत ज़ोर से फूट पड़ी. उन्हें यह लगा होगा कि बस, अब इस क्षण से मेरी बेटी ‘पराई’ हो गई. इस प्रतीति पर भला कौन होगा जो द्रवित होने से खुद को रोक सके. बहुत स्वाभाविक था यह. लेकिन तभी मेरी नज़र दुल्हन की तरफ चली गई. और मुझे यह देखकर अत्यधिक अचरज हुआ कि वह  इस भाव प्रवाह से एकदम अछूती, अपने अनुराग में मुदित-मगन थीं. जी, आप ग़लत न समझें. यह लिखते हुए मेरे मन में उस युवती  के प्रति किसी भी तरह की शिकायत  का कोई भाव नहीं है. यह एक छवि भर है.

असल में, इस दृश्य के बारे में लिखने की ज़रूरत मुझे इसलिए महसूस हुई कि इसने दो एक महीने पहले सम्पन्न एक और विवाह की याद मेरे मन में ताज़ा कर दी. उस विवाह में हम लोग वर पक्ष की ओर से सम्मिलित थे. वह विवाह भी हमारे बाद वाली पीढ़ी की संतति का ही था, और प्रेम  विवाह ही था जो दोनों पक्षों के अभिभावकों की आनंदपूर्ण सम्मति से सम्पन्न हुआ था. उस विवाह के बाद वर या वधू किसी ने फेस बुक पर जो बहुत सारी तस्वीरें पोस्ट की थीं उनमें से एक तस्वीर और उस पर आई हुई बहुत सारी मज़ेदार प्रतिक्रियाओं की स्मृति ने मुझे इस दृश्य के बारे में लिखने को प्रेरित किया. वह तस्वीर विदाई के क्षणों  की थी जिसमें वधू के साथ-साथ वर भी लगभग रुदन मुद्रा में था. इसी बात को लेकर वर-वधू के मित्रों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में वर की मैत्रीपूर्ण खिंचाई की थी. हम सब जानते हैं कि रोना बहुत संक्रामक होता है. अगर आपके पास कोई रोने लगे तो आप अपने को भी वैसा ही करने से रोक नहीं पाते हैं. तो उस समय जब दुल्हन अपने मां-बाप से विदा लेते हुए रोने लगी होगी तो उसके वियोग भाव से दूल्हा भी अप्रभावित नहीं रहा होगा और उसी क्षण को फोटोग्राफर ने कैद कर लिया था. लेकिन हमारे यहां इस बात को कोई कैसे स्वीकार कर ले कि जब दुल्हन विदा हो रही  है तो दूल्हा भी रुंआसा हो जाए! तो ये थी विवाहों की दो छवियां. और हां, बात तो मैंने अमदावाद नी गुफा के ज़िक्र से शुरु की थी. गूगल कर चुकने के बाद भी हम यह न जान पाए थे कि उसे शाम चार बजे से पहले नहीं देख सकते, इसलिए भरी दोपहर वहां जाकर भी उसे देखे बिना लौटना पड़ा. यानि अहमदाबाद एक बार  और जाने का  कम से कम एक आकर्षण  तो मन में है ही!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 24 फरवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, August 19, 2014

एक अनूठा बिज़नेस मॉडल और सरकारें

आज सुबह फेसबुक पर किसी ने मात्र एक मिनिट ग्यारह  सेकण्ड के  एक वीडियो का लिंक भेजा तो सहज जिज्ञासा वश उसे देख ही लिया. बहुत मज़ेदार,  लेकिन विचारोत्तेजक भी. कहा गया कि यह वीडियो मुम्बई की एक औरत की कहानी है. उसके अनूठे व्यवसाय की कहानी. रोज़ सुबह वो औरत अपनी चार गायों और थोड़ी-सी घास को लेकर उस जगह पर आती है. पुण्य करने के इच्छुक  लोग उस औरत से घास खरीदते हैं और पास ही बंधी हुई गायों के आगे डाल देते हैं. शाम होते-होते उस औरत की सारी घास  बिक जाती है, और उसी के साथ उसकी गायों का पेट भी भर जाता है. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. वे गायें जो दूध देती हैं, उसे  भी वो औरत बेच लेती है. तो यह है व्यापार का एक अनूठा मॉडल. अगर आप ध्यान से देखें तो इसमें ग़लत कुछ भी नहीं है. मुम्बई जैसे महानगर में वो औरत चन्द लोगों को पुण्य करने का अवसर प्रदान कर रही है. उन्हें पुण्य करने के लिए घास खरीदने दूर नहीं जाना पड़ रहा. गाय और घास दोनों पास-पास. वह औरत कोई छल नहीं कर रही. किसी को धोखा नहीं  दे रही. दानियों को इस बात से क्या फर्क़ पड़ता है कि वे गायें किसकी हैं? और इस तरह वो औरत अपने बहुत साधारण लेकिन अनूठे बिज़नेस सेंस से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी चला रही है. हो सकता है आपको भी अपने आस-पास ऐसी ही कोई अनूठी कहानी मिल जाए!  

लेकिन इस वीडियो को देखते-देखते मेरा ध्यान एक और बात की तरफ चला गया. इस वीडियो को देखते-देखते मुझे खयाल आया कि सारी दुनिया की सरकारें भी तो इसी मॉडल पर चलती हैं! ज़रा सोचिये. सारा का सारा टैक्स हम देते हैं, और सरकारें इस बात का श्रेय लेती हैं कि उन्होंने हमारे लिए ये किया और वो किया. सड़कें बनवाई और अस्पताल चलाए! वेलफेयर स्टेट यानि कल्याणकारी राज्य! जब चाहा टैक्स लगा दिया और जितना चाहा उसे बढ़ा दिया. तर्क यह कि बिना टैक्स कोई भी योजना कैसे पूरी की जा सकती है! और आपने-हमने जो टैक्स दिया उससे सिर्फ हमारा-आपका ही भला नहीं हुआ! खुद सरकार का भी कम भला नहीं हुआ. सरकार यानि मंत्री, सांसद, विधायक और पूरा का पूरा सरकारी अमला. जो टैक्स आप हम देते हैं उसी में से वे खुद पर भी खर्च करते हैं और अच्छी खासी दरियादिली से खर्च करते हैं. उनके वेतन भत्ते, उनकी सारी सुख सुविधाएं, उनकी सुरक्षा, उनके घर-बार, उनकी हारी-बीमारी, उनकी देश-विदेश की यात्राएं, उनकी पेंशन सब कुछ उसी पैसे से तो होता है जो हम लोग बतौर टैक्स सरकार को देते हैं. है ना वही का वही मॉडल.

और जैसे इतना भी पर्याप्त नहीं है. हम पैसा देते हैं, और अगर हम प्रजातांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हों तो हम ही उन्हें चुनते हैं (चुनने का सारा खर्च भी हम ही उठाते हैं!), और अगर दूसरी व्यवस्था हो तो वे खुद को हम पर थोप लेते हैं, लेकिन हर व्यवस्था में यह दावा ज़रूर किया जाता है कि यह सब हमारी ही बेहतरी के लिए है. प्रजातंत्र में अपनी सरकार चुनने का अधिकार हमारे हाथों में सौंपना भी एक तरह से हम पर किया गया एक उपकार बताया जाता है. और अगर यह व्यवस्था न हो तो किसी महान परम्परा का निर्वाह बता कर उस भिन्न  व्यवस्था को  भी महिमा मण्डित किया जाता है. लेकिन ज़रा खुले मन से सोचिये कि क्या कोई भी सरकार अपनी जनता पर किया हुआ उपकार होती है? अगर वो किसी और स्रोत से वित्त पोषित होती तो मैं उसे उपकार मानने के बारे में सोचता. लेकिन जब वो मेरे ही संसाधनों से चलती है तो उसे उपकार के रूप में स्वीकार करने में मुझे तो संकोच होगा.  

असल में सरकारों ने, शायद यही बात उनके हित में हो, लम्बे समय से एक ऐसा माहौल बना रखा है कि सभी देशों की जनता उन्हें अपने हित में और अपरिहार्य मानने लगी  है. मुझे याद आता है कि कुछ समय पहले एक भारतीय साप्ताहिक पत्रिका ने एक कवर स्टोरी की थी  ‘डू वी रियली नीड अ गवर्नमेण्ट?’  क्या हमें वाकई  किसी सरकार की ज़रूरत है? यह सवाल आज फिर मेरे जेह्न में उठ रहा है.  इसलिए भी उठ रहा है दुनिया के बहुत सारे देशों में सरकारें अपने बहुत सारे काम निजी क्षेत्र को सौंपती जा रही हैं. ग्लोबल विलेज की अवधारणा का मूर्त होना विदेश नीति की ज़रूरत भी कम करता जा रहा है. और अगर सरकारें न हों तो शायद रक्षा महकमे की भी ज़रूरत न रहे! सभी जानते हैं कि लड़ती सरकारें हैं, जनता नहीं. तो  ऐसे में क्या उस औरत से कहा जा सकता है कि हमें तुमसे घास नहीं खरीदनी है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 19 अगस्त, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, May 20, 2014

स्वस्थ समाज और मज़बूत लोकतंत्र के लिए

देश में चुनाव सम्पन्न हो गए और नई सरकार की तस्वीर साफ हो गई है. इस बार के चुनाव कई मामलों में बेहद अनूठे रहे. वैसे तो हर बार यही कहा जाता है कि परिणाम  अप्रत्याशित रहे हैं, लेकिन इस बार के परिणाम ज़्यादा ही  अप्रत्याशित रहे हैं. इतने एक पक्षीय फैसलों की तो घोर से घोर समर्थकों ने भी आशा नहीं की थी. निश्चय ही यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार बिना किसी दबाव और समझौतों के काम करेगी, आम जन के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कार्य करेगी और जनाकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.

इस बार के चुनावी माहौल में दो बातें बहुत ख़ास रही हैं. इन चुनावों में जितनी कटुता देखने को मिली, और एक दूसरे के प्रति जितनी  ख़राब भाषा का प्रयोग किया गया वैसा अब तक कभी नहीं हुआ था. वैसे इस बार के चुनावों को लोगों के अनुपम हास्य बोध के लिए भी याद किया जाना चाहिए. अपने चहेते नेताओं और दलों के पक्ष का समर्थन करने के लिए विरोधियों को लेकर जैसे-जैसे लतीफे,  प्रसंग, कार्टून वगैरह  रचे गए वैसे और उतनी मात्रा में शायद ही पहले कभी रचे गए हों. लेकिन यहां भी अधिकतर यह प्रवृत्ति देखने को मिली कि हम तो सबका कैसा भी मखौल उड़ा सकते हैं लेकिन हमारी तरफ देखने की कोई ज़ुर्रत भी न करे! अब जब चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सब अप्रिय बातों को भुला दिया जाएगा और पूरी सद्भावना और सदाशयता के साथ काम किया और करने दिया जाएगा.

दूसरी बात जो ग़ौर तलब है वह यह कि इन चुनावों में पहली बार पर सोशल मीडिया, विशेष रूप से फेसबुक, ट्विट्टर,  वाट्सएप्प आदि  का इतने बड़े पैमाने इस्तेमाल हुआ. वैसे तो इस इस्तेमाल की पदचाप हाल ही में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों में भी  काफी साफ सुनाई दी थी और एक नए जन्मे दल के लिए कहा गया था कि उसने इस माध्यम का बहुत सशक्त प्रयोग किया है, लेकिन इस संसदीय चुनाव में यह प्रयोग और बड़े पैमाने पर हुआ. लगभग सभी  राजनीतिक दलों ने बहुत योजनाबद्ध रूप से इन माध्यमों को अपने पक्ष  में इस्तेमाल किया और  इस कुशलता के साथ किया कि वे अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से अपने साथ इस हद तक जोड़ने में कामयाब रहे कि राजनीतिक पक्षधरता और संलग्नता निजी और पारिवारिक सम्बन्धों तक पर भारी पड़ गई. मैं कल ही यहां यहां बैंगलोर में एक ख़बर पढ़ रहा था कि दो परिपक्व और खासे शिक्षित युवाओं में बरसों पुरानी  गहरी दोस्ती सिर्फ इसी बात पर टूट गई कि उनमें से एक किसी एक राजनीतिक दल का कट्टर समर्थन कर रहा था. हम लोग जो फेसबुक पर सक्रिय हैं, उन्होंने भी यह बात लक्षित की है कि इस चुनाव के दौरान ‘अनफ्रेण्ड’ करने का कारोबार कुछ ज़्यादा ही चला है.

निश्चय ही इस पूरे सिलसिले में अपने राजनीतिक विचार के प्रति हमारी गहरी संलग्नता के साथ ही दूसरे के विचार और उसकी भावनाओं के प्रति असहिष्णुता की भूमिका को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता है. अलग राजनीतिक विचारों का होना अस्वाभाविक और असामान्य बात नहीं है. यह तो प्रजातंत्र का मूल है. विचार वैभिन्य जितना देश या समाज में हो सकता है, उतना ही परिवार और दोस्तों के  बीच  भी हो सकता है. हम अलग-अलग विचार और पसन्द नापसन्द रखकर भी साथ रह सकते हैं, और प्रेम से रह सकते हैं – इस बात पर ज़ोर देने की बेहद ज़रूरत इन चुनावों ने महसूस कराई है. असल में, अब तक यह बात कि हमारा मत किसको जाएगा, गोपनीय रहती आई है और इस वजह से बहुत सारे टकरावों से भी हम बचे  रहे हैं. राजनीतिक दलों के प्रचारक अपना काम  करते रहे और मतदाता अमन चैन की ज़िन्दगी जीता रहा. लेकिन इस बार, कदाचित पहली बार, सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी पसन्द  खुलकर बताई और न सिर्फ यह किया, बल्कि जिनकी पसन्द उनसे भिन्न थी, उन पर तमाम तरह के उचित-अनुचित, सही ग़लत  प्रहार भी किए. एक तरह से आम मतदाता भी पार्टी का प्रचारक बन कर उभरा.  सारी खुराफत की जड़ यही बात  थी. अब इसके मूल में बहुत सारी बातें हो सकती हैं. हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो कि देश का एक बड़ा वर्ग परिवर्तन के लिए व्याकुल था और वह उससे कम के लिए क़तई प्रस्तुत नहीं था. और भी बहुत  कुछ इसके मूल  में हो सकता है, जिसका विश्लेषण यहां प्रासंगिक नहीं होगा. लेकिन अब, जबकि वह परिवर्तन  हो चुका है, यह बहुत ज़रूरी है कि इस दौर की तमाम कटुताओं को खुले मन से विस्मृत कर दिया जाए, और न सिर्फ इतना बल्कि यह भी सोचा जाए कि भविष्य में इससे कैसे बचा जाएगा. चुनाव फिर होंगे, हर पाँच  बरस में होंगे. फिर हम किसी के पक्ष में और किसी के प्रतिपक्ष में होंगे. लेकिन हमारी पारस्परिक सद्भावना कभी आहत न हो, हमारे विचारों के कारण हमारे निजी और पारिवारिक रिश्ते तनिक भी क्षतिग्रस्त न हों, इसका ध्यान  ज़रूर रखा जाना चाहिए. यह बात एक मज़बूत  लोकतंत्र के लिए जितनी ज़रूरी है उतनी ही ज़रूरी एक स्वस्थ और परिपक्व समाज के लिए भी है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 20 मई, 2014 को आम मतदाता बनकर उभरा पार्टी प्रचारक शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, October 16, 2013

और ज़रा-सी दे दे.....

और ज़रा-सी दे दे

बड़े विकट समय में जी रहे हैं हम लोग. साईं इतना दीजिए जा में कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु ना भूखा जाएवाला वो वक़्त बहुत पीछे छूट चुका है जब हमारी ज़रूरतें सीमित हुआ करती थीं और जितना हमारे पास होता था, उससे बहुत अधिक की चाह नहीं होती थी और इतना समय हमारे पास होता था कि अपनी ज़िन्दगी के प्याले का रस चख सकें.  अब सब कुछ बदल गया है. ‘थोड़ा है थोड़े  की ज़रूरत है’  सिर्फ एक फिल्मी गाने के बोल हैं, हमारे जीवन का मूल मंत्र नहीं.  ‘और ज़रा-सी दे दे साक़ी’ वाली हालत है हम सबकी.

अभी कल ही कुछ दोस्त सदी के महानायक की चर्चा कर रहे थे. किसी इण्टरव्यू में खुद उन्होंने बताया था कि उन्हें तनिक भी फुर्सत नहीं होती है. होगी भी कहां से? क्या-क्या नहीं करते हैं वे! फिल्में, टीवी, विज्ञापन और भी न जाने क्या-क्या! सीमेण्ट से लगाकर तेल और पेन बाम तक सब कुछ तो बेचते हैं वे. गुजरात भी. एक मित्र दुःखी होकर बोल पड़े, आखिर क्या करेंगे वे इतने पैसों का? हां, इन कामों में से ज़्यादातर तो वे पैसों के लिए ही करते हैं! अपनी अनेक बीमारियों और बढ़ती उम्र के बावज़ूद वे इतना कर लेते हैं, इस बात  की तारीफ की जाए या इसके लिए उनसे सहानुभूति व्यक्त की जाए?
  
उधर ये बातें हो रही थीं और इधर मेरे मन के पर्दे पर रूसी कथाकार टॉल्स्टाय की प्रसिद्ध  कहानी ‘एक व्यक्ति को कितनी ज़मीन चाहिए’ चल रही थी  जिसका भावानुवाद हमारे अपने जैनेन्द्र कुमार ने कितनी ज़मीन शीर्षक से किया था. इस कहानी का नायक पोखम नामक एक किसान है. एक रात वह सपना देखता है कि उसके राज्य में मुनादी हो रही है कि जो भी बिना श्रम किए धनी होना चाहता है, वह कल सबेरे मैदान में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा सकता है.  दो तीन बहुत आसान शर्ते हैं.  प्रतियोगी सूर्योदय के पहले प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाए. सूर्य निकलते ही  उसे दौडऩा प्रारंभ करना होगा.  दिनभर दौड़कर वह जितनी जमीन को घेर लेगा, वह उसकी अपनी हो जाएगी, लेकिन सूर्यास्त के समय  उसे ठीक उसी स्थल तक पहुंचना होगा, जहां से उसने दौड़ प्रारंभ की थी. पोखम दौड़ता चला जाता है. पचास-साठ मील ज़मीन नाप लेता है लेकिन सूर्य के डूबते-डूबते जैसे ही वह लौट कर दौड़ शुरु होने वाली जगह पहुंचता है, उसकी सांसें थम जाती है. “किस्मत की खूबी देखिए टूटी कहां कमन्द दो-चार हाथ जबके लबे-बाम रह गया” से भी बुरी स्थिति. जितनी ज़मीन उसने नापी थी, वो सब अब उसके लिए बेमानी हो जाती है. उसके भाईबंद और पड़ोसी उसे दफनाने के लिए वहीं साढ़े तीन हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा एक गड्ढा खोदते हैं. उसे बस उतनी-सी ही ज़मीन की तो ज़रूरत थी!

सदी के महानायक तो खैर फिर भी मेहनत करते हैं और कमाते हैं, अपने चारों तरफ हम ऐसे ऐसे महापुरुषों  को देखते या उनके बारे में पढ़ते सुनते हैं जो तमाम ग़ैर कानूनी तरीकों से पैसा बटोरने में लगे हैं और जिनकी धन-लिप्सा का कोई ओर छोर नहीं है.  मैं अक्सर सोचता हूं कि वे इस धन का करेंगे क्या? क्या उन्हें कभी इसका आनंद लेने की फुर्सत भी मिलेगी या कि वे भी एक दिन  उस अभागे पोखम की तरह..... 
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चीयर्स!


सामाजिक मीडिया हमारे समय की एक नई प्रवृत्ति है. पहले लोग  प्रत्यक्ष मिला करते थे, अब वर्चुअल स्पेस में मिलते हैं. पहले हमें अपने सामाजिक वृत्त (सोशल सर्कल) पर गर्व होता था, अब हम इस बात पर गर्व करते हैं कि फेसबुक पर हमारे इतने दोस्त हैं और हमारी किसी टीप को इतने लाइक्स मिले हैं. कई लोग इस बदलाव पर बहुत दुःखी होते हैं – क्या से क्या हो गया!  लेकिन  मुझे इस बदलाव का कोई मलाल नहीं है. भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में, फैलते जा रहे शहरों में, ट्रैफिक की मारा-मारी में, भला पहले की तरह का मेल-मिलाप कैसे मुमकिन है? और अगर वो मुमकिन नहीं है तो उसका जैसा भी विकल्प है, उसका स्वागत क्यों न किया जाए! मुझे तो अच्छा लगता है जब मेरे जन्म दिन पर सौ दौ सौ चार सौ ‘मित्र’ मुझे मुबारक़बाद  देते हैं! जिन लोगों से मैं कभी भी नहीं मिला हूं, और शायद कभी मिलूंगा भी नहीं, वे अगर मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी खुशी में इज़ाफा करने के लिए चन्द लमहे निकालते हैं तो मुझे खुश क्यों नहीं होना चाहिए? जब हालात तेज़ी से बदलते जा रहे हैं तब हम भी अपने तौर-तरीके क्यों ना बदलें! अंतत: दोस्तों, सारी बात आपके नज़रिये की है. आप चाहें तो गिलास को आधा खाली मान कर टसुए बहा लें और चाहें तो उसे आधा भरा हुआ मान कर सेलिब्रेट कर लें!  


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम इधर उधर के अंतर्गत 15 अक्टोबर 2013  को प्रकाशित किंचित संक्षिप्तिकृत टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Thursday, October 10, 2013

इधर-उधर : 1



भाभीजी – आप तो ऐसी न थीं!

भारतीय समाज में कुछ रिश्ते हंसी-मज़ाक और छेड़छाड़ के लिए भी जाने जाते हैं. जैसे देवर-भाभी का रिश्ता, या जीजा-साली का रिश्ता. कहना अनावश्यक है कि इन रिश्तों में शरारत का जो तत्व मुमकिन रहा है उसकी भी अपनी मर्यादाएं रही हैं. सब कुछ इस तरह से मुमकिन रहा कि रिश्तों की शुचिता पर कोई आंच  न आए. लेकिन बदलते वक़्त का आप क्या करेंगे? पिछले कुछ समय से एक भाभी विशेष की हमारे यहां बड़ी चर्चा रही है. और चर्चा भी कुछ ऐसी कि सरकार को उस पर रोक लगाने को भी मज़बूर होना पड़ा. जी हां, मेरा इशारा उन्हीं तीन अक्षरों के नाम वाली भाभीजी की तरफ है. नाम  इसलिए नहीं ले रहा हूं कि अगर संयोग से किन्हीं भाभीजी का भी नाम वही हो तो उन्हें बेवजह शर्मिन्दा न होना पड़े. इधर हाल ही में वे ही भाभीजी फिर से चर्चा में हैं. चर्चा की वजह यह है कि उन भाभीजी के कार्टून किरदार के रचयिता को अब अपने कार्टून के लिए मॉडल के रूप में एक सचमुच की अदाकारा मिल गई हैं, और वे इस बात को छिपा भी नहीं रही हैं कि अब उन भाभीजी के रूप में उनका ही चेहरा-मोहरा इस्तेमाल किया जाएगा. बल्कि  छिपाना तो दूर, वे तो आह्लादित हैं कि अब अनगिनत युवा अपनी फैंटेसियों में उन्हें शुमार कर सकेंगे. क्या इसे हमारे समाज में विकसित हो रही नई नैतिकता के रूप में देखा जाना चाहिए? कुछ समय पहले तक जिस बात से लोगों को लज्जा का अनुभव होता था, अब नहीं होता है. वैसे तो कला जगत में, और विशेष रूप से साहित्य और फिल्मों में यह बदलाव काफी पहले से नज़र आने लगा था! साहित्य के घनघोर पाठकों को  कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’  ज़रूर याद होगी जो पूरी ठसक और धौंस के साथ अपने शरीर और मन की चाह की बात बहुत बिन्दास शब्दावली में करती है. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि यह 1967 की रचना है. कृष्णा सोबती की यह चारित्रिक सृष्टि मित्रो अपने पति सरदारी लाल से सम्पूर्ण शारीरिक सुख न मिलने पर सिर्फ  कुढ़ती ही नहीं, अपनी कुढ़न को सास और देवरानी के सामने खुलकर व्यक्त भी करती है और पति की ग़ैर हाज़री में उसके दोस्त प्यारो से नैन मटक्का भी कर लेती है. ‘इस देह  से जितना जस-रस ले लो वही खट्टी कमाई है’ कहने वाली मित्रो जब बच्चा न होने के बारे में अपनी सास और जेठानी से ताने सुनती है पलटकर कह देती है कि तुम्हारे लाल में ही दमखम नहीं है तो मैं क्या करूं? वह तो यह सवाल तक उठा लेती है कि ‘अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो पाप!’ इस बिन्दास मित्रो के अलावा  साहित्य में भाभियां तो इतनी  मिल जाती हैं कि उनके लिए अलग से भाभीवाद नामक एक बाड़ा ही बनाया जा चुका है.  फिल्मों में तो नैतिकता के स्थापित मानों को ध्वस्त करने और नई नैतिकता गढ़ने के इतने प्रसंग मिल जाएंगे कि उनके लिए एक कॉलम तो क्या एक पोथा भी कम होगा.  लेकिन फिर भी यह कहना ज़रूरी है  कि इस अभिनेत्री द्वारा ‘उन’ भाभीजी के रूप में अपनी आकृति के इस्तेमाल की इस घोषणा को एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए जिसके शायद दूरगामी परिणाम हों!


कम्प्यूटर पर पाटा संस्कृति का पुनर्जन्म 


पहले घरों के बाहर चबूतरे हुआ करते थे जहां शाम ढले दिन-भर के कामकाज से मुक्त हो बुज़ुर्ग लोग दिन भर के घटनाक्रम की जुगाली किया करते थे. बीकानेर में तो एक अलग पाटा संस्कृति ही विकसित हो गई थी. लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदला है. चबूतरे और पाटे अब अपनी रौनक खो चुके हैं. अलबत्ता मॉर्निंग वॉक के नाम पर सुबह-सुबह पार्कों वगैरह  में मिलने वाले लोग घूमते-फिरते वही काम किसी सीमा तक कर लेते हैं. लेकिन इधर मार्क जुगकरबर्ग जी की कृपा से दुनिया भर के उन लोगों को जो कम्प्यूटर से परहेज़ नहीं बरतते हैं, एक नई पाटा संस्कृति सुलभ हो गई है. जी हां. मेरा इशारा फेसबुक की तरफ ही है. यहां लोग खुलकर अपनी कहते हैं और दूसरों की सुनते - मेरा  मतलब पढ़ते  हैं. अपना दिल टूटने से लगाकर नमो-ममो तक के हाल-चाल और उस हाल-चाल पर हर तरह की टीका-टिप्पणी का रस यहां लिया जा सकता है. कुछ लोग इस सार्वजनिक मंच पर आकर अपने गन्दे पोतड़े (डर्टी लिनेन!) धोते हैं तो कुछ इसे आत्म प्रचार का सर्वश्रेष्ट माध्यम मानकर इसका भरपूर इस्तेमाल कर दूसरों को हलकान किए रहते हैं.  फेसबुक का सबसे मज़ेदार फीचर है टैग करना! टैग करना बोले तो अपने हाथों में आपका चेहरा पकड़ कर उसे अपनी तरफ घुमा कर कहना, ज़रा सुनिए तो! किसी ने कोई कविता लिखी और कर दिया चालीस-पचास साहित्य रसिकों को टैग! किसी को किसी बाबा की कोई बात पसन्द आई तो सौ सवा सौ लोगों तक उस बात को पहुंचाना अपना पुनीत कर्तव्य और अधिकार मान बैठे. यह मर्ज़ एक महामारी का रोग ले चुका है. हमारे शहर के ही एक कवि-कथाकार-पत्रकार  मित्र तो इस रोग से इस हद तक पीड़ित हुए कि उन्होंने बाकायदा घोषणा करके टैग करने का अपराध करने वालों को अनफ्रैण्ड करने की हिंसक कार्यवाही तक कर डाली. फेसबुक की दुनिया में अगर कोई किसी को अनफ्रैण्ड करता है इस बात का बहुत बुरा माना जाता है. अनफ्रैण्ड करना एक तरह से जाति बहिष्कार का ही नया संस्करण है. अब किसी का पुनर्जन्म होगा तो इतना बदलाव तो होगा ही!



जयपुर से प्रकाशित अपराह्न-दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'इधर-उधर' में 09 अक्टोबर 2013 को किंचित संक्षिप्त रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Saturday, December 10, 2011

सरकार अपना बचकाना इरादा छोड़े

भारत के टेलीकॉम और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल इन दिनों अनगिनत आलोचनाओं और उपहासों के पात्र बन रहे हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कोई छह सप्ताह पहले उन्होंने कुछ सोशल मीडिया साइट्स के एक्ज़ीक्यूटिव्स के साथ मुलाकात करके उन्हें आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश दिया. अब सिब्बल ने यह भी कहा है कि उन्हें देश के लोगों की भावनाओं का खयाल है और अगर सोशल नेटवर्क सरकार के अनुरोध पर ध्यान नहीं देंगे तो सरकार उनके खिलाफ कदम उठाने पर विचार कर सकती है. ज़ाहिर है कि इन माध्यमों का प्रयोग करने वाले करीब बीस करोड़ लोगों में से अधिकांश ने और अन्यों ने भी सिब्बल के इस कदम को बुरी तरह नापसन्द किया है.

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का उपयोग करने वाले इन माध्यमों की आज़ादी और त्वरिततता के कायल हैं और वे अपनी बात कहने या दूसरों की बात पर अपनी प्रतिक्रिया -चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल– देने के लिए खुल कर इन माध्यमों यथा फेसबुक, ट्विट्टर, यू ट्यूब वगैरह का निर्बाध उपयोग कर रहे हैं और करते रहना चाहते हैं. यह बहुत स्वाभाविक है कि इन माध्यमों पर सरकार की और उसके कामों की खुलकर आलोचना होती है. इतनी खुलकर कि मुद्रण माध्यमों में तो उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि आलोचना केवल पक्ष की ही होती है. बख्शा प्रतिपक्ष को भी नहीं जाता है. इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं नरेन्द्र मोदी. इन माध्यमों पर बात केवल राजनीति पर ही नहीं होती है. जीवन के तमाम पक्षों पर खुली और बेबाक बातचीत यहां होती है. कभी-कभी तो यह बातचीत ज़्यादा ही खुली हो जाती है, लेकिन इस अनियंत्रित बेबाकी की आलोचना भी इन्हीं माध्यमों पर होती है.

कपिल सिब्बल ने कहा है कि इन मंचों पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली सामग्री से वे चिंतित हैं. एक मंत्री के नाते उनका यह दायित्व समझ में आता है कि उन्हें अगर कहीं ऐसा कुछ नज़र आए जो देश की कानून व्यवस्था को आहत करने वाला हो तो वे उसके बारे में फिक्रमंद हों. लेकिन क्या बात वाकई यही है? या यह भी है कि पिछले कुछ समय से इन माध्यमों पर सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता नज़र आ रहा है और वे इससे चिंतित हैं. ऊपर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की जिस रिपोर्ट का हवाला दिया है उसमें तो यह भी कहा गया है कि सिब्बल ने फेसबुक के अधिकारियों को एक ऐसा पृष्ठ दिखाया था जिसमें श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में कुछ अप्रिय था. कॉग्रेस की जो कल्चर है उसमें यह बात तुरंत स्वीकार्य लगती है. सत्तारूढ़ दल भला देश के इस अति विशिष्ट परिवार के बारे में कुछ भी अप्रिय कैसे सहन कर सकता है? और अगर उस अप्रिय के बहाने इस दल के किन्हीं सदस्यों को परिवार के प्रति अपनी वफादारी प्रदर्शित करने का मौका मिलता है तो भला वे इस मौके को हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं?

लेकिन आम जनता को तो इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है. हमें तो अपनी आज़ादी प्यारी है. हम तो खुलकर अपनी बात कहना चाहते हैं! हम क्यों किसी को इस आज़ादी को छीनने की छूट दें? कपिल सिब्बल और सरकार के इरादों के तीव्र विरोध के पीछे यही बात है.

अगर इस विरोध की बात को थोड़ी देर के लिए अलग रखें तो सरकार के इस इरादे की हास्यास्पदता भी सामने आए बगैर नहीं रहती है. आप मुद्रित शब्द को तो जैसे-तैसे सेंसर कर सकते हैं, हालांकि वो भी इतना आसान नहीं होगा, इन नए माध्यमों को आप कैसे सेंसर करेंगे? यू ट्यूब पर हर रोज़ करीब 25 करोड़ तस्वीरें अपलोड होती हैं. माना जाता है कि भारत में 8 करोड़ लोग फेसबुक और ट्विट्टर का इस्तेमाल करते हैं. क्या कर लेंगे आप इन सबका? ज़्यादा से ज्यादा यही करेंगे ना कि अगर आपके ध्यान में ऐसा कुछ आया जो आपको पसंद नहीं है तो इन कम्पनियों से उसे हटाने का अनुरोध करेंगे. वैसे में, एक तो यह ज़रूरी नहीं कि आपका अनुरोध मान ही लिया जाए, और दूसरे यह कि उस तरह की सामग्री को आप एक जगह से हटवा भी देंगे तो वो चार और जगहों पर चस्पां हो जाएगी. यानि कुल मिलाकर आप अपनी खिसियाहट ज़ाहिर करने से ज़्यादा कुछ खास नहीं कर सकेंगे. मैं तो चाहूंगा कि हमारी सरकार अपना यह बचकाना इरादा छोड़ दे और जनता को अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुलकर इस्तेमाल करने दे. एक स्वस्थ और विकासशील प्रजातंत्र में यही अपेक्षित है. अगर वाकई कहीं कुछ अवांछनीय आता भी है तो इन माध्यमों पर नियंत्रण करके अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को बाधित करने की कोशिश करने की बजाय उसे नज़रन्दाज़ करना बेहतर होगा. और, अगर सरकार को कुछ कहना है तो वो भी इन मंचों का इस्तेमाल करे. इससे शायद उसकी विश्वसनीयता में भी कुछ वृद्धि होगी.

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जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ में दिनांक 10 दिसम्बर 2011 को प्रकाशित टिप्पणी.

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Sunday, July 26, 2009

आने वाला समय मुफ़्त का है


2006 की बेस्ट सेलर द लोंग टैल के लेखक, वायर्ड पत्रिका के सम्पादक क्रिस एंडरसन की स्थापना है कि हमारी अर्थव्यवस्था की नियति है मुफ़्त, यानि फ्री. अपनी सद्य प्रकाशित किताब फ्री: द फ्यूचर ऑफ अ रेडिकल प्राइस के शुरू में ही वे लिखते हैं कि देर-सबेर हर कंपनी को किसी न किसी तरह यह देखना पड़ेगा कि वह अपने व्यापार के विस्तार के लिए फ्री का प्रयोग कैसे करे, या कैसे फ्री से प्रतिस्पर्धा करे. यह बात वे मुख्यत: डिजिटल अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में करते हैं, लेकिन समझा जा सकता है कि अंतत: इससे शेष अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहने वाली है.

डिजिटल दुनिया में आज बहुत कुछ मुफ़्त में उपलब्ध है. आप मुफ्त में अपना ई मेल खाता बनाते हैं, आप मुफ्त में फेस बुक, यू ट्यूब वगैरह का इस्तेमाल करते हैं. टेलीविज़न तो आप बहुत पहले से मुफ्त में देख ही रहे थे. एंडरसन इसे इस तरह समझाते हैं. वे कहते हैं कि तकनीक निरंतर सस्ती होती जा रही है. 1961 में जहां एक ट्रांज़िस्टर की कीमत दस डॉलर थी, आज इंटेल आपको दो बिलियन ट्रांज़िस्टर सिर्फ़ 1100 डॉलर में दे रहा है, यानि एक ट्रांज़िस्टर का मूल्य आज घट कर सिर्फ .000055 सेंट रह गया है. इसी तरह आज एक घण्टे का वीडियो कार्यक्रम एक व्यक्ति तक पहुंचाने का खर्च मात्र 0.25 डॉलर है और अगले साल तक यह घट कर 0.15 डॉलर ही रह जायेगा. कीमतों के घटने की परिणति मांग के बहुत ज़्यादा बढने में होती है और इस मुफ्त से अभाव की जगह इफरात का दौर शुरू होता है. लेकिन, यहीं से एंडरसन एक खास बात कहते हैं. वे कहते हैं कि उपभोक्ता के लिहाज़ से सस्ते और मुफ्त में बड़ा फर्क़ है. बहुत सारे उदाहरणों से वे साफ करते हैं कि कोई चीज़ चाहे कितनी ही सस्ती क्यों ना हो, वह उतने लोगों को आकृष्ट नहीं करती जितनी कोई मुफ्त चीज़ करती है. क्यों?

एंडरसन समझाते हैं कि हम सब मानसिक रूप से आलसी हैं और यही बात मुफ्त को प्रोत्साहित करती है. जब आपको किसी वस्तु का मूल्य चुकाना होता है, चाहे वह एक पैसा ही क्यों ना हो, आप सोचते हैं कि कहीं यह क़ीमत अधिक तो नहीं है. जब कोई चीज़ मुफ्त में मिलती है तो आपके दिमाग को सोचने की यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती और आप तुरंत उस चीज़ को ले लेने के लिए तैयार हो जाते हैं. दो प्रख्यात चाकलेटों के उदाहरण से वे इस बात को पुष्ट करते हैं. जब किसेज़ नाम की चॉकलेट 1 सेंट और ट्रफल्स नाम की चॉकलेट 15 सेंट में दी गई तो 75 प्रतिशत लोगों ने ट्रफल्स को चुना. इसके बाद एक और प्रयोग किया गया. दोनों की कीमत एक सेंट घटा दी गई. यानि किसेज़ मुफ्त में और ट्रफल्स 14 सेंट में दी गई. परिणाम चौंकाने वाले थे. 69 प्रतिशत ने किसेज़ को चुना. अब देखिए, कीमत का फर्क़ तो सिर्फ एक सेंट था, लेकिन पसंद बदल गई.

एंडरसन कहते हैं कि सारी दुनिया में पीढिगत दृष्टि से मूल्य को लेकर एक बड़ा परिवर्तन आ रहा है. 30 साल से कम उम्र के लोग अब सूचना के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना चाहते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह कहीं न कहीं तो मुफ़्त में मिल ही जायेगी. विचारों से निर्मित उत्पाद प्राय: मुफ्त उपलब्ध होने लगे हैं. मज़े की बात यह है कि यह मुफ़्त भी चिंताजनक नहीं है. चीन में जितने संगीत का उपभोग होता है, उसका 95% पाइरेसी से होता है. लेकिन कलाकार फिर भी खुश हैं. उन्हें प्रचार मिलता है और इससे उनके कंसर्ट और दूसरी आय में इज़ाफा होता है.

एंडरसन अपनी इस चर्चा को पत्रकारिता की दुनिया तक भी ले जाते हैं और भविष्यवाणी करते हैं बहुत जल्दी पत्रकारिता एक व्यवसाय के साथ-साथ शौक़ भी बन जाने वाली है. लोग आजीविका के लिए पत्रकारिता पर निर्भर नहीं रह पायेंगे. पत्रकारों को पेट भरने के लिए पढ़ाने या दूसरों से बेहतर लिखवाने के काम में लगना पड़ेगा. हम देख ही रहे हैं कि आज ब्लॉग़्ज़ के प्रचलन के साथ शौकिया पत्रकार व्यावसायिक पत्रकारों को कड़ी टक्कर देने लगे हैं और प्रकाशन की दुनिया पर भी भी पेशेवर लोगों का एकाधिकार नहीं रह गया है. पत्रकारों और प्रकाशकों के लिए चुनौतियां बढती जा रही है. लेकिन एंडरसन इसे पत्रकारों के लिए बुरा नहीं बताते. वे इसे उनकी मुक्ति का नाम देते हैं.

एंडरसन ने अपनी किताब का ढांचा कुल चार स्थापनाओं पर खड़ा किया है: तकनीकी(डिजिटल संरचना प्रभावी रूप से मुफ्त में उपलब्ध है), मनोवैज्ञानिक(हर उपभोक्ता मुफ्त में पाना पसंद करता है), प्रक्रियात्मक(मुफ्त के लिए आपके दिमाग को कोई तक़लीफ नहीं करनी पड़ती) और व्यावसायिक(मुफ्त की तकनीक और मनोवैज्ञानिक मुफ्त की परिणति भरपूर मुनाफे में होती है).

और अंत में यह और बताता चलूं कि एंडरसन की यह किताब इंटरनेट पर मुफ्त में पढ़ी जा सकती है.

Discussed book:
Free: The Future of a Radical Price
By Chris Anderson
Published by: Hyperion
288 pages, Hardcover
US $ 26.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 26 जुलाई, 2009 को प्रकाशित.








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