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Tuesday, March 13, 2018

डॉक्टरों ने कहा- हमारी तनख़्वाह मत बढ़ाओ!


कनाडा के क्यूबेक प्रांत के सैंकड़ों डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने अपनी सरकार को एक ज्ञापन देकर अपने बढ़े हुए वेतन का विरोध किया है और सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस राशि का इस्तेमाल नर्सों के लिए तथा मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए करे. यह बात सर्वविदित है कि कनाडा में सरकार सभी नागरिकों को निशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करती है. यह सुविधा मरीज़ की ज़रूरत पर आधारित होती है न कि उसकी खर्च करने की क्षमता पर. इसी फरवरी माह में वहां की सरकार ने अपने इस इलाके के मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की तनख़्वाह में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि करने की घोषणा की थी.

ऐसा माना जाता है कि क्यूबेक इलाके में डॉक्टरों को देश के अन्य इलाकों की तुलना में पहले ही ज़्यादा वेतन मिलता है. लेकिन इसी इलाके में नर्सों और अन्य चिकित्सा सेवकों की हालत बहुत बुरी है. इसी जनवरी में वहां की एक नर्स एमिली रिकार्ड की एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी नम आंखों की एक तस्वीर लगाते हुए बताया था कि उसे पूरी रात जागकर सत्तर मरीज़ों की देखभाल करनी पड़ी है और अब उसके पांव इतना दर्द कर रहे हैं कि वह सो भी नहीं पा रही है. उसने लिखा था कि वह अपने काम के बोझ से टूट चुकी है और उसे इस बात से शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि वो अपने मरीज़ों को कितनी कम सेवा दे पाती है. “हमारा स्वास्थ्य तंत्र बीमार और मरणासन्न है.” कल्पना की जा सकती है कि कितनी पीड़ा के साथ उसने यह लिखा होगा. कनाडा के नर्सिंग संघ ने भी सरकार पर ज़ोर डाला है कि वो यह सुनिश्चित करे कि एक नर्स को अधिकतम कितने मरीज़ों की देखभाल करनी है. क्यूबेक की नर्स यूनियन की अध्यक्ष नैंसी बेडार्ड का कहना था कि डॉक्टरों के लिए तो पैसों की कोई कमी नहीं होती है लेकिन मरीज़ों की देखभाल करने वाले औरों  की कोई परवाह नहीं की जाती है. 

नर्सों की इस व्यथा-कथा ने क्यूबेक के डॉक्टरों की अंतरात्मा को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने एक ज्ञापन देकर अपनी सरकार से यह अनुरोध  कर दिया कि वह  उनके बढ़ाये हुए वेतन को निरस्त कर दे और इस तरह जो राशि बचे उसे बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को असह्य बनाए, क्यूबेक क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में खर्च कर दे. अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि हमारी तनख़्वाहों में यह वृद्धि इसलिए और भी ज़्यादा आहत करने वाली है कि हमारी नर्सों, क्लर्कों और अन्य पेशेवरों को बहुत कठिन हालात में काम करना पड़ रहा है और हमारे मरीज़ों को हाल के वर्षों में की गई भीषण कटौतियों और सारी सत्ता के स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीकृत हो जाने की वजह से ज़रूरी सुविधाओं तक से वंचित रहना पड़ रहा है. इन तमाम कटौतियों का जिस एक बात पर कोई असर नहीं पड़ा है वो है हमारी तनख़्वाहें. और इसलिए इस वृद्धि को अभद्रबताते हुए उन्होंने लिखा, “हम क्यूबेक डॉक्टर यह अनुरोध कर रहे हैं कि चिकित्सकों को दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली जाए और इस तंत्र  के संसाधनों का बेहतर वितरण स्वास्थ्य कर्मियों की बेहतरी के लिए और क्यूबेक के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराने के लिए किया जाए.”

यह प्रकरण हमारी आंखें खोल देने वाला है. इससे पता चलता है कि एक ज़िम्मेदार और सभ्य समाज का चेहरा कैसा होता है. क्यूबेक के डॉक्टर चाहते तो बिना कोई ना-नुकर किये अपनी बढ़ी हुई तनख़्वाहें स्वीकार कर सकते थे. लेकिन उनके इंसान होने के एहसास ने उन्हें यह न करने दिया. अपने से ज़्यादा फिक्र उन्हें अपने सहकर्मियों की थी कि उन्हें कम तनख़्वाह में ज़्यादा समय खटना पड़ता है. उन्होंने इस बात की भी फिक्र की कि उनके प्रांत के नागरिकों को सरकारी कटौती की वजह से उस ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा से वंचित रहना पड़ रहा है जिसके वे हक़दार हैं.

लेकिन सब जगह सब कुछ अच्छा  ही नहीं होता है. डॉक्टरों की इस संवेदनशीलता पर झाड़ू फेरते हुए  कनाडा के चिकित्सा मंत्री ने अपने बयान में कहा कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें ज़्यादा तनख़्वाहें दी जा रही हैं तो वे उसे  टेबल पर ही छोड़ जाएं.  मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हम उस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर लेंगे. डॉक्टरों की इस व्यथा पर टिप्पणी करते हुए कि नर्सों को बहुत कम वेतन मिल रहा है और रोगियों पर होने वाले खर्च में कटौतियां की जा रही हैं, मंत्री जी ने फरमाया कि हमारे पास तमाम ज़रूरतों के लिए पैसा है और हम समय पर सारी समस्याएं हल कर लेंगे.

यानि मंत्री तो कनाडा में भी वैसे ही हैं जैसे अपने देश में हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ डुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 मार्च, 2018 को 'कनाडा के डॉक्टरों ने लौटाया बढ़ा हुआ वेतन' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 11, 2017

तबीयत से उछाला एक पत्थर और कर दिया आकाश में छेद!

मंगोलिया की डॉक्टर ओदोंतुया दवासुरेन जब महज़ सत्रह बरस की थीं और घर से काफी दूर लेनिनग्राड में रहकर पढ़ाई कर रही थीं तब फेफड़ों के कैंसर ने पिता को उनसे छीन लिया था. बाद में कभी उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का अब भी  मलाल है कि वे अपने पिता के अन्तिम  दर्शन तक नहीं कर सकीं, और अपनी बड़ी बहन से ही उन्हें यह भी पता चला कि उनके पिता लगातार असह्य वेदना झेलते रहे. इसके कई बरस बाद, जब वे डॉक्टर बन चुकीं तब भी उन्हें अपने असंख्य मरीज़ों के अलावा अपने निकट के लोगों की वेदना का मूक दर्शक बनना पड़ा. उनकी सास उनके साथ ही रहती थीं और ओदोंतुया ने लिवर कैंसर से जूझती,  दर्द से तड़पती और शांत मृत्यु के लिए विकल अपनी सास की पीड़ा को गहराई से महसूस किया. वे उनकी हर तरह से सेवा करतीं लेकिन उन्हें दर्द से निज़ात दिलाने में असमर्थ थीं.

उनकी असमर्थता का एक ख़ास संदर्भ  है. भले ही तब दुनिया के दूसरे देशों में असाध्य रोगों से ग्रस्त मरणासन्न रोगियों की पीड़ा कम करने के लिए ख़ास व्यवस्थाएं (पैलिएटिव केयर)  सुलभ थीं, खुद उनके देश मंगोलिया में उनके लिए सामान्य दर्द निवारकों से अधिक कुछ भी सुलभ नहीं था. यह आकस्मिक ही था कि सन 2000 में डॉक्टर ओदोंतुया को यूरोपियन पैलिएटिव केयर असोसिएशन की एक कॉन्फ्रेंस  में भाग लेने के लिए स्टॉकहोम (स्वीडन) जाने का अवसर  मिला और वहां मिली जानकारियों ने उनमें नई ऊर्जा का संचार कर डाला. तब तक तो वे पैलिएटिव केयर जैसी किसी अवधारणा से ही परिचित नहीं थी. स्वीडन से लौटकर उन्होंने अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय से जब अपने देश में भी ऐसी ही सुविधाएं सुलभ कराने का अनुरोध किया तो पलट कर उनसे ही पूछा गया कि जब देश में ज़िंदा लोगों के लिए ही पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं देने के संसाधनों का अभाव है तो भला मरणासन्न लोगों को कोई सुविधा देने की बात सोची भी कैसे जा सकती है!

लेकिन एक चिकित्सक होने के नाते ओदोंतुया इस बात से भली भांति परिचित थीं कि मंगोलिया में इस सुविधा की कितनी ज़रूरत है. वे जानती थीं कि उनके देश में लिवर कैंसर से मरने वालों की तादाद वैश्विक औसत से छह गुना ज़्यादा है और इसमें लगातार वृद्धि होती जा रही है. इस तरह के रोगियों का अंत बहुत कारुणिक और कष्टप्रद  होता है. ऐसे में, ओदोंतुया यह मानने लगी थीं कि मृत्यु से पहले की सुखद ज़िंदगी मनुष्य का आधारभूत अधिकार है, और वे इसे दिलाने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहीं. देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने अपनी बात सशक्त रूप से रखने के लिए उन्होंने मरणासन्न लोगों से उनके घरों पर जाकर मुलाक़ातें की और उनके अनुभवों को फिल्मांकित किया. उन्होंने पाया कि ऐसे बहुत सारे रोगियों को अस्पताल वाले जबरन घर भेज दिया करते हैं और वे असहाय रोगी दर्द से कोई निज़ात न पाकर मृत्यु की मांग तक करने लगते हैं.

आखिर ओदोंतुया के प्रयास  सफल हुए और सन 2002 में मंगोलिया सरकार ने मरणासन्न लोगों को राहत देने के लिए एक राष्ट्रीय पैलिएटिव केयर कार्यक्रम की शुरुआत करने की घोषणा की. इसके बाद से अब तक की प्रगति यह है कि अब उस देश का हर प्रादेशिक अस्पताल यह सुविधा सुलभ कराने लगा है और देश में बहुत सारे होसपिस  केंद्र भी खुल गए हैं. सबसे बड़ी बात यह हुई है कि ऐसे रोगियों को राहत पहुंचाने के लिए मॉर्फिन की आपूर्ति बढ़ा दी गई है. डॉक्टर ओदोंतुया के प्रयासों से पहले मंगोलिया के अधिकारी मॉर्फिन के वितरण में इसलिए कृपणता बरतते थे कि उन्हें भय था कि इसकी सुलभता नशे के प्रसार में सहायक बन जाएगी. लेकिन अब वहां कैंसर के रोगियों को उनकी ज़रूरत के मुताबिक मॉर्फिन दे दी जाती है, और वो भी निशुल्क. ज़ाहिर है कि इससे उनके कष्टों में काफी कमी आई है. ओदोंतुया के प्रयासों से मंगोलिया में हज़ारों डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया गया है ताकि वे इस तरह के रोगियों को दर्द निवारण में और सुखपूर्ण अंतिम जीवन बिताने में सहायक बन सकें. खुद डॉक्टर ओदोंतुया अब भी नियमित रूप से ऐसे रोगियों के सम्पर्क में रहती हैं और न सिर्फ उन्हें समुचित  चिकित्सकीय सहायता सुलभ कराती हैं, जब उन्हें लगता है कि अब मृत्य के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है तो उन्हें मानसिक रूप से मृत्यु के लिए तैयार भी करती हैं.

डॉक्टर ओंदोतुया का यह वृत्तांत एक बार फिर हमें आश्वस्त करता है कि दुनिया में भले लोगों की कमी नहीं है और हमारे कवि दुष्यंत कुमार ने ठीक  ही कहा है कि “कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.”  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 जुलाई, 2017 को प्रकशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, January 5, 2016

ताकि जी सके वो अपनी तरह से अपनी ज़िन्दगी

संयुक्त राज्य अमरीका का एक राज्य है ओरेगॉन. इस राज्य का नाम सुनते ही हम भारतवासी अपने ओशो को ज़रूर याद कर लेते हैं जिन्होंने अस्सी के दशक में इसी राज्य में रजनीशपुरम नाम से अपना एक अत्यधिक वैभवशाली साम्राज्य खड़ा किया था. यह अलग बात है कि कोई एक  दशक पहले जब मुझे इस राज्य में जाने का मौका मिला तो वहां ओशो या रजनीश के नाम से कुछ मिलना तो दूर रहा, इस नाम की स्मृतियां भी नदारद पाई गईं. अभी शुरु हुए नए साल में इस राज्य ने संयुक्त  राज्य अमरीका में एक महत्वपूर्ण पहल की है. इस पहल का परिचय देने से पहले यह बता देना ज़रूरी होगा कि दुनिया के और बहुत सारे देशों की तरह, और भारतीय चलन से हटकर, अमरीका में आप बिना डॉक्टर की पर्ची के कोई भी दवा नहीं खरीद सकते हैं. इस व्यवस्था  के कारण ही इस अमरीकी राज्य में साल के पहले दिन से शुरु हुई नई व्यवस्था की अधिक महत्ता है.

इस व्यवस्था  का सम्बन्ध गर्भ निरोध से है. बहुत सारी स्त्रियां विभिन्न कारणों से गर्भ निरोध के लिए गोलियों या पैचेस का इस्तेमाल करती हैं और ये न केवल खासे महंगे हैं, बिना डॉक्टर की पर्ची के इन्हें प्राप्त भी नहीं किया जा सकता था. इन दोनों कारणों से कई बार सुरक्षा चक्र अटूट नहीं रह पाता था, यानि इन्हें इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के कुछ दिन असुरक्षित हो जाते थे. लेकिन अब वहां दो हाउस बिल प्रभावी हो गए हैं जिनसे यह खतरा पूरी तरह निर्मूल हो गया है. हाउस बिल 3343 में यह प्रावधान किया गया है कि जो कम्पनी आपका बीमा करती है वह पूरे बारह महीनों के गर्भ निरोधकों  का भुगतान एक साथ करेगी, और इससे गोलियों या पैचेस की पूरे साल की निर्बाध आपूर्ति सम्भव हो जाएगी. यहीं यह उल्लेख भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि अमरीका में चिकित्सा सुविधाएं बहुत महंगी हैं और वहां के नागरिक समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इस महंगाई से पार पाने के लिए बीमा योजनाओं का सहारा लेता है.

दूसरा  हाउस बिल 2879 और अधिक क्रांतिकारी है. इस बिल के द्वारा दवा विक्रेताओं को भी उन विशेषज्ञों की सूची में जगह दे दी गई है जो गर्भ निरोधक प्रेस्क्राइब कर सकते हैं. हालांकि यह काम उतना भी आसान नहीं होगा जितना प्रथम दृष्टि में लगता है, कि आप दवा विक्रेता के पास जाएं, उससे  अनुरोध करें और वो आपको गर्भ निरोधक  प्रेस्क्राइब कर दे. पहली बात तो यह कि यह सुविधा 18 वर्ष से कम की युवतियों को सुलभ नहीं होगी. उन्हें  अपना पहला प्रेस्क्रिप्शन तो डॉक्टर से ही लेना होगा, उसके बाद ही वे इस सुविधा का लाभ ले सकेंगी. दूसरी बात यह कि उन्हें दवा विक्रेता के पास जाकर एक प्रश्नावली भर कर देनी होगी और यह जांच लेने के बाद कि उन्हें गर्भ निरोधक के इस्तेमाल से कोई खतरा प्रतीत नहीं होता है, विक्रेता उन्हें वांछित सामग्री की बारह महीनों की सप्लाई दे सकेगा. यहीं यह भी बताता चलूं कि फिलहाल राज्य के तमाम दवा विक्रेताओं के यहां यह सुविधा सुलभ नहीं होगी. अभी वहां के मात्र 150 दवा विक्रेताओं को ऐसा करने के लिए अधिकृत किया गया है. स्थानीय प्रशासन दवा विक्रेताओं को समुचित प्रशिक्षण देने के बाद ही यह अधिकार प्रदान कर रहा है. उम्मीद की जा रही है कि अगले माह के अंत तक 800 दवा विक्रेताओं के यहां यह सुविधा उपलब्ध होने लगेगी. 

वैसे यह व्यवस्था एक अन्य अमरीकी राज्य कैलिफोर्निया करीब दो बरस पहले ही कर चुका था. वहां इस तरह का प्रावधान 2013 में ही पारित हो गया था लेकिन क्योंकि वह लागू  अब तक नहीं हो सका है, ओरेगॉन ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है.

समझा जा सकता है कि अमरीका जैसे उन्मुक्त और उदार देश में इन व्यवस्थाओं का अर्थ केवल  परिवार को सीमित रखने के लिहाज़ से ही नहीं है. इससे भी आगे इन व्यवस्थाओं की अहमियत स्त्री को अपने चयन में अधिक समर्थ बनाने में है. स्त्री की देह पर उसका और केवल उसका अधिकार है और होना चाहिए तथा वो संतान को जन्म देना  चाहती है या नहीं, उसके इस निर्णय में अगर कोई बाधा आती है तो राज्य का दायित्व है कि वह उस बाधा को दूर करे. ओरेगॉन राज्य की इन नई व्यवस्थाओं को इसी सन्दर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए. इन नई व्यवस्थाओं से जहां स्त्री पर पड़ने वाले आर्थिक  भार में कमी आएगी वहीं उसे अपना मनचाहा जीवन जीने के लिए ज़रूरी उपकरण/संसाधन प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों में भी कमी आएगी.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जनवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 6, 2015

पड़िये ग़र बीमार तो....

अगर आप बीमार हो जाएं तो क्या करेंगे?
अजीब सवाल है!  डॉक्टर के पास जाएंगे, और क्या करेंगे?
सही भी है. जिन लोगों में मेरा उठना बैठना है वे किसी पीर-ओझा-बाबा के पास तो जाने से रहे. बेशक समाज का एक वर्ग है जो बीमार होने पर जादू-टोने-टोटकों वगैरह की शरण लेता है, लेकिन बहुत बड़ा वर्ग वह है जो बीमार होने पर अस्पताल भागता है और रोग की गम्भीरता तथा अपनी हैसियत के अनुरूप छोटे या बड़े डॉक्टर की सलाह लेता है. इसी वर्ग में वे लोग भी शामिल हैं जो अपने-अपने विश्वासों के अनुरूप एलोपैथिक से इतर किसी चिकित्सा पद्धति की शरण में जाते हैं.  वैसे यह बात आम तौर पर मान ली गई है कि किसी को तुरंत राहत चाहिये तो उसे एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की शरण में ही जाना होगा.

एलोपैथिक चिकित्सक आपकी बात सुनेगा, अगर उसे ज़रूरी लगा तो कुछ परीक्षण करवाएगा और फिर कुछ दवाइयां  लिख देगा. सरकार लाख कहे कि जेनेरिक दवाइयां लिखी जाएं, डॉक्टर आम तौर पर आपको ब्राण्डेड दवाइयां ही देगा. लेकिन अगर आपका रोग गम्भीर हुआ तो बहुत मुमकिन है कि डॉक्टर आपको शल्य चिकित्सा की सलाह दे. तब आप क्या करेंगे? डॉक्टर भगवान है, उसकी सलाह मानेंगे. ठीक  है ना?

लेकिन अभी हाल में नवी मुम्बई के एक सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसे पढ़ने के बाद शायद आप भी अपने इस जवाब पर पुनर्विचार करना चाहें! यह सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर दरअसल एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जो अपने आप को ई-  हॉस्पिटल कहता है और आप द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट्स आदि के आधार पर कुछ शुल्क लेकर आपको दुनिया भर में अवस्थित अपने विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह उपलब्ध कराता है. इस सेण्टर ने हाल में साढे बारह हज़ार ऐसे रोगियों का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट जारी की है जिन्हें शल्य चिकित्सा की सलाह दी गई थी. सेण्टर का कहना है कि इनमें से 44% को असल में शल्य चिकित्सा की ज़रूरत थी ही नहीं. अब ज़रा इसी बात को अगर अलग-अलग रोगों के सन्दर्भ में देखिये. जिन हृदय रोगियों को सलाह दी गई उनमें से पचपन प्रतिशत को स्टेण्ट  लगवाने की, सैंतालिस प्रतिशत कैंसर रोगियों को शल्य क्रिया की, और अड़तालीस प्रतिशत को घुटनों के प्रत्यारोपण की ज़रूरत नहीं थी. सोचिये, अगर आपकी जेब और आपकी देह दोनों ने ग़ैर ज़रूरी शल्य चिकित्सा का अत्याचार सहन किया होता तो?

वैसे यह जानकर आपको थोड़ी राहत महसूस हो सकती है कि सिर्फ अपने देश में ही ऐसा नहीं होता है. पिछले  दिनों हम लोग यह भी पढ़ चुके हैं कि अमरीका में किए गए घुटना प्रत्यारोपण के ऑपरेशनों में भी एक तिहाई अनावश्यक थे. अपने देश में भी, और अन्य देशों में भी, प्रसव के लिए सिज़ेरियन ऑपरेशनों की अधिकता और अनावश्यकता पर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं.

जानकार लोग अनावश्यक शल्य चिकित्सा के मूल में यह बात  देखते हैं कि निजी अस्पतालों में डॉक्टरों को मिलने वाली तनख्वाह का सीधा सम्बन्ध इस बात से होता है कि वे अपने अस्पताल को कितना ‘बिज़नेस’ देते हैं.  और कमोबेश यही बात हमें दी जाने वाली ग़ैर ज़रूरी दवाइयों के बारे में भी सच है. फर्क बस इतना है कि यहां डॉक्टर और अस्पताल की बजाय डॉक्टर और दवा कम्पनी का समीकरण काम करता है. दवा कम्पनियों द्वारा डॉक्टरों को उनके लिखे प्रेस्क्रिपशंस के अनुरूप ‘उपहार’ प्रदान करने की चर्चाओं से शायद ही कोई नावाक़िफ हो.

इस सारे खेल में एक और पक्ष अब तेज़ी से जुड़ता जा रहा है और वह है बीमा कम्पनियां. भारत में भी सरकारी अस्पतालों की बदहाली से तंग आए लोग निजी अस्पतालों का रुख करने और उन्हें बहुत ज़्यादा महंगा पाकर मेडिकल इंश्योरेंस में अपना संकट मोचक तलाश करने लगे हैं. निजी अस्पतालों और बीमा कम्पनियों की साठ गांठ इलाज का खर्चा दिन दूना रात चौगुना बढ़ाने में कोई कसर नहीं रख रही है. शायद इसी की परिणति इस बात में भी हुई है कि हाल ही में बीमा कम्पनियों ने कुछ महत्वपूर्ण रोगों के लिए शुल्क निर्धारित कर दिया जिसे ये अस्पताल मानने को तैयार नहीं हैं और परिणामत: अस्पतालों ने कैश लैस सुविधा को स्थगित कर रखा है.

लेकिन इस सारी चर्चा से यह न मान लिया जाए सारा दोष डॉक्टरों और अस्पतालों का ही है. इस चर्चा के शुरु में मैंने सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया, उसके सन्दर्भ में यह जान लेना भी ज़रूरी होगा कि दो डॉक्टरों की राय में अंतर सदा सम्भव है. इसलिए यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि हर मामले में पहली राय ग़लत और दूसरी राय ही सही होगी. दूसरी राय से भी असहमत होने की सम्भावनाओं को स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन ये तमाम बातें  हमारी चिंताओं को घटाते नहीं, बढ़ाते हैं, यह बात निर्विवाद है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 जनवरी, 2015 को आगे कुंआ, पीछे खाई, कोई राह न दे सुझाई शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, March 18, 2014

तुम क्या जानो क्या हाल कर दिया था तुमने हमारा

हम सबको इस तरह के अनुभव होते ही रहते हैं. किसी की तनिक-सी उदासीनता, या लापरवाही, या ग़ैर ज़िम्मेदारी – आप जो भी चाहे नाम दे लें उसे, दूसरों के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन जाती है. ऐसा नहीं है कि ऐसी  ग़लती सिर्फ दूसरों से ही होती है, मुझसे  कभी हुई ही नहीं. मुझसे भी शायद अनेक दफ़ा ऐसी चूक हुई होगी, और मेरे अनजाने में उसे दूसरों ने भुगता होगा. इसीलिए आज  किसी और की एक चूक की चर्चा आपसे कर रहा  हूं.

उस दिन अस्पताल गया तो किसी और ही काम से था, लेकिन लगा कि अपना बीपी भी लगे हाथों चैक करवा लूं. डॉक्टर साहब से दुआ-सलाम थी. उन्होंने बीपी चैक करके  कहा कि बेहतर होगा मैं अपना ईसीजी करवा लूं. न सिर्फ कहा, ईसीजी करने वाले टैक्नीशियन को बुला मुझे उनके हवाले भी कर दिया. तब मैं जयपुर के नज़दीक, कोटपुतली  के स्नातकोत्तर  कॉलेज में उपाचार्य था. कुछ ही दिनों  पहले सिरोही से पदोन्नति पर वहां पहुंचा था. संयोगवश टैक्नीशियन महोदय उसी कॉलोनी में रहते थे जिसमें मैं रहता था, और मुझे पहचानते थे. उन्होंने तसल्ली से मेरा ईसीजी किया और उसका प्रिण्ट आउट मुझे देकर डॉक्टर साहब के पास भेज दिया.

ईसीजी की उस रपट को देखते ही डॉक्टर साहब की मुख मुद्रा गम्भीर हो गई. उन्होंने सलाह दी कि मुझे फौरन जयपुर जाकर एस एम एस अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए. मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास चिंता की बात है, तो वे मेरे सवाल  को टाल गए. मुझे कुछ ही देर बाद एक शादी में शमिल होने के लिए सिरोही जाने के लिए कोटपुतली से निकलना  था. घर आया. मुंह ज़रूर ही लटका हुआ होगा. पत्नी ने पूछा कि क्या बात है, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने भी  स्थिति की गम्भीरता समझ ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हम लोग कोटपुतली से निकल कर अगली सुबह सिरोही पहुंच गए. मैं रास्ते भर अनमना बना रहा. स्वाभाविक ही है कि मेरे अनमनेपन का असर पत्नी पर भी पड़ा. शादी में जाने का उत्साह और उल्लास हवा हो चुका था.

नहा धोकर सिरोही के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां मेरे एक अत्यंत आत्मीय डॉक्टर सामने ही मिल गए. उदासी शायद मेरे चेहरे पर चिपकी हुई थी. उन्होंने वजह पूछी तो मैंने ईसीजी की रपट आगे कर दी. उन्होंने एक नज़र उस पर डालते ही पूछा कि “अग्रवाल साहब, यह किसकी रिपोर्ट उठा लाए?”  जब मैंने कहा कि यह तो मेरी ही रिपोर्ट है, तो उन्होंने अविश्वास  भरी नज़र से मुझे देखा, जैसे कह रहे हों, क्यों मज़ाक करते हो? मैंने फिर से उन्हें कहा कि यह मेरी ही रिपोर्ट  है, कल ही मैंने अपना ईसीजी करवाया है और इसी के  आधार पर डॉक्टर साहब ने मुझे राज्य के सबसे बड़े अस्पताल चले जाने की अर्जेण्ट सलाह दी है.

मेरे मित्र डॉक्टर साहब को शायद उस रिपोर्ट पर क़तई विश्वास नहीं हो रहा था. असल में कोतपुतली जाने से पहले मैं उनके नियमित सम्पर्क में था और मेरे स्वास्थ्य की स्थिति  से वे भली-भांति परिचित थे. उन्होंने पहले मेरा बीपी चैक किया और फिर मुझे एक बार और ईसीजी करवा लेने के लिए कहा. मैं बड़ी उलझन में था कि मामला आखिर क्या है! लेकिन अपने यहां इस बात का कोई रिवाज़ नहीं है डॉक्टर, चाहे वो आपका कितना ही नज़दीकी क्यों न हो, आपके मर्ज़ के बारे में आपसे खुलकर  बात करे. बहरहाल, मैंने एक बार फिर अपना ईसीजी करवाया और उसकी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास पहुंचा. एक नज़र उस पर डालते ही वे मुझसे बोले, “देखो, मैंने कहा था ना कि वो रिपोर्ट आपकी हो ही नहीं सकती! आप एकदम ठीक हैं!” उन्होंने मुझे एक बार फिर आश्वस्त किया कि मैं तनिक भी चिंता न करूं, सब कुछ ठीक है, और फिर मुझे चाय पिला कर  विदा किया.

माहौल बदल चुका था. खुशी-खुशी घर  आया, पत्नी को सारा किस्सा बताया राहत की खूब लम्बी सांस ली, बहुत मज़े से शादी का लुत्फ लिया, और फिर हम दोनों कोटपुतली लौट गए.
यह संयोग ही था, कि अगले दिन जैसे ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकला, सामने वे तकनीशियन महोदय मिल  गए. मैंने शिकायत भरे लहज़े में उनसे कहा कि आपने मेरा कैसा ईसीजी किया.......मेरी तो जान ही निकाल दी! पहले तो उन्होंने मुझसे पूरा वाकया सुना, और फिर बड़े बेपरवाह लहज़े में बोले, “हां, सर, हमारी वो मशीन थोड़ी खराब है. कई बार वो ग़लत रिपोर्ट  दे देती है.” यानि उन्हें अपनी मशीन के चाल चलन की जानकारी थी.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उनसे क्या कहूं? उनकी मासूमियत लाजवाब थी. होती भी क्यों नहीं? उन्हें क्या पता कि मैं इस बीच कितने विकट मानसिक तनाव से गुज़र चुका था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 मार्च 2014 को 'खराब मशीन की ईसीजी ने बढ़ा दी धड़कन' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ 

Friday, November 30, 2012

कैसे समझाएं इन्हें

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काफी दिनों से बढ़ते जा रहे मोतियाबिंद से परेशान था. ऑपरेशन कराना टालता जा रहा था.  बात यह है कि ऑपरेशन चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उससे डर तो लगता ही है. लेकिन वो कहा जाता है ना कि बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी. कई दोस्तों से पूछा, और सबकी राय का आकलन करने के बाद जा पहुंचा शहर के सबसे नामी, सर्वाधिक आधुनिक सुविधाओं वाले (और  इसीलिए स्वाभाविक रूप से खासे महंगे भी)  नेत्र चिकित्सालय में. रिसेप्शन काउण्टर पर लगी एक पट्टिका पर नज़र पड़ी तो दिल खुश हो गया. लिखा था: “अस्पताल में मरीज़ कृपया अपने मोबाइल बन्द रखें.” यह हुई ना बात. लोगों को मोबाइल इस्तेमाल करने का शऊर ही कहां है? जहां देखो वहीं शुरू हो जाते हैं, बिना आस-पास वालों की असुविधा का ज़रा भी खयाल किए. रिसेप्शन काउण्टर पर रजिस्ट्रेशन करवाया, दो जगह जूनियर डॉक्टरों से अपनी आंखें जंचवाई और फिर मुझे पहुंचा दिया गया अस्पताल के मुख्य डॉक्टर के कक्ष में. उन्हीं के नाम पर यह अस्पताल है. वे एक मरीज़ को देख रहे थे, मुझे पास पड़े सोफे पर बिठा दिया गया. वे मरीज़ को देख रहे थे, पास खड़े एक दोस्त से बात कर रहे थे और कान में लगे ईयर फोन पर किसी की बात सुनते हुए यदा-कदा उन्हें भी जवाब देते जा रहे थे. इसी बीच वो मरीज़ निपट गया. अब  मुझे डॉक्टर के सामने वाली स्टूल पर बिठा दिया गया. मेरा कार्ड डॉक्टर के सामने था. उनका द्वि-चैनली संवाद पूर्ववत जारी रहा. और उसी के साथ मेरी आंखों की जांच भी हो गई. मुझसे कुछ पूछने की ज़रूरत उन्हें महसूस नहीं हुई. पास खड़े उनके सहायक ने जब मुझे उठने का संकेत किया तो मैंने ढीढ बनकर डॉक्टर से कहा कि आपने मुझसे कुछ भी तो नहीं पूछा. और तब बेमन से उन्होंने एक दो सवाल किए और मुझे बाहर भेज दिया. उनकी जल्दी में शायद इतना ही सम्भव था.

बाहर मुझे बताया गया कि मुझे अपनी दोनों आंखों का ऑपरेशन करवाना होगा. बहरहाल, किस्सा कोताह यह कि निर्धारित तिथि को निर्धारित समय पर मैं अपनी आँख का ऑपरेशन करवाने अस्पताल पहुंच गया और कुछ प्रारम्भिक चिकित्सकीय कामों के बाद लेजाकर मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. कक्ष में कुल तीन लोग थे. एक स्वयं वे डॉक्टर, एक उनकी सहायिका और एक परिचारक. सहायिका जी ने बहुत कोमलता से मेरी आँख के नीचे निश्चेतन करने वाला इंजेक्शन लगाया, मेरी दोनों आंखों को ढक दिया गया और जिस आँख का ऑपरेशन होना था, उस पर पड़े आवरण में एक खिड़की बना दी गई. अब जो करना था मुख्य डॉक्टर को करना था. मुझे आभास तो हो रहा था कि मेरी आँख के साथ क्या हो रहा है, लेकिन महसूस कुछ नहीं हो रहा था. डॉक्टर अपने दक्ष हाथों से मेरी आँख में कुछ कर रहे थे और साथ-साथ अपनी सहायिका जी से गपशप भी करते जा रहे थे. मुझे वो गपशप क़तई अच्छी नहीं लग रही थी, लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि उन्हें मना करूं. थोड़ी देर बाद मुझे आवाज़ से पता लगा कि डॉक्टर साहब मोबाइल पर किसी से बात भी कर रहे हैं. हाथ उनके बदस्तूर चल रहे थे. बात सामान्य किस्म की थी, लेकिन लम्बी चली. मैं कुढ़ता रहा. कोई पन्द्रह मिनिट लगे होंगे इस सब में, और मेरी ऑपरेशन की गई आँख पर पट्टी चिपका कर मुझे ऑपरेशन थिएटर से बाहर छोड़ दिया गया.

पन्द्रह दिन बाद मेरी दूसरी आँख का ऑपरेशन हुआ और उस दौरान भी यही सब हुआ. यानि डॉक्टर साहब का फोन पर बतियाना, अपनी सहकर्मी से  गपशप करना वगैरह. ख़ैर! ऑपरेशन हो गया, और मैं घर आ गया. लेकिन घर आकर तमाम दूसरी व्यस्तताओं के बीच भी यह बात मन में घुमड़ती रही कि मरीज़ को देखते वक़्त और उसके बाद ऑपरेशन के वक़्त डॉक्टर का अपने सहकर्मी से और मोबाइल पर गपशप करते रहना कितना वाज़िब था. यह सब करते हुए उनके हाथ ज़रा भी इधर-उधर हो  जाएं तो? क्या आँख के ऑपरेशन जैसे नाज़ुक काम में एकाग्रता की ज़रूरत नहीं होती है? क्या किसी डॉक्टर का अपने मरीज़ के साथ इस तरह का गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार उचित है? वगैरह. काफी सोच-विचार के बाद,  अपनी तमाम नाराज़गी पर काबू पाते हुए, यथासम्भव संयत लहज़े में मैंने एक पत्र इन डॉक्टर महोदय को लिखा और ई मेल कर दिया.

बहुत जल्दी ही मुझे डॉक्टर महोदय का उत्तर भी मिला. मुझे खुशी इस बात की हुई कि अपने उत्तर में उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया पर, जो शालीन होने के बावज़ूद मधुर तो नहीं ही थी, कोई नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की, लेकिन  उनका जवाब यह था कि वे खुद भी चाहते हैं कि ऐसा न करें, लेकिन मरीज़ों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसा करना पड़ता है. यानि, बहुत कुशलता से उन्होंने अपने व्यवहार का दायित्व मरीज़ों की सुविधा के नाम कर दिया. या फिर उन्होंने समझकर भी मेरी बात को नहीं समझा.  अब उनके इस उत्तर पर क्या कहा जा सकता है सिवा चचा ग़ालिब को याद करने के :
                            या रब न वो  समझे  हैं न  समझेंगे मेरी बात
                            दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और!
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दिनांक 30 नवम्बर 2012 को जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तम्भ में 'सुविधा के ख़तरे' शीर्षक से प्रकाशित.