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Tuesday, November 12, 2013

यह हमारा निकम्मापन है या लालच?

सरकारें जनता के लिए बहुत सारे काम करती हैं, जैसे स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराती हैं, शिक्षण संस्थाएं  चलाती हैं, रेल और बस चलाती हैं, डाकघरों और बैंकों का संचालन करती हैं और भी काफी कुछ करती हैं. सैद्धांतिक रूप से कोई सरकार कभी अपव्यय  नहीं करना  चाहती इसलिए अक्सर  होता यह है कि मांग की तुलना में पूर्ति कम होती है और लोगों को इंतज़ार करना पड़ता है. हारी-बीमारी में आप अस्पताल पहुंचते तो पाते हैं कि वहां पंजीकरण से लगाकर डॉक्टर को दिखाने तक और फिर जांच कराने से लगाकर भर्ती होने तक और फिर अगर ज़रूरत हो तो ऑपरेशन वगैरह करवाने तक हर जगह लम्बी प्रतीक्षा कतार है. आपको कहीं जाना है तो पता लगता है कि ट्रेन में एक महीने की वेटिंग है, डाकखाने जाते हैं तो एक पोस्टकार्ड खरीदने या एक रजिस्ट्री करवाने के लिए आधा घण्टा क्यू में खड़ा रहना पड़ता है. और आज़ादी के बाद से हम सब यह करते-करते इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि प्रतीक्षा करना हमें अखरता भी नहीं है.

ऐसा नहीं है कि सरकारें जनता की ज़रूरतों के प्रति असंवेदनशील होती हैं. वे इन सुविधाओं में वृद्धि भी करती हैं, लेकिन सरकारी कार्यप्रणाली ही कुछ ऐसी है कि सोचने और करने के बीच वक़्त का काफी लम्बा फासला रहता है. किसी अस्पताल की शैयाओं और डॉक्टरों की संख्या में वास्तव में वृद्धि होते होते इतना समय लग जाता है कि तब तक ज़रूरत फिर काफी बढ़ चुकी होती है और वह वृद्धि ऊँट के मुंह में जीरे के समान लगने  लगती है.

जब से देश में निजीकरण की हवा बहने लगी है, बहुत सारी सुविधाएं निजी क्षेत्र में भी उपलब्ध होने लगी हैं और जो लोग साधन सम्पन्न हैं वे निशुल्क सुलभ सरकारी सेवाओं की बजाय इन सशुल्क सेवाओं की तरफ भी जाने लगे हैं. निजी अस्पताल, निजी स्कूल कॉलेज, निजी बैंकों, कूरियर सेवाओं  वगैरह  का कारोबार खूब फल फूल रहा है. निश्चय ही कुछ मामलों में ये निजी सेवाएं सरकारी सेवाओं से बेहतर भी हैं. इनके परिसर बेहतर प्रबन्धित हैं,  और यहां जो लोग सेवाएं देते हैं, उनका व्यवहार भी आम तौर पर सरकारी सेवा देने वालों के व्यवहार से बेहतर होता है. बात  को स्पष्ट कर दूं. सरकारी सेवा देने वालों का व्यवहार दाता जैसा होता है और वे हमेशा आप पर एहसान करने वाली मुद्रा में रहते हैं, जबकि निजी क्षेत्र में जिन लोगों से आपका साबका पड़ता है वे आपके साथ अधिक सम्मानपूर्ण बर्ताव करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि आपकी शिकायत उनकी नौकरी को ख़तरे में डाल सकती है.

लेकिन इधर मैं यह देख रहा हूं कि निजी क्षेत्र भी कई मामलों में सरकारी क्षेत्र जैसा होता जा रहा है. बहुत सारे मित्रों को स्मरण होगा कि जब हमारे यहां कूरियर सेवाओं की शुरुआत हुई थी तो हर चिट्ठी की पावती (जिसे पीओडी – प्रूफ ऑफ डिलीवरी कहा  जाता था) मिलती थी. अब मैं पाता हूं कि कुछ बहुत महंगी कूरियर सेवाओं के सिवा अधिकांश में यह व्यवस्था नहीं  रह गई है. आप किसी महंगे अस्पताल में जाते हैं और पाते हैं कि वहां भी पहले पर्ची बनवाने के लिए और फिर डॉक्टर को दिखाने के लिए आपको खासा इंतज़ार करना पड़ता है. उन लोगों को तो अपनी सुविधाओं का विस्तार करने में और नए लोगों की भर्ती करने में उन तमाम बाधाओं से नहीं गुज़रना पड़ता है जिनसे सरकारी तंत्र को गुज़रना पड़ता है, फिर भी हालात एक से क्यों होते हैं? निजी शिक्षण संस्थाओं की तो बात ही मत कीजिए. वहां के शिक्षकों से बात कीजिए तो शोषण की अनेक व्यथा-कथाएं आपको सुनने को मिल जाएंगी. कम वेतन, अधिक से अधिक काम. अब अगर ऐसे शोषित शिक्षक बच्चों से दुर्व्यवहार भी करें तो क्या ताज्जुब? कभी-कभी लगता है कि निजी और सरकारी शिक्षा  संस्थानों में बस परिसरों और शिक्षकों की टीम टाम का फर्क़ रह गया है.
                                
इस स्थिति की हास्यास्पद और एक हद तक अपमानजनक परिणति हाल ही में नगर के एक लोकप्रिय ग्राम्य रिसोर्ट में देखने को मिली. यह स्थल पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है और गुलाबी नगरी में आने वाला हर पर्यटक एक बार तो यहां ज़रूर ही जाना चाहता है. इस बार वहां जाना हुआ तो मौज मज़े की बजाय भीड़-भड़क्के का माहौल देखने को मिला. यानि जितनी उस स्थान की क्षमता है उससे काफी अधिक पर्यटक वहां थे. और इस सबकी दारुण परिणति इस बात में हो रही थी कि वहां की भोजनशाला में प्रवेश करने से पहले आपको लगभग एक घण्टा धक्का-मुक्की वाले क्यू में खड़े रहना पड़ रहा था. कह सकता हूं कि लंगरों का माहौल इससे बेहतर होता है. हालत यह थी कि अन्दर लोग पंगत में बैठ कर जीम रहे थे और दरवाज़े पर खड़े लोग आंखें गड़ाये अपनी तमाम भंगिमाओं से जैसे उन्हें कह रहे थे – ‘अबे भुक्खड़! अब तो उठ! बहुत भकोस लिया!’ मैं सोच रहा था कि अगर ये लोग अपनी सुविधाओं का  विस्तार नहीं कर सकते तो कम से कम यह तो कर सकते हैं कि अपने इस स्थल की क्षमता निर्धारित  कर दें और उससे अधिक लोगों को विनम्रतापूर्वक वापस लौटा दिया करें! पश्चिम के अपने प्रवासों के दौरान मैंने देखा है कि हर रेस्तरां के बाहर यह अंकित होता है कि उसमें कितने लोगों को लिए जगह है और वे लोग उस क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं देते हैं. हमारे यहां अगर ऐसा नहीं होता है तो इसे आप हमारा लालच कहेंगे या निकम्मापन? 


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जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 12 नवंबर 2013 को प्रकाशित आलेख  का मूल पाठ. 

Sunday, September 15, 2013

शिक्षक दिवस पर स्मरण अपने ‘गुरुजी’ का!


 लगभग 35 साल खुद शिक्षक रह चुकने के भी दस बरस बाद भी मेरे मन में अपने अनेक शिक्षकों की स्मृतियां संचित  हैं.  करीब 16 बरसों (उन दिनों पूर्व प्राथमिक जैसा कुछ तो होता नहीं था) के अपने अध्ययन काल में अनेक शिक्षकों से पढ़ने और सीखने का मौका मिला. उनमें से बहुतों  की स्मृति तो  धूमिल होते-होते अब लगभग अदृश्य हो गई है, लेकिन कुछ की स्मृति कुछ इस तरह से ताज़ा है जैसे आज भी मैं उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं. कभी मौका मिला तो उनमें से कुछेक को सलीके से स्मरण करूंगा, अभी तो अपने (निस्संकोच कह सकता हूं) सर्वाधिक प्रिय ‘गुरुजी’ को याद करना चाहूंगा. जी हां, वे मेरे लिए ‘सर!’ न होकर ‘गुरुजी’  ही थे.

मैं बात कर रहा हूं मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर की. अपने ज़माने के बहुत लोकप्रिय कवि थे वे, राजनीतिकर्मी भी और राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘न भूतो न भविष्यति’ अध्यक्ष भी. उदयपुर के महाराणा भूपाल कॉलेज में 1961 में पहली बार बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में मैं उनके सम्पर्क में आया,  लेकिन स्नातक अध्ययन के तीन वर्ष बहुत सामान्य रहे. बी.ए. पास करने के बाद विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरी पढ़ाई पर विराम लग गया, लेकिन एक संयोग की वजह से, डॉ आतुर के सहज स्वाभाविक और खुले व्यक्तित्व ने उस विराम को पूर्ण विराम बनने से पहले अल्प विराम में परिवर्तित कर एम. ए. हिंदी में मेरे प्रवेश का, और इसी के साथ मुझे अपना बना लेने का पथ प्रशस्त कर दिया. उनसे विद्यार्थी का मेरा रिश्ता दो बरस का ही नहीं रहा.  बाद में जब मैंने पी-एच.डी. करने का फैसला किया तो उन्हीं को अपना गाइड बनाया और 1984 में उनका पहला पी-एच.डी. होने का सौभाग्य भी प्राप्त किया. सितम्बर 1989 में उनके स्वर्गवास होने तक उनसे मेरा रिश्ता न सिर्फ बना रहा, लगातार प्रगाढ़ होता गया. मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है कि उदयपुर में उनकी स्मृति में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल गई थी कि “मैं नहीं जानता कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है. लेकिन अगर मेरा एक और जन्म हो तो मैं चाहूंगा  कि मेरा वो जन्म  प्रकाश  आतुर के बेटे के रूप में ही हो.”

वे एक प्रभावी शिक्षक थे, अपने विषय पर उनकी बहुत मज़बूत पकड़ थी. लेकिन उनकी जो बात उन्हें सामान्य शिक्षक से अलग करती है वो है अपने विद्यार्थियों के प्रति उनका गहनतम अनुराग. आर्थिक अभावों से भरे अपने विद्यार्थी काल  में उनकी निजी लाइब्रेरी की अनगिनत किताबों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने  दिया कि  ‘काश! यह किताब भी  मेरे पास होती.’  उनकी किताबों को मैंने ऐसे बरता जैसे मेरे पिताजी उन्हें मेरे वास्ते खरीद कर रख गए हों! और किताबें ही क्यों, उनके प्रभाव का प्रयोग भी तो ऐसे ही किया. लेकिन ऐसा  हुआ कैसे? मैं परम संकोची, और उस ज़माने में कॉलेज शिक्षक का अलग ही रुतबा होता था. मुझ जैसा अति सामान्य और संकोची विद्यार्थी किसी प्रोफेसर के नज़दीक आ सके, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं थी. लेकिन फिर भी यह चमत्कार हुआ. और इस चमत्कार के मूल में था उनका अपना वत्सल व्यक्तित्व.  एक अनुभव को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. जिस दिन मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिलना तै हुआ उस दिन,  तब प्रचलित प्रथा के अनुसार,  शाम को एक बड़ी दावत मुझे आयोजित करनी चाहिए थी. लेकिन वो दावत डॉ आतुर ने अपने घर पर रखी. उस दावत में जो बहुत सारे लोग शरीक थे उनमें से एक तो आज केन्द्र सरकार में काबीना मंत्री हैं. दावत से ठीक पहले, मैंने बहुत संकोच के साथ  डॉ आतुर से अनुरोध किया कि इस दावत का व्यय भार मुझे वहन करने की अनुमति दें! लगभग तीस बरस बीत जाने के बाद भी उनका गुस्से से तमतमाया चेहरा मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ  है. “तुम कौन होते हो? तुम कैसे कर सकते हो यह? आज डॉ आतुर के बेटे को पी-एच.डी. मिली है, तो खुशी भी वो ही मनाएगा!”


मैं चाहूं तो भी गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उदयपुर में उनके घर भोजन किया और शाम बिताई है! जीवन में हर सुख दुःख में उनका वरद हस्त मुझ पर रहा. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया, और बदले में मुझसे कभी कुछ  भी नहीं चाहा. आज जीवन की सन्ध्या वेला में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि डॉ आतुर ने मेरे जीवन की धारा बदल दी. अगर  वे  मेरी ज़िन्दगी में न आए होते तो मैं न जाने कहां और कैसा होता? उन्होंने मुझे पढ़ने को प्रेरित किया. उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ा. उन्होंने कॉलेज शिक्षक बनने की मेरी दबी हुई आकांक्षा को खाद-पानी दिया. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मेरी रीढ़ को सीधी रहने की क्षमता प्रदान की. यह मेरा सौभाग्य था कि गुरु के रूप में मुझे वे मिले. उनकी पावन स्मृति को नमन! 

Sunday, January 24, 2010

शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस


अपनी मेगा बेस्टसेलर थ्री कप्स ऑफ टी (अब तक 30 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं) में ग्रेग मॉर्टेन्सन ने पाकिस्तान के दुर्गम इलाकों में लड़कियों के लिए स्कूल बनाने के अपने प्रयासों का मार्मिक वृत्तांत दिया था. उसी किताब की अगली कड़ी है स्टोन्स इण्टु स्कूल्स: प्रोमोटिंग पीस विद बुक्स, नोट बॉम्ब्स, इन अफ़गानिस्तान एण्ड पाकिस्तान. इस किताब में ग्रेग ने अफ़गानिस्तान में अपने स्त्री साक्षरता के प्रयासों का प्रेरक वृत्तांत प्रस्तुत किया है. ग्रेग मॉर्टेन्सन पिछले 16 बरसों से अपने एक ग़ैर-लाभकारी संगठन सेंट्रल एशिया इंस्टीट्यूट के माध्यम से पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के दुर्गम इलाकों में 130 से ज़्यादा स्कूल स्थापित कर अपनी तरह से शांति स्थापना के प्रयास में जुटे हैं. इन स्कूलों में से ज़्यादातर लड़कियों के लिए हैं.

ग्रेग की पिछली किताब थ्री कप्स ऑफ टी की बुनियाद पाकिस्तान में एक स्कूल खोलने का वादा थी, तो इस किताब के मूल में भी वैसा ही एक वादा है. 1999 में अफ़गानिस्तान के वाखन दर्रे से ए के-47 से सज्जित चौदह किरग़िज़ घुड़सवार पाकिस्तान आते हैं और ग्रेग से वादा लेते हैं कि वह पामीर की पहाड़ियों के एक दुर्गम स्थल बोज़ाई गुम्बद में एक स्कूल बनायेंगे. इसी स्कूल को बनाने की कहानी है यह किताब. ग्रेग को इस स्कूल को बनाने के प्रयास में कई और स्कूल भी बनाने पड़े. ग्रेग को अपनी यह विजय शांति के पथ की तरह प्रतीत होती है. एक बिलकुल नए देश अफ़गानिस्तान के सुदूर उत्तर पूर्वी एकांत इलाकों में, वाखन दर्रे में किस तरह ग्रेग और उनके निडर मैनेजर के अथक प्रयासों से पहला स्कूल बन सका, और फिर दर्जनों और स्कूल बने, यह वृत्तांत जितना रोचक है उतना ही प्रेरणास्पद भी.

एक जगह ग्रेग लिखते हैं, “हम लोग अफ़गानिस्तान के हर गांव और कस्बे में, जहां बच्चे शिक्षा के लिए तरसते हैं और मां-बाप ऐसे स्कूलों के निर्माण का सपना देखते हैं जिनके दरवाज़े न सिर्फ़ उनके बेटों बल्कि बेटियों के लिए भी खुले होंगे, आशा की एक किरण जगा सके थे. इन जगहों में वे जगहें भी ख़ास तौर पर शामिल थीं जो कलाश्निकोव धारी ऐसे मर्दों के घेरे में हैं जिनकी पूरी ताकत इस झूठ को ज़िन्दा रखने में खर्च होती है कि क़ुरान शरीफ में यह सीख दी गई है कि जो लड़की गणित पढ़ना चाहे उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देना चाहिये.”

ग्रेग अपने प्रयासों के लिए अमरीकी सैन्य सेवा से भी आर्थिक सहायता प्राप्त करते हैं. सैनिक लोग निजी तौर पर भी उन्हें आर्थिक मदद देते हैं और उनके कुछ प्रोजेक्ट्स के लिए सामग्री लाने-लेजाने में भी सहायता करते हैं. लेकिन वे अमरीकी सैन्य नीतियों के प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी कोई परहेज़ नहीं करते. युद्ध जर्जर अफ़गानिस्तान में तीन लाख से भी ज़्यादा सैनिक भेजने वाले अमरीकी निज़ाम को वे यह कहकर चेताते हैं कि “हमें अफ़गानिस्तान के लोगों से अभी जितना सीखना है वह उससे बहुत ज़्यादा है जो हम ताज़िन्दगी उन्हें सिखाने की सोच भी सकते हैं.” इसी तरह वे एक टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल की लगभग साढ़े आठ लाख डॉलर की भारी कीमत पर अफ़सोस करते हुए कहते हैं, “इतनी बड़ी धन राशि से तो आप दर्ज़नों ऐसे स्कूल बना सकते हैं जो हज़ारों विद्यार्थियों को पीढ़ियों के लिए एक संतुलित, ग़ैर अतिवादी शिक्षा प्रदान करेगी.” और यह कहने के बाद वे मानो अपनी ही सरकार के सामने एक सवाल रखते हैं, “आपके विचार में इनमें से किस से हम अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे?”

लेकिन उनका असली संबल तो स्थानीय लोग ही हैं. पूर्व कमाण्डो सरफराज़ खान ऐसे ही लोगों में से एक हैं जो अब ग्रेग के संगठन के प्रोजेक्ट डाइरेक्टर हैं. सरफराज़ जैसों के बल पर ही ग्रेग तालिबानों के गढ़ में भी शिक्षा की अलख जगा सके. तालिबानों ने उनके कई स्कूलों को नुकसान भी पहुंचाया. लेकिन इन स्थानीय लोगों से जो सहयोग ग्रेग को मिला उसी के आधार पर वे यह कह सके हैं कि वे ही लोग तालिबान को कुचल कर लड़कियों की शिक्षा के विरुद्ध प्रचलित सांस्कृतिक सोच में बदलाव ला सकते हैं.

ग्रेग मॉर्टेन्सन तांजानिया में अपने बचपन में एक अफ़्रीकी कहावत सुनते रहे हैं कि अगर आप एक लड़के को शिक्षित करते हैं तो आप महज़ एक व्यक्ति को ही शिक्षित करते हैं, लेकिन अगर आप एक लड़की को शिक्षित करते हैं तो आप पूरे समुदाय को शिक्षित करते हैं. ग्रेग ने बाद में पाया कि बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है. उन्होंने जाना कि विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार शिक्षा बाद की ज़िन्दगी में एक औरत की आय को 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा देती है. कुछ दूसरे अध्ययनों से यह भी पता चला कि अगर लड़की पांचवीं तक भी पढ़ लेती है तो शिशु मृत्यु दर काफ़ी घट जाती है. ऐसी लड़कियां देर से विवाह करती हैं और उनके बच्चे भी कम होते हैं. लेकिन इसी के साथ ग्रेग मॉर्टेन्सन ने यह भी पाया कि लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा दे देना ही पर्याप्त नहीं है. विकासशील देशों में ऐसी ग्रामीण स्त्रियों के लिए करीब-करीब कोई काम सुलभ नहीं है. उन्हें कोई अर्थपूर्ण रोज़गार मिले, जैसे वे अध्यापिका, डॉक्टर, नर्स वगैरह बन सकें, इसके लिए ज़रूरी है कि उन्हें उच्च शिक्षा मिले. अपनी बात के प्रमाण के तौर पर वे 22 वर्षीया शकीला का उदाहरण देते हैं जो उनके यहां की प्रथम स्नातिका और तीन लाख की आबादी वाले इलाके की पहली महिला चिकित्सक होगी.

यह सारा काम करते हुए खुद ग्रेग ने काफी कुछ सीखा. उन्होंने पाया कि महज़ किताबी शिक्षा ही काफ़ी नहीं है. खुद उनकी बेटी ने उन्हें यह पाठ पढ़ाया कि बच्चों के लिए खेल भी ज़रूरी है. शायद इसी सीख का परिणाम यह रहा कि ग्रेग ने लड़कियों के कूदने के लिए सात हज़ार रस्सियां मंगवाईं और स्कूलों में खेल के मैदान भी बनवाए.

ग्रेग ने एक जगह एच जी वेल्स को उद्धृत किया है: “इतिहास शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस है.” खुद ग्रेग ने किताब में एक जगह बहुत खूबसूरत और महत्वपूर्ण बात कही है: “बस, एक बार दिल के दरवाज़े खुल जाएं और वह पढना सीख ले, फिर तो पेड़ की हर पत्ती किताब का एक पन्ना बन जाती है.”
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राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत रविवार, 24 जनवरी, 2009 को प्रकाशित.








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