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Wednesday, March 30, 2022

 

नए माध्यमों पर हमारी उपस्थिति 

सन 2005 में आई और बाद में बहुत चर्चा में रही अपनी किताब द वर्ल्ड इज़ फ्लैट: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ द ट्वंटी फर्स्ट  सेंचुरी में थॉमस एल. फ्रीडमैन ने दुनिया की शक्ल बदलने वाले तीन नवाचारों की चर्चा की है: 1.पर्सनल कंप्यूटर , जिसने हमें डिजिटल कण्टेण्ट का सर्जक बनाया, 2. इण्टरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब (www) जिसने हमें यह सुविधा दी कि हम अपनी विषय वस्तु को पूरी दुनिया में निशुल्क कहीं भी ले जा सकते हैंऔर 3. नब्बे के दशक में हुई सॉफ्टवेयर क्रांति जिसने सारे कम्प्यूटरों को एक-रूप किया. फ्रीडमैन की इस किताब के आने के बाद दुनिया में बदलाव की गति बहुत ज़्यादा तेज़ रही है, और इसी तेज़ गति के कारण अब कंप्यूटर  और इण्टरनेट हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं.  लम्बे समय तक यह माना जाता रहा कि कंप्यूटर  का  प्रयोग करने और उस पर काम करने के लिए अंग्रेज़ी आना ज़रूरी है, और एक हद तक यह बात सही भी थी. लेकिन अहिस्ता-आहिस्ता यह बाधा भी दूर हो गई और आज स्थिति यह है कि कंप्यूटर पर हिंदी में भी सब कुछ किया जा सकता है. इस स्थिति को लाने में विभिन्न कंप्यूटर  सॉफ्ट्वेयर कम्पनियों की बहुत बड़ी भूमिका तो है ही, यूनीकोड को भी कम श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए. इनके कारण काम करना बहुत सुगम हो गया है.  यूनीकोड ने भाषा की दीवारें जैसे पूरी तरह ध्वस्त कर दी हैं.  बिना सम्बद्ध भाषा का फॉण्ट इन्स्टाल किये किसी भी कंप्यूटर पर (बशर्ते वह बहुत पुराना और धीमा न हो) किसी भी भाषा की सामग्री देखी-पढ़ी या लिखी-भेजी जा सकती है. निश्चय ही यह बात हिन्दी के लिए एक वरदान है. और हिन्दी जगत ने इसका लाभ भी भरपूर उठाया है.

 

हिंदी की दुनिया में बहुत लम्बे समय तक नई तकनीक को लेकर दुविधा का भाव रहा है. दुविधा पूरी तरह तो अब भी दूर नहीं हुई है, लेकिन निश्चय ही इसमें बहुत कमी आई है और नई तकनीक की स्वीकार्यता खूब बढ़ी है. न केवल युवा और युवतर लोग इस तकनीक को अपना चुके हैं वयोवृद्ध लोग भी अब इससे अपनी दूरी कम करने में जुटे हैं. बेशक नई तकनीक को लेकर अब अन्य अनेक प्रकार की शंकाएं-आशंकाएं सामने आ रही हैं और उन पर गम्भीर विमर्श भी ज़ारी है, लेकिन वह अलग मुद्दा है. मूल बात तो यहां यह है कि हमारे हिंदी समाज ने इस तकनीक को अब बहुत अच्छी तरह अपना बना लिया है. यह कहते हुए मुझे अनायास ही इस शताब्दी के पहले दशक  के वे दिन याद आते हैं जब मैंने जयपुर से अपनी एक मित्र अंजली सहाय के साथ मिलकर एक बेब पत्रिका - इंद्रधनुष इण्डिया शुरू की थी. मैं इस पत्रिका के लिए जब अपने लेखक मित्रों से रचनात्मक सहयोग मांगता  था तो उनमें से बहुत  ही कम मित्र उत्साहित होते थे. उस समय जिन लोगों ने मुझे सहयोग दिया वह सहयोग उनसे मेरे आत्मीय रिश्तों के कारण ही मिल सका था. अधिकांश साथी हस्तलिखित या टंकित रचनाएं देते और हम उन्हें फिर से टाइप करवा के अपनी पत्रिका में प्रकाशित करते. यह काम ख़ासा असुविधाजनक और श्रमसाध्य था, लेकिन हमने किया. जब मैं अपने किसी मित्र को यह सूचना देता कि इंद्रधनुष इण्डिया में उनकी रचना प्रकाशित हो गई है तो उनमें से करीब-करीब सभी का आग्रह यह होता कि मैं उनकी प्रकाशित रचना का प्रिण्ट आउट उन्हें भेजूं, और मैंने ऐसा किया भी. बहुत कम रचनाकार साथी थे जो खुद कंप्यूटर  खोलकर पत्रिका में अपनी रचना देखने के लिए प्रेरित या उत्साहित होते. हमने  कोई छह सात बरस इस पत्रिका को चलाया, और आज इस बात पर गर्व भी होता है कि हमारी यह पत्रिका राजस्थान से निकलने वाली पहली ई पत्रिका थी. बाद में कुछ व्यावहारिक दिक्कतों के कारण इसका प्रकाशन अवरुद्ध हुआ. जब वे दिक्कतें दूर हुईं तब तक हिंदी में इतनी ज़्यादा वेब पत्रिकाएं आ चुकी थीं कि एक और पत्रिका निकालना हमें ग़ैर ज़रूरी लगा. 

 

आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो पाता हूं कि राजस्थान में भी हिंदी साहित्य के संदर्भ में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का चलन खूब बढ़ा है और इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है.  वृहत्तर हिंदी क्षेत्र में तो बहुत ज़्यादा काम हुआ ही है और हर रोज़ उसमें नई चीज़ें जुड़ रही हैं. मेरी इंद्रधनुष  इण्डिया के अलावा मुझे सबसे पहले नाम याद आता है हिंदी नेस्ट का. इसका संचालन मनीषा कुलश्रेष्ठ करती हैं. यह हिंदी के  शुरुआती ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में से है, हालांकि तब मनीषा जी राजस्थान से बाहर रहती थीं. हिंदी नेस्ट ने इण्टरनेट पर हिंदी को विस्तार देने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है. खुशी की बात यह है कि अब राजस्थान लौट आने के बाद मनीषा जी ने इस प्लेटफॉर्म को एक नया आकार और नई पहचान दी है. हिंदी नेस्ट के अलावा, आश्चर्य की बात है कि चित्तौड़गढ़ जैसी बहुत छोटी जगह से एक उत्साही युवा माणक सोनी ने बहुत लम्बे समय तक अपनी माटी नाम से एक  वेब पत्रिका निकाली और इसमें विविध प्रकार की सामग्री प्रकाशित की. बाद के दिनों में  जयपुर से कथाकार रमेश खत्री ने साहित्य दर्शन नाम से काफी समय तक वेब पत्रिका निकाली. इधर  हमारी बहुत सारी पत्रिकाएं विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही हैं. इनमें से अग्रणी है राजस्थान मूल के युवा आलोचक पल्लव संपादित बनास जन, जिसके करीब-करीब सारे अंक नॉट नल  पर  उपलब्ध हैं. मुझे आश्चर्य और क्षोभ इस बात का है कि हमारे यहां की पत्रिकाओं के अधिकांश संपादक अपनी पत्रिकाओं को ऑनलाइन सुलभ कराने के मामले में उदासीन, बल्कि इसके लिए अनिच्छुक हैं.  मेरा तो मानना है कि अगर कोई पत्रिका आपने भौतिक रूप के साथ-साथ ऑनलाइन भी उपलब्ध होती है तो उसका प्रसार बढ़ता ही है. इस मामले में मैं मधुमती  की विशेष रूप से सराहना करना चाहता हूं जिसका हर अंक राजस्थान  साहित्य अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध रहता है और दुनिया भर में कहीं से कोई भी उसे पढ़ सकता है. मैं यह सपना देखता हूं कि हमारे प्रांत से जितनी भी सहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं वे ऑनलाइन भी उपलब्ध  हों. 

 

यह लेख तैयार करने के सिलसिले में, बिना इस बात का विस्तृत उल्लेख किए जब फ़ेसबुक पर एक पोस्ट लगा कर यह जानने का प्रयास किया कि साहित्यिक दुनिया के हमारे कौन कौन साथी इण्टरनेट के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं, तो मुझे इतने ज़्यादा उत्तर मिले कि मैं स्वयं चकित रह गया. मैं यह भी जानता हूं कि जितने साथियों के बारे में मुझे सूचना मिली उनसे बहुत अधिक इस आभासी दुनिया में सक्रिय हैं. लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि अधिकांश साथियों की सक्रियता फ़ेसबुक पर अपनी रचनाएं पोस्ट करने या बहुत हुआ तो औरों की रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएं देने तक सीमित है. जब हम इससे आगे की स्थिति की पड़ताल करते हैं तो पाते हैं कि इण्टरनेट के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर हमारी सक्रियता बहुत ज़्यादा नहीं है. इनमें से बहुत थोड़े ही हैं जो अन्यत्र भी खूब सक्रिय हैं. और यह बात तब है जब हिंदी में इण्टरनेट के तीन बड़े पुरोधा राजस्थान से ही हैं. यशवंत व्यास और पवन झा उस समय से इण्टरनेट पर सक्रिय  हैं जब हममें से अधिकांश के लिए यह दुनिया अनजानी थी. इन्हीं के साथ एक और नाम लेना ज़रूरी है. वे हैं बालेंदु शर्मा दाधीच. इन्होंने हालांकि साहित्यिक काम बहुत कम किया है, कंप्यूटर  और इंटरनेट पर हिंदी को सक्षम करने में इनकी भूमिका बहुत बड़ी है और अब भी ये इसी काम में जी-जान से जुटे हैं. हाल के वर्षों में गिरिराज किराड़ू ने भी हिंदी साहित्य को विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर, विशेष रूप से स्टोरी टेल के माध्यम सेलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. इनके साथ-साथ पीयूष दइया के अवदान को भी स्मरण किया जाना ज़रूरी है जो समग्र हिंदी साहित्य  को  अपने प्लेटफॉर्म हिंदवी  पर लाने के काम में लगे हुए हैं. इधर राजस्थान मूल के प्रवासी साहित्य सेवी अनूप भार्गव एक बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजना का संचालन कर रहे हैं. इस योजना का नाम है हिंदी से प्यार है’. अभी इस योजना के तहत साहित्यकार तिथिवारनाम  से एक परियोजना चल रही है जिसमें हर रोज़ उस दिन जिस साहित्यकार का जन्म दिन होता है उस पर एक सुविचारित आलेख पोस्ट किया जाता है. मेरे यह लेख लिखने तक इस योजना में लगभग एक सौ लेख पोस्ट किए  जा चुके हैं. अनूप भार्गव जी अब इसी योजना के तहत  दूसरा उपक्रम शुरू करने की तैयारी में हैं  जिसका शीर्षक है सौ कालजयी पुस्तकें. इस उपक्रम में हिंदी की सार्वकालिक एक सौ कालजयी कृतियों का चयन कर उनमें से हरेक  पर लगभग पंद्रह मिनिट की अवधि के वीडियो तैयार करके साझा किए जाएंगे. ख़ास बात यह है कि हिंदी से प्यार है की यह सारी योजना पूर्णत: अव्यावसायिक आधार पर संचालित की जा रही है और दुनिया भर  में फैले हिंदी साहित्य प्रेमी इसमें सहयोग कर रहे हैं.

 

राजस्थान के हमारे बहुत सारे मित्रों ने अपने यू ट्यूब चैनल चला रखे हैं जिन पर वे लगातार नई सामग्री अपलोड करके हम तक पहुंचाते रहते हैं. व्यंग्यकार संपत सरल, व्यंग्यकार अनुराग वाजपेयी, गीतकार बनज कुमार बनज, कहानीकार योगेश कानवा के यू ट्यूब चैनल खूब देखे जाते हैं. हिमांशु पण्ड्या के विद्यार्थियों के लिए दिए हुए लेक्चर्स ग़ैर विद्यार्थियों में भी बहुत लोकप्रिय हैं. राजस्थान के कॉलेज शिक्षा विभाग ने एक अलग मंच बनाकर अपने प्राध्यापकों के जो लेक्चर्स अपलोड किये हैं उनमें साहित्य विषयक लेक्चर खूब हैं. मेरा भी एक यू ट्यूब चैनल है. हाल में बोधि स्टूडियो के बैनर तले 'कुछ क़िस्से कुछ कहानियां' नाम  से एक आकर्षक कार्यक्रम शुरू किया गया है. व्यंग्यकार संपत सरल ने अपने व्यंग्य  और गीतकार दिनेश सिंदल ने अपनी कविताओं के पाठ की सीडी भी निकाल रखी है. कभी लोक कला मर्मज्ञ विजय वर्मा जी ने भी अपने  लिखे गीतों की एक सीडी  निकाली थी. निश्चय ही इसी तरह के काम अन्य कई मित्रों ने भी किए होंगे. इधर नई तकनीक के रूप में ऑडियो बुक्स का चलन बढ़ रहा है और हमारे कई युवा रचनाकार इस क्षेत्र में भी सक्रिय हैं. इरा टाक की ऑडियो बुक्स बहुत लोकप्रिय हुई हैं. इरा टाक एक साथ बहुत सारे प्लेट्फॉर्म्स पर सक्रिय हैं. उनकी रचनाओं की ई बुक्स भी खूब पढ़ी गई हैं. मातृ भारती डॉट कॉम और प्रतिलिपि डॉट कॉम पर हमारे प्रांत के बहुत सारे कथाकारों की रचनाएं नियमित रूप से अपलोड होती हैं और खूब पढ़ी जाती हैं. इस संदर्भ में बहुत रोचक और सराहनीय बात यह है कि युवा कथाकारों के साथ-साथ यशवंत कोठारी और एस भाग्यम  शर्मा जैसे बड़ी उम्र वाले  कथाकार भी इन  माध्यमों का जमकर उपयोग कर रहे हैं. नॉट नल, स्टोरी टेल, बिंज हिंदी, रेख़्ता और हिंदवी पर हमारे प्रांत के अनेक रचनाकारों का सृजन अपनी उपस्थिति अंकित करवा चुका है और ऐसे रचनाकारों की संख्या निरंतर बढ़ती  जा रही है. हमारी नई पीढ़ी के अनेक रचनाकार इन विभिन्न प्लेटफॉर्म्स का सूझबूझ पूर्ण प्रयोग कर अपने लेखन को बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाने की दिशा में भी सक्रिय हैं. इनमें कथाकार नवीन चौधरी का नाम मैं ख़ास तौर पर लेना चाहता हूं. वे इन माध्यमों का बहुत  सर्जनात्मक उपयोग अपनी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए भी करते हैं. 

 

अशोक आत्रेय और हेमंत शेष जैसे रचनाकार शब्दों के अलावा रंगों और रेखाओं के साथ इन माध्यमों को उत्साहपूर्वक बरत और समृद्ध कर रहे हैं. प्रांत के कई रचनाकारों ने अपनी वेबसाइट्स भी बनवा रखी है जहां वे नियमित रूप से अपने बारे में जानकारियां और अपने सृजन की बानगियां साझा करते हैं. जयपुर की एक कम्पनी मार्क माय बुक इस दिशा में बहुत बढ़िया काम कर रही है. राजस्थान साहित्य अकादमी की अपनी वेबसाइट है और इसी तरह प्रभा खेतान फाउण्डेशन की विभिन्न  परियोजनाओं की न केवल वेबसाइट्स हैं, वे इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप आदि पर भी अपनी गतिविधियों की सूचनाएं नियमित रूप से देते हैं. राजस्थान मूल की किंतु अब केरल में रह रहीं रति सक्सेना कविता केंद्रित  अपनी संस्था कृत्या के कारण पूरी दुनिया में जानी जाती हैं और उनकी ऑनलाइन उपस्थिति प्रशंसनीय है. 

 

प्रांत की कई संस्थाओं ने कोरोना महामारी के समय में, जब हमारा घरों से बाहर निकलना बहुत सीमित हो गया था, वेबिनार्स के माध्यम  से साहित्यिक सक्रियता  बनाए रखी. राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ, जवाहर कला केंद्र जैसी सार्वजनिक संस्थाओं के साथ-साथ अनेक सीमित साधनों वाली संस्थाओं ने भी इस विकट समय में साहित्यिक आयोजनों के क्रम को बनाए रखा. राजस्थान के ही एक निजी यू ट्यूब चैनल क्रेडेण्ट टीवी ने डियर साहित्यकार नाम से एक साप्ताहिक शृंखला चला रखी है जिसमें हर सप्ताह किसी साहित्यकार से संवाद किया जाता है. इसी चैनल ने हाल में डियर साहित्यकार सम्मेलन का आयोजन कर एक नई पहल की है. यहां यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान की राजधानी में होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा निशुल्क साहित्य  उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी कोरोना के कारण आभासी अवतार में आने को विवश हुआ है. इस बार यह आयोजन वास्तविक और आभासी दोनों रूपों में होगा. 

 

ग़ौर तलब बात यह है कि आरम्भिक हिचकिचाहट के बाद अब हिंदी समुदाय ने कंप्यूटर  और इण्टरनेट को अपना लिया है और इसका बहुत अच्छी  तरह से उपयोग किया जा रहा है. कंप्यूटर  पर हिंदी में काम करना आसान हो जाने से और तकनीक के विकास से यह काम और ज़्यादा तेज़ हो गया  है. इधर आने वाले नए कंप्यूटर्स में बोलकर लिखने की सुविधा मिल जाने से ऐसे लोग भी इनका इस्तेमाल करने लगे हैं जिन्हें टाइप करने में असुविधा होती थी. यह सुविधा न केवल लैप टॉप वगैरह में सुलभ हो गई है, मोबाइल फोन तक में आ गई है. मोबाइल फोन और उसके बड़े भाई टैबलेट ने कहीं से भी अपना काम करना सम्भव बना दिया है और इस सुविधा का लाभ उठाते हुए हमारे कई लेखक मित्रों ने अपनी पूरी की पूरी किताब ही इन उपकरणों पर लिख डाली है. तकनीक और विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उसके उपयोग ने साहित्यिक वातावरण बनाने में भी बहुत बड़ी भूमिका निबाही है. यह आकस्मिक नहीं है कि कुछ बरस पहले राजस्थान निवासी  सुपरिचित कथाकार लक्ष्मी शर्मा ने सोशल मीडिया पर आई कविताओं का एक संकलन 'स्त्री होकर सवाल करती है' तैयार किया था. इस संकलन में अधिकांश रचनाकार ऐसी थीं जिन्होंने सोशल मीडिया पर ही लिखना शुरु किया था. उनमें से कई अब साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बना चुकी हैं.  सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स ने एक पूरी पीढ़ी को लेखन की तरफ उन्मुख किया है, यह बात विशेष रूप से रेखांकनीय है. इनमें से ज़्यादातर प्लेटफॉर्म्स पर कोई संपादन-चयन व्यवस्था नहीं है, इसलिए अभिव्यक्ति में प्रयोग भी खूब होते हैं और बहुत बार अपरिपक्व रचनाएं भी सामने आ जाती हैं. लेकिन यह सब विकास की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है. इस बात से दुखी नहीं होना चाहिए. 

 

मुझे यह देखकर  बहुत खुशी होती है कि अब पुरानी और नई पीढ़ी एक साथ विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर एक साथ सक्रिय है. उनमें परस्पर  संवाद भी होता है, और स्वाभाविक है कि विवाद भी होता है. इन प्लेटफॉर्म्स पर जो प्रकाशित हो रहा है उसकी एक सीमा यह है कि रचनाकारों का बहुलांश लाइक्स को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देने लग जाता है और बहुत बार लाइक्स की बड़ी संख्या को देखकर आत्म मुग्धता का शिकार भी हो जाता है. लाइक्स का मिलना रचना की गुणवत्ता से अधिक रचनाकार की सामाजिकता का परिणाम होता  है, लेकिन रचनाकारों का एक वर्ग  इस बात को समझने को तैयार नहीं है. यह ग़लत फहमी खुद उनके विकास के लिए हानिकारक है. एक और प्रवृत्ति इन प्लेटफॉर्म्स पर देखने को मिलती है, हालांकि सौभाग्य से यह बहुत अधिक व्यापक  नहीं है. प्रवृत्ति यह कि कुछ अत्यधिक उत्साही लोग दूसरों की रचना को कॉपी पेस्ट कर यह भ्रम पैदा करने लग गए हैं कि यह उन्हीं की रचना है. सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म की एक बहुत बड़ी सीमा यह है कि यह त्वरित माध्यम है, और यहां ठहरकर, सोच समझकर प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति बहुत सीमित है. यहां तो आपकी रचना सामने आते ही तुरंत उस पर सराहना भरी प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं. बहुत सारी प्रतिक्रियाएं तो शायद पढ़े बिना ही दे दी जाती हैं. रचना को पढ़कर उस पर सुविचारित प्रतिक्रिया देने का चलन इन माध्यमों पर बहुत कम है, और यह बात रचनाकार के हित में नहीं जाती है. 

 

कुल मिलाकर सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर राजस्थान के साहित्यकार पहले से काफी अधिक सक्रिय हैं और इनकी सक्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है. यह शुभ है. जैसे-जैसे तकनीक विकास के नए क्षितिजों की तरफ बढ़ रही है वैसे वैसे इस बढ़ी हुई सक्रियता का लाभ सर्जनात्मकता को मिल रहा है. ने केवल रचनाकारों की सर्जनात्मकता इससे लाभान्वित हो रही है, उनकी सर्जनात्मकता के गुण ग्राहक भी बढ़ रहे हैं और इस तरह एक ऐसा माहौल  तैयार होता जा रहा है जो साहित्यिक गतिविधियों के पल्लवन के लिए बहुत अनुकूल और उत्प्रेरक साबित होने वाला है. 

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राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका 'मधुमती' के मार्च, 2022 अंक में प्रकाशित. 

Tuesday, June 5, 2018

इस तरह दिया तमिलनाडु ने अपने साहित्य को संरक्षण


मार्च 1949 में दक्षिणी भारत के राज्य तमिलनाडु में एक विलक्षण काम हुआ. इस काम का सम्बंध साहित्य को राजकीय संरक्षण प्रदान करने से है. राज्य की तत्कालीन सरकार ने विख्यात दिवंगत कवि सुब्रह्मण्यम भारती के परिजनों (उनकी पत्नी, बेटियों और सौतेले भाई) में से प्रत्येक को पांच-पांच  हज़ार रुपये देकर इस महान रचनाकार की सभी रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त कर लिया. कदाचित पूरी दुनिया में यह पहला मौका था जब किसी राज्य सरकार ने किसी रचनाकार के सृजन का कॉपीराइट खरीद कर उसकी रचनाओं को सार्वजनिक रूप से सुलभ कराया हो. भारत में जो कॉपीराइट नियम चलन में हैं उनके अनुसार किसी लेखक की मृत्यु के साठ बरस बाद उसकी रचनाएं कॉपीराइट मुक्त हो जाती हैं. मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में सुब्रह्मण्यम भारती का निधन 1921 में हुआ था और इस तरह उनका सृजन जनवरी 1972 में कॉपीराइट मुक्त होता. लेकिन सरकार ने इससे बहुत  पहले ही उनकी रचनाओं को आम जन को सुलभ करा दिया. सरकार के इस प्रयास का सुपरिणाम यह है कि तमिलनाडु  में आज भी इस महाकवि की कविताओं का  लगभग पांच सौ पन्नों का संग्रह  सौ रुपये से भी कम में मिल जाता  है. तमिलनाडु में और अन्यत्र भी उनकी किताबों की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं और तमिल फिल्मों में उनके गीत खूब प्रयुक्त हुए हैं.

सुब्रह्मण्यम भारती के काव्य पर रोमाण्टिक कवियों का गहरा असर था और शायद यही वजह है कि उन्होंने अपना उपनाम विख्यात अंग्रेज़ी कवि शैली के नाम पर शैली दासन रखा था. भारती ने सभी तरह के शिल्प में काव्य सृजन किया – छंदबद्ध भी और छंद मुक्त भी. कविताओं के अलावा कहानियां भी उन्होंने लिखीं और पत्रकारी लेखन भी खूब किया. लेकिन इतना सब करने और उत्कृष्ट करने के बावज़ूद उन्हें गरीबी में ही जीवन बिताना पड़ा. उनके निधन के बाद उनकी निरक्षर पत्नी और दो बेटियों को भी अभावों से जूझना पड़ा, और इसी दौरान उनकी पत्नी ने मज़बूर होकर बहुत कम मूल्य पर महाकवि की रचनाएं उनके सौतेले भाई को बेच दी. वह समय ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स और फिल्मों के उत्थान का भी था. महाकवि के कुछ गीत खूब लोकप्रिय हो गए थे और यही देख एक बड़े फिल्म निर्माता ने उस भाई से कवि के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद लिया. अब हुआ यह कि उसी दौरान एक अन्य फिल्म निर्माता ने भारती का एक गीत अपनी फिल्म में इस्तेमाल कर लिया और इस पर उक्त खरीददार निर्माता ने उस पर कानूनी कार्यवाही कर दी. और यहीं से घटनाक्रम में एक ज़ोरदार  मोड़ आ गया. राज्य में इस मांग के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरु हो गया कि राज्य सरकार इस महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त करे. शायद साहित्य के इतिहास की यह अपने तरह की इकलौती घटना है. तमिल लेखक भी इस मांग के समर्थन में मुखर हुए कि भारती के सृजन को निजी स्वामित्व की कैद  से आज़ादी दिलाई जाए. लगभग पांच बरस की जद्दोजहद के बाद अंतत: 1949 में राज्य सरकार ने इस तमिल महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट खरीद कर उसे सार्वजनिक रूप से सुलभ कराने का अभूतपूर्व कदम उठाया. और इसके बाद तो तमिलनाडु में ऐसा होना आम ही हो गया. सुब्रह्मण्यम भारती की मृत्यु के चालीस बरस बाद उनके शिष्य-कवि भारती दासन के कृतित्व का कॉपीराइट भी तमिलनाडु सरकार ने खरीद लिया. इसी सरकार ने 1992 में तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुराई के कृतित्व का कॉपीराइट सत्तर लाख से भी ज़्यादा रुपयों में खरीदा. और उसके बाद से अब तक यह सरकार करीब सौ लेखकों के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद कर उस सृजन को सार्वजनिक रूप से सुलभ करा चुकी है.

मूलत: इस काम के पीछे लेखकों को आर्थिक मदद पहुंचाने का पवित्र भाव था. लेकिन जैसा सर्वत्र होता है, अब इसमें और बहुत सारी बातें शुमार हो गई हैं और इस कारण  खुद तमिल लेखक कहने लगे हैं कि इस तरह का संरक्षण साहित्य के हित में नहीं है. यहीं यह बात भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा कि खुद महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती साहित्य को राजकीय संरक्षण देने के खिलाफ थे. उन्होंने 1916 में अपने एक लेख में लिखा था कि “अब कलाओं को आम जन से ही समर्थन और सहायता प्राप्त होगी. यह कलाकारों का दायित्व  है कि वे आम जन में सुरुचि जगाएं. इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे.” तमिल साहित्यकार जो भी कहें और वहां का यथार्थ चाहे जो भी हो,  इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि किसी महाकवि का पांच  सौ पृष्ठों का कविता संग्रह मात्र सौ रुपये में मिलना हम हिंदी वालों के लिए अकल्पनीय बात है. कॉपीराइट मुक्त हो जाने के बाद भी हम तो प्रेमचंद और रवींद्र नाथ टैगोर की किताबों के महंगे संस्करण ही खरीदने को विवश हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 8, 2018

साहित्य के नोबेल पुरस्कार पर # मी टू की काली छाया

यह एक असामान्य बात है और इसने पूरी दुनिया के साहित्यिक समाज को चौंका  दिया है. स्वीडिश एकेडमी  ने घोषणा की है कि वर्ष 2018 के लिए दिया जाने वाला साहित्य का नोबेल पुरस्कार अब वर्ष 2019 के पुरस्कार के साथ ही प्रदान किया जाएगा. वैसे नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में इससे पहले भी कई  दफा ऐसा हो चुका है कि किसी एक साल का  पुरस्कार उससे अगले साल के पुरस्कारों के साथ दिया गया. उदाहरण  के लिए अमरीकी नाटककार  यूजेन ओनील को उनका 1936 का पुरस्कार 1937 में दिया गया था.  1943 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से स्थगित करना पड़ा था. इस बार स्वीडिश एकेडमी  को यह असामान्य फैसला यौन दुर्व्यवहार और वित्तीय घोटालों तथा गोपनीयता भंग करने के आरोपों के चलते करना पड़ा है. कहा जा रहा है कि जबसे पुरस्कार शुरु हुए यानि 1901 के बाद से चर्चा में आने वाला यह सबसे बड़ा और गम्भीर विवाद है.  नोबेल समिति ने भी यह कहते हुए स्वीडिश एकेडमी के इस फैसले  का स्वागत किया है कि सम्मानित संस्था के लिए यह मामला शर्मनाक है. नोबेल फाउण्डेशन ने अपने एक वक्तव्य में यहां तक कहा है कि स्वीडिश एकेडमी का यह फैसला स्थिति की गम्भीरता को रेखांकित करता है और उम्मीद ज़ाहिर की है कि इस फैसले से पुरस्कार की दीर्घकालीन प्रतिष्ठा  की रक्षा हो सकेगी.

पिछले कुछ समय से स्वीडन के प्रेस में फ्रेंच फोटोग्राफ़र जौं क्लोड अरनॉल्ट के कथित यौन दुराचार की खबरें सुर्खियों में थीं. पिछले साल नवम्बर में अठारह महिलाओं ने मी टूआंदोलन के माध्यम से अरनॉल्ट पर यौन हमलों व उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. प्रोफेसर विट ब्रैट्स्ट्रोम जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व ने तो यहां तक कहा है कि अर्नोल्ट ने एक दशक पहले स्वीडिश एकेडमी के एक समारोह में स्वीडन की क्राउन प्रिंसेस विक्टोरिया को भी ग़लत ढंग से स्पर्श किया था. कहा गया कि अरनॉल्ट ने ये दुष्कृत्य कई दफा एकेडमी के स्वामित्व वाले परिसरों में भी किए. अरनॉल्ट पर एकेडमी के कर्मचारियों व सदस्यों के रिश्तेदारों के साथ भी अवांछित यौन सम्बंध  बनाने के आरोप लगाए गए. अरनॉल्ट की पत्नी कवयित्री व लेखिका कटरीना फ्रोस्टेनसन हैं जो लम्बे समय से स्वीडिश एकेडमी की एक सदस्या रही हैं. अरनॉल्ट व उनकी पत्नी बहुत लम्बे अर्से तक स्टॉकहोम  में फॉर्म नाम का एक क्लब भी संचालित करते रहे हैं जहां नोबेल पुरस्कार विजेता एवम अन्य प्रतिष्ठित लेखकों कलाकारों आदि के रचना पाठ, प्रदर्शनियां व अन्य प्रदर्शन आयोजित होते रहे हैं. इस क्लब को एकेडमी से वित्तीय सहायता मिलती रही है. अरनॉल्ट दम्पती पर एक बड़ा आरोप यह भी लगाया गया है कि उन्होंने कम से कम सात नोबेल  पुरस्कार विजेताओं के नाम समय से पहले लीक किये. इन नामों में बॉब डिलन और हैरॉल्ड पिण्टर प्रमुख हैं. बहुत स्वाभाविक है कि अरनॉल्ट के वकील ने इन तमाम आरोपों का  खण्डन किया और कहा कि ये आरोप उनके मुवक्किल की छवि को नुकसान  पहुंचाने के इरादे से लगाए गए हैं.

इन तमाम आरोपों के बीच स्वीडिश एकेडमी की अठारह सदस्यीय  समिति ने मतदान कर अरनॉल्ट की पत्नी कटरीना फ्रोस्टेनसन को समिति से निकालने का फैसला कर लिया. उधर खुद कटरीना ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. एकेडमी की स्थायी सदस्या सारा डेनिअस ने कहा कि संस्थान ने कथित आरोपों के बाद अरनॉल्ट से भी अपने सम्बंध पूरी तरह तोड़ लिए हैं. डेनिअस समेत छह सदस्य भी अब तक इस समिति से इस्तीफा दे चुके हैं. लेकिन यहीं सारा प्रकरण एक रोचक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है. तकनीकी तौर पर स्वीडिश एकेडमी के सारे अठारह सदस्य ज़िंदगी भर के लिए नियुक्त किए जाते हैं और वे इस्तीफा भी नहीं दे सकते हैं. लेकिन हां, वे एकेडमी की बैठकों और उसके फैसलों में शामिल न होने का विकल्प ज़रूर चुन सकते हैं. इसी प्रावधान के चलते आज स्थिति यह है कि अठारह में से केवल दस सदस्य ही बचे हैं  जो सक्रिय हैं. लेकिन एकेडमी के प्रावधानों में यह बात भी शामिल है कि किसी नए सदस्य के चुनाव के लिए न्यूनतम सदस्य संख्या बारह है. इस तरह ये दस सदस्य कोई फैसला करने की हालत में भी नहीं हैं. इस गत्यवरोध को दूर करने के लिए एकेडमी के संरक्षक राजा कार्ल गुस्ताफ़ सोलहवें ने घोषणा की है कि वे नियमावली  में फेरबदल के मुद्दे पर गम्भीरता से विचार कर रहे हैं. उन्होंने संकेत दिया है कि नियमों में बदलाव कर सदस्यों को स्वेच्छा से पद त्याग की अनुमति दी जा सकती है.

वैसे स्वीडिश एकेडमी ने यह भी कहा है नोबेल पुरस्कार विजेता के चयन की प्रक्रिया काफी अग्रिम अवस्था में है और ज़ारी रहेगी, लेकिन विजेता की घोषणा होने में समय लगेगा. आशा की जानी चाहिए कि एकेडमी और नोबेल फाउण्डेशन की इस त्वरित कार्यवाही के कारण नोबेल पुरस्कार की प्रतिष्ठा बनी रह सकेगी.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 22, 2015

देर आयद दुरुस्त आयद

साहित्य को लेकर जो दो बातें सबसे ज्यादा दुहराई जाती हैं वे हैं – 1. साहित्य समाज का दर्पण है, और 2. साहित्य समाज को राह दिखाने वाली मशाल है.  वैसे समझदार और विद्वान लोग इन दोनों ही बातों से काफी असहमति भी रखते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद हम पाते हैं कि जब भी हमारे समाज में ऐसा कुछ घटित होता है, जिससे मिलता जुलता कुछ भी अतीत में किसी ने लिख दिया था, तो हम मशाल वाली इस बात को ज़रूर याद कर लेते हैं. अगर आज कोई हत्याकाण्ड हो जाए और हमें अनायास याद आ जाए कि ऐसी ही कहानी किसी कहानीकार ने तीस-चालीस साल पहले लिखी थी तो बस! हमारे चेहरे चमक उठते हैं! यह सारी बात करने की ज़रूरत मुझे भी ऐसे ही एक सन्दर्भ की वजह से पड़ी है.

कुछ बरस पहले हिन्दी में विमर्शों का दौर चला था और जो विमर्श बेहद चर्चित हुए उनमें से एक था स्त्री विमर्श. हालांकि यह खासा गम्भीर और सोद्देश्य मुद्दा था, कुछेक नासमझों ने इसे उच्छ्रंखलता की सीमा को छूने वाले वाली स्त्री की यौनिक स्वतंत्रता तक भी सीमित करके देखा था. इधर हाल में जब अमरीका में स्त्रियों की वियाग्रा कही जाने वाले फ्लिबरांसर नामक एक गोली को एफडीए की अनुमति हासिल हो जाने की खबर को स्त्री मुक्ति का पर्याय बताने की बातें पढ़ी तो मुझे अपने स्त्री विमर्श का वह दौर भी बेसाख़्ता याद आ गया और सच कहूं तो इस बात की किंचित खुशी भी हुई एक बार फिर साहित्य समय से आगे साबित हो गया.

हम चाहे इस बात को स्वीकार करें या न करें, यह एक तल्ख सच्चाई है कि मानव जाति के यौनिक व्यवहार पर पुरुष वर्चस्व हावी है. सब कुछ पुरुष के कोण से ही देखा, जाना और किया जाता है. स्त्री की भूमिका तो बस चीज़ों को जस का तस स्वीकार कर लेने भर की है. न उसकी हां की कोई अहमियत होती है और न उसे ना कहने का कोई हक होता है. उसे तो बस प्रजनन का एक उपकरण या पुरुष के आनंद का एक साधन भर होना है. पश्चिम के नारी मुक्ति आन्दोलन को इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि उसने इस असमानतापूर्ण और अन्याय भरे व्यवहार की तरफ ध्यान खींचा और कदाचित उस आन्दोलन के बाद से ही स्त्रियां इस मामले पर अपनी आवाज़  बुलन्द करने लगी. सिमोन द बुवा ने बहुत सही कहा कि मानवीय दैहिक संसर्ग के मामले में पुरुष स्वामी की भूमिका में होता है और उसे अपने दास की अनुमति की कोई ज़रूरत महसूस नहीं  होती है.

लेकिन यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. स्त्रियां अपनी ज़रूरत और अपनी महत्ता को समझने और उसके लिए आग्रह करने लगी हैं और पुरुष भी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं. इसी सोच के आगे बढ़ने की परिणति यह भी हो रही है कि जिस बात  की तरफ अब तक किसी का ध्यान नहीं गया, अब उसे भी सोचा और समझा जाने लगा है.  अब दुनिया भर में यह बात समझी जाने लगी है कि जिस तरह  यौनिक संसर्ग के मामले में यदा-कदा पुरुष अक्षम होता है उसी तरह स्त्रियां भी होती या हो सकती हैं. और दोनों  ही  के मामले में उपचार के बारे में सोचा जाना चाहिए. पुरुषों के मामले में वियाग्रा इसी उपचार की एक कड़ी है. और अब स्त्रियों के लिए भी इसी तरह के उपचार के बारे में सोचा जाने लगा है.

और यहीं से बात कई इतर मोड़ भी लेने लगती है. एक तो यह कि अकूत मुनाफे की सम्भावनाओं को देख बाज़ार इसमें कूद पड़ा है. नई नई शोध हो रही हैं और चीज़ों  को नित नए तरीकों से विज्ञापित किया जा रहा है. दूसरा यह कि इस मेडिकल फिनोमिना को स्त्री-पुरुष के असमान वर्चस्व वाले कोण दे देखा परखा जा रहा है और यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या वजह है कि पुरुष वियाग्रा के आविष्कारकों को तो नोबल पुरस्कार से नवाज़ा गया था जबकि स्त्री वियाग्रा की चर्चा उपहास का विषय बनती  है!  इतना ही नहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाया जाता है कि पुरुष यौनिकता पर शोध में जितनी राशि खर्च की गई है उसका बहुत छोटा हिस्सा भी स्त्री यौनिकता पर शोध में खर्च नहीं किया गया है.  

शिकायतें अपनी जगह, हम तो इस बात से ही प्रसन्न हो लेते हैं कि चलो देर से ही सही, एक सही और अब तक अलक्षित रहे मुद्दे की तरफ दुनिया का ध्यान जा रहा है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 सितम्बर, 2015 को  उनकी इच्छा की बात, साहित्य फिर दर्पण साबित  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 27, 2015

जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो.........

साल 2015 के  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का भी समापन हो गया. यह आयोजन हमारे समय की सबसे बड़ी सफलताओं की गाथा है. सन 2005 में मात्र चौदह अतिथियों की उपस्थिति में प्रारम्भ हुआ यह आयोजन इतने कम समय में दुनिया का सबसे बड़ा निशुल्क साहित्यिक उत्सव  बन जाएगा – यह कल्पना तो इसके आयोजकों ने भी नहीं की होगी. एक मोटे अनुमान के अनुसार इस बरस भी इस उत्सव में कुल उपस्थिति ढाई  लाख के  करीब रही.  यह आयोजन एक तरफ जहां जयपुर और भारत को विश्व के मानचित्र पर प्रभावशाली तरीके से रेखांकित करता है, पर्यटन  और अन्य सम्बद्ध व्यवसायों की उन्नति में योगदान करता है वहीं साहित्य, कलाओं और विचारों पर मुक्त चिंतन का विरल अवसर भी प्रदान करता है. इस आयोजन  की सराहना इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि इसकी सफलता से प्रेरित होकर पूरे देश में साहित्य उत्सवों का सिलसिला चल निकला है. हमारे अपने प्रांत में भी अनेक नए साहित्य और कला उत्सव होने लगे हैं.

लेकिन गम्भीर साहित्य के कद्रदां इस आयोजन  से तनिक भी प्रभावित नहीं हैं. बल्कि वे तो इससे बहुत नाराज़ हैं. उन्हें न तो साहित्य का उत्सवीकरण पसन्द आता है न साहित्य की परिधि का इतना विस्तार कि उसमें सब कुछ समा जाए. उन्हें लगता है कि राजनीति, खेल, फिल्म, फैशन,  ग्लैमर आदि की चर्चाएं लोगों को भ्रमित और साहित्य  से विमुख करती हैं. हमारे समय के बेस्ट सेलर लेखकों की उपस्थिति  भी उन्हें पसन्द नहीं आती है, क्योंकि वे तो उन्हें लेखक ही नहीं मानते हैं. गम्भीर साहित्यिक बिरादरी को इस आयोजन से एक बड़ी शिकायत इसके अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत की तरफ झुकाव से भी है. वे इसे भारतीय भाषाओं के प्रति आक्रामक षड़यंत्र के रूप में भी देखते हैं. शुरु-शुरु में राजस्थानी साहित्यकार भी अपनी अवहेलना से नाराज़ थे लेकिन आयोजकों ने उनकी सहभागिता बढ़ाकर उन्हें तो एक सीमा तक संतुष्ट कर दिया है.

इन सब बातों के बावज़ूद, दुनिया भर के लेखकों और साहित्य  प्रेमियों का इतनी बड़ी तादाद में इस आयोजन में शरीक होना एक ऐसी परिघटना है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. पूरे पांच दिन तक हर रोज़ छह स्थानों पर छह सत्रों का एकदम समय की पाबन्दी के साथ होना और उनमें बहुत बड़े जन समूह का शिरकत करना साधारण बात नहीं है. इस साल सारे ही सत्र हाउस फुल से कम नहीं थे और चर्चा के विषय या चर्चा करने वालों के बारे में उपस्थित जन की जानकारियां चकित कर डालने वाली थी. उन्हें तमाशबीन कहना उनके असम्मान से अधिक अपने पूर्वाग्रह  का प्रदर्शन होगा. हां, इतने बड़े आयोजन में तमाशबीनों या मौज मज़े के लिए आने वालों की तादाद भी कम नहीं रही. और इसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए और न इस बात को भूला जाना चाहिए कि यह है तो उत्सव ही.

हममें से जितना ताल्लुक साहित्य से है वे प्राय: साहित्य में लोगों की घटती रुचि की शिकायत करते पाए जाते हैं. हम हिन्दी भाषी लेखकों (और हिन्दी शिक्षकों)  की शिकायत समाज अंग्रेज़ी के बढ़ते जा रहे प्रचलन और प्रभाव को लेकर भी होती है. किसी खासे बड़े शहर में भी आपको किताब की दुकान ढूंढनी पड़ती है और अगर दुकान मिल जाए तो वहां जाकर हिन्दी की किताब ढूंढनी पड़ती है. हिन्दी प्रकाशक की आम शिकायत यह होती है कि लोग हिन्दी की किताबें खरीदते ही नहीं हैं. और इसी के समानांतर हमारे ही समय और समाज में अंग्रेज़ी की किताबें धड़ल्ले से बिक रही हैं और उनके लेखक अमीर और स्टार बनते जा रहे हैं. यानि लोग किताबें तो खरीदते हैं मगर हिन्दी की नहीं, अंग्रेज़ी की.

क्या इस बात पर कोई विचार सम्भव है कि क्यों हिन्दी की किताबें कम और अंग्रेज़ी की किताबें अधिक बिकती हैं? और यह भी कि क्या वाकई  हिन्दी की किताबें कम बिकती हैं? पुस्तक मेलों और प्रकाशकों की हालत को देखकर तो यह भी नहीं लगता. तो क्या गम्भीर और साहित्यिक पुस्तकें कम बिकती हैं, और इतर किस्म की किताबें धड़ाधड़ बिक जाती हैं? और क्या यह बात भी है कि हिन्दी में लोकप्रिय लेखन का अभाव है? या इस बात के सूत्र प्रकाशकों के अपने गणित से जुड़ते हैं?  

मुझे लगता है कि जयपुर साहित्य उत्सव हमें बहुत सारी बातों पर गम्भीर विमर्श के लिए  भी प्रेरित करता है. इस उत्सव की सार्थकता, प्रासंगिकता, इसकी उपलब्धियों, इसकी खामियों इन सब पर विचार करते हुए क्या हर्ज़ है अगर हम इस बात  पर भी विचार करें कि कैसे लोगों को पुस्तकों की तरफ आकृष्ट किया जा सकता है और कैसे लेखक-पाठक के बीच की खाई को छोटा किया जा सकता है? इधर साहित्य उत्सवों के कारण पूरे देश में जो माहौल  बना है उसका अपनी भाषा के बेहतर और गम्भीर साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए भी किया जाना चाहिए.  
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 27 जनवरी, 2015 को जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो दूर तक जाएगी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 15, 2014

इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम

साहित्य की दुनिया की अपनी विलक्षणताएं हैं. जो लोग इस दुनिया के तौर-तरीकों से वाक़िफ नहीं हैं उन्हें इस बात से बड़ी उलझन होती है कि कैसे दो विद्वान एक ही कृति के बारे में परस्पर विपरीत राय व्यक्त कर देते हैं! उन्हें यह समझाने में बहुत ज़ोर पड़ता है कि साहित्य में दो और दो का जोड़ सदा चार ही नहीं होता है. एक ही कृति किसी को बहुत अच्छी लग सकती है और किसी दूसरे को बहुत सामान्य! कई बार मानदण्ड भिन्न होते  हैं और कई बार देखने का कोण अलग होता है. और अगर आप भी उस रचना को पढ़ चुके हैं तो एक पाठक  के रूप में आपके पास भी अपना किया हुआ एक मूल्यांकन हो सकता है. स्वाभाविक है कि आप अपने किए मूल्यांकन से दूसरे के मूल्यांकन की तुलना करेंगे और अगर दोनों में बहुत बड़ा फर्क़ पाएंगे तो हो सकता है कि आप दूसरे मूल्यांकन कर्ता, जिसे आलोचक या समीक्षक के नाम से भी जाना जाता है, की नीयत पर शक कर लें.

नीयत वाली यह  बात एक दूसरे स्तर पर भी उभर कर सामने आती है. जब कोई समीक्षक किसी रचना या कृति पर अपनी टिप्पणी करता है और अगर वह टिप्पणी प्रशंसात्मक  होती है तो लेखक कहता है कि यह समीक्षक बहुत  समझदार और ईमानदार है. लेकिन अगर कोई समीक्षा रचनाकार के अनुकूल नहीं होती है तो अक्सर यह होता है कि या तो रचनाकार यह कहता है कि समीक्षक उसकी रचना को समझ नहीं पाया है और या फिर वो उसकी नीयत पर सन्देह करता है. तब गुटबाजी, पक्षपात, बेईमानी, वैचारिक कट्टरता आदि जैसे विशेषण भी बाहर निकल आते हैं. 

मेरा क्षेत्र क्योंकि आलोचना रहा है मुझे इस तरह के अनेक अनुभव हुए हैं और अब तो निस्संकोच यह बात कह सकता हूं कि अपनी आलोचना के लिहाज़ से हिन्दी के अधिकांश रचनाकारों की पाचन शक्ति बहुत कमज़ोर है. यह लिखते हुए मुझे बरसों पहले का एक प्रसंग याद आ रहा है. हुआ यह कि जोधपुर के हमारे एक कथाकार मित्र ने अपनी कथा कृतियों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया और उन्होंने मुझसे भी अनुरोध किया कि मैं उस गोष्ठी में पहुंचकर उनके रचनाकर्म पर कुछ कहूं. मैं तब जोधपुर से 200 किलोमीटर दूर सिरोही में कार्यरत था. कुछ युवकोचित उत्साह और कुछ उन रचनाकार मित्र के प्रति आत्मीयता – मैं जोधपुर चला गया. शाम को गोष्ठी थी. उस गोष्ठी में उनके दो और मित्र, नामी रचनाकार – एक दिल्ली से और एक मुम्बई से भी बुलाए गए थे. वैसे तो हम तीनों परस्पर परिचित थे, लेकिन गोष्ठी से पहले न तो हमारी कोई बातचीत हुई और न पत्र व्यवहार. फिर भी संयोग यह रहा कि हम तीनों ने उन रचनाकार मित्र के कृतित्व की विशेषताओं के साथ-साथ कमियों की भी करीब-करीब एक जैसी चर्चा की. वैसे भी वो चर्चा गोष्ठी थी, अत: यह बात अनुचित नहीं थी. गोष्ठी ख़त्म होते-होते मुझे लग गया कि वे रचनाकार मित्र बहुत क्षुब्ध हैं. शायद इसी क्षोभ की वजह से उन्होंने सिरोही से जोधपुर आने के लिए मेरे प्रति आभार व्यक्त करने का सामान्य सौजन्य भी नहीं बरता. आवास की मेरी अपनी परिवारिक व्यवस्था थी. मैं वहां चला आया और अगली सुबह सिरोही लौट आया. बाद में टुकड़ों-टुकड़ों में वहां के अन्य साहित्यकार मित्रों से जो बातें पता चली उन्हें जोड़ने पर तस्वीर यह बनी कि उन दोनों मित्रों को एक होटल में ठहराया गया  था और गोष्ठी के बाद उनके आतिथ्य सत्कार का ‘समुचित’ प्रबन्ध भी था. समुचित का अभिप्राय आप अपने आप समझ लें. उस सत्कार-समागम के दौरान हमारे उन रचनाकार  मित्र ने उन अतिथियों की जमकर ख़बर ली और इस बात पर न केवल शाब्दिक बल्कि शारीरिक नाराज़गी भी व्यक्त की कि इतना पैसा खर्च करके तुम्हें इसलिए थोड़े ही बुलाया था कि तुम यह सब कहो! मेरा तो यह सौभाग्य रहा कि मैंने अपने पर उनका एक पैसा भी खर्चा नहीं कराया और न उनका आतिथ्य ग्रहण किया, उलटे यात्रा व्यय भी अपना ही किया.  लेकिन इसके बावज़ूद उनकी नाराज़गी इस रूप में ज़रूर प्रकट हुई कि उस गोष्ठी से पहले हमारे बीच जो आत्मीयता का सूत्र था, वह टूट गया और ऐसा टूटा कि फिर जुड़ ही नहीं सका. और ऐसा  तो मेरे साथ बहुत बार हुआ है कि किसी रचनाकार की किसी रचना की प्रशंसा की तब उन्होंने कहा कि मुझ जैसा आलोचक कोई और है ही नहीं, लेकिन जब उनकी किसी रचना की किसी कमी पर उंगली  रखी तो पता चला कि उन्हें मेरी साहित्यिक समझ पर गहरा संशय है.

लेकिन वो अंग्रेज़ी  में कहते हैं ना कि इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार दिनांक 15 जुलाई, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, June 17, 2014

मौका भी है और दस्तूर भी

साहित्य की दुनिया में किसी नव प्रकाशित पुस्तक के लोकार्पण का अवसर लगभग उसी तरह का होता है जैसे विवाह के बाद नव दम्पती का स्वागत समारोह, या किसी परिवार में हुए शिशु जन्म पर किसी भी बहाने से होने वाला कोई उत्सव या किसी के नए घर में जाने पर होने वाला गृह प्रवेश या अंग्रेज़ी परम्परा में हाउस वार्मिंग पार्टी. मक़सद सभी जगह करीब-करीब एक-सा होता है. अपने निकटस्थ लोगों को सूचना देना और साथ-साथ अपने उल्लास में सहभागी बनाना. जिस तरह पारिवारिक आयोजनों में निकटस्थ की परिधि बड़ी  होती जा रही है वैसा ही साहित्यिक आयोजनों में भी होता जा  रहा है. कई बार लगता है कि पारिवारिक आयोजन भी जन सम्पर्क प्रयासों में तब्दील होते जा रहे हैं. साफ नज़र आता है कि आयोजन इन मक़सदों की पूर्ति के साथ-साथ अपनी व्यापक पहुंच और अपने वैभव का दिखावा करने के लिए भी किया गया है.


किसी की कोई नई किताब प्रकाशित होती है और वह उसकी ख़बर देते हुए इस खुशी को आपसे साझा करना चाह रहा है इससे बहुत ज़्यादा आजकल नज़र आने लगा है. रचनाकार इन बातों के अलावा यह प्रदर्शित करने में भी कोई संकोच नहीं करता है कि उसकी जान-पहचान किन बड़े राजनेताओं और धन कुबेरों से है और वो अपनी खुशी के लिए कितना ज़्यादा खर्च कर डालने की हैसियत रखता है. लगभग अनपढ़ और कई दफ़ा तो इस बात की सगर्व सार्वजनिक घोषणा भी करने वाले नेताओं की उपस्थिति से गद्गद लेखक जब किसी पंच सितारा आरामगाह में अपनी किताब का लोकार्पण करवाता है तो मंज़र काबिले-दीद होता है. लेकिन यह उसकी अपनी समझ और प्राथमिकता की बात है.


मुझे हाल  ही में एक अपेक्षाकृत नए लेखक की किताब के लोकार्पण समारोह में शामिल होने का मौका मिला. मैं लेखक या उसके लेखन से परिचित नहीं था लेकिन कुछ मित्रों का आग्रह था सो चला गया. वक्ताओं की बहुत लम्बी सूची थी. कई तो बाहर से और काफी दूर से भी बुलाए गए थे. कहना अनावश्यक है कि साहित्य की दुनिया में उनका अच्छा नाम भी था. ज़ाहिर है कि लेखक ने उन सब को बुलाने और उनके आवास-भोजन आदि पर काफी पैसा खर्च किया होगा. प्रकाशक तो आम तौर पर करते नहीं हैं. स्थानीय रचनाकारों  और साहित्य प्रेमियों की भी उपस्थिति काफी अच्छी थी.  यह सब देखकर मुझे तो अच्छा लगा. जंगल में मोर नाच रहा है तो उसे देखने वाले भी तो होने चाहिएं. न हो तो जुटाये जाएं! इसमें क्या हर्ज़ है?

तो आयोजन शुरु हुआ, किताब को लोकार्पित किया गया और फिर वक्तागण ने एक-एक करके उस किताब की खूबियां बतानी शुरु कीं. संयोग से, वह किताब  मैं पहले ही पढ़ चुका था, इसलिए वक्तागण जो कह रहे थे उसका अपनी तरह से मूल्यांकन भी करता जा रहा था.  हर वक्ता उस किताब की उन्मुक्त सराहना कर रहा था और यह अस्वाभाविक भी नहीं है. आखिर आप जब किसी के नवजात शिशु को देखने जाते हैं तो कहते हैं ना कि ‘बच्चा बड़ा प्यारा है’, या किसी शादी में जाते हैं तो ‘जोड़ी बहुत खूबसूरत है’ कहते हैं या किसी के  गृह प्रवेश पर जाते हैं तो घर के नक्शे की, उसकी रंग योजना की और अगर हो तो उसके इण्टीरियर की तारीफ में कुछ न कुछ कहते ही हैं! मौका भी है, दस्तूर भी वाली बात! और मुझे लगता है कि किसी किताब  के लोकार्पण समारोह में की गई टिप्पणियों को इसी भाव से लिया जाना चाहिए. अगर नहीं लेंगे तो जब उस किताब को वाकई पढ़ेंगे तो बहुत मुमकिन है कि आपको ज़ोर का झटका ज़ोर से ही लगे. तो इस किताब की भी तारीफ होती रही और मैं और मेरे पास बैठे एक मित्र एक दूसरे को देख-देखकर और समझ-समझ कर हौले-हौले मुस्कुराते रहे.  सब कुछ ठीक चल रहा था. कार्यक्रम अपने समापन की तरफ बढ़ रहा था.

अब बारी आई अध्यक्ष जी के बोलने की. एक जाने-माने साहित्यकार और प्रभावशाली वक्ता. खड़े हुए और दो-चार औपचारिक बातों के बाद एक-एक करके अब तक हुई तारीफों की  बखिया उधेड़ने लगे. जो वे कह रहे थे  उसमें ग़लत कुछ भी नहीं था. जिन कमियों का उन्होंने ज़िक्र किया, वे सब उस किताब में थी. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि अब तक के वक्ताओं ने जो तारीफें की थी वे भी मिथ्या नहीं थी. बस बात इतनी थी कि पहले वाले वक्ताओं ने किताब की कमज़ोरियों को छिपाते हुए उसके उजले पक्षों को उजागर किया था और अध्यक्ष जी ने उन छिपाई हुई बातों  पर से भी पर्दा हट दिया था.  कार्यक्रम तो सम्पन्न हो गया, लेकिन मैं अब भी सोच रहा हूं कि ऐसे मौकों पर क्या कहा  जाना चाहिए और क्या नहीं? 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 17 जून, 2014 को जब अध्यक्ष जी उखेड़ने लगे तारीफों की बखिया शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

    

Monday, December 27, 2010

मारियो वर्गास लोसा


वर्ष 20101 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मारियो वर्गास लोसा की गणना एक अति महत्वपूर्ण लातीन अमरीकी लेखक के रूप में की जाती है तथा उनका नाम ऑक्टावियो पाज़ और गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ जैसे लेखकों के साथ लिया जाता है. साहित्यालोचक गेराल्ड मार्टिन ने उचित ही लिखा है कि लोसा कदाचित “पिछले 25 वर्षों के सर्वाधिक सफल और निश्चय ही सर्वाधिक विवादास्पद लातिनी अमरीकी उपन्यासकारों में से हैं.”

मारियो वर्गास लोसा का जन्म 28 मार्च 1936 को पेरु के एक कस्बे अरेक्विपा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके पिता एक पूर्व बस-ड्राइवर थे. लोसा के मां-बाप उनके जन्म से ठीक पहले अलग हो गए थे. अपने संघर्षपूर्ण जीवन के मध्य लोसा ने 1957 में अपनी कहानियों ‘द लीडर्स’ और ‘द ग्राण्डफादर’ के प्रकाशन के साथ अपना लेखकीय जीवन प्रारंभ किया. उनका पहल उपन्यास ‘द टाइम ऑफ द हीरो’ 1963 में प्रकाशित हुआ. प्रादो मिलिट्री अकादमी के लेखक के निजी अनुभवों पर आधारित इस उपयास को बहुत सराहा गया लेकिन इस उपन्यास में पेरु के मिलिट्री संस्थानों की जो आलोचना थी उसकी वजह से इस पर विवाद भी खूब हुआ. पेरु के सैन्य अधिकारियों ने तो यहां तक कह दिया कि यह उपन्यास एक बीमार दिमाग की रचना है और वर्गास को यह पेरु के सैन्य प्रतिष्ठान की छवि बिगाड़ने वाला यह उपन्यास लिखने के लिए इक्वाडोर से धन मिला है. विवाद और आलोचना से अप्रभावित वर्गास ने अपना लेखन जारी रखा और 1965 में ग्रीन हाउस नामक एक चकलाघर पर आधारित उनका नया उपन्यास ‘द ग्रीन हाउस’ प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास को भी भरपूर आलोचकीय सराहना मिली और वर्गास को लातीन अमरीकी कथाकारों की पहली कतर में जगह मिल गई. इस उपन्यास को पुरस्कार भी खूब मिले. कुछ आलोचक ‘द ग्रीन हाउस’ को ही वर्गास का श्रेष्ठतम और सबसे महत्वपूर्ण कृतित्व मानते हैं. वर्गास का तीसरा उपन्यास ‘कन्वरसेशन इन द कैथेड्रल’ 1969 में आया. इस उपन्यास में उन्होंने ऑड्रिया की तनाशाह सरकार पर कड़े प्रहार किए थे.

‘कैथेड्रल’ की अपार सफलता के बाद वर्गास के लेखन में एक नया मोड़ आया. लातीन अमरीकी विद्वान रेमण्ड एल. विलियम्स ने उनके रचनाकर्म के इस काल को ‘द डिस्कवरी ऑफ ह्युमर’ कहा है. इस काल में 1973 में उनका एक लघु हास्य उपन्यास ‘कैप्टेन पाण्टोजा एण्ड द स्पेशल सर्विस’ आया जिसे उनके ‘द ग्रीन हाउस’ की एक पैरोडी की तरह देखा गया. लोसा का अगला महत्वपूर्ण उपन्यास ‘द वार ऑफ द एंड ऑफ द वर्ल्ड’ 1981 में प्रकाशित हुआ. यहां लोसा ने अपने लेखन की दिशा को ऐतिहासिक उपन्यास की तरफ मोड़ा. इसमें 19 वीं सदी के ब्राज़ील की एक घटना को आधार बनाया गया था. ब्राज़ील में इस उपन्यास को सराहा गया लेकिन अन्यत्र इसे कभी क्रांतिकारी तो कभी असामाजिक तक कहा गया. खुद लोसा इसे अपनी प्रिय किताब मानते हैं और कहते हैं कि इसे लिखना उनके लिए बेहद मुश्क़िल था. इस उपन्यास के बाद लोसा अपेक्षाकृत छोटे उपन्यासों की तरफ मुड़े. 1984 में उनका उपन्यास ‘द रियल लाइफ ऑफ अलेजाण्ड्रो’ प्रकाशित हुआ जो 1962 के एक वामपंथी विप्लव पर आधारित था. इसके बाद सन 2000 में उनका एक और महत्वपूर्ण उपन्यास, एक पॉलिटिकल थ्रिलर ‘द फीस्ट ऑफ द गोट’ प्रकाशित हुआ. विलियम्स ने इसे ‘द वार ऑफ द एण्ड ऑफ द वर्ल्ड’ के बाद का लोसा का सबसे ज़्यादा मुकम्मल और महत्वाकांक्षी काम माना है. वर्ष 2006 में लोसा ने ‘द बेड गर्ल’ की रचना की, जो कुछ लोगों के अनुसार गुस्ताव फ्लाबेयर के मदाम बॉवेरी का पुनर्सृजन था.

लोसा के उपन्यासों में ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्यों और उनके निजी जीवनानुभवों का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है. इस सामग्री का उपयोग प्राय: लेखक समाज की न्यूनताओं को उजागर करने के लिए करता है. अपने उपन्यासों में वे बार-बार एक दमनकारी व्यवस्था से अपनी स्वतंत्रता के लिए जूझते-टकराते व्यक्ति को सामने लाते हैं. उनके शुरुआती उपन्यास जहां पेरु में अवस्थित हैं वहीं बाद के कई उपन्यास लातीन अमरीका के अन्य क्षेत्रों जैसे ब्राज़ील और डॉमिनिकन रिपब्लिक तक भी पहुंचते हैं. उनका एक ताज़ा उपन्यास ‘द वे टू पैरेडाइस’ तो फ्रांस और ताहिती में अवस्थित है.

आलोचकों ने लोसा के उपन्यासों को मॉडर्निस्ट और पोस्ट मॉडर्निस्ट की श्रेणी में रखा है. यह कहा गया है कि उनके शुरुआती उपन्यासों की जटिलता और तकनीकी सघनता उन्हें मॉडर्निस्ट ठहराती है जबकि बाद के उपन्यासों का खिलंदड़ापन उन्हें उत्तर आधुनिक शैली के नज़दीक ले जाता है. लोसा पर उनके अनेक पूर्ववर्ती और समकालीन कथाकारों-रचनाकारों का प्रभाव भी लक्षित किया गया है. शुरू में तो वे अपने ही देश के कुछ कथाकारों से प्रभावित पाए जाते हैं लेकिन बाद में उन पर ज्यां पाल सार्त्र, गुस्ताव फ्लाबेयर, और विलियम फॉकनर का प्रभाव भी चीन्हा गया.

कथा लेखन के साथ-साथ लोसा ने पत्रकारी लेखन भी खूब किया. इसे उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता के एक अंग के रूप में देखा जा सकता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने 1975 में अपने ही उपन्यास के फिल्मी रूपांतरण के सह निर्देशक का दायित्व भी वहन किया. वे अंतर्राष्त्रीय लेखक संगठन पेन के प्रेसिडेण्ट भी निर्वाचित हुए.

अधिकांश लातीन अमरीकी बुद्धिजीवियों की तरह लोसा भी प्रारंभ में तो फिडेल कास्त्रो की क्यूबाई क्रांतिकारी सरकार के समर्थक थे. मार्क्सवाद क उन्होंने गहन अध्ययन किया था और क्यूबाई क्रांति की कामयाबी के बाद इसमें उनका विश्वास और सघन हुआ था. लेकिन बाद में उन्हें लगने लगा कि क्यूबाई समाजवाद और वैयक्तिक स्वाधीनता में टकराव है. जब 1971 में कास्त्रो की सरकार ने कवि हरबर्टो पाडिल्ला को कैद किया तो लोसा ने अपने कई मित्र बुद्धिजीवियों के साथ कास्त्रो को एक पत्र भी लिखा जिसमें क्यूबाई राजनीतिक व्यवस्था और कवि की गिरफ्तारी की निंदा की गई. उसके बाद से उनका झुकाव उदारवाद की तरफ होता गया. बाद में तो उन्हें प्रखर नव उदारवादी माना जाने लगा. लोसा ने 1990 में पेरु के राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ा.

1990 के बाद से लोसा आम तौर पर लंदन में रहते हैं, लेकिन हर साल वे कम से कम तीन महीने पेरु में भी बिताते हैं. 1993 में उन्होंने स्पेन की नागरिकता ले ली थी अत: वे प्राय: स्पेन भी जाते रहते हैं और वहां छुट्टियां बिताना उन्हें अच्छा भी लगता है. 1994 में उन्हें स्पैनिश रॉयल अकादमी का सदस्य चुना गया था अत: वे इसके माध्यम से वहां की राजनीति में भी सक्रिय हैं. उनके राजनीतिक विचार इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन पर अनेक किताबों में चर्चा की गई है.

अज्ञेय ने अपने एक साक्षात्कार में महान कवि की जो कसौटियां निर्धारित की हैं वे हैं: 1. उसे बहुत लिखने वाला होना चाहिए, 2. उसमें निरंतर विकास दीखना चाहिए, और 3. अपने समय के समाज पर उसका काफी प्रभाव होना चाहिए. वर्गास के जीवन और रचनाकर्म के बारे में पढ़ते हुए मुझे अज्ञेय की ये तीनों कसौटियां याद आती रहीं और मुझे लगा कि अगर इन कसौटियों पर विश्वास करें तो बेशक वर्गास एक बड़े लेखक हैं. उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद स्वाभाविक ही है कि उनकी रचनाओं का और गहराई से अध्ययन-विश्लेषण होगा.
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Tuesday, July 8, 2008

साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद

राजस्थान की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों बडा उद्वेलन है. कारण है राजस्थान साहित्य अकादमी के तीन ताज़ा निर्णय. राजस्थान साहित्य अकादमी ने हाल ही में अपने दो पुरस्कार बन्द या समाप्त करने की घोषणा की है. एक है साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला प्रकाश जैन पुरस्कार, और दूसरा है अंतरप्रांतीय साहित्य बन्धुत्व अनुवाद पुरस्कार. कारण यह बताया गया कि विगत कुछ वर्षों से इन पुरस्कारों के लिए वांछित प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थीं. प्रांत के साहित्यकारों की नाराज़गी इन कारणों से है. एक तो यह कि ‘लहर’ के यशस्वी सम्पादक प्रकाश जैन के नाम पर दिया जा रहा पुरस्कार बन्द कर अकादमी ने अपनी तरह से उनकी स्मृति के साथ अपमानजनक व्यवहार किया है, और दूसरे यह कि साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद की महत्ता को नकारा गया है. और जहां तक अकादमी के इस विचार का प्रश्न है कि इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थी, तो पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि क्या राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में तालाबन्दी हो गई है? न तो कोई साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और न अनुवाद किये जा रहे हैं? ऐसा नहीं है. तो फिर सवाल यह उठना चाहिए कि क्या कारण है कि लोग इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां ही नहीं भेजते? कहीं इस बात का सम्बन्ध अकादमी की प्रतिष्ठा के क्षरण से तो नहीं है? लेकिन इस बात पर भला अकादमी के कर्ता धर्ता तो क्यों विचार करने लगे? लोग लाख कहें कि अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का स्तर बहुत गिर गया है, इतना कि अब स्तर बचा ही नहीं है, तो भी इस पत्रिका के सम्पादक को क्यों चिंता हो? आखिर आत्ममुग्धता भी कोई चीज़ होती है!
दूसरी बात जिसने लोगों को उद्वेलित किया है वह है जीवित लेखकों द्वारा अपने नाम पर पुरस्कार घोषित करवाना. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल ने अकादमी को कुछ राशि दी और अकादमी ने उनके नाम पर पुरस्कार देने की घोषणा कर दी. साहित्य की दुनिया में अपने नामों पर या अपने निकट के लोगों के नाम पर पुरस्कार का सिलसिला पुराना है, और इसमें कोई बडी आपत्ति भी नज़र नहीं आती. अगर मुझे लगे कि मेरे पास काफी पैसा है और उसका सदुपयोग मैं किसी को पुरस्कृत करके करना चाहता हूं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इस बात से भी कोई फर्क़ नहीं पडता कि यह ‘मैं’ कोई लेखक है या व्यवसायी या राजा या तस्कर. आखिर ऐसे अनेक लोगों के नाम पर शिक्षण संस्थान भी तो हैं! किसी को इनका पुरस्कार ग्रहण करना हो, करे; न करना हो अस्वीकार कर दे. गडबड तब होती है जब निजी और सार्वजनिक का गठबन्धन होता है. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल अपने स्तर पर पुरस्कार देते, किसी को आपत्ति नहीं होती. आपति की बात यह है कि जनता के पैसों से संचालित एक सार्वजनिक संस्थान राजस्थान साहित्य अकादमी ने ये निजी नाम वाले पुरस्कार देने की घोषणा की है. शायद जीवन के अन्य क्षेत्रों में आ रही पी पी पी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) की अवधारणा का यह साहित्य की दुनिया में प्रवेश है. लेकिन, अगर हम इसी तर्क को थोडा आगे तक ले जाएं तो इस व्यवस्था की विसंगति सामने आ जाएगी. मान लीजिए कोई लेखक, या कोई भी अन्य व्यक्ति, जिसके पास बहुत सारा धन है, यह कहे कि मैं पूरी राजस्थान साहित्य अकादमी को ही खरीदना चाहता हूं, या कि अपने नाम पर करवा लेना चाहता हूं तो क्या होगा? कल आप घसीटामल राजस्थान साहित्य अकादमी बना देंगे? हो सकता है कुछ लोगों को इस पर कोई ऐतराज़ न हो, लेकिन अन्य बहुतों को है. जीवन में कुछ चीज़ें तो साफ-सुथरी बची रहें, यह जिनकी आकांक्षा है, उन को ऐतराज़ है.
फिर एक बात और हुई. इसी अकादमी ने दो पुरस्कार और शुरू किए. डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार, और हनुमान प्रसाद पोद्दार के नाम पर राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार. जिन्हें स्मरण न हो उन्हें करा दें कि सिंघवी जी एक सुविख्यात न्यायविद थे और अधिक से अधिक हिन्दी सेवी थे, तथा पोद्दार जी सुपरिचित धार्मिक (साहित्यिक नहीं) पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक-संपादक थे. अकादमी प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर देश और दुनिया तक अपने पंख फैला रही है, यह अच्छा है. लेकिन अगर घर की उपेक्षा करके बाहर दिया जलाना चाहती है तो चिंत्य है. एक तरफ तो उसके पास राजस्थान में काम करने केलिए पर्याप्त संसाधन नहीं है, तभी तो लोगों के पैसों से पुरस्कार शुरू करने पड रहे हैं, और दूसरी तरफ वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार देना चाह रही है. यह कितना वाज़िब है? और फिर पुरस्कार किनके नाम पर? इनका साहित्यिक अवदान है ही नहीं, या बहुत अल्प है. और याद कीजिए कि जिनका है,(मेरा इशारा प्रकाश जैन की तरफ है) उनके नाम वाले पुरस्कार को साथ-साथ बन्द भी कर रही है.

तो, कोढ में खाज यह कि ये तीनों चीज़ें एक साथ हो गईं. पता नहीं यह आकस्मिक है या सुचिंतित, लेकिन एक तरफ तो प्रकाश जैन का नाम मिटाने की चेष्टा हुई और दूसरी तरफ दो लेखकों को जैसा-तैसा अमरत्व प्रदान करने की कोशिश हुई. और तीसरी तरफ दो साहित्येतर व्यक्तियों के नाम पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर उन्हें साहित्यिक अमरत्व प्रदान करने की चेष्टा की गई. तो इस कॉकटेल ने लोगों को और ज़्यादा परेशान किया है. प्रकाश जैन का साहित्यिक पत्रकारिता में जो अवदान है उसे कोई बे-पढा लिखा ही नकारेगा. उनके नाम से चल रहे पुरस्कार को बन्द करना निश्चय ही उनकी स्मृति का अपमान है. जिन लेखकों के नाम पर पुरस्कार शुरू किए जा रहे हैं, उनके महत्व पर कोई टिप्पणी गैर ज़रूरी है. इसलिए गैर ज़रूरी है ये पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व की वजह से नहीं, उनके धन-बल की वजह से शुरू किए जा रहे हैं, इसलिए टिपणी अनावश्यक होगी. इतना ज़रूर है कि इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की एक कहानी ‘चौथमल पुरस्कार’ बेसाख्ता याद आती है. और जहां तक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की बात है उसमें ये दोनों बातें जुड जाती हैं: जिनके नाम पर पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व पर प्रशन चिह्न और इन पुरस्कारों की ज़रूरत.

राजस्थान साहित्य अकादमी के इन निर्णयों ने एक बार फिर इस संस्थान की रीति-नीति को विमर्श के दायरे में ला खडा किया है. इस संस्थान की और तमाम सार्वजनिक संस्थानों की. जिन्होंने ऐसे निर्णय किए, स्वाभाविक है कि वे इन्हें डिफेण्ड करेंगे, कर रहे हैं. लेकिन बजाय किसी ज़िद के, बेहतर हो, इस तरह के मुद्दों पर खुले मन से विचार हो. आखिर इस तरह के फैसलों के परिणाम दूरगामी हुआ करते हैं. सार्वजनिक और निजी की लक्ष्मण रेखाएं तो तै की ही जानी चाहिए.







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