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Wednesday, December 31, 2025

राजकीय महाविद्यालय, सिरोही: आज रंग है!



आज मेरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. महाविद्यालय के प्राचार्य डो अजय शर्मा ने इस अवसर पर महाविद्यालय के पूर्व शिक्षकों को भी आमंत्रित किया है. मेरे लिए यह स्वर्णिम अवसर था अपने खूबसूरत अतीत को एक बार फिर से जी लेने का, लेकिन मैं इस अवसर को लपक लेने से वंचित रह गया. डॉ अजय शर्मा ने बहुत आग्रह किया, और अगर वे न भी करते तो मुझे इस आयोजन में होना ही था. लेकिन.... सब कुछ अपने वश में कहां होता है! मैं सिरोही से 400 किलोमीटर दूर, जयपुर में हूं और कल्पना कर रहा हूं कि वहां क्या-क्या हो रहा होगा! इस कॉलेज में और इस कस्बे में मैंने अपनी उम्र के बेशकीमती ढाई दशक गुज़ारे हैं! स्मृतियों का एक पूरा कोठार है मेरे पास. भले ही अब मैं सिरोही में नहीं रहता हूं, सिरोही अब भी मुझ में सांस लेता है! हमेशा लेता रहेगा. 


जब भी सिरोही याद आता है, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ भी साथ-साथ याद आ जाते हैं. उनकी एक  बहुत लोकप्रिय ग़ज़ल के मतले की दूसरी पंक्ति (मिसरा-ए-सानी) है: अपनी ख़ुशी न आए न अपनी खुशी चले! मेरे बारे में यह बात सौ फ़ीसदी सही है. 06 अगस्त 1974 को जब चित्तौड़ छोड़कर सिरोही आना पड़ा था तो वह मेरी मज़बूरी थी. अच्छा ख़ासा वहां जमा हुआ था. लेकिन तत्कालीन विधायक (अब स्वर्गीय) प्रो निर्मला सिंह को मुझसे जाने  क्या नाराज़गी हुई कि उन्होंने मेरा तबादला वहां से सिरोही करा दिया. मज़े की बात यह कि तबादला कराने के बाद वे मुझे आश्वस्त भी करती रहीं कि मैं आपका ट्रांसफर कैंसल करा दूंगी. निर्मला जी मेरी सहकर्मी थीं और उनसे सघन पारिवारिक आत्मीयता थी. उनके बारे में मैंने विस्तार से अपनी किताब 'गए दिनों का सुराग़ लेकर' में लिखा है. समय और सुविधा हो तो ज़रूर पढ़ें. अच्छा लगेगा. तो अनचाहे सिरोही आया, और आया तो फिर उर्दू के एक और मशहूर शायर को मन में बसा लिया: हज़रते दाग़ जहां बैठ गए, बैठ गए! 1974 में सिरोही आया और 1996 तक तो यहां बना ही रहा, इसके बाद भी कुछ और वक़्त टुकड़ों-टुकड़ों में  यहां गुज़ारा. य्हां गुज़ारे  वक़्त की चर्चा आगे कर रहा हूं. सिरोही से बाकायदा मेरा रिश्ता ख़त्म हुआ 17 जुलाई, 2000 को और इस बार भी कारण एक राजनेता ही बने. 21 मार्च 2000 को मैं राजकीय महाविद्यालय सिरोही का प्राचार्य बन कर आया और इसके दूसरे ही दिन तत्कालीन स्थानीय विधायक संयम लोढ़ा ने फ़ोन पर मुझे कहा, "अग्रवाल साहब, आप यहां आ तो गए हो, मैं आपको यहां रहने नहीं दूंगा." और उन्होंने नहीं ही रहने दिया. मात्र चार माह बाद 18 जुलाई को मैंने सिरोही को अलविदा कहा. लेकिन इन दोनों प्रसंगों का दूसरा पहलू यह भी है कि ये दोनों अप्रिय प्रसंग अंतत: मेरे लिए वरदान साबित हुए. अनचाहे सिरोही आया, लेकिन यहां लगभग 25 वर्ष रहा और इसने मुझे जितना दिया, उसका वर्णन नामुमकिन है. कुछ बातों की चर्चा आगे करूंगा. सिरोही से अनचाहे धकियाया गया, तो इसकी परिणति इस बात में हुई कि जयपुर पदस्थापित हुआ और अंतत: यहां का निवासी भी बना. कहां तो मेरा सपना यह था कि सिरोही कॉलेज से रिटायर होकर सिरोही में ही बस जाएंगे और कहां यह हुआ कि जयपुर से रिटायर होकर जयपुर में बस गए! लेकिन जयपुर में अपने विभाग के (लगभग) सर्वोच्च पर पर रहना और फिर यहां बस जाना मेरे व्यक्तित्व के विकास के लिए जितना  सकारात्मक रहा, उसको बताने के लिए बहुत सारे शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी. यहां रहकर साहित्य कला संस्कृति की दुनिया से मेरा रिश्ता और मज़बूत हुआ और अपने बहुत सारे सपने पूरे करने के मौके मिले. तो मुझे इन दोनों राजनेताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए! 


जैसा मैंने कहा, मैं अनचाहे सिरोही आया था. आया क्या, फेंका गया था. यहां का पहला दिन मुझे अब भी याद है. रात तीन बजे सिरोही के बस स्टैण्ड पर उतरना और भौंकते कुत्तों से जैसे-तैसे बचते हुए डाक बंगले पहुंचना. लेकिन कॉलेज में पहुंचने के बाद जैसे बहुत तेज़ी से सब कुछ बदलता गया. हिंदी विभाग के श्री सोहन लाल पटनी (तब वे डॉ नहीं हुए थे) ने अपने स्कूटर, जिसे उन्होंने गरुड़ नाम दे रखा था, पर मुझे शहर का एक चक्कर लगवाया और फिर अपने घर ले जाकर घी में डूबी रोटी खिलाई. तब उनसे जो रिश्ता कायम  हुआ वह उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा. वे विलक्षण व्यक्ति थे. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, और अपरिमित दुलार पाया. कॉलेज में और बहुत ज़बर्दस्त शख्सियतें थी, जैसे प्रो अमरलाल माथुर, प्रो गणपत लाल बोहरा, प्रो एम एल एच शाह, प्रो बीके गौड़ और भी बहुत सारे विद्वान शिक्षक गण. हरेक से अपार स्नेह मिला, और मिला मार्गदर्शन. कॉलेज का ऑफिस - उसके तो कहने ही क्या. श्री मोहम्मद शब्बीर ख़ान, श्री अब्दुल लतीफ - ये तो इंसान के रूप में फरिश्ते थे. काम में एक सौ दस फीसदी दक्ष. पूरे राजस्थान के उच्च शिक्षा जगत में इनकी धाक थी. लाइब्रेरियन मूल चंद सेठ - इनका तो कहना ही क्या! इन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया. 


एक से बढ़कर एक प्राचार्य-उपाचार्य यहां रहे. सबको याद करना संभव नहीं होगा, लेकिन प्रो श्याम लाल माथुर, प्रो महेश कुमार भार्गव, प्रो डी सी कृष्णानी, प्रो एचके रावत, डॉ जीसी छाजेड़ हरेक अपनी तरह से अप्रतिम. प्रो एचबी सक्सेना का व्यक्तित्व अलग ही था. उन जैसा रौब दाब वाला  प्राचार्य मैंने अपने पूरे सेवा काल में नहीं देखा, हालांकि मैंने कभी वैसा बनना नहीं चाहा.   इन सब प्राचार्यों ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि जब मुझे प्राचार्य की उसी कुर्सी पर बैठने का मौका मिला तो बैठने से पहले बहुत देर तक सोचता रहा कि जिस कुर्सी पर ऐसे महान लोग बैठ चुके हैं, क्या मैं उस कुर्सी पर बैठने के काबिल भी हूं? 


सिरोही में पढ़ाने का बहुत सुख मिला. मैंने अपने अध्यापन को यहां तराशा भी खूब. पुस्तकालय बहुत समृद्ध था, और हमने इसे और अच्छा बनाया. खूब पढ़ा, और कोशिश की कि उसका लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचे. विद्यार्थियों से मुझे अपार अपनापन मिला. छोटा कॉलेज था, इसलिए अगर कोई बाकायदा मेरा विद्यार्थी न भी रहा तो उसने गुरु वाला मान दिया. एक से ज़्यादा पीढ़ियां विद्यार्थी के रूप में मुझसे जुड़ीं.  अब सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत सारे पूर्व विद्यार्थी मुझसे जुड़े हैं. कॉलेज में खूब गतिविधियां कीं, और कॉलेज से बाहर शहर की गतिविधियों में भी सक्रिय सहभागिता की. बरसों मैंने विभिन्न ज़िला स्तरीय समारोहों का संचालन किया और इस निमित्त ज़िला प्रशासन ने मुझे अनेक बार सम्मानित भी किया. 


आज सिरोही कॉलेज में जो आयोजन हो रहा है उसका सबसे बड़ा आकर्षण हैं श्री शैलेश लोढ़ा. शैलेश लोढ़ा ने भारतीय मनोरंजन की दुनिया में जैसी पहचान बनाई है वह हम सबके लिए, विशेष रूप से इस पूरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही परिवार के लिए अत्यधिक गर्व की बात है. शैलेश ने साहित्य और मनोरंजन इन दो दुनिया में समान ख्याति अर्जित की है. जब मैं इस कॉलेज में पढ़ाता था, तभी शैलेश भी यहां के विद्यार्थी थे. शैलेश अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे. मुझे याद है कि तब मैं अपने कॉलेज के वार्षिक समारोहों का संचालन किया करता था, और बरस दर बरस मुझे शैलेश की उपलब्धियों की बहुत लम्बी सूची पढ़नी पड़ती थी. वैसे तो वे विज्ञान के विद्यार्थी थे, साहित्य में गहरी रुचि रखने के कारण उनका मुझसे भी नियमित सम्पर्क था. बल्कि इस कॉलेज के वे छात्र बने उससे पहले से, जब वे बालकवि शैलेश के रूप में जाने जाते थे, हमारा पारस्परिक सम्पर्क रहा. सम्पर्क के और भी कारण रहे, मसलन यह कि उनके पिता जी, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, मेरे प्रिय मित्र थे. शैलेश की दो बहनें एमए हिंदी की मेरी प्रिय छात्राएं थीं. शैलेश में जो सबसे बड़ा गुण मैं पाता हूं वह है उनकी अध्ययन वृत्ति. अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच वे नया से नया पढ़ते हैं और उन्हें उस पर बात करना भी अच्छा लगता है. मैं आज सिरोही में नहीं हूं इसमें मेरा यह मलाल भी शामिल है कि शैलेश से मिलने का एक अवसर मैं खो रहा हूं. उनके लिए मेरी शुभ कामनाएं! 


सिरोही कॉलेज के सारे स्टाफ में ग़ज़ब का भाईचारा था. किसी भी एक का सुख या दुख पूरे स्टाफ़ का सुख दुख होता था. होली दिवाली हरेक हरेक के घर जाता था. कोई ईद ऐसी नहीं बीती जब हम लोग शब्बीर साहब और लतीफ़ साहब के यहां न गए हों, और कोई होली दिवाली ऐसी नहीं बीती जब वे हमारे घर न आए हों. तब जो रिश्ते बने वे अब तक बरक़रार हैं. लम्बे समय तक यहां कम ही शिक्षक रहे, अत: सबमें भाई चारा रहा. बाद में जब उनकी संख्या बढ़ी तब भी यही आत्मीयता बनी रही. यह बहुत स्वाभाविक है कि कुछ लोगों से मेरी आत्मीयता ज़्यादा रही और वे मेरे सारे सुख दुखों के साथी रहे, अब भी हैं. व्यक्तिगत चर्चा यहां नहीं करूंगा.


सोहन लाल पटनी के कारण, और इस कारण भी कि उस काल खण्ड में राजस्थान साहित्य अकादमी बहुत सक्रिय थी, सिरोही में खूब सारी साहित्यिक गतिविधियां आयोजित हुईं और इस कारण हम राजस्थान के तो करीब-करीब सारे भी ख्यात साहित्यकारों को अपने कॉलेज में भी ला सके. हिंदी के बड़े कथाकार स्वयं प्रकाश उन दिनों सुमेरपुर में पद स्थापित थे, और मेरे आत्मीय थे. वे  मेरे कॉलेज में न जाने कितनी बार आए होंगे. विद्यार्थी भी उनसे घुल मिल गए थे और अगर वे महीना भर कॉलेज में नहीं आते तो विद्यार्थी इसरार करते कि सर, स्वयं प्रकाश जी को बुलाइये ना! और वे आ जाते. स्वयं प्रकाश ने मेरे ही कॉलेज से स्वयं पाठी विद्यार्थी के रूप में हिंदी में एम ए किया, और फिर इसी कॉलेज की लाइब्रेरी का लाभ उठाते हुए मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. भी की. मेरे कॉलेज से अपने लगाव का और यहां के अनुभवों का बहुत रोचक वर्णन उन्होंने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक 'धूप में नंगे पांव' में किया है. अद्भुत किताब है यह. 


जब मैं सिरोही आया तब परिवार में हम तीन प्राणी थे- पत्नी बेटा और मैं. यहां मेरा परिवार बड़ा हुआ. बेटी का जन्म यहीं हुआ. यहीं से बेटे ने पीईटी में सफलता प्राप्त कर अपनी जीवन राह चुनी. जब मैं उपाचार्य था, तब यहीं से उसका विवाह हुआ. सिरोही में जन्मी मेरी बेटी ने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सैकण्डरी परीक्षा में मेरिट में स्थान पाया और फिर उसने भी अपने भाई वाली ही राह चुनी. बाद में बेटी नौकरी करने अमरीका चली गई और बेटा ऑस्ट्रेलिया. बेटी के जीवन से सिरोही इस तरह भी जुड़ा कि सिरोही का निकटवर्ती गांव वराड़ा उसका ससुराल बना. यहां रहते हुए ही मेरी मां और फिर मौसी ने प्राण त्यागे. 


हम लोगों के जीवन में सिरोही ऐसा घुला मिला है कि हमारे बच्चे कहते हैं कि जब भी उन्हं घर का कोई सपना आता है, सपने में वही शांति नगर का किराये वाला घर आता है! 


सिरोही कथा अनंत है. अपनी दो किताबों - ‘समाज का आज’ और ‘गए दिनों का सुराग लेकर’ में मैंने सिरोही के बहुत सारे प्रसंग लिखे हैं. लेकिन जितने लिखे हैं उससे अधिक अभी लिखे जाने हैं! 


जीवन की इस  संध्या वेला में सिरोही में बिताए दिन बहुत याद आते हैं! वे दिन लौट कर नहीं आएंगे, लेकिन उनकी यादें मन को हमेशा प्रफुल्लित करती रहेंगी. 


मेरे मन में डॉ अजय शर्मा और उनकी पूरी टीम के प्रति असीम कृतज्ञता का  भाव है जिनंने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है. मेरा सुझाव है कि इसे महाविद्यालय कैलेण्डर का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए.   जो मित्र सिरोही कॉलेज के इस आयोजन में भाग ले पा रहे हैं, उन सबको मेरा सप्रीत अभिवादन और हार्दिक शुभ कामनाएं! 


मान लें कि मैं भी इस समय आपके साथ हूं. 

Sunday, May 19, 2024

कितने कमरे!


 जब मुझसे यह आग्रह किया गया कि मैं अपने पढ़ने लिखने के कमरे में बारे में कुछ लिखूं तो मैं सोच में पड़ गया. लगभग 35 साल की सरकारी नौकरी में अनेक घर बदले और स्वाभाविक ही है कि घर बदलने के साथ पढ़ने-लिखने के कमरे भी बदले. बेशक अब लगभग दो दशक से अपने घर में हूं और मानता हूं कि स्थायी रूप से हूं, लेकिन इससे पहले तो थोड़े-थोड़े अंतराल पर कमरे बदलते ही रहे हैं, तो मुझे किस कमरे की बात करनी चाहिए, या क्या सारे कमरों की बातें करनी चाहिएं? लेकिन इन सब कमरों की बात करूं भी तो शुरुआत तो वहीं से करनी होगी, जहां से वाकई पढ़ने-लिखने की शुरुआत हुई! और रोचक बात यह कि जहां से यह शुरुआत हुई वहां कमरा जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं.

 

मुझे बात  को थोड़ा और खोल कर कहना चाहिए. 


मेरा  जन्म और किशोरावस्था बल्कि युवावस्था के आरम्भ तक का सारा जीवन उदयपुर में बीता है. मेरा संबंध एक व्यापारी परिवार से था अत: घर में पढ़ने-लिखने का कोई माहौल नहीं था. शहर के बीचों बीच एक तिमंज़िला मकान में मैं अपने मां-बाप के साथ रहता था. मैं उनकी एकमात्र जीवित संतान था. मकान किराए  का था और मुझे अब भी यह बात स्मरण है कि उसका किराया ` 35/- माहवार था. जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था तब लम्बी बीमारी के बाद मेरे पिता का निधन हो गया. उसके बाद मां ने अपने कुछ ज़ेवर वगैरह बेच कर और कुछ कर्ज़ा लेकर उस घर को ग्यारह हज़ार रुपये में खरीदा - ताकि सर पर एक छत तो रहे. उस मकान की रजिस्ट्री मेरे नाम पर हुई और इस तरह अल्प वय में ही मैं उस मकान का विधिवत स्वामी बन गया. उस तिमंज़िला इमारत के भूतल पर हमारी दुकान थी, पहले तल पर दो कमरे और उनके सामने एक बरामदा था. इस तल  का कोई ख़ास उपयोग नहीं होता था. दूसरे तल पर फिर दो कमरे और एक बरामदा और आगे एक बालकनी थी. असल में यही हमारा लिविंग एरिया था. एक कमरा हमारा शयन कक्ष था, दूसरे कमरे में एक कोना मुझे मिला हुआ था जिसमें एक टेबल कुर्सी थी और दो आले जिनमें मेरी कुछ किताबें  रहती थीं. यह एक अंधेरा-सा कमरा था. कोई खिड़की या वेण्टीलेशन इसमें नहीं था. यहीं एक रेडियो भी हुआ करता था जिसे सुनते हुए मैं पढ़ाई जैसा कुछ करने की कोशिश  करता था. पुराने ज़माने का वाल्व वाला रेडियो था, जिसे मैं कभी बाहर बरामदे में रख कर सुनता, कभी छत पर ले जाता....इसी तल पर एक खुली-खुली सी बालकनी भी थी जिसमें खूब बड़े तीन झरोखे जैसे थे और जिनसे खूब प्रकाश मिलता था. वहां से नीचे  के बाज़ार की सारी हलचल नज़र आती थी.  इसी बालकनी का एक कोना लम्बे समय तक मेरा पढ़ाई का 'कमरा' रहा. यह चर्चा आगे चलकर करूंगा. मकान की तीसरी मंज़िल एक खुली छत थी और उसी छत पर एक टिन शेड वाला कमरा था जिसे मेरी  मां बतौर रसोई काम में लेती थी. वही हमारा डाइनिंग रूम भी था. तब खड़े होकर खाना बनाने का या डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाने का चलन नहीं हुआ था. तब तक स्टोव भी अधिक चलन में नहीं आए थे,  कोयले या लकड़ी जलाकर खाना बनाया जाता था और रसोई में ज़मीन  पर बैठकर ही खा लिया जाता था.

 

तो स्कूली शिक्षा के दौरान यही अंधेरा-सा कमरा मेरा पढ़ाई का कमरा भी रहा. इस कमरे में बड़ा पुराना एक पलंग रखा रहता था, घर के बिस्तर भी इसी   कमरे में जमा कर रखे जाते थे और रात को सोते समय उन्हें बिछा लिया जाता था. पलंग पर कोई बिस्तर बिछा नहीं रहता था. असल में वह ज़माना आज से अलहदा था. तब बेडरूम जैसी कोई परिकल्पना चलन में नहीं थी, कम से कम हम जैसों के यहां तो नहीं थी. मैं पढ़ाई में बस सामान्य-सा ही था, इसलिए ऐसी कोई ख़ास बात याद नहीं आ रही जिसका ज़िक्र करूं. हां, एक बात ज़रूर बताने काबिल है. उन दिनों मुझे एक अजीब शौक लगा था. शौक यह था कि बड़े लोगों को खासकर राजनेताओं को उनके जन्म दिन, निर्वाचन, पद ग्रहण आदि के अवसर पर बधाई के पत्र लिखा करता था. मैं पत्र लिख कर डाक में डालता और  कुछ दिनों बाद मेरे घर के पते पर 'भारत सरकार की सेवार्थवाला सर्विस स्टाम्प लगा लिफाफा आता, जिसमें वे बड़े लोग मेरे प्रति आभार व्यक्त करते. पत्र सामान्यत: टंकित होता लेकिन उस पर हस्ताक्षर वास्तविक होते. औरों की तो छोड़िये, प्रधानमंत्री के यहां से भी उनके हस्ताक्षर वाले पत्र आते. अलबत्ता राष्ट्रपति के यहां से जो पत्र आते उनमें उनके सचिव के हस्ताक्षर होते. उसी दौर में जब अमरीका में जॉन एफ कैनेडी राष्ट्रपति बने तो एक बधाई पत्र उन्हें भी भेज दिया  और उनके यहां से भी उनकी तस्वीर वाला धन्यवाद पत्र आया. कभी-कभार किसी फिल्मी कलाकार को भी ऐसा ही पत्र लिख देता और उनके यहां से उनके हस्ताक्षर वाले पत्र की बजाय उनका एक फोटो आता जिस पर उनके हस्ताक्षर होते. ऐसे कोई चार पांच सौ पत्रों का पुलिंदा मेरे पास था, जो बाद में कहीं इधर उधर हो गया. अब उनमें से एक भी पत्र मेरे पास नहीं है. लेकिन क्या तो वह ज़माना था जब नेतागण पत्रों के जवाब दिया करते थे, और क्या ज़माना था जब मुझ जैसा सामान्य स्कूली विद्यार्थी उन्हें पत्र लिखता था. क्या आज के विद्यार्थी भी ऐसा कोई शौक पालते हैं

 

जब मैं स्कूली शिक्षा पूरी करके  कॉलेज में आया तो कुछ ज़्यादा पढ़ाई की ज़रूरत होने लगी और वह अंधेरा-सा कमरा मुझे पढ़ाई के लिए अनुपयुक्त लगने लगा. तब मैंने उस बालकनी के एक कोने को अपना पढ़ाई का 'कमरा' बनाया. असल में वह कमरा था ही नहीं. लेकिन उस कोने में मैंने अपनी वही पुरानी टेबल कुर्सी लगा ली और वहीं बैठ कर बाज़ार की रौनक देखते हुए, बाज़ार की आवाज़ें सुनते हुए पढ़ाई करने लगा. वह सुरक्षा के ताम-झाम से बहुत पहले का समय था अत: अपनी उसी बालकनी से मैंने पण्डित जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी को भी गुज़रते हुए देखा है. असल में मेरा वह घर राजमहल को जाने वाली सड़क पर स्थित था और जो भी बड़ा व्यक्ति उदयपुर में आता वह राजमहल भी ज़रूर जाता. इसलिए मुझे इन महान शख्सियतों  को अपनी बालकनी से देखने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा.  बाद मैं जैसे-तैसे पैसों का जुगाड़ कर एक सस्ता-सा टेबल लैम्प भी खरीदकर भी मैंने उस टेबल पर रख लिया. इस बालकनी वाले तथाकथित कमरे में ही बैठकर मैंने अपनी बीए और एमए की पढ़ाई की. किताबें खरीदने की अपनी हैसियत थी नहीं, शहर की दो लाइब्रेरियों और अपने कॉलेज की लाइब्रेरी  और ख़ास तौर पर एमए की पढ़ाई के दिनों में अपने गुरुजन के घरों से जो किताबें लाता उन्हें कमरे में आलों में रखता और ज़रूरत के मुताबिक एक या दो किताबें टेबल पर रखकर उन्हें पढ़ता.  एमए की परीक्षा देने के बाद मैंने अपने एक ही गुरू जी को उनकी लगभग छह सात सौ किताबें लौटाई थीं. 

 

एमए पास करते ही 1967 में मुझे राजस्थान सरकार के कॉलेज शिक्षा विभाग में प्राध्यापक हिंदी की नौकरी मिल गई और मेरा गृह नगर मुझसे छूट  गया. लगभग 35 बरसों की नौकरी में मुझे कभी भी उदयपुर में पदस्थापित होने का अवसर नहीं मिला और संयोग कुछ ऐसा बना कि नौकरी से रिटायर होने के बाद भी मैं उदयपुर नहीं जाकर जयपुर में बस गया. तो उदयपुर का वह तथाकथित पढ़ाई का कमरा मुझसे छूट गया (बरसों बाद वह घर भी मैंने बेच दिया, और उसके कुछ बरस बाद उसके नए खरीददार ने उसे भूमिगत करवा कर नई तरह से बनवा लिया. और इस तरह मेरा वह कमरा सदा-सदा के लिए लुप्त हो गया! इति प्रथम कमरा कथा! 

 

नौकरी के शुरुआती बरसों में, जब तक मेरा विवाह नहीं हुआ, प्राय: एक कमरा लेकर रहा, अत: वही कमरा ड्राइंग रूम-बेडरूम स्टडी रूम सब कुछ रहा. भीनमाल और चित्तौड़गढ़ में कुल मिलाकर ऐसे तीन कमरे मेरा निवास स्थान बने. पहली बार अलग से पढ़ाई का कमरा मुझे मयस्सर हुआ चित्तौड़गढ़ में जहां मुझे एक बहुत बड़ा सरकारी बंगला अलॉट हुआ. वहां जगह खूब थी, सामान कम था. किताबें और भी कम. लेकिन नौकरी लग जाने से इतनी सुविधा हो गई थी कि हर माह एक दो किताबें खरीद लेता था. वहां किताबों कोई दुकान तो नहीं थी और न तब तक ई कॉमर्स  साइट्स चलन में आई थीं. मैंने वहां ज़्यादा किताबें रेल्वे स्टेशन के बुक स्टॉल से खरीदीं.  उन्हीं दिनो सीमोन द बुवा की द सेकण्ड सेक्स भी खरीदी, जो अब तक मेरे पास है. तो ये किताबें मेरे कमरे की शोभा बढ़ातीं. और हां, जब मैंने एमए पास किया और उसमें मुझे स्वर्ण पदक मिला तो उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की एक नीति की वजह से हमें स्वर्ण पदक की बजाय (शायद) छह सौ रुपये की किताबें दी गई थीं और उन किताबों में से हरेक पर इस आशय की एक चिप्पी लगी हुई थी कि स्वर्ण पदक के बदले यह किताब अमुक को दी गई है. अच्छी बात यह थी कि किताबों की सूची हमसे मांगी गई थी और मुझे अपनी मनचाही किताबें मिली थीं. वे किताबें भी मेरे कमरे में रहती थीं, और मेरे खूब काम भी आती थीं. इस तरह किताबें ही मेरा स्वर्ण पदक बनीं, और उनमें से अधिकांश अब भी मेरे पास हैं.  उस ज़माने में अमरीकी दूतावास भी बहुत सारी किताबें निशुल्क भेजा करता था. मैं जब जयपुर आता तो पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से रूसी किताबें भी ज़रूर खरीद कर ले जाता. तब तक वैचारिक रूप से मैं बहुत सजग नहीं था. उन किताबों को खरीदने का एक बड़ा कारण उनका सस्ता और आकर्षक होना भी हुआ करता था. 

 

अपनी नौकरी के प्रारम्भ से ही मेरे पास  जेके का एक पोर्टेबल टाइपराइटर था और मैंने अपनी पूरी नौकरी के साढ़े तीन दशकों में उसका भरपूर इस्तेमाल किया है. अपने लेख समीक्षा आदि तो मैं स्वयं उस पर टाइप करता ही था, व्यक्तिगत पत्र, यहां तक की पोस्टकार्ड भी उसी पर टाइप करके भेजता. असल में मुझे लिखने में सुरुचि का जुनून-सा रहा है. अच्छी स्टेशनरी पर सुरुचिपूर्वक लिखना-टाइप करना मुझे बहुत प्रिय रहा है और इस बात को लेकर कई दोस्तों ने मेरी सराहना भी की है. जहां-जहां भी रहा, यह टाइपराइटर मेरा लेखन-सहयोगी रहा. मेरे पास अपने लिखने-पढ़ने का बहुत समृद्ध कमरा कभी भी नहीं रहा, लेकिन ज़रूरी सुविधाएं हमेशा मेरे पास रही. एक टेबल, एक ठीक-ठाक  कुर्सी, एक टेबल लैम्प, टाइपराइटर, स्टेशनरी का खूब सारा सामान, बढ़िया कागज़, अच्छा लैटरहेड, बढ़िया लिफ़ाफे, पर्याप्त डाक टिकिट ये सब मेरे पास खूब रहे. एक बार मेरे एक मित्र ने जो दूसरे शहर में रहते थे, टिप्पणी की थी कि आपके पत्रों को देखकर लगता है कि आपकी राइटिंग टेबल खूब सजी-धजी और भरपूर होगी. 

 

अपनी नौकरी के दौरान मैं क्रमश: भीनमाल, चित्तौड़गढ़, सिरोही, कोटपूतली, आबू रोड और जालोर में रहा. ये सभी राजस्थान के छोटे कस्बे  हैं. भले ही मेरे पास स्वतंत्र लिखने-पढ़ने का कमरा इनमें से किसी भी जगह नहीं रहा, इतना अभाव भी नहीं रहा कि लिखने-पढ़ने में कोई असुविधा हो. सबसे ज़्यादा समय, लगभग 25 बरस मैंने सिरोही में बिताया और वहां मेरे पास मात्र दो कमरों का एक छोटा-सा किराए का घर था. उसमें से एक कमरे में मैंने अपनी लिखने-पढ़ने की टेबल लगा रखी थी. यह टेबल एक बड़ी खिड़की से सटी हुई थी अत: वहां स्वाभाविक उजाला रहता था.  टेबल के पास बांस की बनी एक पुस्तक रैक थी और जब किताबें उस रैक में नहीं समातीं तो उसी कमरे में लगी  एक अलमारी में रख देता. मेरे सिरोही कॉलेज की लाइब्रेरी बहुत बढ़िया थी और वहां के ज़िला पुस्तकालय- सारणेश्वर लाइब्रेरी से भी मुझे खूब किताबें मिल जाती थीं, अत: वहां पढ़ने का खूब बढ़िया मौका मुझे मिला. इस कमरे की चर्चा का समापन करते हुए दो-तीन छोटी-छोटी बातें और. एक तो यह कि यह कमरा एक्सलूसिवली मेरे पढ़ने लिखने का कमरा नहीं था. जब बाहर  पढ़ने चले गए बच्चे घर आते तो यह उनका शयन  कक्ष बन जाता, जब कोई मेहमान आता तो यह कमरा उनके  सोने-बैठने के काम आने लगता, जब किसी को औपचारिक रूप से खाना खिलाना होता तो इसी कमरे को डाइनिंग रूम की हैसियत बख़्श दी जाती और सबसे बड़ी बात यह कि जब बाहर से कोई लेखक सिरोही आता तो उसके सम्मान में छोटी मोटी गोष्ठी भी इसी कमरे में कर दी जाती.  यह इस कमरे का सौभाग्य रहा कि कम से कम राजस्थान के तो लगभग सारे ही नामी लेखकों की चरण धूलि यहां पड़ी. स्वयं प्रकाश, जिनसे मेरी बहुत गहरी दोस्ती रही, ने न जाने कितनी बार इस कमरे में  अपनी रचनाएं मेरे दोस्तों को सुनाईं! 

 

सिरोही के बाद मैं जिन भी जगहों पर रहा, ज़्यादा समय के लिए नहीं रहा. एक अपवाद आबू रोड है जहां मैं करीब दो बरस रहा और संयोग से मुझे बहुत सुंदर घर भी वहां मिल गया. वहां मेरे पास पढ़ने-लिखने का कमरा तो रहा, लेकिन क्योंकि तब तक मैं प्राचार्य बन गया था, पढ़ने-लिखने का समय मुझे कम मिलने लगा, इसलिए कमरा तो रहा, उसका अधिक उपयोग नहीं हुआ. प्राचार्य के रूप में मुझे जालोर में और उससे पहले सिरोही में खूब अच्छे सरकारी बंगले मिले, लेकिन दोनों जगहों पर भी मैं  अधिक समय नहीं रह सका, इसलिए उन बंगलों के पढ़ने-लिखने के कमरों की कोई खास स्मृतियां नहीं हैं. 

 

अपनी नौकरी के आखिरी चरण में जब मैं जयपुर आया तो यहां मुझे सरकारी ट्रांज़िट हॉस्टल में रहना पड़ा. वह एक छोटा-सा, काम चलाऊ आवास था. मैं अपना सामान भी सिरोही से लेकर नहीं आया था और मेरी नौकरी बहुत व्यस्तता वाली थी अत: यहां पढ़ने-लिखने का कोई ख़ास अवसर मुझे नहीं मिला. इसके बावज़ूद मैंने पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की एक किताब का अनुवाद इसी हॉस्टल में रहते हुए किया, और अब आश्चर्य होता है कि कैसे किया! सेवा निवृत्त होने के बाद हम इस हॉस्टल से सीधे अपने घर में आए और यहां मुझे बाकायदा एक पढ़ने का कमरा मयस्सर हुआ. घर हमारा ज़्यादा बड़ा नहीं है, लेकिन दो जन के लिए छोटा भी नहीं है.  एक कमरा बाकायदा मेरा अध्ययन कक्ष है जिसमें दो स्टील की अलमारियां किताबों से ठसाठस भरी हैं और बहुत सारी किताबें कमरे में इधर उधर रखी हैं. इसी कमरे से जुटा एक छोटा-सा स्टोर रूम है, उसमें भी मैं अपनी किताबें ठूंसता रहता हूं. जितनी  किताबें हैं उनकी तुलना में जगह कम है. किताबें हैं कि उनका कुनबा बढ़ता ही जाता है. दोस्तों से किताबें मिलती रहती हैं, समीक्षार्थ किताबें आती रहती हैं और हर बार यह संकल्प करने के बावज़ूद कि अब और किताबें नहीं खरीदूंगा हर माह चार पांच किताबें तो खरीद ही लेता हूं. ई कॉमर्स ने किताबें खरीदना बहुत आसान कर दिया है. उनके लिए जगह बनाने के लिए समय-समय पर किताबों की  छंटनी करके किसी  न किसी सार्वजनिक पुस्तकालय को भेंट करता रहता हूं. उम्र के इस मुकाम पर पहुंच कर बहुत ज़्यादा  किताबें इकट्ठी करने का भी मोह नहीं है. बल्कि कोशिश करता हूं कि उनकी छंटनी  होती रहे और केवल वे ही किताबें घर में रहें जिनका रहना बहुत ज़रूरी है. बहुत सारी किताबों को अलविदा इसलिए भी कह दिया है कि उनके ई संस्करण अब मेरे किण्डल पर मौज़ूद हैं. हज़ारों किताबों की पीडीएफ मेरे कम्प्यूटर में हैं. बल्कि उनके लिए एक अलग हार्ड डिस्क खरीद रखी है. एक अच्छी टेबल  और कुर्सी है, पुराने मैन्युअल टाइपराइटर को कभी का अलविदा कह चुका हूं. लिखने का सारा काम अपने कम्प्यूटर पर करता हूं. हालांकि चिट्ठियां अब बहुत कम लिखता हूं, स्टेशनरी का मेरा शौक बरकरार है. हां, इस टेबल पर मेरा साथ गूगल का एआई  आधारित उपकरण एको डॉट देता है जिस पर मैं पढ़ने लिखने के पूरे समय शास्त्रीय वाद्य संगीत चलाकर रखता हूं. असल में मुझे पढ़ते लिखते समय संगीत का साथ बहुत ज़रूरी लगता है. इसके बग़ैर मैं एकाग्र हो ही नहीं पाता हूं.

 

मेरा यही कमरा कोरोना काल में मेरे बहुत सारे सजीव प्रसारण आदि के लिए स्टूडियो भी बना और अब भी यू ट्यूब के अपने पाक्षिक कार्यक्रम डियर साहित्यकार के लिए मैं यही से अपने अतिथि साहित्यकारों से संवाद करता हूं. अगर मन होता है तो इसी कमरे की अपनी पढ़ने-लिखने की टेबल पर मैं लैपटॉप पर कोई फ़िल्म वगैरह भी देख लेता हूं. मेरा लैपटॉप एक बड़े स्क्रीन से जुडा हुआ है अत: उस पर फिल्म देखना सुविधाजनक व सुखद रहता है.

 

तो यह था मेरा कमरा पुराण!

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Wednesday, July 22, 2020

प्राचार्य कैसे-कैसे!


सिरोही में मैंने कॉलेज में एक गतिविधि में बहुत ज़्यादा रुचि ली और वह गतिविधि थी फिल्म प्रदर्शन. कॉलेज के पास एक 16 मि. मि. फिल्म प्रोजेक्टर था. महेश कुमार भार्गव जैसे उत्साही और नवाचारी प्राचार्य का सम्बल मिला तो मैंने कॉलेज में खूब ही फिल्में दिखाईं. कुछ लोकप्रिय किस्म की हिंदी फिल्में, कुछ विषयों से जुड़ी शैक्षिक फ़िल्में और कुछ नई लहर की फिल्में, जैसे एम एस सथ्यु की गरम हवा’. इस गतिविधि में हालांकि मुझे वक़्त खूब देना पड़ा, मज़ा भी बहुत आया.
इस चर्चा को और आगे बढ़ाऊं उससे पहले प्राचार्य महेश कुमार भार्गव की संवेदनशीलता का एक प्रसंग काबिले-ज़िक्र लग रहा है. फ़िल्म प्रदर्शन के लिए हम कॉलेज के रसायन विज्ञान विभाग के प्रयोगशाला सहायक क़मरुद्दीन की सेवाएं लेते थे. क़मरुद्दीन अल्प वेतन भोगी कर्मचारी था और नौकरी के बाद के समय में रजाई गद्दे सिल कर कुछ अतिरिक्त कमाई कर लिया करता था. जब फ़िल्म शो ज़्यादा ही होने लगे तो एक दिन क़मरुद्दीन ने मुझसे कहा कि इस वजह से वह शाम को अतिरिक्त आय के लिए जो काम करता है उसे करना कठिन होता जा रहा है. मुझे भी उसकी यह व्यथा उचित लगी. मैंने भार्गव साहब से इस बात की चर्चा की. अब अगर उनकी बजाय कोई और प्राचार्य होता तो वह रौब से कहता कि सरकारी आदेश है इसलिए काम तो करना ही पड़ेगा. लेकिन भार्गव साहब अलग ही मिट्टी के बने थे. उन्होंने फौरन उस अल्प वेतनभोगी कर्मचारी की तक़लीफ़ को समझा और मुझे एक रास्ता बता कर उसकी मुश्क़िल को हल किया. रास्ता यह था कि जिस दिन फिल्म शो होता, मैं प्राचार्य जी को एक आवेदन लिखता कि आज शाम आयोज्य फिल्म शो में काम करने वाले कर्मचारियों के जलपान के लिए बीस रुपये तक व्यय करने की अनुमति प्रदान करें. प्राचार्य जी उस पर अनुमति प्रदान कर देते. मैं वह अनुमति पत्र क़मरुद्दीन को दे देता. वह उसके साथ चाय का बिल लगाकर कैशियर से भुगतान ले लेता. यह व्यवस्था जब तक भार्गव साहब प्राचार्य थे, चलती रही.
भार्गव साहब को एक और प्रसंग के कारण मैं कभी नहीं भूल सकता. कॉलेज में प्रदर्शन के लिए एम एस सथ्यु की बहु प्रशंसित फ़िल्म गरम हवाआई थी. स्टाफ के लिए और आम जन के लिए उसके प्रदर्शन हो चुके थे. उन दिनों हम कोई लोकप्रिय हिंदी फिल्म कॉलेज के लॉन पर दिखाते तो जैसे पूरा शहर ही उसे देखने उमड़ पड़ता. तभी सुमेरपुर से स्वयं प्रकाश मेरे यहां आए. जब उनसे इस फ़िल्म का ज़िक्र हुआ तो वे भी इसे देखने को लालायित हो उठे. मैंने बहुत संकोच से अपने प्राचार्य भार्गव साहब से यह कहते हुए कि प्रोजेक्टर खुद मैं ही चला लूंगा, स्टाफ रूम में स्वयं प्रकाश के लिए इस फ़िल्म का विशेष शो करने की अनुमति मांगी. भार्गव साहब एक दम गुस्से में आ गए. बोले, “आप प्रोजेक्टर क्यों चलाएंगे? क्या मुझे नज़र नहीं आता है कि आप अपना कितना समय इस गतिविधि को देते हैं? आप स्वयं प्रकाश जी को यह फ़िल्म ज़रूर दिखाइये. इसके लिए क़मरुद्दीन को बुला लीजिए.मेरी खुशनसीबी है कि मुझे इस तरह के समझदार, संवेदनशील और कद्रदां प्राचार्य मिले. उनसे मैंने बहुत सीखा, जो बाद में मेरे काम भी आया.
इस गतिविधि में मुझे तत्कालीन उपाचार्य डी.सी.कृष्णानी का जो सहयोग मिला, उसकी चर्चा अलग से करने की ज़रूरत है. तब मैंने ब्रिटिश काउंसिल से शेक्सपियर के बहुत सारे नाटकों के मंचीय प्रदर्शन की फिल्में एक-एक करके मंगवाई. अब होता यह कि जिस दिन ऐसी किसी फिल्म का प्रदर्शन होता उसके कई दिन पहले से हम तैयारी शुरु कर देते. हम लाइब्रेरी में उस नाटक की जितनी भी प्रतियां होतीं वे और अगर उस नाटक का हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध होता तो उसकी प्रतियां लाइब्रेरी के काउण्टर पर रखवा देते और विद्यार्थियों को यह सूचना दे देते ताकि रुचि हो तो वे फिल्म देखने से पहले उसे पढ़ भी लें. फिर कृष्णानी साहब हर क्लास में जाकर उस फिल्म के प्रदर्शन की भूमिका तैयार करते. वे शेक्सपियर के महत्त्व और उस नाटक की विषय वस्तु का परिचय देते. इसके बाद जिस दिन फिल्म का प्रदर्शन होता, खुद कृष्णानी साहब माइक हाथ में लेकर खड़े होते और जैसे जैसे फिल्म चलती, वे उसके संवादों को म्यूट करके हिंदी में संक्षिप्त जानकारी देकर उस फिल्म को बोधगम्य बनाते. फिल्मों के इस शौक ने मुझे शहर में सिरोही फिल्म सोसाइटी जैसी गतिविधि के संचालन के लिए भी प्रेरित किया. जोधपुर के प्रो (अब दिवंगत) मोहन स्वरूप माहेश्वरी से प्रेरणा व सहयोग लेकर हमने कई बरस सिरोही में यह गतिविधि चलाई और न्यू वेव और समांतर फिल्म आंदोलन की करीब-करीब सारी फिल्में सिरोही की जनता को दिखाई. स्वाभाविक है कि ऐसा करके खुद मेरी कलारुचि तृप्त हुई.
कई बरस यह गतिविधि चली और फिर अचानक एक प्रसंग ऐसा आया कि मेरा मन उससे उचट गया और सिरोही सोसाइटी बंद हो गई. हुआ यह कि एक दिन एक फिल्म का शो शहर में किसी सार्वजनिक नोहरे में आयोजित था. उन्हीं दिनों हमारे कॉलेज में एच. बी. सक्सेना प्राचार्य होकर आए थे. उन्हें किसी ने इस गतिविधि के बारे में बता दिया तो उन्होंने मुझे तलब किया और किंचित नाराज़गी से यह कहा कि मैं यह कर रहा हूं इसकी जानकारी मैंने उन्हें क्यों नहीं दी? ख़ैर, मैंने उन्हें शाम के शो के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने घुमा फिराकर यह इच्छा व्यक्त की कि कोई उन्हें लेने आए, और ऐसा करना मेरे लिए शो की तैयारियों में व्यस्त होने के कारण सम्भव नहीं था. मैंने उन्हें यह कह दिया कि कृपया ठीक समय पर आ जाएं क्योंकि हम अपना शो एकदम ठीक समय पर शुरु कर देते हैं, लेकिन उन्होंने घुमा फिराकर यह जता दिया कि अगर उनके पहुंचने से पहले हमने शो शुरु कर दिया तो ठीक नहीं होगा.उस दिन तो जैसे तैसे वह शो हुआ, लेकिन उसके बाद मुझे लगा कि बेहतर यही होगा कि मैं इस गतिविधि से खुद को अलग कर लूं.
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जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे


मैं सन 1968 से 1974 तक राजकीय महाविद्यालय, चितौड़गढ़ में हिंदी प्राध्यापक रहा. वहीं की एक स्मृति आज साझा कर रहा हूं. 

चित्तौड़ कॉलेज में हमारे साथियों में एक युगल भी था जिसकी चर्चा का संकेत मैंने ऊपर किया था. ये थे विक्रम सिंह और निर्मला कुमारी शक्तावत. विक्रम सिंह जी कदाचित सोशल स्टडीज़ के और निर्मला जी समाज  शास्त्र की व्याख्याता थीं. विक्रम सिंह जी चित्तौड़ के पास के ओछड़ी गांव के ठिकानेदार थे और बहुत बार हम लोगों को अपने फार्म पर ले जाकर दावतें किया करते थे. ऑमलेट का स्वाद मैंने उन्हीं के यहां चखा. एक दौर ऐसा आया जब विक्रम सिंह जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने ज़ोर मारा और वे विधायक पद के लिए कॉंग्रेस का टिकिट पाने के लिए जी-जान से जुट गए. हुआ कुछ ऐसा कि उन्हें टिकिट नहीं मिला लेकिन महिला कोटे के नाम पर हमारी भाभीजी यानी निर्मला जी को टिकिट मिल गया. निर्मला जी शुद्ध  गृहस्थिन किस्म की महिला थीं और इस तरह का सार्वजनिक जीवन उनके स्वभाव के अनुरूप नहीं था, लेकिन अपने पति की महत्वाकांक्षा के दबाव में वे राजनीति में कूद पड़ीं. उनके शुरुआती दौर में मैंने न केवल उनके लिए बहुत सारे भाषण लिखे, उन्हें भाषण देने के तौर तरीके भी सिखाए. एक समय ऐसा था जब किसी सार्वजनिक सभा में जाने से पहले वे मेरा लिखा भाषण कई कई बार मुझे सुनातीं, और फिर यह चाहतीं कि जब वे वाकई भाषण दें  तो मैं वहां मौज़ूद रहूं और फिर घर आकर उस भाषण का ईमानदार विश्लेषण कर उन्हें आगे के लिए मार्ग दर्शन दूं. उनकी राजनीति के शुरुआती दौर में कई बार मैंने सहर्ष यह दायित्व निर्वहन किया भी. उन्होंने शायद अपना पहला भाषण चित्तौड़ के गांधी चौक में दिया था और उसे सुनकर घर लौटने पर मैंने उन्हें उस मेडन स्पीच की कमियों से अवगत कराया था. वो दौर इंदिरा गांधी की लहर का था और उस लहर में निर्मला जी विधायक चुन भी ली गईं. 


इससे आगे का किस्सा बड़ा रोचक है. उनके विधायक चुन लिये जाने के कुछ ही समय बाद मेरा तबादला चित्तौड़ से सिरोही हो गया. मैं चित्तौड़ में बड़ा सुखी और आश्वस्त था. तबादला मेरे लिए बहुत गहरा आघात था. स्वाभाविक रूप से इस तबादले से बचने के लिए मैं उन्हीं भाभीजी के पास गया. विक्रम सिंह जी और भाभीजी ने मुझे मदद का आश्वासन दिया, और साथ ही यह भी कहा कि अमुक दिन उनके यहां खेत सिंह जी (उस समय के एक प्रतापी मंत्री) खाने पर आने वाले हैं, तो मैं भी ‘सहयोग’ करने आ जाऊं. इसी बीच कॉलेज शिक्षा निदेशक उदयपुर से जयपुर जा रहे थे तो वडैहरा साहब मुझे उनसे मिलवाने (और मेरी सिफारिश करने) स्टेशन पर ले गए. वडैहरा साहब ने जब निदेशक जी से कहा कि स्थानीय विधायक भी इनके पक्ष में हैं,  तो वे बहुत ज़ोर से हंसे. बोले,  “ उनके कहने पर ही तो मैंने यह ट्रांसफर किया है.” तस्वीर साफ़ हो चुकी थी. अगले दिन मैंने कॉलेज से ही भाभीजी को फोन किया. कहा, “आपके अब तक के सहयोग और सद्भाव के लिए कृतज्ञ हूं. अनुरोध है कि आप मेरे ट्रांसफर को कैंसल करवाने के लिए कोई प्रयत्न न करें. मैं यहां से रिलीव हो रहा हूं.” वैसे उस समय तबादलों की एक लम्बी श्रंखला बनी थी और कदाचित सारे ही तबादले इसी तरह राजनीतिक दबाव में हुए थे. मेरी जगह नीम का थाना से हेतु भारद्वाज चित्तौड़ आए थे, और मैं जब सिरोही गया तो वहां से इसी तरह जीवन सिंह को अन्यत्र जाना पड़ा था. बाद में मेरे इस प्रसंग का मज़ा लेते हुए हेतु जी ने बारहा साक़िब लखनवी का यह शे’र गुनगुनाया: बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे/ जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे. 

आहिस्ता-आहिस्ता तस्वीर पर से धुंध भी हटी. हुआ यह था कि चित्तौड़ में मुझे एक बहुत अच्छा परिवार मिला – ब्रज रतन भार्गव और उनकी पत्नी लक्ष्मी भार्गव का. भार्गव साहब एस.बी.बी.जे के मैनेजर थे और तीन छोटे बच्चों की युवा मां लक्ष्मी भाभीजी कुछ नया और सार्थक करने को लालायित गृहिणी. बहुत जल्दी हम लोगों का तालमेल बैठा और हमने बहुत सारे नए और सार्थक काम वहां किये. मसलन, हमने एक मैगज़ीन क्लब शुरु किया जिसमें हम सदस्यों से नियमित मासिक शुल्क (उस समय पांच रुपया) लेते और हम उनके घर पत्रिकाओं का एक बड़ा बस्ता भेजते जिसमें से कोई दो पत्रिकाएं वे दो दिन के लिए ले सकते थे. दूसरे दिन फिर हमारा बंदा जाता और उनसे वे पत्रिकाएं लेकर उन्हें नई पत्रिकाएं दे आता. यह व्यवस्था खासी लोकप्रिय हुई और एक समय इसकी सदस्य संख्या सौ तक जा पहुंची. कई पत्रिकाओं की तो हम पांच-पांच प्रतियां मंगवाने लगे थे. कहना अनावश्यक है कि इस मैगज़ीन क्लब का केंद्रीय कार्यालय मेरा घर था. इसी तरह भार्गव भाभीजी के मन में विचार आया कि चित्तौड़ में कोई अच्छा प्री-स्कूल नहीं है, तो क्यों न हम शुरु कर दें? और इस तरह शुरु हुआ एक स्कूल बाल भारती. कुछ समय हमने इसे इधर उधर चलाया और फिर ज़िला प्रशासन के सहयोग के कारण हम इसे डिस्ट्रिक्ट क्लब के भवन में चलाने  लगे. इस स्कूल के लिए मुझे अपनी बहन इंदु (कोचर) का भी बड़ा सहयोग मिला. बल्कि वह इस स्कूल की सर्वाधिक लोकप्रिय शिक्षिका बनी रहीं. अब इस स्कूल की सफलता और लोकप्रियता के कारण जो थोड़ी बहुत प्रशंसा मेरी भी हुई वह विधायक भाभीजी और उनके पति देव को नागवार गुज़री, और इसी वजह से उन्होंने मेरे स्थानांतरण की सिफारिश कर दी. 

बहुत बरसों बाद एक दिन अचानक जयपुर के सर्किट हाउस में निर्मला भाभीजी (तब तक वे सांसद भी रह चुकी थीं) से मेरा आमना-सामना हो गया. मैं क्योंकि सिरोही में था, चित्तौड़ की हलचलों से पूरी तरह अनभिज्ञ था. यह सोचकर कि शायद निर्मला जी ने मुझे देखा नहीं है, मैंने पूर्ववत आत्मीयता से उन्हें कहा- “भाभीजी, नमस्कार.”  और जैसे एक विस्फोट हुआ. वे फट पड़ी. “कौन भाभीजी? किसकी भाभीजी? मैं आपकी भाभीजी नहीं हूं.” मैं तो हतप्रभ था. भाभीजी कहकर मैंने क्या ग़लती कर दी? तभी वे फूट फूटकर रोने लगीं. जैसे तैसे मैं उन्हें अपने कमरे में ले गया, बिठाया, पानी पिलाया. तब जाकर वे कुछ स्वस्थ हुईं. और तब कहीं जाकर मुझे उनके इस तरह फट पड़ने का रहस्य समझ में आया. असल में वे आहिस्ता-आहिस्ता राजनीति में व्यस्त होती गईं, और इसी बीच उनके पति देव अपनी एक युवा  भानजी के मोह पाश में ऐसे फंसे कि उसे अपनी पत्नी की हैसियत ही दे बैठे. यह बात चित्तौड़ के अखबारों में तो खूब उछली थी लेकिन मैं इससे एकदम अनजान था. भाभीजी का कहना यह था कि जिस व्यक्ति (विक्रम सिंह) के रिश्ते से आप मुझे भाभीजी कह कर सम्बोधित कर रहे हैं, जब उसने ही इस रिश्ते को तोड़ दिया तो मैं आपकी भाभीजी कैसे रही? अब तो ख़ैर  वे दोनों ही तस्वीरों और स्मृतियों में रह गए हैं.  
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Thursday, April 23, 2020

मेरा स्कूटर पुराण


समय और स्थितियों में इतनी तेज़ी से बदलाव आया है कि जब मैं अपने कॉलेज के दिनों और उसके तुरंत बाद नौकरी शुरु करने के समय की बातें किसी को बताता हूं तो उन बातों को संशय के साथ सुना जाता है. 1967 में जब मैंने कॉलेज प्राध्यापक के रूप में अपनी नौकरी की शुरुआत की तो मेरे कॉलेज के सारे प्राध्यापक,  बल्कि प्रिंसिपल भी,  साइकिल पर ही  कॉलेज आते थे. सड़कों पर भी स्कूटर, मोटर साइकिल बहुत कम नज़र आते थे, कारें तो और भी कम. कोई आठ बरस नौकरी करने के बाद मैंने अपने जीवन का पहला स्कूटर खरीदा, और वो भी सरकार से कर्ज़ा लेकर. तब तनख़्वाहें भी ज़्यादा कहां होती थीं? उस समय मैं जिस सिरोही कॉलेज में कार्यरत था वहां मुझसे पहले मेरे दो साथियों के पास स्कूटर थे. एक के पास लैम्ब्रेटा और दूसरे के पास राजदूत. एक के लिए स्कूटर मज़बूरी था और दूसरे ज़रूरत से ज़्यादा शाही तबीयत के धनी थे. अन्यथा किसी को स्कूटर रखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी. जब मैंने भी स्कूटर खरीदा तो मेरे कई शुभ चिंतकों ने मेरी इस फिज़ूल खर्ची पर सवाल उठाये. उन्होंने बाकायदा गणना करके मुझे समझाया भी कि मैं अनावश्यक रूप से हर माह पैट्रोल पर इतना खर्चा करने की मूर्खता कर रहा हूं.

जिस ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उसमें स्कूटरों का राजा हुआ करता था वेस्पा. भले ही इसे स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाना होता था, जिनके पास यह होता था उनकी शान और ऐंठ अलग ही होती थी. लेकिन वेस्पा आसानी से मिलता कहां था? बुकिंग करवानी होती थी और लम्बी प्रतीक्षा सूची का धैर्य रखना होता था. जब लगभग उन्हीं दिनों उदयपुर में वेस्पा की बुकिंग शुरु हुई तो ऐसी भगदड़ मची कि घुड़सवार पुलिस को उसे काबू करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी और उस भगदड़ में कई लोगों ने अपनी जानें तक गंवाई.  और यह हालत वेस्पा की ही नहीं थी. लैम्ब्रेटा भी बुक करवाने के बाद इंतज़ार के बाद ही मिलता था. सरकारी कर्मचारियों के लिए एक अलग प्रतीक्षा सूची भी होती थी जिसके आधार पर उन्हें यह स्कूटर देने में प्राथमिकता दी जाती थी. ख़ुद मैंने भी इस सरकारी प्राथमिकता के लिए आवेदन किया था. यह बात अलग है कि मेरा नम्बर कभी आया नहीं. उन्हीं दिनों एक सरकारी उपक्रम स्कूटर्स इण्डिया का नया स्कूटर विजय डीलक्स बाज़ार में उतरा तो स्कूटर स्वामी बनने की मेरी आकांक्षा ने भी ज़ोर मारा, और मैंने भी उदयपुर  में  अपने लिए एक विजय डीलक्स स्कूटर बुक करवा लिया.  स्कूटर की कीमत थी चार हज़ार सात सौ सैंतालीस रुपये. लयात्मक राशि (चार सात चार सात)  होने के कारण यह मुझे अब तक स्मरण है. लेकिन इतना पैसा एक मुश्त चुकाने की अपनी क्षमता थी नहीं सो सरकारी ऋण के लिए आवेदन किया और वो मिल भी गया, जिसकी कटौती कई बरस होती रही. जब उदयपुर के डीलर से सूचना मिली कि हम डिलीवरी लेने आ सकते हैं तो सिरोही से हम दो साथी अपने दो मित्रों के साथ उदयपुर गए. तब तक मुझे स्कूटर चलाना आता ही नहीं था. स्कूटर खरीदने वाले दूसरे साथी  का भी यही हाल था. लौटते हुए रास्ते में थोड़ी देर हिम्मत कर मैंने स्कूटर चलाया तो नदी की एक रपट पर फिसला भी सही. लेकिन उस समय स्कूटर स्वामी बन कर जो खुशी हासिल हुई वो खुशी बाद में चौपहिया वाहन खरीद कर भी हासिल नहीं हुई,  दूसरा स्कूटर खरीदने के मौके की तो बात ही क्या की जाए. मेरे यह स्कूटर खरीदने के बाद मेरे कॉलेज के कई अन्य मित्रों ने भी उदयपुर  से  ही यह स्कूटर खरीदा और अनुभवी होने के नाते उनमें से अनेक के साथ इस बड़ी खरीददारी के लिए उदयपुर जाने का सौभाग्य मुझे मिला.

आज भले ही यह बात अविश्वसनीय बल्कि हास्यास्पद लगे, उस ज़माने में विजय स्कूटर का स्वामी होना भी बड़े गर्व की बात थी और हम दोनों ने अपने दोनों बच्चों के साथ इसी स्कूटर पर कई बार सिरोही से उदयपुर की यात्राएं कीं. शिवगंज सुमेरपुर तो इतनी बार गए कि उसकी गिनती ही मुमकिन नहीं. यह गर्व बोध काफी समय तक बरकरार रहा. 1998 से 2000 के बीच जब मैं आबू रोड कॉलेज में प्राचार्य रहा तब भी न जाने कितनी बार हम दोनों अपने स्कूटर पर आबू रोड से अम्बाजी और माउण्ट आबू गए. तब तक स्कूटर को एक  सम्मानजनक वाहन माना जाता था. उसका अवमूल्यन तो आगे जाकर हुआ.

सिरोही में मेरे दो दशक से भी अधिक के कार्यकाल में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला वह नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ इस तरह एकाकार हो गया था कि कहीं उस स्कूटर के खड़े होने का मतलब ही वहां डीपी अग्रवाल के होने का होता था. बाद में जब मेरा बेटा भी मेरे इस स्कूटर का इस्तेमाल करने लगा तो मेरे दोस्त बड़े सहज भाव से मुझसे अपना यह ज्ञान  साझा कर लिया करते थे कि कल आप अमुक जगह गए थे, जबकि असल में वहां मेरा बेटा गया होता था. इसी  पहचान की वजह से एक मज़ेदार प्रसंग भी उत्पन्न हो गया, जिसकी चर्चा आगे चलकर करूंगा.

1996 में उपाचार्य पद  पर मेरी पदोन्नति हुई और मुझे सिरोही छोड़ कर कोटपूतली जाना पड़ा. तब तक मेरा यह स्कूटर भी वृद्धावस्था को प्राप्त होने लगा था. लेकिन मुझे इससे लगाव भी था, और यह मेरी ज़रूरत भी था सो इसे साथ ले गया. जब दो-एक बार वहां इसकी रिपेयर की ज़रूरत पड़ी तो जिस भी मैकेनिक के पास  मैं इसे लेकर  गया, उसने इसे आगे-पीछे, ऊपर नीचे देखकर पहला सवाल यही किया कि यह है क्या चीज़?  ज़ाहिर है कि उन लोगों ने इससे पहले विजय स्कूटर नाम की कोई चीज़ नहीं देखी थी. वो लोग इसकी रिपेयर करने के प्रति भी उदासीन ही रहते, क्योंकि यह उनके लिए अपेक्षाकृत नई चीज़ था. ख़ैर! जैसे–तैसे मेरा काम तो इस स्कूटर से वहां चल  ही गया.
मात्र दस माह में मेरा स्थानांतरण वहां से सिरोही हो गया. और क्योंकि यह स्थानांतरण मेरे इच्छित स्थान सिरोही हुआ था, मैं बिना एक भी दिन का विलम्ब किये वहां से सिरोही के लिए रवाना हो गया. गृहस्थी का सामान तो ज़्यादा था नहीं, सो वह तो साथ ही ले आया. असल संकट तो इस स्कूटर का था. कोटपूतली में रेल्वे स्टेशन है नहीं सो स्कूटर ट्रांसपोर्ट से ही सिरोही भेजा जा सकता था, और यह काम करने का मेरे पास समय था नहीं.  इसलिए अपना यह स्कूटर मैं वहीं अपने कॉलेज के एक  प्रयोगशाला सहायक राजेश सैनी के पास इस अनुरोध के साथ छोड़ आया कि वह यथासुविधा इसे ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दे. कुछ दिनों के बाद उसने मेरा स्कूटर ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दिया. ट्रांसपोर्ट वाले ने इसके लिए एक हज़ार रुपये चार्ज किये. अब आगे की बात बड़ी दिलचस्प है. ट्रांसपोर्ट में थोड़ी बहुत टूट फूट तो होती ही है. मेरे वयोवृद्ध स्कूटर के भी बांये हाथ में कुछ चोट आ गई जिसे बड़ी मुश्क़िल से सिरोही में मेरे स्थायी स्कूटर मैकेनिक डाया लाल ने ठीक किया. इस पर करीब पांच सौ रुपये का खर्चा और आ गया. लेकिन तब तक मुझे लगने लगा था कि अब इस स्कूटर के साथ मेरा रिश्ता और नहीं निभ सकेगा, इसलिए मैंने एक नया स्कूटर ले  लिया. अब सवाल उठा कि इस पुराने, बूढ़े स्कूटर का क्या किया जाए?  इधर उधर बात की, लोगों से कहा कि मुझे मेरा पुराना स्कूटर बेचना है तो एक ग्राहक घर में ही मिल गया. मेरे पुराने कॉलेज का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उसे खरीदने को तैयार हो गया. और उसे मैंने अपना यह लाड़ला स्कूटर बड़े भारी मन से बेच दिया. पूछना चाहेंगे कि कितने में बेचा? पूरे एक हज़ार रुपये में! बेचने के बाद ख़ुद मुझे लगा कि मैं कितना बड़े वाला वोहूं! अगर मैं इस स्कूटर को सिरोही न लाया होता और इसे कोटपूतली की सड़क पर लावारिस भी छोड़ आया होता तो मुझे शुद्ध पांच सौ रुपये की बचत होती. लेकिन जो हुआ सो हुआ!

लेकिन किस्सा यहीं ख़त्म नहीं हो गया. इस कथा का एक और लेकिन अभी बाकी है.  केक पर आइसिंग का मज़ा तो अब आएगा. भले ही मैंने एक नया, मिलिट्री ग्रीन रंग का स्कूटर खरीद लिया था, सिरोही में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ स्थायी रूप से जुड़ चुका था. लोग स्कूटर देखते तो कल्पना कर लेते कि डीपी अग्रवाल भी आसपास यहीं कहीं होंगे. जब मैंने यह स्कूटर अपने उस पुराने कर्मचारी को बेच दिया तो उसके कुछ ही दिनों बाद दबे स्वरों में सिरोही में यह चर्चा सर उठाने लगी कि आजकल अग्रवाल साहब के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं हैं. इस कुचर्चा के मूल में था मेरा वह 1615 नम्बर का स्कूटर जिसे लोग पिछले कुछ दिनों से हर शाम स्वरूप क्लब के पास वाले देशी दारु के ठेके के पास खड़ा देख रहे थे. यह मान लिया गया कि जब उनका स्कूटर यहां है तो अग्रवाल  साहब भी यहीं होंगे! और देशी दारु के ठेके पर होंगे तो ज़ाहिर है कि उसका सेवन भी कर ही रहे होंगे! असल बात यह थी कि मेरे कॉलेज का वह कर्मचारी देशी मदिरा का नियमित सेवन करता था, और अब जब उसने स्कूटर खरीद लिया था तो बड़ी शान से हर शाम उस स्कूटर पर आसीन होकर अपना शौक पूरा करने जाने लगा था. जैसे ही यह कुचर्चा मुझ तक पहुंची, मैंने उस शौकीन मिजाज़ कर्मचारी को बुलाया और उसे पाबंद किया कि वो अपना शौक भले ही ज़ारी रखे, मेरा स्कूटर लेकर वहां न जाया करे! मैं तो उससे अपना स्कूटर वापस भी खरीद लेने को तैयार था, लेकिन उसने  इसके बिना ही मेरी बात मान ली.

तो, यह था मेरा संक्षिप्त स्कूटर पुराण!
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Wednesday, May 3, 2017

जैसे हैं वैसे ही बने रहें हमारे हेतु जी...



कितनी यादें, कितनी छवियां! कितने उपकार, कितनी मीठी चुटकियां! और हों भी तो क्यों नहीं! सम्पर्क और अपनापे की उम्र भी तो बहुत छोटी नहीं है. ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद 1965 के आसपास की बात होगी जब अपने गुरुवर प्रो. नवलकिशोर जी से यह नाम सुना था – होतीलाल भारद्वाज! उनके मित्र. और वो ज़माना ऐसा था जब गुरु का मित्र भी गुरु से कम नहीं हुआ करता था. तभी शायद पहली मुलाक़ात भी हुई होगी, जिसकी कोई छवि मन में नहीं है. और फिर कुछ बरस बाद मैं भी उसी जमात में शामिल हो गया. गुरुओं की जमात में. और यह तो मुमकिन था ही नहीं कि आप राजस्थान की कॉलेज शिक्षा सेवा में हों और भारद्वाज जी से आपका सम्पर्क न हो! शिक्षकों के संगठन में और विश्वविद्यालय में – हर जगह तो वे सक्रिय थे. कभी कहीं के और कभी कहीं के चुनाव चलते ही रहते थे और भले ही मुझ जैसों को उनकी ज़रूरत न पड़ती हो, उनके लिए तो मुझ जैसों की भी उपयोगिता थी. मिलना-जुलना या पत्र सम्पर्क होता रहा. कई बार मैंने अपने मतलब के लिए भी उनसे सम्पर्क किया. मतलब वाली बात को भी स्पष्ट कर दूं. वे विश्वविद्यालय में परीक्षा कार्य के दाता की हैसियत रखते थे (तब परीक्षा कार्य हम प्राध्यापकों  की अतिरिक्त आय का एक महत्वपूर्ण साधन हुआ करता था और मुझ जैसे सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वालों के लिए उसकी बहुत अधिक महत्ता होती थी) और हम जैसे लोग उनकी नज़रे इनायत के तलबग़ार हुआ करते थे. इस तरह रिश्ते आहिस्ता आहिस्ता पुख़्ता हो रहे थे.

तभी 1974 में एक प्रसंग ऐसा बना कि हम लोग अनायास नज़दीक हो गए. हालांकि इसमें न उनका कोई योगदान था न मेरा. हुआ यह कि तबादलों की एक ऐसी लम्बी श्रंखला बनी जिसमें हम कई मित्र एक दूसरे से जुड़ गए. होतीलाल जी तब तक हेतु भारद्वाज हो चुके थे. उनका तबादला नीम का थाना से चित्तौड़ हुआ, मेरा चित्तौड़ से सिरोही और जीवन सिंह का सिरोही से (शायद) दौसा. हम तीनों ही अपनी-अपनी तरह से राजनीति पीड़ित थे. हेतु जी चित्तौड़ आए और मुझे वहां से रिलीव होकर सिरोही जाना पड़ा. तब शायद पहली दफा हेतु जी से खुलकर एक सहकर्मी के रूप में बात हुई. इससे पहले तो वे मेरे लिए गुरु स्थानीय ही थे. उन्होंने अपने बिन्दास अन्दाज़ में मुझसे कहा कि मैं यह बात मन से निकाल दूं कि उनके कारण मेरा ट्रांसफर हुआ है. बहरहाल. हम तीनों ही विस्थापित हुए. यह बात अलग है कि हेतु जी कुछ समय बाद नीम का थाना लौट गए, मैं सिरोही का हो गया (वहां पूरे 25 बरस मैंने निकाले) और जीवन सिंह बाद में अलवर चले गए और वहीं के हो गए. 

इसके बाद दो-तीन कारणों से उनसे मिलने- जुलने के अधिक मौके आए. अपनी नौकरी में पाँव जमने के बाद मैं भी साहित्य में थोड़े हाथ पाँव चलाने लगा था इसलिए एक बड़े लेखक से मिलने-जुलने और संवाद के अधिक मौके आने लगे.  वे बरस राजस्थान साहित्य अकादमी की सर्वाधिक सक्रियता  के भी वर्ष थे, इसलिए हेतु  जी से मिलने के मौके बढ़े और सिरोही में हम लोगों की जो टीम थी उसके कारण और वहां के हमारे अग्रज (अब स्वर्गीय) सोहन लाल पटनी के कारण राजस्थान की साहित्यिक गतिविधियों का एक छोटा-मोटा केन्द्र सिरोही भी बन गया था इसलिए भी हेतु जी से मिलना-जुलना बढ़ता गया. मेरे गुरु डॉ प्रकाश आतुर राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे. वे मेरे लिए गुरु से बहुत अधिक, ‘पितु मातु सहायक स्वामी सखा’ थे, और हेतु जी उनके परम विश्वस्त और आत्मीय थे – इस कारण भी हमारी निकटता बढ़ी. तब का एक मज़ेदार प्रसंग याद आता है. डॉ आतुर अकादमी  के किसी आयोजन के निमित्त सिरोही आए हुए थे. उनका खान-पान का शौक लीजेण्डरी है. एक शाम उनके आतिथ्य का सौभाग्य मुझे मिला. और मैंने हेतु जी को भी अपने यहां आमंत्रित कर लिया. गुरु जी की प्रतिष्ठा और तलब के अनुरूप व्यवस्था मैंने कर रखी थी, और पण्डित हेतु भारद्वाज के लिए कोका कोला की एक बोतल भी ला रखी थी. जब टेबल पर बैठे तो गुरुजी ने पूछा, यह कोका कोला किसके लिए? और मैंने जैसे ही हेतु जी की तरफ संकेत किया, वे बेसाख़्ता बोल उठे  “अरे! शेर भी कभी घास खाता है!” तुरंत एक ठहाका लगा, दूरियां नज़दीकियां बन गई, और फिर यह इबारत सदा-सदा के लिए हमारे स्मृति कोष का हिस्सा बन गई. उसी दौर में जब मेरी पहली किताब छपने का मौका आया तो मैंने उनसे सम्पर्क किया और आज इस बात को बहुत कृतज्ञता से स्मरण करना ज़रूरी है कि ‘सृजन के परिप्रेक्ष्य’ हेतु जी के कारण छपी.

डॉ प्रकाश आतुर हेतु जी पर बहुत ज़्यादा विश्वास करते थे. शायद यह बात हेतु जी के गुण सूत्रों का ही हिस्सा है कि जो भी उनके सम्पर्क  में आता है उन पर विश्वास करने लगता है. आज जब बहुत तटस्थ और निरपेक्ष होकर उनके इस गुण का विश्लेषण करना चाहता हूं तो थोड़ा चकित भी होता हूं. चकित इसलिए कि वे मुंह देखी कभी नहीं कहते हैं. बल्कि सीमा से अधिक ही मुंहफट हैं. वे कभी भी, कहीं भी,  किसी की लू उतार सकते हैं. बल्कि उतारते ही रहते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद जो भी उनके सम्पर्क में आता है उनका मुरीद हो जाता है. कभी-कभी अपने बहुत सारे निहायत शालीन और मृदु भाषी मित्रों से उनके इस बर्ताव की तुलना करता हूं तो यह आश्चर्य और बढ़ जाता है. ज़्यादा  सोचता हूं तो पाता हूं कि उनका यह बेलौस अन्दाज़ उनके मन की पारदर्शिता का परिचायक भी तो है.  क्षण भर को भले ही लगे कि उन्होंने आपके मन के प्रतिकूल कुछ कह दिया है लेकिन फिर आप पाते हैं कि उन्होंने उसे मन में छिपा कर भी तो नहीं रखा. उनका एक और गुण है लोगों के काम आना. बहुत बड़ा तो परिचय वृत्त और वे सदा सहायता को सुलभ. जब भी बात करें, पता चलेगा आज इस दफ़्तर  गए थे, कल  उस दफ़्तर. यह रोज़ का सिलसिला है. जब कोई पुकारे वे बिना किसी झिझक के साथ हो लेते हैं. कोई ना नुकर नहीं, कोई नाज़ नखरा नहीं. मैं खुद कई दफा उनकी इस सदाशयता का लाभ उठा चुका हूं. इससे भी ज़्यादा मज़े की बात तो यह है कि जिस दफ़्तर में मैं कार्यालयाध्यक्ष रहा वहां भी एक काम के लिए एकाधिक दफ़ा उन्हें अपने साथ ले गया. यह है उनका रुतबा. इसी के साथ यह बात कहना भी बहुत ज़रूरी लग रहा है कि जहां वे आपके काम आने में तनिक भी कृपणता नहीं बरतते हैं वहीं अगर आपने कभी उनके लिए कुछ कर दिया तो उसके प्रति  कृतज्ञता ज्ञापन में वे ज़रूरत से ज़्यादा उदार और मुखर रहते हैं. यह बात भी मैं स्वानुभव से कह रहा हूं. मेरे एक बार के छोटे-से सहयोग का वे इतनी बार ज़िक्र कर चुके हैं कि अब तो मुझे भय लगने लगा है.

हेतु जी बहुत कामयाब शिक्षक रहे हैं, और एक अर्थ में अब भी हैं. मेरा ऐसा मानना है कि एक कामयाब शिक्षक के लिए जितना ज़रूरी यह है कि उसे अपने विषय का पूरा ज्ञान हो, उतना ही उसकी अभिव्यक्ति का सशक्त होना भी ज़रूरी है. हेतु  जी के मामले में तो इसमें और कई चीज़ें जुड़ जाती हैं. मसलन यह कि बावज़ूद इस बात के कि वे हिन्दी के अध्यापक रहे हैं  (और आम तौर पर हिन्दी के अध्यापक को ‘ऐंवे’ ही माना जाता है) अपने चारों तरफ की नवीनतम  चीज़ों और प्रवृत्तियों की जितनी जानकारी और समझ उन्हें है उसकी बड़ी भूमिका उनकी कामयाबी में है. संगीत और फिल्मों के तो वे जैसे विश्वकोश ही हैं. अपने संगीत अनुराग का एक प्रसंग तो वे खुद बहुत मज़े लेकर कई बार सुना चुके हैं. जयपुर में जब प्लेनेट एम संगीत के शौकीनों का सबसे प्रिय ठिकाना हुआ करता था, एक दफा  हेतु जी कुछ खरीदने जा पहुंचे. वे शायद गज़लों के रैक के पास खड़े थे, तभी वहां की सेल्स गर्ल आई, उनकी वेशभूषा (धोती कुर्ता) पर ऊपर से नीचे तक एक नज़र डाली, और उनसे बोली, “अंकल,  भजन उस तरफ़ हैं!” अब बेचारी वो बालिका क्या जाने कि ‘अंकल’ भजन सुनने वाली उम्र से अभी काफी दूर हैं! ऐसा ही एक प्रसंग वे किसी मल्टीप्लेक्स का भी सुनाते हैं जब वे कोई एडल्ट फिल्म देखने जा पहुंचे थे और फिर वहां  मौज़ूद कुछ युवा मनचलों से उनका दिलचस्प संवाद हुआ था. उस संवाद को मैं अपने सपाट लहजे में बयान करके उसकी खूबसूरती को आहत नहीं करना चाहता. अगर कभी मौका मिले तो खुद हेतु जी से ही उसे सुनें. फिल्मों का उनका शौक़  तो अद्भुत है. ‘संस्कृति, शिक्षा और सिनेमा’ किताब के एक खण्ड में फिल्मों के बारे में उनके लेख उनकी सूक्ष्म समझ और बारीक पकड़ का श्रेष्ठ नमूना हैं. फिल्में देखने के उनके  शौक़ का आलम यह है कि शुक्रवार को रिलीज़ हुई फिल्म अगर वे रविवार तक न देख लें, और फिर फोन करके उसके बारे में न बता दें तो मैं समझ जाता हूं कि वे शहर से बाहर हैं.

और शहर से बाहर जाना उनका चलता ही रहता है. जयपुर से नीम का थाना तो वे ऐसे आते-जाते हैं जैसे कोई एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में चला जाए. सुबह यहां तो शाम वहां, और शाम वहां तो रात यहां. लेकिन इस मुल्ला की दौड़ सिर्फ मस्जिद तक ही नहीं है. या यों कहिये कि इसने तो हर जगह मस्जिद बना रखी है. तुमने पुकारा और हम चले आए की तर्ज़ पर बस किसी ने आवाज़ दी और हेतु जी निकल पड़ते हैं. पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण सब जगह तो वे जा पहुंचते हैं. जाते हैं और अपने झण्डे गाड़ आते हैं. उन्हें सुनने वालों को तो मज़ा आता ही है, मुझ जैसे आत्मीय जन खुद उनकी जबानी उनकी यात्राओं व्याख्यानों और अन्य प्रसंगों का वृत्तांत सुनकर जो आनंद प्राप्त करते हैं वह अनिर्वचनीय है. असल में घूमना-फिरना, मिलना-जुलना और सामाजिक होना हेतु जी की फितरत का अभिन्न अंग है. वे जहां भी जाते हैं, अपने मुरीदों की फौज खड़ी कर लेते हैं और वे मुरीद उन्हें बार-बार पुकारते रहते हैं. इस तरह उनकी यात्राओं की ज़रूरतें बढ़ती रहती हैं और वे आनंदपूर्वक प्रवास करते रहते हैं. सुखद बात यह है कि इन यात्राओं में उनकी उम्र कहीं आड़े नहीं आती है. बढ़ी उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से चली आने वाली अनेक सीमाओं और विवशताओं को वे बड़े सहज भाव से नज़र अन्दाज़ करते रहते हैं. उम्र के साथ उत्पन्न असुविधाओं का सामना वे किस मज़े से करते हैं इसका बहुत रोचक वर्णन एक बार उन्होंने किया. इस वर्णन का ताल्लुक स्लीपर बस में ऊपर वाली बर्थ पर लम्बी यात्रा से है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है का इससे बेहतर उदाहरण शायद ही कोई मिले. मेरी विवशता है कि इस प्रसंग को मैं बहुत खोलकर नहीं लिख पा रहा हूं. लेकिन उम्मीद करता हूं कि सुधि मित्र इसी से समझ जाएंगे. यह सब कह चुकने के बाद एक बात आहिस्ता से कह दूं? हेतु जी जो खुद को इतना ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, वो मुझे अब अच्छा नहीं लगता है. लगता है कि उन्हें उम्र की आवाज़ को बहुत ज़्यादा अनसुना नहीं करना चाहिए, और अपनी यात्राओं को थोड़ा सीमित करना चाहिए. 

कुछ चीज़ों के प्रति उनका मोह और अनुराग हद्द से ज़्यादा है. इनमें से दो का ज़िक्र करना चाहूंगा है. एक है सम्पादन कर्म. जब वे राजस्थान साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष (और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष)  रहे तो उन्होंने ‘मधुमती’ का सम्पादन कर अपने सम्पादन कौशल का लोहा मनवाया. उन अंकों को लोग आज भी बड़े आदर के साथ याद करते हैं. फिर उन्होंने ‘समय माजरा’  का सम्पादन किया और उसे प्रांत ही नहीं देश की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में स्थान मिला. लेकिन पत्रिका का प्रकाशन करने वाले संस्थान और उससे सम्बद्ध मित्रों की कुचेष्टाओं की वजह से उस गौरवशाली प्रकाशन का दुखद अवसान हुआ. इससे हेतु जी बहुत आहत भी हुए. पत्रिका के इस अकाल-अवसान में जिन मित्रों की जो-जो भूमिकाएं रहीं उनसे हम निकटस्थ लोग भली भांति परिचित भी हैं, लेकिन आज मैं इस बात को बड़े विस्मय के साथ स्मरण करता हूं कि उन मित्रों के प्रति भी हेतु जी के मन में कोई कटुता नहीं है, बल्कि उन्हें वे उतने ही अनुराग के साथ अपने से जोड़े हुए हैं और उनके सुख दुःख में सहभागी बनते हैं.  ‘समय माजरा’ के अवसान के बाद उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा को पुंजीभूत कर ‘अक्सर’ निकलना शुरु किया और अब तक प्रकाशित इसके चौंतीस अंक हेतु जी के सम्पादन कौशल के शिलालेख हैं. पत्रिका में उनके साथ एक सम्पादकीय टीम है, और टीम के सदस्य-मित्र अपनी तरह से सहयोग भी करते हैं, लेकिन इसका ज़्यादा भार तो हेतु जी ही वहन करते हैं – यह बात जग जाहिर है. इस त्रैमासिक पत्रिका के साथ-साथ उन्होंने काफी समय तक ‘पंचशील शोध समीक्षा’  का भी सम्पादन किया है और जिन्होंने यह प्रकाशन देखा है वे जानते हैं कि जहां और लोग इस तरह के प्रकाशन  को शुद्ध  व्यावसायिक उपक्रम के रूप में देखते हैं, हेतु जी ने यहां भी अकादमिक शुचिता का पूर्णत:  निर्वहन किया और पत्रिका की सामग्री की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया.

हेतु जी का दूसरा गहरा अनुराग है प्रगतिशील लेखक संघ के प्रति. इस संगठन ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं और जैसा कि अधिकांश संगठनों के साथ होता है, छल छद्म, दुरभिसंधियां, रणनीतियां – सब कुछ चलते रहते हैं. बीच में एक  समय ऐसा भी आया अब हेतु जी अपने मित्रों के बर्ताव से बहुत आहत हुए. मैंने तो उन्हें दो-टूक सलाह दी कि अपनी उम्र और सेहत को देखते हुए उन्हें संगठन को अलविदा कह देना चहिए. मेरा मानना है कि हम लोगों के लिए उन जैसे मित्र का कुशल क्षेम और उसकी  उपस्थित किसी भी और बात से ज़्यादा ज़्यादा ज़रूरी है. लेकिन मुझ जैसों की सलाह को सहानुभूतिपूर्वक सुनने के बाद भी बाबाजी कम्बल को नहीं छोड़ पाए. अब जबकि यह प्रसंग थोड़ा पुराना हो चुका है, इस पर विचार करते हुए मैं पाता हूं कि हेतु  जी के लिए कोई रिश्ता अस्थायी नहीं होता है. एक बार जुड़ गया तो फिर वो जुड़ा ही रहता है. यह बात जितनी दोस्तों के बारे में सच है उतनी ही संस्थाओं के बारे में भी सच है. अब मैं समझ गया हूं कि प्रगतिशील लेखक संघ जैसे उनके व्यक्तित्व का, उनके वज़ूद का एक हिस्सा है और चाहे जो हो जाए, वे इससे जुदा हो ही नहीं सकते हैं.

और जब बात संस्था की चल ही निकली है तो थोड़ा-सा ज़िक्र राजस्थान साहित्य अकादमी का भी कर दूं! आज तो खैर यह संस्था जिस हाल में है उसका ज़िक्र न ही किया जाए तो बेहतर है, लेकिन मुझ जैसे लोग जानते हैं कि इस संस्था ने अच्छे दिन भी देखे हैं. बल्कि यह कहूं कि इस संस्था की वजह से हम साहित्यिक बिरादरी के लोगों ने साहित्य के अच्छे    दिन देखे हैं. ऊपर मैंने एक इतर प्रसंग में राजस्थान साहित्य अकादमी के यशस्वी अध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर से हेतु जी की निकटता का उल्लेख किया है. आतुर साहब दिसम्बर 1981 में अकादमी के अध्यक्ष बनाए गए और तब प्रांत की साहित्यिक बिरादरी के बीच भी आम सोच यही था कि तत्कालीन सत्ता से निकटता के पुरस्कार स्वरूप उन्हें यह पद प्रदान किया गया है. लेकिन प्रकाश जी ने बहुत अल्प समय में ही यह सिद्ध कर दिया कि महत्व पद का नहीं उसे धारण करने वाले का होता है और वे हर तरह से इस पद के काबिल हैं. उनके तीन कार्यकालों में अकादमी में जितनी सार्थक और नवाचारी गतिविधियां हुईं, जिस तरह प्रांत के हर रचनाकार को लगने लगा कि अकादमी उसकी है, और जिस तरह प्रांत के दूरस्थ अंचलों में अकादमी के कार्यक्रम होने लगे वह सब हमारी स्मृतियों का हिस्सा है. इसे मैं अपना सौभाग्य ही कहूंगा कि मैं भी उस काल खण्ड में अकादमी से सीधे जुड़ा हुआ था, इसकी संचालिका का सदस्य भी था – इसलिए न केवल इन गतिविधियों का बल्कि पर्दे के पीछे की बहुत सारी हलचलों का भी साक्षी था. और इसीलिए ऊपर मैंने कहा कि हेतु जी डॉ आतुर के बहुत निकट और विश्वस्त थे. सितम्बर 1989 में जब अचानक प्रकाश आतुर का निधन हुआ तब भी वे अकादमी अध्यक्ष थे, और हेतु जी उनके उपाध्यक्ष थे. अकादमी के विधानानुसार दिवंगत प्रकाश जी की जगह हेतु जी पर अकादमी संचालन का दायित्व आन पड़ा. इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि एक बेहद कामयाब अध्यक्ष के बाद उस पद के दायित्व का निर्वहन कितना कठिन होता है. लेकिन आज इस बात को मैं बहुत सुखद आश्चर्य  के साथ याद करता हूं कि हेतु जी  ने उस दायित्व का निर्वहन इतने कौशल के साथ किया कि प्रांत की लेखक बिरादरी को एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि अध्यक्ष पद पर जो व्यक्ति आसीन है वो हाल ही में दिवंगत हुए अध्यक्ष से किसी भी माने में कम है. उस काल खण्ड की बहुत सारी बातें याद की जा सकती हैं, लेकिन अगर वैसा करूंगा तो मैं अपने मूल विषय से दूर चला जाऊंगा, इसलिए फिर से हेतु जी पर लौटता हूं. मैं उस काल की सिर्फ कुछ  बातें याद करना चाहता हूं. एक तो यह कि हेतु जी ने बाकायदा यह घोषित कर दिया था कि अकादमी के (कार्यवाहक)  अध्यक्ष होने के नाते उन्हें वाहन, कर्मचारी, भत्ते आदि की जो भी सुविधाएं देय हैं, वे उनका प्रयोग नहीं करेंगे. मेरे लिए इस घोषणा का  अधिक महत्व इस कारण है कि अकादमी की बैठकों में मैंने अपने ही मित्रों को इन्हीं चीज़ों के लिए कभी झगड़ते और कभी रिरियाते देखा था. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हालांकि हम सब जानते हैं कि अकादमी जैसी संस्थाएं सरकार से वित्त पोषण प्राप्त करती हैं इसलिए उन में घोषित-अघोषित सरकारी हस्तक्षेप भी होता ही है. अकादमी के पुरस्कार वितरण और सम्मान  समारोहों में सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिनिधियों की उपस्थिति को हमने निरपेक्ष भाव से स्वीकार कर लिया है. लेकिन हेतु जी के कार्यकाल में कदाचित पहली और आखिरी बार ऐसा हुआ कि किसी मंत्री के नहीं वरन एक बड़े लेखक रघुवीर सहाय के हाथों अकादमी पुरस्कार प्रदान करवाये गए. मैं अपने अभिन्न मित्र डॉ माधव हाड़ा के घर जब भी रघुवीर सहाय से पुरस्कार लेते हुए उनकी तस्वीर देखता हूं, मुझे हेतु जी का वो कार्यकाल याद आए  बग़ैर नहीं रहता है.  इसे मामूली बात नहीं माना जाना  चाहिए. बाबा नागार्जुन भी उनके कार्यकाल में अकादमी में आए. उस दौर में हेतु जी के सम्पादन में मधुमती के जो अंक निकले हैं उनकी चर्चा मैं कर ही चुका हूं. अपने नातिदीर्घ अध्यक्षीय कार्यकाल में हेतु जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण काम किया ‘काव्यास्वादन संगोष्ठी’ का आयोजन करके. उन्होंने समकालीन कविता के चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों – नंद चतुर्वेदी, नन्द किशोर आचार्य, ऋतुराज और विजेन्द्र को एक साथ बिठाकर उनसे कविता के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक बातचीत की. इस बातचीत को टेप किया गया और बाद में इसे किंचित संपादित रूप में ‘कविता का व्यापक परिप्रेक्ष्य: एक उपनिषद’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया. इस चर्चा के महत्व को आप तभी समझ सकेंगे जब इस किताब को पढ़ना शुरु करेंगे. ऐसे बहुत सारे काम हेतु जी ने किए.  बातें और बहुत सारी हैं, लेकिन कहीं तो विराम लगाना ही होगा.           

साहित्य, शिक्षा, समाज, राजनीति, कला आदि-आदि अनेक अनुशासनों पर गम्भीर विमर्श करने वाले और अपना मौलिक सोच रखने वाले हेतु  जी  की बड़ी ख़ासियत मुझे यह लगती है कि वे आम विद्वानों की तरह मनहूस नहीं हैं. बात कितनी ही गम्भीर हो, उसे सहज स्वाभाविक रूप में कहना उन्हें आता है और बखूबी आता है. उनकी सोहबत में – चाहे वो रचनाकार हेतु जी की हो या व्यक्ति हेतु जी की, आप बोर तो हो ही नहीं सकते. और अगर वो सोहबत अंतरंग हो तो फिर कहना ही क्या! मैं खुद को इस मामले में बहुत खुशनसीब मानता हूं कि उम्र के अंतराल के बावज़ूद मुझे हेतु जी के साथ इस तरह का बहुत सारा समय बिताने का मौका मिला है और मिलता रहता है. उस वक़्त उनकी ज़िन्दादिली का क्या कहना! पण्डित चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’  ने अपनी अमर कहानी ‘उसने कहा था’ में एक वाक्य लिखा है - कौन जानता था कि दाढ़ियावाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएँगे  बस, बारहा वो याद आता रहता है! ग्राम्य जीवन के जाने कितने बिन्दास प्रसंग उनसे सुने हैं! और उन्हें सुनाने का उनका अन्दाज़! मुझे तो बेसाख़्ता महाकवि ग़ालिब याद आते रहते हैं: ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां... हेतु  जी में यह प्रतिभा भरपूर है कि वे किसी भी प्रसंग को ऐसा रोचक बना देते हैं कि मनहूस से मनहूस भी ठहाका मारने को मज़बूर हो जाए! और अगर प्रसंग भी जीवंत हो तो फिर कहना ही क्या!

कभी मैंने जयपुर के अपने एक रचनाकार मित्र से कहा था कि अपना बुढ़ापा कैसे बिताया जाए इस मामले में हेतु जी मेरे आदर्श हैं! पता नहीं वे मित्र मेरी बात को कितना समझे और कितना नहीं समझे! लेकिन करीब एक दशक पहले कही अपनी बात को आज याद करके खुद अपनी पीठ थपथपाने का मन कर रहा है – कि मेरा आकलन कितना सही था. जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमारे मनोनुकूल नहीं होता है. और जहां तक उसे बदलने की बात है, हम उसे तो क्या बदलेंगे, जब खुद को ही नहीं बदल पाते हैं. ऐसे में, जो है उस  को आनंद भाव के साथ स्वीकार करने से बेहतर तरीका जीवन जीने का हो नहीं सकता. और यह बात मैंने हेतु जी को देखकर सीखी है. रोज़ सीखता हूं. उनकी दोस्ती, उनके स्नेह और उनसे मिली सीखों के लिए आभार तो क्या व्यक्त करूं? बस यही कि वे जैसे हैं वैसे ही बने रहें!

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मानव मुक्ति को समर्पित त्रैमासिकी 'एक और अंतरीप' के डॉ हेतु भारद्वाज पर एकाग्र विशेषांक 'आदमी जैसा आदमी' (अप्रेल-जून 2017) में सम्मिलित मेरा लेख.