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Tuesday, July 16, 2019

सोलोथर्न शहर में कभी बारह नहीं बजते!


स्विटज़रलैण्ड के उत्तर पश्चिम में आरे के किनारे और वेइसेंस्टीन ज़ुरा पहाड़ियों के तल में स्थित सोलोथर्न शहर की गिनती इस देश के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है. इतालवी भव्यता, फ्रांसिसी सौंदर्य और जर्मन व्यावहारिकता की त्रिवेणी से सज्जित यह शहर बर्न से मात्र तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच यह शहर फ्रांसिसी राजा के राजदूत का निवास स्थान भी रहा और इसलिए आज इसे राजदूत का नगरनाम से भी जाना जाता है. ये तमाम बातें अपनी जगह, और इस शहर की एक ख़ासियत अपनी जगह. और वह ख़ासियत है इस शहर का अंक ग्यारह से ख़ास लगाव. यह लगाव इतना गहरा है कि शहर  की अधिकांश निर्मितियों  और उनके डिज़ाइन में इस अंक की उपस्थिति को देखा जा सकता है. यहां चर्चों और चैपलों की संख्या ग्यारह-ग्यारह है. इस शहर में ग्यारह ऐतिहासिक फव्वारे, ग्यारह संग्रहालय और कुल ग्यारह  ही टॉवर हैं.

करीब दो हज़ार साल पहले रोमनों द्वारा बसाए गए इस शहर का सबसे बड़ा आकर्षण है यहां का सेंट उर्सूस गिरजाघर. अगर आपको इस शहर में ग्यारह की उपस्थिति का जादू देखना हो तो इस गिरजाघर से बेहतरीन जगह और कोई नहीं हो सकती. एक इतालवी वास्तुविद गेटानो मेटियो पिसोनी द्वारा इस गिरजे का निर्माण ग्यारह वर्षों में किया गया. इसमें सीढ़ियों की ग्यारह कतारें हैं. सीढ़ियों के दोनों तरफ दो भव्य फव्वारे हैं जिनमें से हरेक में ग्यारह-ग्यारह खूबसूरत नलों से पानी की धार निकलती है. गिरजे के कुल ग्यारह द्वार हैं और इसकी ऊंचाई ग्यारह-ग्यारह मीटर के तीन हिस्सों से निर्मित है. शीर्ष पर जो गुम्बद है उसमें ग्यारह घण्टे हैं जिनकी सुमधुर ध्वनि दूर से सुनाई देती है. ऐसा माना जाता है कि वास्तुविद पिसोनी को तत्कालीन सरकार ने यह आदेश दिया था कि वह इस गिरजे के निर्माण में ग्यारह का विशेष ध्यान रखे, और उसने ऐसा ही किया. इस हद तक ऐसा किया कि इस गिरजे की एक वेदी में ग्यारह प्रकार के संगमरमर प्रयुक्त किये. गिरजे में कुल ग्यारह वेदियां हैं. वहां आराधकों के बैठने के लिए जो बेंचें लगी हुई हैं वे भी ग्यारह-ग्यारह की कतार में हैं.

जब आप यह जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर क्यों इस शहर को ग्यारह की संख्या से इतना ज़्यादा लगाव है, तो बहुत सारी व्याख्याएं सुनने को मिलती हैं. दंतकथा प्रेमी बताते हैं कि प्राचीन काल में इस शहर के निवासी बहुत कड़ी मेहनत करते थे लेकिन उन्हें उसका पुरस्कार नहीं मिलता था. तब वेइसेंस्टीन की पहाड़ियों से कुछ चमत्कारी बौने अवतरित हुए और उन्होंने इस नगर के वासियों को उनका प्राप्य दिलवाया. नगरवासियों ने उन बौनों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्यारह की संख्या को अपनाया. यह तो हुई दंतकथा. एक अन्य व्याख्या का सम्बंध यहां के लोगों की धार्मिक आस्थाओं से है. वे यह मानते थे कि ग्यारह की संख्या धार्मिक रूप से पवित्र है. अंक शास्त्र भी यह मानता है कि तमाम अंकों में से ग्यारह का अंक सर्वाधिक अंत: प्रज्ञाजन्य है और इसका सीधा रिश्ता  आस्था और  आध्यात्मिकता के साथ है. एक मत यह भी है कि धर्मशास्त्र के अनुसार देवदूतों की कुल संख्या बारह थी लेकिन उससे एक कम यानि  ग्यारह का सम्बंध और अधिक पाने की आकांक्षा से जुड़ता है. और शायद आज भी इस शहर के नागरिक यही मानते हैं कि ग्यारह को अपने जीवन में इतना महत्व देकर वे यह साबित कर रहे हैं कि वे जो है उससे बेहतर के आकांक्षी हैं. ग्यारह के प्रति इस लगाव की कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रचलित हैं. जिन्हें इतिहास में रुचि  है वे यह बताते हैं कि सन 1481 में सोलोथर्न शहर स्विस संघ का ग्यारहवां केण्टन (प्रांत) बना था और सोलहवीं शताब्दी  तक आते-आते यह केण्टन ग्यारह प्रोटेक्टोरेट्स (एक तरह से छोटे प्रांतों) में विभाजित हो गया था. और अधिक पड़ताल करने पर  यह भी पता चलता है कि शहर के इतिहास में ग्यारह की संख्या का पहला उल्लेख सन 1252 में मिलता है जब इस शहर के लिए जो पहली नगर परिषद बनी उसमें ग्यारह सदस्य चुने गए थे.

ग्यारह के प्रति लगाव के मूल में चाहे जो भी कारण हों, आज स्थिति यह है कि इस शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी ग्यारह की बहुत अधिक महत्ता है. बच्चे अपना ग्यारहवां जन्म दिन विशेष उल्लास के साथ मनाते हैं. उस दिन खास  समारोह आयोजित किया जाता है. और जब हर जगह ग्यारह का महत्व है, तो भला बाज़ार उससे कैसे अछूता रह सकता है? बीयर, चॉकलेट जैसे अनेक उत्पादों के ब्राण्ड नामों में ग्यारह की उपस्थिति देखी जा सकती है. ग्यारह वर्ष पुरानी मदिरा बहुत लोकप्रिय है. सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि यहां के टाउन स्क्वायर पर एक विशाल घड़ी लगी हुई है. उस घड़ी के डायल पर एक से ग्यारह तक की संख्याएं ही अंकित हैं. यानि यहां कभी बारह बजते ही नहीं हैं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 16 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.