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Friday, April 19, 2019

जापान में चुनौती बनी नागरिकों की बढ़ती उम्र


अगर किसी देश के नागरिकों की औसत आयु में वृद्धि होती है तो उसे वहां की व्यवस्था की कामयाबी माना जाता है,  लेकिन कभी-कभी यही कामयाबी कुछ मुसीबतों का कारण भी बन जाती है. कम से कम जापान में तो ऐसा ही हो रहा है. जापान दुनिया के उन देशों में प्रमुख है जहां वृद्धों की संख्या सबसे ज़्यादा है. वर्तमान  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जापान में पैंसठ साल या उससे अधिक आयु के काम करने वालों की संख्या अस्सी लाख से अधिक है जो कुल काम करने वालों की संख्या की बारह प्रतिशत है. पैंतीस सदस्यीय आर्थिक  सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों में से जापान में उम्र के लिहाज़ से काम कर सकने  वालों और वृद्धों के बीच का अनुपात सबसे ज़्यादा है. समय के साथ वहां काम न कर सकने वालों की संख्या बढ़ती और काम करने वालों की संख्या घटती जा रही है. अभी वहां वृद्धावस्था निर्भरता पचास प्रतिशत से अधिक है और सन 2050 तक आते-आते यह बढ़कर अस्सी प्रतिशत हो जाएगी. इसका अर्थ यह कि  जापान का संकट यह है कि वहां काम करने वाले लगातार कम होते जा रहे हैं और काम न कर सकने  वालों पर व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है. लोगों के ज़्यादा जीने का सीधा असर  अर्थ व्यवस्था  पर यह भी पड़ता है कि पेंशन पर ज़्यादा खर्च करना पड़ता है. जापान का संकट इस बात से और गहरा जाता है कि वहां की सरकार विदेशियों को काम के लिए अपने देश में बुलाने के मामले में बहुत उत्साही नहीं है. इस कारण भी वहां काम करने वालों की कमी अन्य देशों की तुलना में अधिक गम्भीर हो जाती है.  इस समस्या का एक और आयाम यह है कि जो लोग सेवा निवृत्त होते हैं उन्हें मिलने वाली पेंशन उनकी अपेक्षाओं और ज़रूरत से कम होती है, इसलिए उन्हें सेवा निवृत्ति के बाद आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है. अभी जापान में एक कर्मचारी को औसतन डेढ़ लाख येन की पेंशन मिलती है जो कि उस सरकारी लक्ष्य से काफी कम है जिसके अनुसार किसी भी वेतनभोगी कर्मचारी को सेवा निवृत्ति के बाद उसके सेवा निवृत्ति से ठीक पहले के वेतन का कम से कम साठ प्रतिशत तो मिलना ही चाहिए. यह राशि दो लाख बीस हज़ार येन होती है.

इस तरह जापान में संकट अनेक आयामी है.  एक तरफ कर्मचारी हैं जो कम पेंशन की वजह से सेवा निवृत्ति को सुखद नहीं मानते हैं तो दूसरी तरफ देश में काम करने वालों की घटती  जा रही संख्या के कारण  आने वाली विभिन्न दिक्कतें हैं. इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ है कि वहां की शिंज़ो एबे सरकार इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही है कि कर्मचारियों की वर्तमान सेवा निवृत्ति की आयु को पैंसठ वर्ष से बढ़ाकर सत्तर या पिचहत्तर वर्ष कर दिया जाए. वैसे यथार्थ यह है कि भले ही अभी वहां सेवा निवृत्ति की आयु पैंसठ वर्ष है वहां की अधिकांश कम्पनियां  अपने वेतन व्यय को नियंत्रित रखने के लिए कर्मचारियों को साठ वर्ष की उम्र में ही सेवा निवृत्त हो जाने को प्रोत्साहित करती हैं, और अगर वे इसके बाद पांच  बरस और काम करना ज़ारी रखना चाहते हैं तो उन्हें कम वेतन पर काम करने का प्रस्ताव दिया जाता है.

काम करने वालों की कमी की समस्या का मुकाबला  करने के लिए जापान में अन्य अनेक श्रम सुधारों पर भी विचार और अमल किया जा रहा है. ओवरटाइम को हतोत्साहित किया जाने लगा है और काम के समय और शर्तों में अधिक उदारता बरती जाने लगी है. जापान इस बात  के लिए कुख्यात है कि वहां लोगों के काम के घण्टे बहुत ज़्यादा होते हैं. अब वहां काम के घण्टे कम किये जा रहे हैं और घर से काम करने के नियमों को भी अधिक उदार  बनाया जा रहा है. इससे यह उम्मीद बढ़ रही है कि स्त्रियां और सेवा निवृत्त लोग भी काम करने के लिए आगे आएंगे और जापान का काम करने वालों की कमी का संकट कुछ तो कम होगा. इस सबके साथ जापान सरकार पर इस बात के  लिए भी भारी दबाव है कि वह अपने देश में काम के लिए आने वाले विदेशियों  का अधिक गर्मजोशी से स्वागत करे और कम से कम अधिक तकनीकी कौशल और दक्षता की ज़रूरत वाले पदों के लिए विदेशियों को अपने देश में आने दे. ऐसा करने से वहां का दक्ष कर्मचारियों की कमी का संकट भी कुछ कम होगा. कहना अनावश्यक है कि सरकार भी इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही है. अगर ये सारी बातें क्रियान्वित हो जाती हैं तो यह सबके लिए सुखद होगा – काम करने वालों के लिए भी और जापान देश के लिए भी.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 19 अप्रैल, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, April 12, 2016

स्वीडन ने आम नागरिकों को बनाया देश का राजदूत!

दुनिया का हर देश कोशिश करता  है कि अन्य देशों के निवासी न केवल उसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करें;  वह यह भी चाहता है कि अन्य देश उसके प्रति सद्भावना भी रखें. सद्भावना के प्रसार के लिए अनगिनत प्रयास किए जाते हैं. एक से दूसरे देश में शिष्टमण्डल जाते हैं, कलाकारों का आदान-प्रदान होता है, राजनयिक गतिविधियां होती हैं, बड़े नेता एक दूसरे के देशों की  सद्भावना  यात्राएं करते हैं- ऐसे ही अन्य  अनगिनत काम और प्रयास किए जाते हैं.  कहना अनावश्यक है कि सद्भावना  का यह प्रसार छवि को ही उजला नहीं बनाता है, व्यावसायिक सम्भावनाओं को भी पंख देता है.

महज़ दस लाख से भी कम आबादी वाला यूरोप महाद्वीप का देश स्वीडन दुनिया के सर्वाधिक शांत देशों में से एक माना जाता है. लेकिन इसी के साथ यह बात भी जोड़ देना उपयुक्त होगा कि दुनिया के ऐसे दस देशों की सूची में, जहां बलात्कार सर्वाधिक होते हैं, यह देश तीसरे नम्बर पर आता है. भारत का नम्बर इस देश के फौरन बाद यानि चौथा  है. लेकिन संख्याओं का यह खेल खासा भ्रामक भी है. असल में तो स्वीडन दुनिया के उन देशों में अग्रणी है जहां स्त्री-पुरुष समानता सर्वाधिक है और स्त्रियों को अपनी बात कहने की और अपने लिए सुरक्षा पाने की सबसे अधिक सुविधाएं सुलभ हैं. यही कारण है कि स्वीडन में एक लाख की जनसंख्या पर बलात्कार के अड़सठ मामले दर्ज़ होते हैं, जबकि भारत में उसी एक लाख जनसंख्या पर मात्र दो मामले दर्ज़ होते हैं. यानि स्वीडन की यह ‘कुख्याति’ असल में उसके इस  गुण की वजह से है कि वहां स्त्री किसी अन्याय को सहने की बजाय उसका प्रतिरोध करती है.  तो इस तरह आंकड़े असल से भिन्न तस्वीर पेश कर डालते हैं. यथार्थ यह है कि 2014 की ग्लोबल जेण्डर गैप रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक समानता के मामले में स्वीडन  दुनिया के  शीर्षस्थ देशों में शुमार है.

इसी स्वीडन देश के पर्यटन विभाग ने हाल ही में अन्य देशों के बीच अपने देश की छवि को और अधिक निखारने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है. आज उसी की चर्चा. स्वीडिश पर्यटन एजेन्सी ने ‘कॉलिंग स्वीडन’ नाम से एक सेवा शुरु की है जो पूरी दुनिया के लोगों को आमंत्रित करती है कि वे दिए गए नम्बर पर कॉल करें तो उनकी बात किसी स्वीडिश नागरिक से होगी और उससे वे किसी भी  मुद्दे पर बात कर सकेंगे. इसके लिए इस स्वीडिश एजेंसी ने एक विज्ञापन देकर अपने देश के नागरिकों को आमंत्रित किया कि वे एक एप डाउनलोड करें जिसके  माध्यम से वे अगले दो महीनों  तक किसी अनजान  विदेशी से संवाद कर सकेंगे. अब जैसे ही कोई विदेशी उस दिए गए नम्बर पर फोन करता है उसे आकस्मिक रूप से चुने गए किसी स्वीडिश नागरिक से जोड़ दिया जाता है और फिर वे दोनों  किसी भी विषय या मुद्दे पर बात कर सकते हैं. अभी हाल ही में शुरु हुई इस सेवा से तीन हज़ार स्वीडी नागरिक जुड़ चुके हैं, और साढ़े साथ हज़ार कॉल उन्हें प्राप्त हो चुके हैं.  

समझा जा सकता है कि स्वीडिश पर्यटन एजेंसी ने इस योजना के माध्यम से अपने देश के आम नागरिक को भी अपना राजदूत बनाने का प्रयास किया है. यह  आशंका हो सकती है कि क्या पता कब कोई स्वीडी नागरिक ऐसी गैर ज़िम्मेदाराना हरकत कर जाए कि देश की छवि संवरने की बजाय बिगड़ जाए, मसलन वो अपने देश के बारे में कोई ग़लत बात कह दे, उसकी आलोचना कर दे या और कुछ नहीं तो सामने वाले से अशिष्ट बर्ताव ही कर डाले!   इन आशंकाओं को पूरी तरह निर्मूल भी नहीं ठहराया जा सकता. और ऐसा भी नहीं है कि स्वीडिश पर्यटन एजेंसी ने इन आशंकाओं को मद्दे नज़र नहीं रखा. लेकिन उसने बहुत सोच विचारकर बलपूर्वक यह कहा कि हर नागरिक नेक इरादों वाला होता है और हमें उस पर भरोसा करना चाहिए! वैसे स्वीडन में अपने देश वासियों पर भरोसा करने की परम्परा पहले से मौज़ूद है. मसलन, वहां एक आधिकारिक सरकारी ट्विटर खाता है जिसका संचालन हर सप्ताह एक भिन्न नागरिक करता है और उसे यह अधिकार होता है कि वह देश की तरफ से किसी भी मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त करे. यह राय सकारात्मक भी हो सकती है, नकारात्मक भी.

है ना यह बहुत बड़ी बात! आखिर क्यों नहीं किसी देश को अपने आम नागरिक पर भरोसा करना चाहिए? स्वीडिश एजेंसी का यह सोच कि पेशेवर राजदूत का काम अपनी जगह, अगर उसी के साथ  आम नागरिक को भी अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया जाए तो उसके बेहतर परिणाम सामने सकते हैं, दुनिया के और देशों के लिए भी अनुकरणीय न भी हो तो विचारणीय तो है ही.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 12 अप्रेल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.