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Tuesday, July 4, 2017

मशीनें मनुष्य की पूरक ही हैं, विकल्प नहीं!

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन मे शुरु हुई औद्योगिक क्रांति ने हमारे जीवन को आधारभूत रूप से बदल कर रख दिया. जीवन का हर पहलू इससे प्रभावित हुआ. कल तक जो काम मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपने हाथों से करता था, वे काम आहिस्ता-आहिस्ता मशीनों की मदद से किये जाने लगे. स्वाभाविक ही है कि ऐसा होने से मनुष्य को बहुत सारे मेहनत-मज़दूरी वाले  कामों से मुक्ति मिली और उसका जीवन सुगम हुआ. औद्योगिक क्रांति का असर केवल मानवीय श्रम तक ही सीमित नहीं रहा, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तमाम क्षेत्रों को इसने प्रभावित किया. अपने श्रम और प्रयत्नों को कम कर वे तमाम काम मशीनों से करवाने के मनुष्य के प्रयास अभी भी थमे नहीं हैं. बल्कि कुछ अर्थों में तो ये प्रयास और अधिक तेज़ भी हुए हैं. कल तक जिन कामों को मशीनों से करवाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, अब वे काम भी मशीनों से करवाये जाने लगे हैं.

ऐसा करने से जहां मनुष्य के श्रम में काफी कटौती  हुई है वहीं एक नई आशंका भी उत्पन्न हो गई है. समझदार लोग इस बात से चिंतित होने लगे हैं कि अगर यही क्रम जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि मनुष्य द्वारा किये जाने वाले तमाम काम मशीनों से ही करवाये जाने लगें. मशीनों को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वे उन सभी कामों को अधिक दक्षता से और अपेक्षाकृत कम खर्चे में करने लग जाएं! अगर वाकई ऐसा हो गया तो क्या सारी मानवता बेरोज़गार नहीं हो जाएगी? बहुत सारे लोग अभी से यह सोच कर आशंकित हैं कि कल को उनका काम मशीनें करने लगेंगी और उनके पास करने को कुछ रह ही नहीं जाएगा!  इसी आशंका के तहत ऑक्सफोर्ड  विश्वविद्यालय के फ्यूचर ऑफ ह्युमेनिटी (मानवता का भविष्य)  संस्थान ने दुनिया के 352 शीर्षस्थ वैज्ञानिकों से जवाब मांग कर उन जवाबों के आधार पर यह अनुमान लगाने का प्रयास किया है कि कितने बरसों में मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले सारे काम मशीनें करने लगेंगी. इस पड़ताल में पाया गया है कि फिलहाल इस बात की पचास प्रतिशत सम्भावना है कि आगामी एक सौ बीस बरसों में मशीनें  मनुष्यों द्वारा किये  जाने वाले सारे काम करने लगेंगी. इस निष्कर्ष से उन सभी को आश्चर्य हुआ है जो यह सोच कर भयभीत थे कि ऐसा निकट भविष्य में ही हो जाएगा!

वैज्ञानिकों का सोच यह है कि मशीनें मेहनत का काम तो आसानी से कर लेती हैं लेकिन जहां विवेक की आवश्यकता होती है वहां वे पिछड़ जाती हैं, हालांकि कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफीशियल इण्टेलीजेंस) का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ता जा रहा है. अब यही बात देखें कि सन दो हज़ार दस में एक रोबोट एक साधारण तौलिये  को तह करने में उन्नीस मिनिट लगा रहा था वहीं दो बरस बाद ही वह पांच मिनिट में एक जीन्स को और छह मिनिट में एक टी शर्ट को तहाने लगा था. कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग करते हुए सन दो हज़ार सत्ताइस तक मानव रहित ट्रक चालन की कल्पना की जा रही है.

हममें से बहुतों ने यह बात नोट की होगी कि जब हम किसी ऑनलाइन  स्टोर  पर कोई चीज़ तलाश करते हैं तो तुरंत हमें उससे मिलती-जुलती चीज़ों के लिए सुझाव मिलने लगते हैं, और यह काम मानव नहीं करता है. इसी कामयाबी से उल्लसित होकर यह कल्पना भी की जाने लगी है कि सन दो हज़ार तरेपन तक आते-आते शल्य चिकित्सक का काम रोबोट करने लगेंगे और उससे भी चार बरस पहले यानि सन उनचास तक मशीनें ही बेस्ट सेलिंग उपन्यास भी लिखने लग जाएंगी! इस काम की शुरुआत तो हो ही चुकी है. गूगल अपने यंत्रों को रोमाण्टिक उपन्यास और समाचार लेख लिखने के लिए प्रशिक्षित कर रहा है. बेंजामिन नामक उनका एक यंत्र छोटी-छोटी साइंस फिक्शन पटकथाएं लिखने भी लगा है.

लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इस क्षेत्र में जो लोग काम कर रहे हैं वे अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं. उनके मन में यह बात एकदम साफ़ है कि यह तकनीक मनुष्य के लिए पूरक बन कर आएगी, न कि उसका विकल्प बनकर. उनके मन में यह बात भी बहुत साफ़ है कि तकनीक कभी भी मनुष्य को विस्थापित नहीं कर सकती है. और यह सब तब जबकि वे यह भी जानते हैं कि जिस गति से तकनीकी विकास हो रहा है उसे देखते हुए ऐसा कोई काम नहीं बचने वाला है जो मनुष्य करता हो और जिसे मशीन न कर सके. लेकिन ये लोग मज़ाक-मज़ाक में एक गम्भीर बात कह देते हैं. इनका कहना है कि सबकुछ हो चुकने के बाद भी कुछ काम तो मनुष्य के लिए ही बच रहेंगे, जैसे गिरजाघर के पादरी का काम. खुद मनुष्य यह नहीं चाहेगा कि किसी चर्च में उसे हाड़-मांस के पादरी की बजाय रोबोट मिले!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 जुलाई, 2017 को इसी  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 1, 2015

सेज पर रोबोट

हाल ही में एक ख़बर आई कि नवम्बर 2015 में मलेशिया में होने वाली एक कॉंफ्रेंस वहां की पुलिस की आपत्ति के बाद रद्द कर दी गई, तो लगा कि सारी दुनिया में हालात एक से हैं. यह कॉंफ्रेंस थी लव एण्ड सेक्स विद रोबोट्स विषय पर और इसके आयोजकों में प्रमुख थे 2007 में प्रकाशित इसी शीर्षक वाली किताब के लेखक डेविड लेवी और उनके साथी प्रोफेसर  एड्रियन चिओक. पुलिस ने ऐसा कुछ समझ कर कि इस कॉंफ्रेंस में रोबोट्स के साथ यौन सम्बन्ध कायम किया जाएगा, इसे ग़ैर कानूनी मान लिया, जबकि आयोजकों का कहना है कि इस कॉंफ्रेंस में बहुत व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दों पर अकादमिक विमर्श होना था. बता दूं कि इसी विषय पर पहली कॉंफ्रेंस  2014 में पुर्तगाल में आयोजित हो चुकी है, और यह दूसरी कॉंफ्रेंस अब कदाचित 2016 में लंदन में आयोजित होगी. 

असल में जब भी हमारे जीवन में नया कुछ आता है, उससे हमारी सुविधाओं में चाहे जितना इज़ाफा हो, बहुत सारे नैतिक, वैचारिक और कानूनी मुद्दे भी स्वाभाविक रूप से उठ खड़े होते हैं. यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि महात्मा गांधी के लिए इंजेक्शन भी हिंसा का ही एक प्रकार था और बहुत सारे लोगों के लिए अनेक अंग्रेज़ी दवाइयों  में मौज़ूद अल्कोहल उनके  अस्वीकार की वजह बनता है. लेकिन यहां हम बात रोबोट्स की कर रहे हैं. पिछले कुछ बरसों में कृत्रिम बुद्धि के विकास की वजह से  रोबोट्स की कार्य दक्षता में जो बदलाव और सुधार आए हैं उनकी वजह से अब वे तेज़ी से मनुष्य के स्थानापन्न बनते जा रहे हैं. हॉलीवुड की अनेक लोकप्रिय फिल्मों और किताबों में रोबोट्स और मनुष्यों के अंत: सम्बन्धों का जो चित्रण लगातार बढ़ता जा रहा है उसके यथार्थ रूपांतरण की आहटें अब साफ़ सुनाई देने लगी हैं. इधर हाल ही में हैलो बार्बी नामक एक खिलौना ऐसा आया है जो बच्चों से बातें करता है और उनके साथ खेलता है. इस तरह के खिलौनों का बच्चों की सामाजिकता पर क्या असर पड़ेगा? इसी तरह अगर रोबोट्स सारे मेहनत मज़दूरी वाले काम करने लगे तो क्या उससे लोगों का रोज़गार नहीं छिन जाएगा? चारों तरफ रोबोट्स से घिरा इंसान क्या असामाजिक नहीं हो जाएगा? और यह असामाजिकता वाला ही सवाल उठा है रोबोट्स के साथ प्रेम और सेक्स की सम्भावनाओं को लेकर भी. कैलिफोर्निया की एक कम्पनी की बनाई रियल डॉल तो पहले से मौज़ूद थी जो करीब-करीब इंसानों जैसी हरकत करती थी, अब उपरोक्त श्री लेवी का कहना है कि उनके खयाल से अगर ऐसे रोबोट्स बना लिये जाएं जिनके साथ सेक्स करना सम्भव हो तो यह लाखों-करोड़ों  ऐसे लोगों के लिए एक वरदान होगा जिन्हें या तो अपना मनपसन्द साथी मिल ही नहीं रहा है या जो अपने साथी के साथ अपने रिश्तों से असंतुष्ट हैं. लेवी का मानना है कि इस तरह के रोबोट्स न केवल अकेलेपन को दूर करेंगे, उनकी वजह से बाल यौन अपराधों में भी बहुत कमी आ जाएगी.

लेकिन सारे समझदार लोग लेवी की तरह से नहीं सोचते हैं. अब आप एक रोबोटिक्स एथिसिस्ट (नैतिकविज्ञानी) कैथलीन रिचर्डसन को ही लीजिए जो इस तरह की सम्भावना को एक भीषण दु:स्वप्न की तरह देखती हैं.  उनको लगता है कि ऐसे सेक्स रोबोट्स असल ज़िन्दगी में भयंकर असमानता पैदा कर देंगे. वे इन  सेक्स रोबोट्स को रोबोट वेश्या की तरह देखती हैं और शिकायत करती हैं कि इनके प्रचलन से हमारे पहले से विकृत रिश्तों में जो और विकृति आ जाएगी उसे हम जान बूझकर अनदेखा कर रहे हैं. वे कहती हैं कि भले ही वे इन सेक्स रोबोट्स पर प्रतिबंध की वकालत न करें, लोगों को इनके सम्भावित दुष्परिणामों के बारे में आगाह कर देना अपना दायित्व समझती हैं. कैथलीन यह भी कहती हैं कि अगर सेक्स के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल बढ़ गया तो इसका प्रतिकूल असर  मानवीय संवेदनाओं पर तो पड़ेगा ही, समाज का स्त्री के प्रति जो नज़रिया है और अधिक विकृत हो जाएगा.

लेकिन डेवी का कहना है कि हमारी ज़िन्दगी में रोबोट्स की आमद तो बढ़ेगी ही. उसे रोक पाना तो नामुमकिन है. और जब उनकी आमद  बढ़ेगी तो वे न सिर्फ हमारे सेवक और सहायक के रूप में हमारी ज़िन्दगी में आएंगे, वे हमारे दोस्त, सहचर और फिर शैया संगी बनकर भी आएंगे. डेवी बड़ी ईमानदारी से कहते हैं कि बहुत मुमकिन है कि कुछ लोग अपने साथी के रूप में मनुष्य  की बजाय रोबोट को पसन्द करने लगें, लेकिन ऐसे लोग बहुत अधिक नहीं होंगे. मनुष्य का झुकाव तो मनुष्य की ही तरफ रहेगा.

देखते हैं कि डेविड लेवी का यह आशावाद कितना सही साबित होता है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 दिसम्बर, 2015 को सेज पर रोबोट, क्या मनुष्य की ज़रूरतें पूरी करेगा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.