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Tuesday, December 1, 2015

सेज पर रोबोट

हाल ही में एक ख़बर आई कि नवम्बर 2015 में मलेशिया में होने वाली एक कॉंफ्रेंस वहां की पुलिस की आपत्ति के बाद रद्द कर दी गई, तो लगा कि सारी दुनिया में हालात एक से हैं. यह कॉंफ्रेंस थी लव एण्ड सेक्स विद रोबोट्स विषय पर और इसके आयोजकों में प्रमुख थे 2007 में प्रकाशित इसी शीर्षक वाली किताब के लेखक डेविड लेवी और उनके साथी प्रोफेसर  एड्रियन चिओक. पुलिस ने ऐसा कुछ समझ कर कि इस कॉंफ्रेंस में रोबोट्स के साथ यौन सम्बन्ध कायम किया जाएगा, इसे ग़ैर कानूनी मान लिया, जबकि आयोजकों का कहना है कि इस कॉंफ्रेंस में बहुत व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दों पर अकादमिक विमर्श होना था. बता दूं कि इसी विषय पर पहली कॉंफ्रेंस  2014 में पुर्तगाल में आयोजित हो चुकी है, और यह दूसरी कॉंफ्रेंस अब कदाचित 2016 में लंदन में आयोजित होगी. 

असल में जब भी हमारे जीवन में नया कुछ आता है, उससे हमारी सुविधाओं में चाहे जितना इज़ाफा हो, बहुत सारे नैतिक, वैचारिक और कानूनी मुद्दे भी स्वाभाविक रूप से उठ खड़े होते हैं. यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि महात्मा गांधी के लिए इंजेक्शन भी हिंसा का ही एक प्रकार था और बहुत सारे लोगों के लिए अनेक अंग्रेज़ी दवाइयों  में मौज़ूद अल्कोहल उनके  अस्वीकार की वजह बनता है. लेकिन यहां हम बात रोबोट्स की कर रहे हैं. पिछले कुछ बरसों में कृत्रिम बुद्धि के विकास की वजह से  रोबोट्स की कार्य दक्षता में जो बदलाव और सुधार आए हैं उनकी वजह से अब वे तेज़ी से मनुष्य के स्थानापन्न बनते जा रहे हैं. हॉलीवुड की अनेक लोकप्रिय फिल्मों और किताबों में रोबोट्स और मनुष्यों के अंत: सम्बन्धों का जो चित्रण लगातार बढ़ता जा रहा है उसके यथार्थ रूपांतरण की आहटें अब साफ़ सुनाई देने लगी हैं. इधर हाल ही में हैलो बार्बी नामक एक खिलौना ऐसा आया है जो बच्चों से बातें करता है और उनके साथ खेलता है. इस तरह के खिलौनों का बच्चों की सामाजिकता पर क्या असर पड़ेगा? इसी तरह अगर रोबोट्स सारे मेहनत मज़दूरी वाले काम करने लगे तो क्या उससे लोगों का रोज़गार नहीं छिन जाएगा? चारों तरफ रोबोट्स से घिरा इंसान क्या असामाजिक नहीं हो जाएगा? और यह असामाजिकता वाला ही सवाल उठा है रोबोट्स के साथ प्रेम और सेक्स की सम्भावनाओं को लेकर भी. कैलिफोर्निया की एक कम्पनी की बनाई रियल डॉल तो पहले से मौज़ूद थी जो करीब-करीब इंसानों जैसी हरकत करती थी, अब उपरोक्त श्री लेवी का कहना है कि उनके खयाल से अगर ऐसे रोबोट्स बना लिये जाएं जिनके साथ सेक्स करना सम्भव हो तो यह लाखों-करोड़ों  ऐसे लोगों के लिए एक वरदान होगा जिन्हें या तो अपना मनपसन्द साथी मिल ही नहीं रहा है या जो अपने साथी के साथ अपने रिश्तों से असंतुष्ट हैं. लेवी का मानना है कि इस तरह के रोबोट्स न केवल अकेलेपन को दूर करेंगे, उनकी वजह से बाल यौन अपराधों में भी बहुत कमी आ जाएगी.

लेकिन सारे समझदार लोग लेवी की तरह से नहीं सोचते हैं. अब आप एक रोबोटिक्स एथिसिस्ट (नैतिकविज्ञानी) कैथलीन रिचर्डसन को ही लीजिए जो इस तरह की सम्भावना को एक भीषण दु:स्वप्न की तरह देखती हैं.  उनको लगता है कि ऐसे सेक्स रोबोट्स असल ज़िन्दगी में भयंकर असमानता पैदा कर देंगे. वे इन  सेक्स रोबोट्स को रोबोट वेश्या की तरह देखती हैं और शिकायत करती हैं कि इनके प्रचलन से हमारे पहले से विकृत रिश्तों में जो और विकृति आ जाएगी उसे हम जान बूझकर अनदेखा कर रहे हैं. वे कहती हैं कि भले ही वे इन सेक्स रोबोट्स पर प्रतिबंध की वकालत न करें, लोगों को इनके सम्भावित दुष्परिणामों के बारे में आगाह कर देना अपना दायित्व समझती हैं. कैथलीन यह भी कहती हैं कि अगर सेक्स के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल बढ़ गया तो इसका प्रतिकूल असर  मानवीय संवेदनाओं पर तो पड़ेगा ही, समाज का स्त्री के प्रति जो नज़रिया है और अधिक विकृत हो जाएगा.

लेकिन डेवी का कहना है कि हमारी ज़िन्दगी में रोबोट्स की आमद तो बढ़ेगी ही. उसे रोक पाना तो नामुमकिन है. और जब उनकी आमद  बढ़ेगी तो वे न सिर्फ हमारे सेवक और सहायक के रूप में हमारी ज़िन्दगी में आएंगे, वे हमारे दोस्त, सहचर और फिर शैया संगी बनकर भी आएंगे. डेवी बड़ी ईमानदारी से कहते हैं कि बहुत मुमकिन है कि कुछ लोग अपने साथी के रूप में मनुष्य  की बजाय रोबोट को पसन्द करने लगें, लेकिन ऐसे लोग बहुत अधिक नहीं होंगे. मनुष्य का झुकाव तो मनुष्य की ही तरफ रहेगा.

देखते हैं कि डेविड लेवी का यह आशावाद कितना सही साबित होता है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 दिसम्बर, 2015 को सेज पर रोबोट, क्या मनुष्य की ज़रूरतें पूरी करेगा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


    

Thursday, April 17, 2008

एक सफल स्टार की करुण कथा

माय फेयर लेडी, साउण्ड ऑफ म्यूज़िक और मेरी पॉपिंस की स्टार जूली एण्ड्र्यूज़ को सब जानते हैं, लेकिन जिन ऊबड-खाबड राहों पर चलकर वे इन शिखरों तक पहुंची वे तो अब तक अजानी ही थीं. जूली एण्ड्र्यूज़ ने बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखी हैं. कुछ अकेले और कुछ अपनी बेटी के साथ मिलकर. उनके लिखे को खूब सराहा भी गया है. वे नियमितता से डायरी भी लिखती रही हैं. उन्हीं के आधार पर रचित होम: ए मेमोयर ऑफ माय अर्ली ईयर्स शीर्षक अपनी सद्य प्रकाशित आत्मकथा में उन्होंने 1935 में अपने जन्म से प्रारम्भ कर 60 के दशक के मध्य में फिल्मी दुनिया में धमाकेदार दस्तक के बाद वाल्ट डिज़्नी के साथ जुडने तक की जीवन यात्रा को प्रस्तुत किया है. वाल्ट डिज़्नी ने ही उन्हें 1963 में मेरी पॉपिंस में काम करने का अवसर दिया था.
जूली की इस आत्मकथा का प्रारम्भ 1935 के इंग्लैण्ड से होता है जहां सरे नामक छोटे किंतु रमणीय गांव में कला क्षेत्र में स्थान बनाने की अभिलाषी मां बारबरा और सामान्य से लोहार-सुथार पिता टेड वेल्स के घर जूली का जन्म होता है. जूली का खूबसूरत बचपन आगे बढ पाता उससे पहले ही उसके मां-बाप में तलाक हो जाता है. कारण यह कि मां अपनी संगीत यात्राओं के साथी टेड एंड्र्यूज़ से प्यार करने लगती है. और अंतत: उससे विवाह कर लेती है. उनका परिवार सरे से लंदन आ जाता है और युद्धोत्तर लन्दन में हवाई हमलों की दहशत के बीच बडी होती है जूली. सौतेले पिता के साथ मां को भी म्यूजिकल थिएटर में अपनी कला प्रदर्शित करने का मौका मिलता है. नए पिता जूली को भी संगीत सीखने को प्रेरित करते हैं और उसी दौरान यह पता चलता है कि जूली की आवाज़ विलक्षण है. 12 साल की छोटी वय में तो उसे रॉयल कमाण्ड पर्फोर्मेंस में युवतम एकल गायिका होने का सम्मान मिल जाता है. जूली लिखती हैं कि जब वे गाना शुरू करतीं तो लगता कि जैसे कार्यक्रम वहीं थम जाता और लोग खडे होकर तालियां बजाने लगते. तालियां थमने का नाम ही नहीं लेतीं. इसी काल में जब वह करीब 15 साल की है उसकी मां यह रहस्योद्घाटन करती है कि उसके पिता उसके जैविक पिता नहीं थे. स्वाभाविक है कि उसे गहरा सदमा पहुंचता है. यही वह समय है जब जूली को कुछ समय लन्दन के स्लम्स में भी रहना पडा क्योंकि उसके मां बाप की आय बहुत सीमित थी. लेकिन जैसे-तैसे खुद को सम्भाल वह अपनी कला-साधना जारी रखती है और किशोरावस्था की देहली पर पहुंचते-पहुंचते तो वह अपनी स्टेज पर्फॉर्मेंस से पूरे परिवार का भरण पोषण तक करने लग जाती है. इस किशोरावस्था में जूली को कुछ ग्लैमरपूर्ण भूमिकाएं अदा करने का भी अवसर मिलता है, लेकिन विडम्बना यह कि जब वह ये भूमिकाएं अदा करती, उसके मोजे प्राय: फटे होते थे.

जब जूली 18 साल की होती है, उसे लन्दन पैलेडियम में एक पैंटोमाइम प्रस्तुत करने का मौका मिलता है और यह मौका उसके लिए ब्रॉडवे की एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति द बॉयफ्रैण्ड में एक महत्वपूर्ण भूमिका दिलाने का साधन बन जाता है. इसी से शुरू होता है उसका म्यूज़िकल कॉमेडी वाला दौर. इसके बाद तो रैक्स हैरिसन के साथ माय फेयर लेडी में काम करना जैसे दूर नहीं रह जाता है. लेकिन जूली माय फेयर लेडी की शूटिंग के दौरान रेक्स हैरिसन के लगभग अमानवीय व्यवहार को भी याद करना नहीं भूलती. वह रिचर्ड बर्टन के उस प्रणय निवेदन का भी ज़िक्र करती है, जिसे उसने करीब-करीब स्वीकार कर ही लिया था, बावज़ूद इस बात के कि तब उसने अपने बचपन के दोस्त टोनी वाल्टन से शादी की ही थी. किताब के अनेक मार्मिक प्रसंगों में से एक है प्रख्यात छायाकर सेसिल बीटन का प्रसंग. सेसिल घण्टों जूली का फोटो सेशन करता है और अंत में यह कहते हुए अपनी ही कला पर मुग्ध होता है कि जूली कितनी अनफोटोजीनिक है!
जूली का यह आत्मकथात्मक वृत्तांत खत्म होता है ऑस्कर विजेता फिल्म मेरी पॉपिंस में उसके डेब्यू के साथ. लेकिन इससे पहले हमारे सामने एक लगभग साधारण युवती की ऐसी दारुण कथा उभरती है जिसके मनमौजी कण्ठ को असमय ही प्रौढ हो जाना पडा था (क्या आपको लता याद आती हैं?) और जिसे बेफिक्रे बचपन को भुलाकर एक संघर्ष भरी और जटिल पारिवारिक ज़िन्दगी का वरण करना पडा था (याद कीजिए रेखा को!) जूली से उसके एक विश्लेषक ने, जिसे किताब में कई बार उद्धृत किया गया है, एक बार पूछा था कि अपने मां बाप में से किससे उसे अधिक नफरत है? जूली ने बहुत कुशलता से इस सवाल को टाल दिया था. यह वृत्तांत पढते हुए लगता है कि वह किसका नाम लेती? मां बाप का तलाक, बचपन में ही स्टेज पर धकेल दिया जाना, पिता से जुदाई, मां का दुर्व्यवहार और उसका शराबी बन जाना, सौतेले पिता द्वारा की गई पिटाइयां और यदा-कदा उनके यौनिक दुर्व्यवहार - ये सब ऐसे आघात हैं जिनकी टीस उसे साठ बरस बाद भी महसूस होती है.
यह वर्णन पढते समय ही हम उस भ्रम जाल से भी निकलते हैं जो जूली की बाद की वैभवपूर्ण ज़िन्दगी को देख हमारे मन में निर्मित होता है. इस वृत्तांत को पढकर एहसास होता है कि चन्द खुशकिस्मतों को छोड दें तो दुनिया में शायद ही ऐसा कोई मिले जिसे गरीबी, मौत, भूख, युद्ध, परिवार आदि के झंझटों में से किसी न किसी से न जूझना पडा हो.
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Discussed book:
Home: A Memoir of My Early Years
By Julie Andrews
Published by: Hyperion
Hardcover, 320 pages
US $ 26.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 17 अप्रेल 2008 को प्रकाशित.







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