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Tuesday, May 28, 2019

देशों की सीमाओं को नकारती है यह लाइब्रेरी!


जब आप हास्केल फ्री लाइब्रेरी में प्रवेश करते हैं तो लगता है कि आप किसी आम कस्बाई अमरीकी लाइब्रेरी में घुसे हैं. बस एक फर्क़ पर आपका ध्यान जाता है  कि यहां जो लकड़ी का काम  है यानि फर्नीचर, अलमारियां वगैरह हैं वे सब अधिक भव्य और पुरानी शैली के हैं. फिर आपका ध्यान इस बात पर भी जाता है कि यहां का जो स्टाफ है वह कभी अंग्रेज़ी बोलता है तो कभी फ्रेंच, और हां, यह बात भी कुछ अजीब लगती है कि इस अमरीकी लगने वाली लाइब्रेरी में फ्रांस-कनाडा के इतिहास पर किताबों की बहुतायत है. और हां, सबसे अधिक ध्यानाकर्षक तो है इस लाइब्रेरी के फर्श पर चिपका हुआ एक काला टेप जो इसे दो भागों में बांटता प्रतीत होता है.

मुझे लगता है कि अब आपको यह बता ही दिया जाना  चाहिए कि जिस लाइब्रेरी की मैं चर्चा कर रहा हों वह दुनिया की एकमात्र ऐसी लाइब्रेरी है जो दो देशों में स्थित है. यह लाइब्रेरी अमरीका के डर्बी लाइन, वर्मोण्ट और  कनाडा के स्टैंस्टेड, क्यूबेक में स्थित है. लाइब्रेरी का मुख्य द्वार, सामुदायिक सूचना पट्ट और बच्चों की किताबों का खण्ड अगर अमरीका में है तो पुस्तकालय का शेष संग्रह और वाचनालय कनाडा में हैं. इसी भवन की दूसरी मंज़िल पर एक ऑपेरा हाउस भी है और ज़ाहिर है कि वह भी दोनों देशों में स्थित है. इस ऑपेरा हाउस की ज़्यादातर सीटें कनाडा में हैं जहां बैठकर आप वर्मोण्ट, अमरीका की धरती पर होने वाले कार्यक्रमों का लुत्फ़ लेते हैं. हैं ना मज़ेदार बात. इस दोमंज़िला भव्य इमारत का निर्माण एक रईस अमरीकी व्यापारी की कनाडाई पत्नी मार्था हास्केल ने सन 1901 में करवाया था. यह वह समय था जब ये दोनों कस्बे दूध और शक्कर की तरह घुले मिले थे. लोग समान जल स्रोत का पानी पीते थे, एक साथ खेलते थे और यहां तक कि बड़ी लड़ाइयों में भी एक साथ हिस्सा लेते थे. हास्केल परिवार ने इस भवन के निर्माण के लिए इस जगह का चुनाव बहुत सोच समझ कर किया था. वे सीमा के दोनों तरफ के लोगों के बीच आत्मीयता और दोस्ती का प्रसार चाहते थे. उस कालखण्ड में मार्था के मन में यह विचार था कि ऑपेरा हाउस की कमाई से लाइब्रेरी का संचालन हो जाया करेगा. लेकिन चलचित्र के आगमन से लोगों की रुचि में बहुत बदलाव आया और अब हालत यह है कि लाइब्रेरी की आय से ऑपेरा हाउस को ज़िंदा रखा जा रहा है.

अपनी स्थापना के बाद से बहुत लम्बे समय तक यह लाइब्रेरी अपनी पुस्तकों के संग्रह के अलावा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रही. असल में सीमाएं, चाहे वे किन्हीं भी देशों के बीच की हों, लोगों के मन में एक दुर्निवार आकर्षण जगाती हैं. यह सोचना कि एक विभाजक रेखा के पार सब कुछ अलहदा है, बहुत रोमांचक  होता है. यही रोमांच इस पुस्तकालय और ऑपेरा हाउस में आने वाले लोगों के आकर्षण का कारण रहा और अब भी है. लेकिन ग्यारह सितम्बर 2001 की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद से काफी कुछ बदल गया है. उस समय से पहले तो इधर से उधर जाना-आना बहुत ही सहज-स्वाभाविक हुआ करता था. लेकिन इस घटना के बाद इस भवन के परिसर में न सही, आस-पास के माहौल में एक अनकहा तनाव महसूस किया जा सकता है. पुस्तकालय भवन के बाहर भी चौबीसों घण्टे अमरीकी सुरक्षा सेवा का एक वाहन पहरेदारी करता है. रॉयल कैनेडियन माउण्टेड पुलिस के सीमा सुरक्षा सैनिक भी वहां हर पल मौज़ूद रहते हैं. अमरीकी नागरिकों के लिए अब भी इस पुस्तकालय में आना-जाना बहुत सहज है. वे मुख्य द्वार  से सीधे अंदर घुस सकते हैं, लेकिन कनाडाई नागरिकों को क्योंकि तकनीकी रूप से अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को पार करना होता है, थोड़ी-सी असुविधा का सामना करना पड़ता है. उन्हें कुछ सुरक्षा कैमरों के आगे से गुज़रते हुए लाइब्रेरी  में प्रवेश  करना होता है. हां इतना ज़रूर है कि एक बार लाइब्रेरी में जाने के बाद वे बहुत सुगमता से अपनी किताबें इश्यू करवा कर लौट आते  हैं. हां, इस बात का ज़रूर ध्यान रखा जाता है कि इस सुविधा का दुरुपयोग करते हुए कोई कनाडाई नागरिक अमरीकी इलाके में ही  न रह जाए. असल में यदा-कदा इस तरह के प्रयास होते भी रहते हैं.  

तमाम बदलावों के बावज़ूद यह भवन दो देशों के बीच की विभाजक रेखा की वजह से अलग हो गए परिवारों को मेल मुलाकात के अवसर सुलभ  कराता है. यह भवन अगर आज भी लोगों को अपनी तरफ खींचता है तो इसके पीछे जो भाव अंतर्निहित है उसे समझा जाना ज़रूरी है. भौगोलिक राजनीतिक तनावों और दुनिया भर में जगह-जगह खड़ी होती जा रही दीवारों के बीच यह भवन संदेश देता है कि सारी सीमाएं अंतत: मानव की कल्पना से उत्पन्न हैं और उन्हें मानना न मानना भी अंतत: हमारे अपने विवेक पर ही निर्भर है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 7, 2019

बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है!

इधर दुनिया भर में बुढ़ापे को लेकर अनगिनत अध्ययन और शोध किये जा रहे हैं. भावी आर्थिक  नीतियों के निर्धारण के लिए यह बेहद ज़रूरी है. इन्हीं शोधों और अध्ययनों से अनेक दिलचस्प बातें छन छन कर सामने आ रही हैं. उनमें से कुछ की चर्चा करने बैठा हूं तो अनायास मुझे सन 2001 में बनी अमिताभ बच्चन की एक लोकप्रिय फिल्म का शीर्षक याद आ रहा  है – ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप!’  शीर्षक से ही यह स्पष्ट है कि बुड्ढा कहलाना किसी को पसन्द नहीं आता है. सच तो यह है कि लोग बुढापे में भी ‘अभी तो मैं जवान हूं’ ही गुनगुनाना पसन्द करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि उम्र के लिहाज़ से बुढ़ापा कब शुरु होता है? 

आपको यह बात तो मालूम  ही है  कि अतीत में ब्रिटेन में फ्रेण्डली सोसाइटीज़ एक्ट (1875) के आधार पर पचास की उम्र  से बुढ़ापे की शुरुआत मानी जाती थी. लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नई शोध की है उसके अनुसार पैंसठ पार की उम्र से बुढ़ापे की शुरुआत मानना प्रस्तावित है. इस शोध में हमारी आयु के विभिन्न पड़ावों को इस तरह से पहचाना गया है: शून्य से सत्रह बरस तक: अल्पायु या अण्डर एज, अठारह से पैंसठ बरस तक: युवावस्था, छियासठ से उनासी बरस तक: मध्य वय, अस्सी से निन्यानवे बरस तक: वरिष्ठ या बुज़ुर्ग, सौ बरस से अधिक वाले: दीर्घजीवी वरिष्ठ. सत्तर के दशक में जो नृवंशशास्त्रीय अध्ययन हुए उनमें मुख्यत: तीन आधारों पर यह वर्गीकरण किया गया था. आधार थे:  पहला- वर्ष की गणना, दूसरा– सामाजिक भूमिका में आया बदलाव (जैसे सेवा निवृत्ति, बच्चों का बड़ा हो जाना और रजोनिवृत्ति वगैरह), और तीसरा- क्षमताओं में आया बदलाव (जैसे शारीरिक अक्षमता, बुढापा, शारीरिक दक्षताओं में आया बदलाव). इनमें से भी दूसरे आधार को अधिक महत्वपूर्ण  माना गया.  

भारत में हम यह मान लेते हैं कि सरकारी सेवा निवृत्ति की उम्र से बुढ़ापा आ जाता है. सामान्यत: अभी यह उम्र साठ बरस है. कनाडा में सेवा निवृत्ति की आयु पैंसठ तो अमरीका में छियासठ बरस है और आशा की जा रही है कि दोनों ही देश शीघ्र ही इसे बढ़ाकर सड़सठ बरस कर देंगे. लेकिन सेवा निवृत्ति  की उम्र को बुढ़ापे के आगमन की बात मानना भी सबको स्वीकार्य नहीं है. वियना, ऑस्ट्रिया की एक शोध संस्था के विशेषज्ञों का मत है कि बुढ़ापे का फैसला वर्तमान आयु  के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि किसी के पास ज़िन्दगी के और कितने बरस बचे हैं. उनका मानना है कि जब किसी के पास जीने के लिए पन्द्रह या इससे कम बरस बचे हों तो उसे बूढ़ा कहा-माना जाना चाहिए. अब इस  लिहाज़ से देखें तो पचास के दशक में एक सामान्य अंग्रेज़ के पन्द्रह बरस और जीने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन आज पश्चिमी  देशों में यह माना जा रहा है कि एक औसत सेवा निवृत्त व्यक्ति कम से कम चौबीस बरस और पेंशन  का लाभ उठा लेगा. यानि मौज़ूदा हालात में चौहत्तर वर्षीय व्यक्ति को बूढ़ा माना जा सकता है. 

लेकिन सोचने की बात यह भी है कि क्या केवल यह चौहत्तर का अंक ही बुढ़ापे के आगमन का निर्धारक हो सकता है ? चौहत्तर बरस की उम्र के हर व्यक्ति की स्थिति एक जैसी नहीं हो सकती है. ग़रीब और अमीर की, ग्रामीण और शहरी की, अनपढ़ और पढ़े लिखे की, अनुकूल और प्रतिकूल  जीवन स्थितियों वाले समान उम्र के व्यक्ति की दशा में बहुत बड़ा फर्क़ हो सकता है. स्त्री पुरुष के मामले में तो यह अंतर प्रमाण पुष्ट भी है. इसके अलावा अपवाद तो होते ही हैं. यह भी अनुमान लगाया गया है कि अभी हाल में रिटायर हुए बारह  में से एक पुरुष और सात में से एक स्त्री कम से कम सौ बरस तक जीवित रहेंगे. तो क्या उन्हें अधिक उम्र से  से बूढ़ा माना जाए? अगर आप अपने घर में भी कोई पुरानी तस्वीर देखें तो पाएंगे कि पिछली पीढ़ी के लोग साठ बरस की उम्र में ही खासे जर्जर दिखाई देते थे जबकि आज उसी उम्र के लोग उनकी तुलना में बहुत सेहमतमन्द और ऊर्जावान दिखाई देते हैं और उन्हें कोई भी बूढ़ा नहीं कहना चाहेगा. सही बात तो यह है कि आज के सत्तर बरस अतीत के पचास बरस के बराबर हो गए हैं. कहना अनावश्यक है कि बेहतर जीवन स्थितियों और अपनी सेहत के  प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण यह बदलाव आया है.

तो, कुल मिलाकर मामला बहुत जटिल है और इस बात का कोई सर्वमान्य और सार्वकालिक उत्तर नहीं हो सकता कि किस उम्र के व्यक्ति को बूढ़ा माना जाए. वैसे, एक उत्तर हो सकता है जिससे शायद ही कोई असहमत हो, और वह यह कि बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है. यह तो एक मानसिक अवस्था है जो हरेक की भिन्न भिन्न होती है. 

आप क्या सोचते हैं?  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, June 1, 2018

भारतवंशी सुषमा ने दिया पूरी मानवता को एक संदेश


यह घटना सुदूर अमरीका में घटी, लेकिन जब इसके बारे में पढ़ा तो बरबस आंखें नम हो आईं और माथा सराहना में झुक गया. क्या ही अच्छा हो कि सारी दुनिया ऐसे ही अच्छे और संवेदनशील लोगों से भर जाए! घटना न्यूयॉर्क के एक जनाना अस्पताल की है जहां भारतीय मूल की कनाडा वासिनी और फिलहाल सपरिवार अमरीका में रह रहीं सुषमा द्विवेदी जिंदल भर्ती थीं. वे गर्भवती थीं और डॉक्टर की सलाह पर उनकी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले वाले जोड़ के पास प्रसव पीड़ा को कम करने वाला इंजेक्शन लगाया गया था. चिकित्सकीय भाषा में इसे एपीड्यूरल एनेस्थीसिया कहा जाता है. इंजेक्शन का असर शुरु होने लगता उससे पहले ही सुषमा को पता चला कि उसी अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती एक स्त्री और उसके साथी  को सहायता की ज़रूरत है. असल में ब्रायना डॉयेल और उनके साथी केसी वॉको इस बात के लिए बहुत आकुल व्याकुल थे कि ब्रायना शिशु को जन्म दे उससे पहले उनका धार्मिक विधि विधान पूर्वक बाकायदा विवाह हो जाए. वैसे वे लोग एक दिन पहले अदालत में जाकर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चुके थे और विवाह का कानूनी प्रमाण  पत्र भी हासिल कर चुके थे. वे धार्मिक रीति से विवाह की रस्में भी पूरी कर लेते लेकिन गर्भस्थ शिशु को शायद इस दुनिया में आने की बहुत ज़्यादा जल्दी थी, सो उन्हें बजाय चर्च जाने के भागकर अस्पताल आना पड़ गया. वैसे डॉक्टरों ने बच्चे की जन्म की जो सम्भावित तिथि बताई थी वो अभी काफी दूर थी, और अगर सब कुछ योजनानुसार चलता तो तब तक वे धार्मिक रीति से भी पति पत्नी बन चुके होते, लेकिन सब कुछ योजनानुसार हो जाता तो यह प्रसंग ही क्यों बनता? ब्रायना और वॉको की व्याकुलता को समझ संवेदनशील अस्पताल कर्मियों (वो कोई भारत का सरकारी अस्पताल थोड़े ही था!) ने अस्पताल के पादरी की तलाश की, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए तो उन्होंने भी अपने हाथ खड़े कर दिए.

जब इस पूरे मामले की भनक सुषमा को लगी तो उन्होंने अस्पताल वालों से कहा कि यह पवित्र कार्य तो वे भी सम्पन्न कर सकती हैं. उन्होंने अस्पताल वालों को बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने इस कार्य का बाकायदा ऑनलाइन  प्रशिक्षण प्राप्त किया है और वे तब से पर्पल प्रोजेक्ट नामक एक सेवा का संचालन कर रही हैं जो एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) समुदाय के लोगों और उन हिंदू धर्मावलम्बियों के विवाह सम्पन्न करवाती हैं जिन्हें उपयुक्त पण्डित नहीं मिल पाते हैं. अस्पताल प्रशासन तेज़ी से हरकत  में आया और उसने इस अजीबोगरीब विवाह के लिए तुरत फुरत सारी सुविधाएं जुटा दीं. लेकिन तब तक सुषमा पर उस इंजेक्शन का असर होना शुरु हो गया था और उन्हें लगा कि वे चलना तो दूर शायद खड़ी भी न रह सकें. वो कहते हैं ना कि जहां चाह वहां राह. तो इस समस्या का भी हल निकाल लिया गया. बजाय इसके कि सुषमा उस युगल के पास जाकर विवाह सम्पन्न करातीं, ब्रायना और वॉको को ही उनके अस्पताली पलंग के पास ले आया गया. अस्पताल की नर्सों ने ब्रायना के केश संवार कर उसे दुल्हन बनाया तो अन्य चिकित्सा कर्मियों ने अस्पताल में उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करते हुए दुल्हे मियां की समुचित साज सज्जा कर दी. कोई भाग कर फूल भी ले आया और एक बंदे ने तो अवसरानुकूल कविता भी रच डाली. और फिर नर्सों के मंगल गान के बीच यह युगल अस्पताल के गलियारों से होता हुआ बिस्तर पर लेटी पण्डितानी यानि सुषमा के सामने जा पहुंचा. सुषमा ने विवाह की रस्में पूरी कीं और बुधवार की उस आधी रात को वो अस्पताल जैसे प्रेम के जीते जागते मंदिर में तब्दील हो गया.

इसके चार घण्टे बाद इस खूबसूरत दुनिया में एक शिशु अवतरित  हुआ जिसे अब नयन जिंदल नाम से जाना जाएगा और नयन महाशय के इस दुनिया में पदार्पण के चंद घण्टों बाद ब्रायना ने जन्म दिया रिले को. और इस तरह न्यूयॉर्क के उस अस्पताल में लिखी गई  दो शिशुओं के जन्म की वो विलक्षण कथा जिसे कम से कम इन दो परिवारों में तो बार-बार सुनाया ही जाएगा. मेरे दिल को तो उस बात ने छुआ जो सुषमा ने बाद में पत्रकारों से कही. अश्विन और उनसे दो बरस छोटे नयन की मां सुषमा ने कहा कि “हमें खुशी है कि हम अपने बच्चों को यह पाठ पढ़ा पा रहे हैं. हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सदा इस बात को याद रखें कि अगर आपको अपनी ज़िंदगी में कभी भी दयालुता दिखाने और किसी और के लिए कुछ भी अच्छा करने का मौका  मिले तो उसे हाथ से न जाने  दें. जान लें कि ऐसा करना तनिक भी मुश्क़िल नहीं है.” मुझे लगता है कि यह संदेश अश्विन और नयन के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत (इस बार मंगलवार की बजाय) शुक्रवार, 01 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 13, 2018

डॉक्टरों ने कहा- हमारी तनख़्वाह मत बढ़ाओ!


कनाडा के क्यूबेक प्रांत के सैंकड़ों डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने अपनी सरकार को एक ज्ञापन देकर अपने बढ़े हुए वेतन का विरोध किया है और सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस राशि का इस्तेमाल नर्सों के लिए तथा मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए करे. यह बात सर्वविदित है कि कनाडा में सरकार सभी नागरिकों को निशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करती है. यह सुविधा मरीज़ की ज़रूरत पर आधारित होती है न कि उसकी खर्च करने की क्षमता पर. इसी फरवरी माह में वहां की सरकार ने अपने इस इलाके के मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की तनख़्वाह में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि करने की घोषणा की थी.

ऐसा माना जाता है कि क्यूबेक इलाके में डॉक्टरों को देश के अन्य इलाकों की तुलना में पहले ही ज़्यादा वेतन मिलता है. लेकिन इसी इलाके में नर्सों और अन्य चिकित्सा सेवकों की हालत बहुत बुरी है. इसी जनवरी में वहां की एक नर्स एमिली रिकार्ड की एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी नम आंखों की एक तस्वीर लगाते हुए बताया था कि उसे पूरी रात जागकर सत्तर मरीज़ों की देखभाल करनी पड़ी है और अब उसके पांव इतना दर्द कर रहे हैं कि वह सो भी नहीं पा रही है. उसने लिखा था कि वह अपने काम के बोझ से टूट चुकी है और उसे इस बात से शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि वो अपने मरीज़ों को कितनी कम सेवा दे पाती है. “हमारा स्वास्थ्य तंत्र बीमार और मरणासन्न है.” कल्पना की जा सकती है कि कितनी पीड़ा के साथ उसने यह लिखा होगा. कनाडा के नर्सिंग संघ ने भी सरकार पर ज़ोर डाला है कि वो यह सुनिश्चित करे कि एक नर्स को अधिकतम कितने मरीज़ों की देखभाल करनी है. क्यूबेक की नर्स यूनियन की अध्यक्ष नैंसी बेडार्ड का कहना था कि डॉक्टरों के लिए तो पैसों की कोई कमी नहीं होती है लेकिन मरीज़ों की देखभाल करने वाले औरों  की कोई परवाह नहीं की जाती है. 

नर्सों की इस व्यथा-कथा ने क्यूबेक के डॉक्टरों की अंतरात्मा को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने एक ज्ञापन देकर अपनी सरकार से यह अनुरोध  कर दिया कि वह  उनके बढ़ाये हुए वेतन को निरस्त कर दे और इस तरह जो राशि बचे उसे बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को असह्य बनाए, क्यूबेक क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में खर्च कर दे. अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि हमारी तनख़्वाहों में यह वृद्धि इसलिए और भी ज़्यादा आहत करने वाली है कि हमारी नर्सों, क्लर्कों और अन्य पेशेवरों को बहुत कठिन हालात में काम करना पड़ रहा है और हमारे मरीज़ों को हाल के वर्षों में की गई भीषण कटौतियों और सारी सत्ता के स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीकृत हो जाने की वजह से ज़रूरी सुविधाओं तक से वंचित रहना पड़ रहा है. इन तमाम कटौतियों का जिस एक बात पर कोई असर नहीं पड़ा है वो है हमारी तनख़्वाहें. और इसलिए इस वृद्धि को अभद्रबताते हुए उन्होंने लिखा, “हम क्यूबेक डॉक्टर यह अनुरोध कर रहे हैं कि चिकित्सकों को दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली जाए और इस तंत्र  के संसाधनों का बेहतर वितरण स्वास्थ्य कर्मियों की बेहतरी के लिए और क्यूबेक के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराने के लिए किया जाए.”

यह प्रकरण हमारी आंखें खोल देने वाला है. इससे पता चलता है कि एक ज़िम्मेदार और सभ्य समाज का चेहरा कैसा होता है. क्यूबेक के डॉक्टर चाहते तो बिना कोई ना-नुकर किये अपनी बढ़ी हुई तनख़्वाहें स्वीकार कर सकते थे. लेकिन उनके इंसान होने के एहसास ने उन्हें यह न करने दिया. अपने से ज़्यादा फिक्र उन्हें अपने सहकर्मियों की थी कि उन्हें कम तनख़्वाह में ज़्यादा समय खटना पड़ता है. उन्होंने इस बात की भी फिक्र की कि उनके प्रांत के नागरिकों को सरकारी कटौती की वजह से उस ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा से वंचित रहना पड़ रहा है जिसके वे हक़दार हैं.

लेकिन सब जगह सब कुछ अच्छा  ही नहीं होता है. डॉक्टरों की इस संवेदनशीलता पर झाड़ू फेरते हुए  कनाडा के चिकित्सा मंत्री ने अपने बयान में कहा कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें ज़्यादा तनख़्वाहें दी जा रही हैं तो वे उसे  टेबल पर ही छोड़ जाएं.  मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हम उस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर लेंगे. डॉक्टरों की इस व्यथा पर टिप्पणी करते हुए कि नर्सों को बहुत कम वेतन मिल रहा है और रोगियों पर होने वाले खर्च में कटौतियां की जा रही हैं, मंत्री जी ने फरमाया कि हमारे पास तमाम ज़रूरतों के लिए पैसा है और हम समय पर सारी समस्याएं हल कर लेंगे.

यानि मंत्री तो कनाडा में भी वैसे ही हैं जैसे अपने देश में हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ डुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 मार्च, 2018 को 'कनाडा के डॉक्टरों ने लौटाया बढ़ा हुआ वेतन' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 13, 2018

अब कनाडा के राष्ट्रगान में केवल बेटे नहीं बेटियां भी शामिल!

आखिर सन 2018 की जनवरी में कनाडा की सीनेट ने वह बिल पास कर ही दिया जिसके लिए लिए वहां के समझदार लोग करीब चार दशकों से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे. इस बिल के पास हो जाने से अब कनाडा का राष्ट्रगान केवल पुरुष पक्षी न रहकर उभयपक्षी या जेंडर न्यूट्रल हो जाएगा. कनाडा का राष्ट्रगान मूलत: 1880 में रचा गया था, लेकिन राष्ट्रगान का दर्ज़ा पाने में इसे एक शताब्दी का सफर तै करना पड़ा था. तब तक गॉड सेव द किंग ही कनाडा का भी राष्ट्रगान बना रहा. इस नए गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं: ओ कनाडा!अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड! / ट्रु पैट्रियट लव इन आल दाई  सन्स  कमाण्ड. सन 1997 में पचास वर्षीया फ्रांसिस राइट का ध्यान इन पंक्तियों पर गया और उन्हें यह बात अखरी कि इस गान में केवल बेटों का ही ज़िक्र क्यों है, बेटियों का क्यों नहीं? कुछ अन्य की शिकायत अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड से भी थी, विशेष रूप से उनकी जो कहीं अन्यत्र से आकर कनाडा वासी हो गए थे. लेकिन ज़्यादा ज़ोर इसके केवल बेटों को याद करने वाले  शब्दों पर ही था. 1998 में जब विवियन पॉय नामक एक पूर्व फैशन डिज़ाइनर सीनेट में पहुंची तब सीनेट की करीब आधी सदस्य स्त्रियां थीं. स्वभावत: उनमें से बहुतों को भी गीत के इन शब्दों पर गम्भीर आपत्ति थी. पॉय ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरु किया जिसमें उनका सक्रिय साथ दिया उक्त फ्रांसिस राइट ने.

उन दिनों की याद करते हुए राइट ने कहा कि वो ज़माना सोशल मीडिया का तो था नहीं. उनका अभियान हिचकोले खाता हुआ ही चला. एक एक हस्ताक्षर जुटाने के लिए उनें कड़ी मेहनत करनी पड़ी, फिर भी बमुश्क़िल चार पांच सौ हस्ताक्षर ही जुट सके. कुछ परम्परा प्रेमी लोग उनसे यह कहते हुए ख़फ़ा भी हुए कि “अरे भाई, यह गान ठीक ही तो है. इसमें बदलाव की ज़रूरत ही क्या है?” लेकिन क्योंकि पॉय और राइट को इस तरह की प्रतिक्रियाओं की पहले से उम्मीद थी, वे हताश  नहीं हुईं. वे यह बात समझती थीं  कि आखिर जिस गान को 3.6 करोड़ लोग इतने समय से गा रहे हैं, उसमें किसी भी बदलाव के लिए उन्हें तैयार करना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं. पॉय ने जब इसमें बदलाव के वास्ते प्राइवेट मेम्बर्स बिल पेश किया तो उन्हें तो यहां तक सुनना पड़ा कि अगर गान के शब्दों में बदलाव करना ही है तो इसमें सिर्फ औरतों को क्यों जोड़ा जाए, समाज के अन्य तबकों जैसे मछुआरों, बैंक कर्मियों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों वगैरह को भी क्यों न जोड़ दिया जाए! ज़ाहिर है कि बहुत सारे लोग बदलाव की मांग को तर्क संगत नहीं  मानते थे. इसके बावज़ूद दिसम्बर 2003 में यह आस बंधी कि शायद यह बिल पास हो जाए, लेकिन तब एक पुरुष सीनेटर ने अपने अहं के चलते इसे पास होने से रुकवा दिया.

लेकिन पॉय ने हार नहीं मानी. उन्हें 63 वर्षीया नैंसी रुथ का साथ मिला, जो कुछ मानों में कनाडा की राजनीति में एक विवादास्पद नेता भी मानी जाती हैं. वे एक जानी-मानी सीनेटर हैं, स्त्रीवादी हैं  और खुलकर स्त्री समलैंगिक सम्बंधों का समर्थन करती हैं. नैंसी को यह अभियान अपने स्त्रीवादी सोच के अनुरूप लगा और उन्होंने  इसका उन्मुक्त समर्थन  किया. उन्होंने बाद में कहा कि “मैं भी चाहती थी  कि इस मुल्क की स्त्रियों को अपने राष्ट्रगान में जगह मिले. मैं चाहती  थी कि मेरे जीते जी ही ऐसा हो जाए.” अपने प्रयासों को और तेज़ करते हुए उन्होंने इसके लिए एक संगठन भी बनाया. लेकिन उनका  मनचीता हो पाता उससे पूर्व ही उनका कार्यकाल पूरा हो गया. उनके बाद भी प्रयास ज़ारी रहे और आखिरकार पिछले बरस जून में हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस बदलाव  को लाने वाले बिल  को परित कर ही दिया. नैंसी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया एक अन्य स्त्रीवादी सीनेटर फ्रांसिस लैंकिन ने. उनका कहना था कि “मैं एक ऐसी दुनिया में जीना कहती हूं जिसमें पहले ही दिन से सभी  के लिए समान अवसर हों. क्या इस बिल से ऐसा हो जाएगा? नहीं. लेकिन कम से कम यह तो होगा कि मेरी पोती मुझसे यह सवाल नहीं करेगी कि इस गान में केवल बेटे ही क्यों हैं? इसमें बेटियों का ज़िक्र क्यों नहीं है? अब ऐसा नहीं होगा.” और आखिर यह बिल पास हो ही गया. अब इस गान में ऑल दाई सन्स कमाण्ड की जगह इन ऑल ऑफ अस कमाण्ड गाया जाएगा.

इस बिल पर सबसे खूबसूरत प्रतिक्रिया ज़ाहिर की कनाडा की विख्यात लेखिका मार्गरेट एटवुड ने. उन्होंने नैंसी को सम्बोधित एक पत्र में लिखा, “एक कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से तुम्हारा शुक्रिया. सिर्फ वो ही व्यक्ति तुम्हारा आभार नहीं मानेगा जो यह चाहता है कि मैं जिस चट्टान के नीचे से निकल कर आई हूं, फिर से जाकर उसी के नीचे घुस जाऊं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 24, 2017

किस्सा विकट संगीत प्रेमियों और उनसे त्रस्त नागरिकों का

क्या किसी संगीत-प्रेमी युगल का अपनी मोटर कार में स्टीरियो बजाना इतना बड़ा मुद्दा है कि अदालत को अपना कीमती वक़्त खर्च करते हुए उससे जिरह करनी पड़े और आखिरकार हस्तक्षेप करने को बाध्य होना पड़े? हाल में कनाडा के एक  शहर में जो कुछ घटित हुआ उससे तो यही लगता है कि यह मामला बहुत साधारण और नज़र अंदाज़ करने काबिल नहीं है. इस शहर में रहता है एक चौबीस वर्षीय युवा जिसका नाम है डस्टिन हैमिल्टन. डस्टिन न केवल संगीत प्रेमी है ध्वनि तकनीक का भी विशेषज्ञ है. उसने संगीत का बेहतरीन लुत्फ़  लेने के लिए अपनी क्रूज़र गाड़ी को आधुनिकतम ध्वनि उपकरणों से सज्जित कर रखा है. इस तकनीक में उसकी विशेषज्ञता का आलम यह है कि एक ऑटो साउण्ड प्रतियोगिता में उसे स्वर्ण  पदक तक मिल चुका है.  हैमिल्टन एक ख़ास किस्म के हड्डियों के रोग से ग्रस्त है जिसकी वजह से उसकी रीढ़ की हड्डी को गहरी क्षति पहुंची है. लेकिन यह पदक उसे इतना धिक प्रिय है कि तमाम असुविधाओं के बावज़ूद वो हमेशा इस पदक को अपने गले में लटकाए रहता है. डस्टिन वैंकूवर के सेण्ट्रल सानिच शहर में रहता है. उसकी गर्लफ्रैण्ड कैटरीना भी उसके साथ रहती है और संगीत से उसे भी बहुत गहरा लगाव है.

दरअसल डस्टिन और कैटरीना को बहुत ऊंची आवाज़ में संगीत सुनने का शौक है. कहा जाता है कि जब वे अपनी गाड़ी लेकर  निकलते हैं तो उससे निकलने वाली संगीत की ध्वनियां  इतनी ज़बर्दस्त होती हैं कि आस-पास के घरों के फर्श थरथराने लगते हैं, घरों की दीवारों पर लटकी तस्वीरें कांपने लगती हैं, टेबल पर रखे कॉफी मग नीचे गिर पड़ते हैं और घरों में रह रहे पालतू जानवर भयभीत हो उठते हैं. अगर रात का वक़्त हो तो डर के मारे गहरी नींद में डूबे बच्चों की चीखें निकल पड़ती हैं. और यह सब रोज़मर्रा की बातें होती हैं. स्वाभविक ही है कि इससे उस शहर के बाशिंदे परेशान हैं. हैमिल्टन  के घर से उनके दफ्तर के बीच रहने वाले नागरिक पिछले कुछ ही समय में उनके खिलाफ कम से कम सत्रह शिकायतें पुलिस में दर्ज़ करवा चुके हैं. इन शिकायतों पर गौर करते हुए स्थानीय पुलिस ने दो बार इस युगल को चेतावनी भी दी कि वे अपनी गाड़ी के साउड सिस्टम का वॉल्यूम धीमा रखा करें, लेकिन जब इन चेतावनियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ तो पुलिस को उन्हें पाबंद करना पड़ा कि वे अपनी गाड़ी में स्टीरियो बजाएं ही नहीं. हैमिल्टन इस आदेश से सहमत नहीं था इसलिए वो अदालत में पेश हुआ और जब उससे पूछा गया कि उसे अदालती आदेश मानने में क्या दिक्कत है तो उसका कहना था कि संगीत से उसे बेपनाह मुहब्बत है, वो जो कुछ भी करता है संगीत के लिए ही करता है. असल में संगीत ही उसका जीवन है. उसने अदालत को यह भी बताया कि सैंकड़ों घण्टों की मेहनत से उसने अपनी गाड़ी में यह साउण्ड सिस्टम  फिट किया है और इस सिस्टम को खरीदने के लिए उसे अपनी गर्लफ्रैण्ड की सारी जमा पूंजी भी खपा देनी पड़ी है. ऐसे में संगीत न सुनने का आदेश भला वो कैसे मान सकता है? अदालत ने उससे यह भी अनुरोध किया कि वो दफ़्तर जाने का अपना रास्ता बदल ले ताकि उस इलाके के बाशिंदों  की शिकायत दूर हो सके. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि इसी सोच के तहत उसकी गर्लफ्रैण्ड अपनी एक नौकरी छोड़ कर दूसरी नौकरी करने लगी है ताकि वह हैमिल्टन के साथ ही काम पर  जा सके.

पुलिस ने हैमिल्टन और कैटरीना के इस विकट संगीत प्रेम पर रोक लगाने के लिए अदालत के सामने एक और तर्क रखा है  जो खासा वज़नदार है.  पुलिस का कहना है कि इन लोगों की गाड़ी से निकलने वाले संगीत की तेज़ आवाज़ से वहां के बाशिंदे इतने ज़्यादा त्रस्त हैं कि वे लोग अब इनकी गाड़ी का पीछा तक करने लगे हैं. पुलिस को डर है कि कहीं ऐसा न हो कि हैमिल्टन और कैटरीना उन लोगों के हत्थे चढ़ जाए और वे लोग इन्हें कोई गम्भीर शारीरिक क्षति पहुंचा दें. यानि पुलिस ने इन लोगों की सुरक्षा का तर्क देते हुए भी इनके संगीत प्रेम पर नियंत्रण लगाने का अनुरोध किया है.

अब देखना है कि अगली पेशी पर अदालत किसके हक़ में फैसला सुनाती है! फिलहाल हैमिल्टन और कैटरीना अपने संगीत प्रेम पर अटल और अविचलित हैं. कैटरीना कहना है कि वो दस बरस से इस इलाके में रह रही है और उसे तेज़ आवाज़ में ही संगीत सुनने का आदत है, जबकि हैमिल्टन इस सारे विवाद को  बेहूदा करार देते हैं और अपनी कार को उस इलाके की सबसे उम्दा सांगीतिक कार बताते हुए कहते हैं कि इससे निकलने वाला संगीत उन्हें किसी सिम्फ़नी जैसा लगता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 7, 2016

बेटियों के पक्ष में राष्ट्रगान में बदलाव की मांग

कनाडाई संसद में वहां के एक लिबरल सांसद मॉरिल  बेलांगर ने राष्ट्रगान में संशोधन का एक बिल पेश कर रखा  है.  वे चाहते हैं कि कनाडा के  वर्तमान राष्ट्रगान में आने वाले शब्दों ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम हम सबमें देशभक्ति जगाते हो’ कर दिया जाए, यानि वे इसे बेटों तक सीमित नहीं रहने देना चाहते हैं. मॉरिल का कहना है कि इस संशोधन के माध्यम से वे उन स्त्रियों को भी मान देना चाहते हैं  जिन्होंने आज के कनाडा को आकार देने में अपना योग दिया है. मॉरिल ने संसद के पिछले अधिवेशन में भी यह संशोधन प्रस्तुत किया था लेकिन तब यह संशोधन इसका विरोध करने वाले 144 मतों के विरुद्ध केवल 127 मत ही पा सका था. लेकिन अब मॉरिल के इस बिल को न केवल काफी समर्थन मिल रहा है, इसे जल्दी  से जल्दी पारित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि मॉरिल एक असाध्य रोग से गम्भीर रूप से पीड़ित हैं,  और उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है. वे बिल्कुल भी नहीं बोल पाते हैं. यहां तक कि कनाडाई संसद में जनवरी में यह बिल भी उन्होंने अपने आइ पैड पर स्थापित एक टेक्स्ट टू स्पीच प्रोग्राम की मदद से ही प्रस्तुत किया था. चाहा जा रहा है कि यह संशोधन उनके जीवन काल में ही पारित हो जाए. जिन सांसदों ने पिछली दफा इस संशोधन का विरोध  किया था उनमें से भी अनेक इस बार इसका समर्थन कर रहे हैं.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई इस संशोधन का समर्थन  ही कर रहा है. कनाडा के कंज़र्वेटिव तथा उसके सहयोगी दलों के सदस्य आम तौर पर इसके विरोध में हैं. उनका कहना है कि “राष्ट्रीय प्रतीकों में बदलाव का मार्ग बहुत फिसलन भरा है. हो सकता है कि कल को कोई वनस्पति विज्ञानी उठ खड़ा हो और कहने लगे कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज में मेपल की पत्ती का आकार सही नहीं है इसलिए उसे बदल दिया जाए. कल को कोई और भी किसी राष्ट्रीय प्रतीक के लिए इसी तरह की मांग कर सकता है.” एक कंज़र्वेटिव सांसद एरिन ओ’टूल का कहना है कि हालांकि उन्हें मॉरिल की अवस्था  से गहरी सहानुभूति है, वे इसे उचित नहीं मानते कि कनाडा की विरासत के महत्वपूर्ण हिस्सों के साथ कोई छेड़छाड़ की जाए.

वैसे यहीं यह जान लेना भी कम रोचक नहीं होगा कि मॉरिल जो संशोधन चाह रहे हैं अगर वो कर दिया गया तो कनाडाई राष्ट्रगान का नया रूप करीब-करीब वैसा ही हो जाएगा जैसा यह 1914 से पहले था. असल में 1914 में ही ‘तुम हममें सच्ची देशभक्ति  जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ किया गया था. और इसके मूल में यह तमन्ना थी कि प्रथम विश्व युद्ध के दौर में देश के लिए समुद्र पार जाने वाले युवकों में देश भक्ति  का जोश जगाया  जा सके. वैसे कनाडा के इस राष्ट्रगान  ने बदलावों के कई दौर देखे और झेले  हैं.  इस गीत की रचना मूल रूप  से फ्रेंच भाषा में 1880 में हुई थी. एक समय तो ऐसा भी रहा जब कनाडा की फ्रेंच भाषी जनता तो यह गान  गाती थी और वहां की अंग्रेज़ी भाषी जनता इसकी बजाय अंग्रेज़ी राष्ट्रगान ‘गॉड  सेव द किंग’ ही गाती थी. फिर 1906 में इस फ्रेंच राष्ट्रगान का रॉबर्ट स्टेनली वियर नामक कनाडाई कवि और जज रचित यह अंग्रेज़ी संस्करण चलन में आया. इसके बाद इसमें दो बार संशोधन हुए. इसका वर्तमान प्रचलित रूप 1980 से चलन में है.

यही यह भी बता दूं कि  अगर यह बदलाव हो गया तो अपने राष्ट्रगान में बदलाव करने वाला कनाडा पहला देश नहीं होगा. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया था, तो सद्दाम हुसैन के पराभव के बाद इराक़ ने भी ऐसा ही  किया. रंगभेद खत्म कर देने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया तो सोवियत संघ के पतन के बाद रूस के राष्ट्रगान में बदलाव किया गया. बाद में सन 2000 में व्लादीमिर पुतिन ने फिर से पुराने राष्ट्रगान  को अपना लिया लेकिन मूल के एक पद को छोड़ दिया. हाल में सन 2012 में ऑस्ट्रिया ने भी अपने राष्ट्रगान के पहले छन्द में थोड़ा बदलाव करते हुए बेटों के साथ बेटियों को भी जोड़ लिया. स्विटज़रलैण्ड में इस आलोचना के बाद कि वहां का राष्ट्रगान कुछ अधिक ही धार्मिक है, एक सार्वजनिक प्रतियोगिता के द्वारा ज़्यादा आधुनिक शब्दावली वाला गीत तलाश किया गया. एक विजेता घोषित भी कर दिया गया लेकिन स्विस सरकार ने अभी तक इस बदलाव पर मतदान नहीं कराया है.

अब देखना है कि कनाडा में यह बदलाव हो पाता है या नहीं. फिलहाल तो वहां बहसों का बाज़ार गर्म है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.