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Tuesday, September 3, 2019

लोगों का घर बसे, चीन सरकार ने चलाई 'लव स्पेशल ट्रेन'


हाल में चीन में सरकार ने एक विशेष रेलगाड़ी चलाई है, जिसका नाम है लव स्पेशल ट्रेन. यह रेलगाड़ी चोंगकिंग नॉर्थ स्टेशन से कियानजियांग स्टेशन तक चलती है और इसमें एकल अर्थात सिंगल स्त्री या पुरुष ही यात्रा कर सकते हैं. दो दिन और एक रात के सफर वाली दस डिब्बों की यह विशेष रेलगाड़ी इसलिए चलाई गई है ताकि यात्रीगण अपने लिए उपयुक्त जीवन साथी तलाश कर सकें. अब तक इस रेलगाड़ी में तीन हज़ार सिंगल्स यात्रा कर चुके हैं और उनमें से दस जोड़े बनने का शुभ समाचार मिल चुका है. इस रेलगाड़ी को चलाने की ज़रूरत क्यों पड़ी, इसे जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चेयरमेन माओ के प्रोत्साहन की वजह से चीन में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई थी. 1978 तक आते-आते यह वृद्धि वहां की तत्कालीन सरकार के लिए इतनी बड़ी मुसीबत बन गई कि उसे मज़बूर होकर एक संतान की नीति की घोषणा करनी पड़ी. पति पत्नी को केवल एक ही संतान पैदा करने की अनुमति थी और अगर दूसरी संतान हो जाती तो सरकार चाहती कि जैसे भी हो वे लोग उससे छुटकारा पाएं. इस कठोर और निर्मम नीति को लागू कर चीन ने अपनी बढ़ती जनसंख्या पर तो नियंत्रण पा लिया, लेकिन इसी नीति की वजह से आज वहां के समाज को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. असल में चीनी समाज में भी लड़कों को अतिरिक्त महत्व दिया जाता है और लड़कियों को कमतर माना जाता है. इस वजह से जब एक संतान वाली  नीति वहां प्रभाव में आई तो लोगों ने येन केन प्रकारेण अकेली संतान के रूप में लड़कों को ही इस दुनिया में लाने के प्रयास ज़ारी रखे. भले ही पिछले बरस चीन ने अपनी इस एकल संतान नीति में थोड़ी छूट देते हुए उन मां बाप को दूसरी संतान पैदा करने की अनुमति दे दी जिनमें से कोई एक अपने मां बाप की एकल संतान था या थी, इतने बरस चली इस नीति के कुपरिणामों का सामना तो करना ही था. एक मोटे अनुमान के अनुसार इन दशकों में करीब पौने चार करोड़ चीनी कन्याओं को अनचाहा या अतिरिक्त मान कर गर्भपात, भ्रूण हत्या, इधर उधर फेंक देने या अवैध क्रय विक्रय का शिकार बनाया गया. इसके अलावा, यह तो आधिकारिक आंकड़ा है कि इस नीति के चलन में आने के बाद वहां चालीस करोड़ गर्भपात किये गए. बहुत सारे मां-बाप ऐसे भी थे जो अपनी दूसरी संतान से किसी भी तरह छुटकारा नहीं पा सके लेकिन क्योंकि इसकी अनुमति नहीं थी, उन्होंने अपनी इस संतान को छिपा कर रखा और उसका कहीं भी आधिकारिक पंजीकरण नहीं कराया. परिणाम यह हुआ कि यूनीसेफ़ के आंकड़ों के अनुसार आज चीन में पांच बरस से कम उम्र के दो करोड़ नब्बे लाख बच्चे ऐसे हैं जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, और इस वजह से चीनी सरकार के लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं है. न वे पढ़ सकते हैं, न इलाज़ करवा सकते हैं, न कहीं जा आ सकते हैं.

अभी स्थिति यह है कि चीन में लड़के  लड़की का अनुपात 118:100 है. कहीं कहीं तो यह अनुपात 130:100 तक भी है. स्मरणीय है कि दुनिया में औसतन यह अनुपात 103:100 से 107:100 के बीच है. कहने का आशय यह कि वर्तमान चीनी समाज में लिंगानुपात में भारी  असंतुलन है. चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवम परिवार नियोजन आयोग ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि वहां बहुत विकट लैंगिक असंतुलन है और यह बात वहां की जनसंख्या के बहुत बड़े भाग को प्रभावित कर रही है. इस लैंगिक असंतुलन का ही परिणाम है कि वहां लाखों पुरुष ऐसे हैं जिनको दूर-दूर तक विवाह की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती है. शहरों की तुलना में गांवों में स्थिति और भी अधिक विकट है. कहा जा रहा है कि हर चार में से एक चीनी पुरुष अविवाहित ही रह जाएगा. इस असंतुलन का एक दुष्परिणाम यह भी हो रहा है कि चीनी समाज में समलैंगिकता बढ़ रही है.

ऐसे में स्थिति को सुधारने के लिए चीन की सरकार जो अनेक प्रयास कर रही है उन्हीं में से एक प्रयास यह लव स्पेशल ट्रेन चलाने का भी है. लेकिन इस प्रयास की सफलता इसलिए संदिग्ध है कि असल समस्या तो यह नहीं है कि लड़के लड़की विवाह नहीं करना चाहते हैं, बल्कि  समस्या यह है कि है कि वहां लड़कियों की कमी है. देखना दिलचस्प होगा कि चीन अपनी इस  समस्या से कैसे उबरता है. इस समस्या में हमारी दिलचस्पी इसलिए भी होनी चाहिए कि भले ही सरकार ने हमारे यहां एकल संतान जैसी कोई नीति लागू न की हो, लड़कियों को लेकर पारम्परिक भारतीय समाज का सोच तो चीन जैसा ही है और इसी कारण हमारे यहां भी लिंगानुपात गड़बड़ा रहा है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक राजस्थान पत्रिका पावर्ड बाय न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 सितम्बर 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 19, 2019

जनसंख्या की कमी से जूझते एक देश की दास्तान


मध्य यूरोप का एक छोटा-सा देश हंगरी इन दिनों एक अजीबो-गरीब संकट से जूझ रहा है. जब मैं अजीबो-गरीब संकट की बात कर रहा हूं तो मेरे मन में अपने देश के हालात भी साथ-साथ चहलकदमी कर रहे हैं. ऑस्ट्रिया, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, रोमानिया, सर्बिया और स्लोवाकिया जैसे देशों से चारों तरफ घिरा हुआ यह देश अपने सुदीर्घ इतिहास, उच्च आय वाली मौज़ूदा अर्थ व्यवस्था और बेहद मज़बूत पर्यटन उद्योग के लिए जाना जाता है. हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट की गणना यूरोप के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है  और हर बरस कोई 44 लाख लोग यह शहर घूमने आते हैं. इस वजह से इसे यूरोप के छठे सर्वाधिक लोकप्रिय शहर का दर्ज़ा हासिल है.  देश के लोग खूब सुखी हैं. यहां की उन्नत व्यवस्थाओं की वजह से लोगों को बहुत आसानी से स्वच्छ पेयजल सुलभ है और वर्ल्ड हैप्पीनेस  रिपोर्ट में इस देश को 69 वां स्थान प्राप्त है.

आप भी सोच रहे होंगे कि जब सब कुछ इतना अच्छा है तो फिर संकट क्या है? संकट है जनसंख्या का. और इसीलिए मुझे अपना भारत याद आ रहा है. हंगरी का संकट हमसे एकदम उलट है. सन सत्तर से ही यहां की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है. कभी इस देश की जनसंख्या एक करोड़ दस लाख थी, वह अब घटकर अट्ठानवे लाख चार हज़ार रह गई है. और यह बात हंगरी की सरकार को बेहद परेशान किए हुए है. प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने तो यहां तक कह दिया है कि अगले पांच बरसों तक उनकी सरकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य ही इस जनसंख्या की गिरावट को रोकने का रहेगा. असल में हंगरी की सरकार की चिंता केवल घटती जनसंख्या को लेकर ही नहीं है. समस्या यह भी है कि वहां युवाओं की तुलना में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हंगरी में आयु सम्भाव्यता खासी ऊंची यानि 76.1 वर्ष है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि बहुत जल्दी यह बढ़कर 86.7 वर्ष तक जा पहुंचेगी. इसकी वजह से सन 1990 में जहां इस देश में प्रति एक हज़ार  शिशु (0-14 वर्ष) चौंसठ साल की उम्र वाले पैंसठ लोग हुआ करते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर एक सौ अट्ठाइस तक जा पहुंची है. इसके विपरीत हाल के बरसों में चौदह वर्ष तक के बच्चों की संख्या में बहुत ज़्यादा कमी आई है. ज़ाहिर है इन बदलावों का असर यहां की उत्पादकता पर पड़ रहा है. मेहनत करने वाले युवा घटते जा रहे हैं और बहुत कम काम कर सकने वाले वृद्ध बढ़ते जा रहे हैं.

हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व जनसंख्या सम्भावनाओं के संशोधित अनुमान की जो रिपोर्ट प्रकाशित की है उसमें भी इन बदलावों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए यह भयावह आशंका व्यक्त की गई है कि अगर कोई बड़ा चमत्कार न हुआ तो इस शताब्दी के आखिर तक केंद्रीय और  मध्य यूरोप की पूरी जनसंख्या ही विलुप्त हो जाएगी. इसी रिपोर्ट में यह डर भी व्यक्त किया गया है कि सन 2100 तक हंगरी की जनसंख्या घटकर मात्र साठ लाख रह जाएगी. और ऐसा तब होगा जब इस शताब्दी के अंत तक धरती की जनसंख्या  बढ़कर 11.2 बिलियन हो जाएगी. इस रिपोर्ट का यह आकलन हमारे लिए विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि सन 2017 से 2050 तक दुनिया की जनसंख्या की कुल वृद्धि सिर्फ नौ देशों में सिमट कर रह जाएगी. ये नौ देश हैं: भारत, नाइजीरिया, कॉंगो गणराज्य, पाकिस्तान, इथोपिया, तंजानिया गणतंत्र, अमरीका, युगाण्डा और इण्डोनेशिया.

हंगरी की जनसंख्या समस्या का एक आयाम यह भी है कि वहां की सरकार इस बात को अधिक पसंद नहीं करती है कि अन्य देशों के लोग वहां आकर बसें. इसलिए फिलहाल तो हंगरी के वैज्ञानिक  जहां इस जुगत में हैं कि कैसे बढ़ी उम्र में भी लोगों की कार्यक्षमता को बनाए रखा जाए, वहां की सरकार अपने विभिन्न प्रयासों के माध्यम से लोगों को अधिक संतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करने में जुटी हुई है. इस बात पर विमर्श ज़ारी है कि क्यों नहीं तीन से अधिक संतानों को जन्म देने वाली माताओं को आजन्म आयकर से मुक्ति प्रदान कर दी जाए. इस बात पर भी विचार चल रहा है कि माताओं को तो मातृत्व अवकाश मिलता ही है, अब  पिताओं को भी पैतृक अवकाश दिया जाने लगे. हंगरी में एक व्यवस्था यह भी है कि सरकार  नियमित रूप से जनता से विचार  विमर्श कर भावी नीतियां तै करती है. इस विमर्श में भी जनसंख्या की कमी से निबटने के विभिन्न उपायों पर चर्चाएं होती रहती हैं और उम्मीद की जा रही है कि अगले विमर्श से जो सुझाव आएंगे वे देश की जनसंख्या विषयक नीतियां निर्धारित करने में प्रयुक्त किए जाएंगे. हो सकता है हंगरी और भारत की स्थितियों की तुलना करते हुए आपको भी निदा फाज़ली साहब का यह शेर याद आ जाए: 
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, September 25, 2018

लड़की, जब तक तुम पति नहीं जुटा लेती तुम्हारा जीवन व्यर्थ है!


सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में, जब चीन तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या की समस्या से त्रस्त था, तत्कालीन सरकार ने यह व्यवस्था लागू कर दी थी कि एक  युगल एक ही संतान को जन्म दे सकता है. व्यवस्था तो लागू हो गई, और समस्या पर काबू भी पा लिया गया,  लेकिन अब अध्येतागण यह पा रहे  हैं कि इस व्यवस्था के बाद जो संतानें पैदा हुईं वे ज्यादा निराशावादी हैं, जोखिम लेने से कतराती हैं और प्रतिस्पर्धा से बचना चाहती हैं. एक ही संतान को जन्म देने की सरकारी नीति के पालन का एक और असर यह हुआ कि बहुत सारे युगलों ने गर्भस्थ कन्या शिशु को कोख  में ही मार डाला  और अब विशेषज्ञों को आशंका है कि सन 2020 तक आते-आते कम से कम तीन करोड़ चीनी अपने लिए दुल्हन नहीं जुटा पाएंगे.

लेकिन कोढ़ में खाज यह कि संख्या में कम होने के बावज़ूद चीन में लड़कियों को शादी के लिए लड़के नहीं मिल रहे हैं.  असल में विवाह और पारिवारिक स्थितियों के मामले में चीन और भारत में अद्भुत साम्य है. वहां भी मां-बाप की पहली चिंता लड़की के हाथ पीलेकर देने की ही है और यह  काम वहां लगातार कठिन होता जा रहा है. कई बरसों से शंघाई में रह रही खासी पढ़ी लिखी और उम्दा नौकरी कर रही अट्ठाईस वर्षीया एक लड़की ड्रीम बताती है कि उसकी मां प्राय: इस बात पर दुखी होती हैं कि उसका कोई पुरुष मित्र क्यों नहीं है. अगर पुरुष मित्र होता तो मां को उसकी शादी की आस बंधती. उधर ड्रीम का कहना है कि चीनी मर्द अभी भी पत्नी के रूप में घर के काम काज में निपुणसेवा-भावी स्त्री की ही तलाश में रहते हैं. चीन में लड़की को एक ऐसी वस्तु के रूप में देखा जाता है जो चौबीस साल की होने के बाद अपना आकर्षण और महत्व खो देती है.  और इसके बाद  ड्रीम और उस जैसी लड़कियों को शेंग नुनाम से पुकारा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है बची-खुची स्त्रियां. 

लेकिन यह समय तो बाज़ार का है. वह हर जगह अपने लिए सम्भावनाएं खोज लेता है. प्रौढ़ावस्था की तरफ कदम बढ़ा रही स्त्रियों की मदद के लिए चीन में बहुत सारे व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुल गए हैं जो उन्हें कैसे तलाश करें बॉय फ्रैण्डविषय पर ज्ञान देने का पुण्य कमाते हुए ख़ासी कमाई भी कर रहे हैं. ऐसे ही एक प्रतिष्ठान वायम क्लब के अध्यक्ष है श्री  एरिक जो पिछले दस बरसों से इस काम में लगे हैं. शुरुआत  तो उन्होंने पुरुषों की सेवा से की थी लेकिन अब ज़्यादा सम्भावनाएं स्त्रियों की सेवा में नज़र आईं तो अपना कार्य क्षेत्र बदलने में तनिक भी संकोच नहीं किया. एरिक के क्लब में पढ़ाई सस्ती नहीं है. वे एक माह की फीस कोई छह हज़ार युआन (एक युआन करीब ग्यारह रुपये के बराबर) लेते हैं. लेकिन उनके काम का तरीका बहुत व्यवस्थित है. मसलन वे अपने यहां आने वाली स्त्रियों को  यह सिखाने के लिए कि वे किस तरह योग्यपुरुष तक पहुंचें सैद्धांतिक ज्ञान देने के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान करते हैं. इस के अंतर्गत प्रशिक्षणार्थियों को किसी लोकप्रिय शॉपिंग मॉल में जाकर खड़ा होना होता है. वहां इन्हें यह प्रदर्शित करते हुए कि जैसे उनके मोबाइल की बैटरी चुक गई है, किसी उपयुक्त प्रतीत होने वाले पुरुष के पास जाकर  यह अनुरोध करना होता है कि वह अपने मोबाइल से उनकी फोटो खींच दे. ज़ाहिर है कि फोटो खींचने के बाद  वह पुरुष उस स्त्री को फोटो भेजेगा भी. और इस तरह बिना मांगे ही उसका मोबाइल नम्बर स्त्री के पास आ जाएगा. फिर उनके बीच कुछ औपचारिक बातचीत होगी, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता  उनके बीच की दूरियां नज़दीकियों में तब्दील होती जाएगी. 

ऐसी ही एक अन्य कम्पनी है डायमण्ड लव जो विशेष रूप से अमीर ग्राहकों की सेवा करती है. यह कम्पनी दस हज़ार से लगाकर दस लाख युआन तक का शुल्क लेकर उपयुक्त जीवन साथी तलाश कर देती है. यह कम्पनी अपने कार्यकर्ताओं को लव हण्टर्स के नाम से  पुकारती है. ग्राहक अपने जीवन साथी के लिए जो-जो गुण बताता है उनको ध्यान में रखकर ये लव हण्टर्स सम्भावित जीवन साथी छांटते है. इस कम्पनी को हमारे यहां की जोड़ी बनाने वाली कम्पनियों जैसा माना जा सकता है. इनके अलावा शंघाई के पीपुल्स पार्क में हर सप्ताहांत पर एक मैरिज़ मार्केट भी लगता है जहां अपनी संतानों का विवाह करवाने के इच्छुक मां-बाप इकट्ठे  होकर अपने बच्चों के बारे में सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं. कहना अनावश्यक है कि यहां अपेक्षाकृत कम समृद्ध लोग आते हैं.

आर्थिक और औद्योगिक  क्षेत्र में चीन ने भले ही कितनी ही प्रगति कर ली हो, जहां तक स्त्रियों का सवाल है, खूब पढ़ाई लिखाई करके और अच्छी नौकरी पाकर भी वे सुखी कहलाने की अवस्था में नहीं आ सकी हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 25 सितम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 22, 2018

यह गिरावट भी स्वागत योग्य है!


कैसी अजब दुनिया है यह! इधर हम अपने देश में बढ़ती जा रही जनसंख्या से त्रस्त हैं, और उधर अमरीका में सन 2008 की कुख्यात महा मंदी के बाद उर्वरता दर (फर्टिलिटी रेट) घटने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह अब तक नहीं रुका  है. इस बार तो लगातार दूसरे बरस इस दर में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज़ की गई है. वैसे निकट अतीत में 1958 से 1968 के बीच भी अमरीका में ऐसा ही हो चुका है. उर्वरता दर को किसी भी देश के जनसंख्या संतुलन को मापने का प्रामाणिक पैमाना माना जाता है. अगर दर बढ़ जाती है तो देश के ज़रूरी संसाधनों मसलन शिक्षा, मकान वगैरह की आपूर्ति प्रतिकूलत: प्रभावित होती  है, और घट जाती है तो काम करने वाली जन शक्ति घटने और काम न कर सकने वाली वृद्ध जनशक्ति बढ़ने लगती है. रूस और जापान में ऐसा ही हो रहा है. यहीं यह भी जान लीजिए कि उर्वरता दर की गणना इस आधार पर की  जाती है कि 15 से 44 वर्ष के बीच आयु वाली एक हज़ार स्त्रियां  कितने बच्चों को जन्म देती हैं. लेकिन बावज़ूद उर्वरता दर में हो रही सतत कमी के, फिलहाल अमरीका के सामने ऐसी कोई चुनौती नहीं है और इसके मूल में है सारी दुनिया के युवाओं का अमरीका  की तरफ आकर्षित होना. आप्रवासन की वजह से अमरीका उर्वरता दर की कमी के दुष्प्रभावों से बचा हुआ है.

सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि जब कोई देश आर्थिक संकटों में घिर जाता है तो वहां उर्वरता दर इस वजह से कम होने लगती है कि लोग अच्छे दिनों के लौटने  तक संतानोत्पत्ति को स्थगित किये रहते हैं. जब आर्थिक संकट दूर हो जाता है तो उर्वरता दर भी पूर्ववत हो जाती है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अमरीका के मामले में यह सिद्धांत भी ग़लत साबित हुआ है. आर्थिक हालात सुधरने के बावज़ूद, एक 2014 के अपवाद को छोड़कर वहां उर्वरता दर घटती ही जा रही है. सम्बद्ध विशेषज्ञ इसे हमारे समय के  बहुत बड़े जनसंख्या  रहस्यों में से एक मानते हैं. यह रहस्य इस तरह और गहरा जाता है कि सन 2007 की तुलना में 2017 में वहां पांच लाख बच्चे कम पैदा हुए, बावज़ूद इस यथार्थ के कि इन दस बरसों में गर्भधारण करने के लिए  सर्वाधिक उपयुक्त उम्र वाली स्त्रियों की संख्या में सात प्रतिशत की वृद्धि हुई.

बावज़ूद इस बात के कि इसे एक रहस्य कहा गया है, इसे समझने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि सामाजिक संरचना तेज़ी से बदल रही है. स्त्रियां ज़्यादा पढ़ लिख रही हैं, शादी करना स्थगित कर रही हैं और परिवार का आर्थिक दायित्व वहन करने की प्रमुख भूमिका निबाहने के लिए तत्पर होने लगी हैं. इस बात को आंकड़ों से भी प्रमाणित किया गया है. जहां पिछले दस बरस में कम उम्र की युवतियों के मां बनने में बहुत कमी आई है वहीं उम्र के चौथे दशक के मध्य तक जा पहुंची स्त्रियों के मां बनने की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है. अब हालत यह है हर पांच में से एक संतान पैंतीस बरस या इससे अधिक वय की स्त्री के यहां जन्म ले रही है. ज़ाहिर है कि ऐसा इस कारण हो रहा है कि आज की स्त्री यह मानने-समझने लगी है कि उससे पहले वाली पीढ़ी की  स्त्री जिस उम्र में मां बना करती थी वही उम्र उसके कैरियर के विकास के लिए सबसे ज़्यादा अहम है. आज उसका सारा ध्यान अपने कैरियर पर केंद्रित है और इस कारण वह मातृत्व  को अगले कुछ बरसों के लिए स्थगित करने लगी है.

उर्वरता दर में गिरावट के इस मामले में कुछ बातें ख़ास तौर पर ग़ौर  तलब हैं. एक तो यह कि यह गिरावट अल्पसंख्यक स्त्रियों के मामले में अन्यों की तुलना में बहुत ज़्यादा है. मसलन लातिन अमरीकी स्त्रियों में यह गिरावट सत्ताइस प्रतिशत तक दर्ज़ की गई है. इसी तरह अश्वेतों में जहां यह गिरावट ग्यारह प्रतिशत  दर्ज़ की गई वहीं श्वेतों में मात्र चार प्रतिशत की गिरावट लक्ष्य की गई. दूसरी बात यह कि उर्वरता दर में सर्वाधिक कमी सामान्यत: युवा स्त्रियों में देखी गई लेकिन पिछले बरस यह कमी तीस पार की स्त्रियों में भी देखी गई. इस पूरे प्रसंग का सर्वाधिक उजला पहलू यह है कि किशोरियों के मां बनने की दर में लगातार और तेज़ी से कमी हो रही है. यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि सन 2007 से अब तक इसमें पचपन प्रतिशत की कमी आ चुकी है. इतनी ही नहीं, 1991 में जब किशोरियों के मां बनने की दर सर्वाधिक  थी तब से अब तक अगर इस गिरावट को आंकें तो यह आंकड़ा सत्तर फीसदी तक जा पहुंचता है. तमाम दूसरी बातें, अपनी जगह, इस गिरावट का तो हम सबको खुले मन से स्वागत करना ही चाहिए.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 31, 2017

जनसंख्या की कमी से जूझ रहा है इटली

जब भी अपने देश की समस्याओं की चर्चा होती है, बात घूम फिरकर इस बिंदु पर आ टिकती है कि हमारे देश की आधारभूत समस्या इसकी विशाल जनसंख्या है. आज़ादी के बाद अनेक प्रकार से जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास हुए हैं और उन प्रयासों को कामयाबी भी मिली है लेकिन देश के संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या इतनी अधिक है कि वे प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे वाली कहावत को चरितार्थ करने से आगे नहीं बढ़ पाते हैं. इस बात का उल्लेख करते हुए अगर मैं आपसे कहूं कि एक देश ऐसा भी है जो हमसे एकदम उलट समस्या से जूझ रहा है, तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे? इटली का नाम तो आपने सुना ही है.  पिछले कई दशकों से यह देश निरंतर घटती हुई जनसंख्या से त्रस्त है. इस देश में और विशेष रूप से इसके ऐतिहासिक महत्व के छोटे शहरों में जनसंख्या इतनी कम होती जा रही है कि वहां के प्रशासकों को अनेक अजीबोगरीब नुस्खे आजमाने पड़ रहे हैं! इटली की सरकार ने अपने मुल्क के बहुत सारे छोटे लेकिन खूबसूरत शहरों को सप्ताहांत  के आमोद-प्रमोद के लिए आदर्श ठिकानों के रूप में प्रचारित करना शुरु किया है. मात्र बारह स्थायी निवासियों वाला लाज़ियो ऐसा ही एक शहर है.  प्रचार का सुपरिणाम यह हुआ है कि पहले जहां इस शहर को देखने मात्र चालीस हज़ार लोग आते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर आठ लाख प्रतिवर्ष हो गई है. कुछ शहरों के पुराने घरों  को होटलों में तब्दील कर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है. कुछ शहर ऐसे भी हैं जो विज्ञापन देकर शरणार्थियों को अपने यहां बुला  रहे हैं. कैलाब्रिया नामक एक शहर ने तो बाकायदा यह घोषित कर दिया है कि शरणार्थी ही इटली की अर्थव्यवस्था का भविष्य हैं. यानि मंज़र कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा हम लोग अपने देश में कस्बों के बस स्टैण्डों पर देखते हैं जहां टैक्सी वाले यात्रियों को खींच खांचकर अपनी गाड़ियों में ठूंसने की कोशिश में लगे रहते हैं.

इसी इटली का एक बहुत छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत शहर है कैण्डेला. अपनी दिलकश इमारतों और ऐतिहासिक किलों के लिए सुविख्यात इस शहर को पर्यटक और स्थानीय निवासी लिटिल नेपल्स कहकर गर्वित हुआ करते थे. यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है कि नेपल्स जिसे इतालवी में नेपोलि बोला जाता है इटली का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और दक्षिण-पश्चिमी तट पर बसा है.  यह एक यूनानी उपनिवेश हुआ करता था जो ईसा पूर्व चौथी सदी में रोमन साम्राज्य  का अंग बन गया था. फिर यह  रोमनों के पतन के बाद जर्मन और इसके बाद सोलहवीं सदी में स्पेन के शासनाधीन रहा. इस शहर की ख्याति इसके भव्य स्थापत्य  और कलात्मक वैभव के लिए रही है.  यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दे रखी है. तो, नब्बे के दशक में इस कैण्डेला शहर की आबादी लगभग आठ हज़ार थी लेकिन निरंतर गिरती जा रही अर्थ व्यवस्था और घटते जा रहे नौकरी के अवसरों के कारण ज़्यादातर युवा इस शहर को छोड़कर अन्यत्र जा बसे  और शहर की आबादी घटकर मात्र दो हज़ार सात सौ रह गई है. इस आबादी में वृद्धजन ज़्यादा हैं. जनसंख्या की इस कमी का असर शहर की अर्थव्यवस्था और समग्र परिवेश पर भी पड़ा है. और इसी से चिंतित होकर कैण्डेला के मेयर ने एक ऐसी घोषणा की है जो कम से कम हमारे लिए तो बेहद चौंकाने वाली है. मेयर निकोला गट्टा ने दूसरी जगहों  से आकर इस शहर में बसने वालों के लिए नकद प्रोत्साहन राशि  देने की घोषणा की है. उनकी घोषणा के अनुसार सिंगल्स को इस शहर में आकर रहने पर 800 यूरो (भारतीय मुद्रा में लगभग  61 हज़ार रुपये), कपल्स को 1200 यूरो (92 हज़ार रुपये) और परिवार के साथ आने वालों को 2000 यूरो (करीब डेढ़ लाख रुपये) दिये जाएंगे. वैसे कैण्डेला  के मेयर ने हाल में  जैसी घोषणा की है वैसी घोषणा बोर्मिडा के मेयर पहले ही कर चुके हैं. उन्होंने अपने शहर में आ बसने वालों को दो हज़ार यूरो देने की घोषणा की थी, लेकिन उस घोषणा पर लोग इतनी  भारी संख्या में टूट पड़े कि मेयर महोदय को अपनी घोषणा वापस लेनी पड़ी. शायद इस प्रकरण से सबक लेते हुए कैण्डेला के मेयर महोदय ने अपनी घोषणा के साथ ये शर्तें भी जोड़ दी हैं कि ये लाभ तभी देय होंगे जब कोई इस शहर का स्थायी बाशिंदा बनने के लिए वचनबद्ध होगा, यहां एक मकान किराये पर लेगा और उसकी सालाना आमदनी कम से कम साढे सात  हज़ार यूरो होगी. इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए छह परिवार अब तक यहां आ चुके हैं और पांच अन्य परिवार आने की प्रक्रिया में हैं. उम्मीद और कामना की जानी चाहिए कि कैण्डेला शहर अपना खोया वैभव फिर से प्राप्त कर लेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 25, 2017

कुछ समुदायों की घटती जनसंख्या भी है समस्या

सामान्यत: इस बात से सभी सहमत हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है इसकी बढ़ती हुई जनसंख्या. आज़ादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाने के प्रयास किए हैं और उन प्रयासों को आंशिक सफलता भी मिली है. सोचा जा सकता है कि अगर वे प्रयास न किए गए होते तो आज हम किस हाल में होते. इसके बावज़ूद कुछ संगठन और लोग ऐसे भी हैं जो इस बात पर चिन्तित होते हैं कि कुछ जातियों/धर्मों को मानने वालों की जनसंख्या उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी उनकी बढ़ रही है जिनसे उनको ख़तरा है. लेकिन अगर ऐसों की  बात न भी करें तो हमारे विविधता भरे देश में कम से कम एक समुदाय ऐसा मौज़ूद है जिसकी संख्या निरंतर छीजती जा रही है और यह समाज तेज़ी से विलुप्त होने की तरफ बढ़ रहा है. संकट इतना गहरा है कि अब सरकार की तरफ से और खुद इस समुदाय  के लोगों की तरफ से भी इस समुदाय की जनसंख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं.

मैं बात पारसी समुदाय की कर रहा हूं. वही पारसी समुदाय, जिसकी चर्चा अपनी ख़ास जीवन शैली, सुरुचि, उच्च शैक्षिक स्तर और समृद्धि के लिए होती है. 1941 में देश में जहां पारसियों की संख्या 114,000 थी वहीं 2001 की जनगणना में ये 69 हज़ार से भी कम रह गए थे और 2011 की जनगणना में तो इनकी संख्या और भी  घटकर मात्र 57, 264 ही रह गई थी. इसी बात से चिंतित होकर भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को अपनी आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के लिए सन 2013 से जियो पारसी’  नाम से एक अभियान चला रखा है.  इस अभियान के पहले चरण में, जो जल्दी ही पूरा होने वाला है, सरकार ने एक बड़ी राशि इस निमित्त प्रदान की है कि जिन पारसी युगलों की आय एक निश्चित सीमा से कम है उन्हें संतानोत्पत्ति विषयक उपचार कराने के लिए आर्थिक सहायता दी जा सके. इसके अलावा इस अभियान के अंतर्गत विज्ञापन, काउंसिलिंग और अन्य तरीकों से भी पारसियों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. अभियान के शुरुआती समय में कई विज्ञापन ज़ारी किये गए जिनमें पारसियों से गर्भ निरोधक इस्तेमाल न करने का भी अनुरोध किया गया. ये तमाम बातें भारत सरकार की परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के खिलाफ़ हैं. एक तरफ जहां इस अभियान का जम कर उपहास हुआ वहीं दूसरी तरफ इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये, लेकिन तीसरी तरफ़ खुद पारसी समुदाय के भीतर से कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. यहां तक कहा  गया कि यह अभियान स्त्री को मात्र संतानोत्पत्ति करने वाली मान कर चलता है.

यह समझना भी ज़रूरी होगा कि आखिर क्यों पारसी जनसंख्या इतनी घटती जा रही है. असल में पारसी समुदाय एक सुगठित लेकिन बंद समुदाय है जहां जो कुछ भी बाहरी है वह सब निषिद्ध  है. अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी कर लेती है तो वह पारसी नहीं रह जाती है, और अगर कोई किसी अन्य समुदाय से हो और किसी पारसी से विवाह कर ले तो उसके बच्चों को भी पारसी का दर्ज़ा नहीं दिया जाता है. किसी भी ग़ैर पारसी के लिए पारसी मंदिर में आना वर्जित  होता है. यही नहीं लगभग तीस प्रतिशत पारसी स्त्री-पुरुष तो विवाह ही नहीं करते हैं. देश में जो पारसी आबादी है उसमें से कम से कम तीस प्रतिशत की उम्र साठ से ऊपर है. और जैसे यह सब पर्याप्त न हो, देश में पारसियों की फर्टिलिटी दर मात्र 0.8 है जबकि औसत भारतीयों में यह दर 2.3 है. यहीं यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि जब फर्टिलिटी दर 2.1 होती है तो जनसंख्या स्थिर  हो जाती है.

इस अभियान का विरोध करने वालों का कहना है कि पारसियों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसाने की बजाय पारसी संस्कृति की रक्षा और उसके संवर्धन के लिए प्रयास किये जाने चाहिए. लेकिन समझा जा सकता है कि यह तर्क  महज़ विरोध करने के लिए दिया गया तर्क है. अगर पारसी संस्कृति का बहुत ज़्यादा समर्थन किया जाएगा तो यह समुदाय सिकुड़ते-सिकुड़ते लुप्त ही हो जाएगा. जब आप अपने तमाम खिड़की दरवाज़े बंद कर देंगे तो यही होगा. और यही वजह है कि पारसी समुदाय के भीतर से भी आम तौर पर इस सरकारी पहल का स्वागत हो रहा है और समझदार लोग कहने लगे हैं कि यह अभियान काफी पहले शुरु कर दिया जाना चाहिए  था. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह सरकारी अभियान पारसी समुदाय को बचा पाने में कितना सफल रहता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 जुलाई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.