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Tuesday, December 26, 2017

एक बिल्ली जिसका नाम है जॉय फॉर ऑल!

अमरीका की एक प्रसिद्ध खिलौना कम्पनी की बनाई हुई एक बिल्ली, जिसका नाम जॉय फॉर ऑल है, पिछले दो बरसों से बाज़ार में है. यह बिल्ली गुर्राती है, म्याऊं म्याऊं करती है, अपने पंजे  को चाटती है और कभी-कभी उलटी होकर लेट भी जाती है ताकि आप इसका पेट सहला सकें. इस बिल्ली का निर्माण वरिष्ठ जन के लिए एक साथी की ज़रूरत को ध्यान में रखकर किया गया था. यहां याद कर लेना उचित होगा कि पश्चिमी देशों में बढ़ती उम्र का अकेलापन बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है. यह बिल्ली अकेलेपन से जूझ रहे बूढों को कम्पनी देती है और बूढों को इसका मल मूत्र भी साफ नहीं करना पड़ता है. यानि यह बग़ैर उनकी ज़िम्मेदारी बढ़ाए उन्हें साहचर्य प्रदान करती है. लेकिन अच्छी ख़बर  इसके बाद है.

अमरीका की  नेशनल साइंस फाउण्डेशन ने तीन बरस के लिए एक लाख मिलियन डॉलर का अनुदान दिया है जिसकी मदद से यह खिलौना कम्पनी और ब्राउन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मिलकर इस इस रोबोटिक बिल्ली को कृत्रिम बुद्धि से भी युक्त  कर देंगे. आशा की जाती है कि यह कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न  बिल्ली वृद्धजन को उनके रोज़मर्रा के सामान्य काम निबटाने में मददगार साबित होगी. फिलहाल ब्राउन विश्वविद्यालय के ह्युमैनिटी सेण्टर्ड रोबोटिक्स इनिशिएटिव के शोधकर्ता इस बात की पड़ताल में जुटे हैं कि इस बिल्ली को ऐसे कौन कौन-से कामों के लिए तैयार करना उपयुक्त होगा जो घर में अकेले रहने वाले वृद्धजन के लिए उपयोगी हों. इस बात के लिए ये लोग शोधकर्ताओं की टीम की मदद से यह पड़ताल कर रहे हैं कि वृद्धजन की रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी होती है और उनकी ज़रूरतें क्या  होती हैं. वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि उन्नत बिल्ली नए काम किस तरह करेगी. विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने मज़ाक के लहज़े में कहा कि हमारी यह बिल्ली न तो कपड़े प्रेस करेगी और न बर्तन मांजेगी. उससे कोई यह भी उम्मीद नहीं करता है कि वो गपशप करेगी, और न ही यह आस लगाता है कि वो जाकर अखबार उठा लाएगी. उनके मन में यह बात बहुत साफ़ है कि बोलने वाली बिल्ली की ज़रूरत किसी को  नहीं है. इस प्रोफ़ेसर ने यथार्थपरक लहज़े में कहा कि हम अपनी इस बिल्ली की कार्यक्षमता के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कोई दावा नहीं करना चाहते. हम तो बस एक ऐसी बिल्ली तैयार करना चाहते हैं जो रोज़मर्रा के बहुत सामान्य काम कर सके, जैसे कि वो अपने साथी वृद्ध को उनकी खोई चीज़ें तलाश करने में मदद कर दे या उन्हें डॉक्टर के अपाइण्टमेण्ट की याद दिला दे या ज़रूरत पड़ने पर यह सुझा दे कि वे किसे फोन करें! और हां, उनकी कोशिश यह भी है कि यह बिल्ली बहुत  महंगी न हो, हर कोई इसे खरीद सके. अभी जो बिल्ली बाज़ार में उपलब्ध है उसकी कीमत एक सौ डॉलर है और इनकी कोशिश है कि यह नई कृत्रिम बुद्धि वाली बिल्ली इससे थोड़ी ही ज़्यादा कीमती  हो. यही वजह है कि इन लोगों ने अपनी इस परियोजना को नाम दिया है: अफोर्डेबल रोबोटिक इण्टेलीजेंस फॉर एल्डरली सपोर्ट- संक्षेप में एरीज़ (ARIES).

पश्चिमी दुनिया की सामाजिक परिस्थितियों में कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न बिल्ली का यह विचार बहुत पसंद किया जा रहा है. एक कामकाज़ी महिला ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनकी 93 वर्षीया मां उनके साथ रहती हैं और उम्र के साथ वे बहुत सारी बातें भूलने लगी हैं. लेकिन उन्होंने  अपनी मां को जो जॉय फॉर ऑल बिल्ली खरीद कर दी वह उनके लिए बहुत मददगार साबित हुई है और जब वे काम पर चली जाती हैं तो बिल्ली उनकी मां की बहुत उम्दा साथिन साबित होती है, उनकी मां भी उससे  असली बिल्ली जैसा  ही बर्ताव करती हैं, हालांकि वे यह जानती है कि यह बिल्ली बैट्री चालित है. वे सोचती हैं कि जब यह बिल्ली कृत्रिम बुद्धि से युक्त हो जाएगी तो उनकी मां के लिए इसकी उपादेयता कई गुना बढ़ जाएगी. अभी मां काफी कुछ भूल जाती है, बिल्ली उन्हें ज़रूरी बातें याद दिला दिया करेगी.

इस परियोजना पर काम कर रहे विशेषज्ञों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में विकसित की जाने वाली यह कृत्रिम बुद्धि युक्त बिल्ली मनुष्यों के साथ एक ऐसा पारस्परिक रिश्ता  कायम कर सकेगी जिसकी उन्हें बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. वे यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि उनके द्वारा विकसित की जाने वाली यह बिल्ली वृद्धजन को एकाकीपन, चिंता और अवसाद से काफी हद तक निज़ात दिला सकने में कामयाब होगी. कामना  करनी चाहिए कि वर्तमान सुख-सुविधाओं और अमीरी की तरफ बुरी तरह  भागते-दौड़ते और व्यक्ति केंद्रित समाज ने जो समस्याएं पैदा कर दी हैं उनसे एक हद तक मुक्ति दिलाने में और कोई नहीं तो यह यांत्रिक प्राणी तो सफल हो ही जाएगा.

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 जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.            

Tuesday, October 10, 2017

जब बाज़ार में आने को थी बच्चे पालने वाली मशीन

कुछ माह पहले जानी-मानी खिलौना निर्माता कम्पनी मैटल ने घोषणा की थी कि वो बहुत जल्दी एक बेबी सिटर किस्म का उपकरण ज़ारी करेगी जो कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशयल इण्टेलीजेंस- एआई) पर आधारित होगा. कम्पनी के अनुसार एरिस्टोटल (अरस्तू) नामक यह उपकरण ध्वनि नियंत्रित एक स्मार्ट शिशु मॉनिटर के रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था. इस उपकरण का घोषित मकसद था माता-पिताओं को शिशुओं के संरक्षण, सुरक्षा और लालन पालन में मदद करना. लेकिन कम्पनी इस उपकरण को ज़ारी कर पाती उससे पहले ही अमरीका में बहुत सारे स्वैच्छिक संगठन और राजनेता इस उपकरण के विरोध में एकजुट हो गए और उनका दबाव इतना प्रबल रहा कि अंतत: कम्पनी को यह घोषणा करनी पड़ी कि वो इस उपकरण को बाज़ार में उतारने का अपना इरादा छोड़ चुकी है.

प्रारम्भ में कम्पनी ने कहा था कि यह उपकरण शिशुओं को बाल कथाएं और लोरियां सुनाएगा और ज़रूरत पड़ी तो उन्हें वर्णमाला भी सिखाएगा. इतना ही नहीं, अगर शिशु रात को रोया तो उसे चुप भी कराएगा. स्वाभाविक रूप से उपकरण के ये उपयोग आकर्षक थे.  लेकिन बाद में यह बात मालूम पड़ी कि इसमें बेबी मॉनिटर के रूप में एक कैमरा लगा होगा जो शिशु की गतिविधियों और उसके परिवेश को रिकॉर्ड करेगा. इतना ही नहीं यह बात भी सामने आई कि इन सबके आधार पर यह उपकरण बच्चों के काम आने वाली उपभोक्ता सामग्री जैसे मिल्क पाउडर, डायपर वगैरह के लिए उपलब्ध डील्स और कूपन्स की जानकारी प्रदान करने के साथ चेतावनी भी देगा कि घर में शिशु के काम की अमुक सामग्री का स्टॉक चुकने को है. शायद यही व्यावसायिक पहलू था जिसने अमरीका स्थित निजता के लिए चिंतित एक्टिविस्टों और विशेष रूप से एक अलाभकारी संगठन कमर्शियल फ्री चाइल्डहुड के कान खड़े किए. अपनी पड़ताल के बाद उन्होंने  इस उपकरण के विरोध में पंद्रह हज़ार लोगों के हस्ताक्षर जुटाये और  दो-टूक लहज़े में कहा कि “यह एरिस्टोटल कोई नैनी नहीं बल्कि एक घुसपैठिया है. हम चाहते हैं कि शिशुओं के कमरे कॉर्पोरेट जासूसी से बचे रहें”. इस संगठन की आपत्ति को ही आगे बढ़ाते हुए सीनेटर एडवर्ड जे मारके और रिप्रेजेण्टेटिव जोए बार्टन सहित अमरीका के बहुत सारे राजनीतिज्ञों ने भी इस बात पर सवाल खड़े किए कि यह  उपकरण जो डेटा एकत्रित करेगा उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और उसे किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा?

एरिस्टोटल के इस विरोध के अलावा भी दुनिया के बहुत सारे देशों में समझदार लोग बाज़ार में उतारी जाने वाली स्मार्ट डिवाइसेज़ के बच्चों  पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर चिंतित  हैं. उनका सोच है कि इस तरह के उपकरण बच्चों के भावनात्मक विकास में रुकावट डालते हैं. कुछ और लोगों की आपत्ति यह भी है कि इस तरह के  उपकरण बच्चों के अपने अभिभावकों से मानवीय सम्बंधों को विस्थापित कर उसकी जगह तकनीक से उनका रिश्ता कायम करने का ख़तरनाक काम करते हैं. इसी आपत्ति को एक जाने-माने शिशु रोग विशेषज्ञ ज़ेनिफर राडेस्की ने अपने एक लेख में यह कहते हुए बल प्रदान किया कि “इस तकनीक के बारे में निजता के महत्वपूर्ण मुद्दे के अलावा मेरी मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि जब कोई शिशु रोएगा, खेलना या कुछ सीखना चाहेगा  तो तकनीक का एक टुकड़ा उसकी आवाज़ सुनने वाला घर का सबसे ज़िम्मेदार और उत्तरदायी सदस्य बनकर उभरेगा.यंत्र द्वारा मनुष्य को विस्थापित कर देने के इस ख़तरे को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए.

इसी के साथ यह याद कर लेना भी उपयुक्त होगा वॉइस एक्टिवेटेड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दुष्प्रभाव सारी दुनिया में चिंता का कारण बनते जा रहे हैं. बहुत सारे अध्ययन हुए हैं जो बताते हैं कि अब तो बच्चे रोबोट्स को दिमागी समझ रखने वाला  सामाजिक प्राणी तक मानने लगे हैं और उनसे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं जैसे वे मानवीय प्राणी हों. बहुत सारे मां-बाप यह भी चिंता करने लगे हैं कि नए ज़माने के स्मार्टफोन्स और टेबलेट्स आवाज़ के निर्देश पर काम करने की अपनी तकनीक की वजह से उनके बच्चों के साथ बहुत कम उम्र में ही घनिष्ट रिश्ता कायम करने लगे हैं. एक बड़ी कम्पनी द्वारा बाज़ार में उतारे गए आवाज़ के निर्देशों पर संचालित होने वाले एलेक्सा नामक उपकरण के उपयोग के प्रभावों का अध्ययन करने वालों ने यह पाया कि इस उपकरण का प्रयोग करने वाले बच्चे प्लीज़ और थैंक यू जैसी अभिव्यक्तियों को भूलते जा रहे हैं और अशालीन होते जा रहे हैं. यह सारा प्रसंग हम सबको भी यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि हमारे जीवन में तकनीक की बढ़ती जा रही घुसपैठ हमारे लिए किस सीमा तक स्वीकार्य होनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिस चीज़ को आज हम सुविधा के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर रहे हैं कल को वही हमारे विनाश का सबब बन जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.