Tuesday, October 20, 2026

कैसे लोग थे वे!

 


घटना सन 1980 के आसपास की है. मैं राजकीय महाविद्यालय सिरोही में हिंदी का प्राध्यापक था. उस समय मेरे प्राचार्य प्रो महेश कुमार भार्गव थे. मैं उनके प्रिय प्राध्यापकों में से एक था. और जहां तक मेरे मन में उनके प्रति सम्मान की बात है, केवल इतना लिखूंगा कि इस घटना के लगभग दो दशक बाद जब मैं उसी कॉलेज का प्राचार्य बना और मुझे भी उसी प्राचार्य कक्ष में उसी कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो मैं कुछ देर को ठिठक कर यह सोचता रहा कि क्या मैं उस कुर्सी पर बैठने के काबिल हूं जिस पर कभी प्रो महेश कुमार भार्गव जैसे महान प्राचार्य बैठा करते थे! आगे बात करूं इससे पहले दो बातें बताता चलूं. पहली यह कि उस समय सिरोही का यह महाविद्यालय बहुत बड़ा नहीं था. हम लगभग बीस संकाय सदस्य थे. दूसरी बात यह कि किसी भी कॉलेज का प्राचार्य होना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. उसके पास वैसी कोई ताकत और सुरक्षा नहीं होती है जैसी (नेताओं की तो बात छोड़ ही दीजिए) किसी छोटे-से प्रशासनिक अधिकारी के पास भी होती है. आप एक एसडीएम के कमरे में भी बगैर इजाज़त के नहीं घुस सकते जबकि किसी बड़े से बड़े कॉलेज के प्राचार्य के कक्ष में कोई भी विद्यार्थी (या अभिभावक, या नागरिक) कभी भी घुस सकता है. यह प्राचार्य की ही सामर्थ्य है कि वह इस तरह के सुरक्षा विहीन माहौल में रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है.

अब मैं अपनी मूल बात पर लौटता हूं.
हमारे कॉलेज के विद्यार्थियों ने किसी बात पर हड़ताल कर दी थी और वे कॉलेज के बाहर धरना दिये हुए थे. दिसंबर का महीना था. सर्दी अपने पूरे यौवन पर थी. हम लोग भी खाना खाकर रजाई में घुस चुके थे. शायद रात के आठ-साढ़े आठ बजे का समय था. मेरी डोरबेल बजी. इतनी रात गए, इस ठण्ड में कौन आया होगा? यह सोचते हुए दरवाज़ा खोला तो पाया कि सामने प्राचार्य भार्गव साहब खड़े हैं. मैं कुछ कहूं उससे पहले ही वे बोले, "डीपी, कपड़े बदल कर बाहर आ". फिर अपनी कार की तरफ मुंह कर उन्होंने श्रीमती भार्गव को आवाज़ दी और कहा कि वे मेरे यहां मेरी पत्नी के साथ बैठें. उस ज़माने में प्राचार्य का जिस तरह का सम्मान हम लोगों के मन में हुआ करता था उसके अनुरूप कुछ भी पूछने का तो सवाल था ही नहीं. मैंने जल्दी से कपड़े बदले और बाहर आकर भार्गव साहब की कार में बैठ गया. न वे कुछ बोले और न मैंने कुछ पूछा. कार सीधे हमारे कॉलेज के बाहर जाकर रुकी. हड़ताली लड़के लोग कुछ आंच वगैरह जलाकर वहां जमे हुए थे. भार्गव साहब कार से उतरे, उनके साथ-साथ मैं भी उतरा. सीधे विद्यार्थियों के पास गए और बोले, "तुम लोगों के पास सर्दी से बचाव का क्या इंतज़ाम है?” ज़ाहिर है कि उनके पास कोई ख़ास इंतज़ाम नहीं था. भार्गव साहब ने कहा, “अभी हम टेण्ट हाउस जाते हैं और तुम लोगों के लिए गद्दे रज़ाई भिजवाते हैं”. हम दोनों कार में बैठे और चले शहर के इकलौते टेण्ट हाउस की तरफ. रास्ते में मेरी जिज्ञासा को भांप भार्गव साहब बोले, “देखो डीपी, ये हैं तो हमारे ही बच्चे! इन्हें हम ठण्ड में कैसे ठिठुरने दे सकते हैं?"
टेण्ट हाउस से उनके लिए पर्याप्त गद्दे-रजाई भिजवा दिए गए.
अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है, फिर भी कह रहा हूं कि अगली सुबह जब प्राचार्य भार्गव साहब कॉलेज के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो जो विद्यार्थी बीते कल प्राचार्य मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे वे ही उनके लिए मालाएं लिए खड़े थे और नारे लगा रहे थे- प्राचार्य जी ज़िंदाबाद!
एक ज़माना वो भी था!


 


स्मृति शेष: रमेश चंद्र भार्गव

 


अभी कुछ ही दिन पहले यह दुखद सूचना मिली कि हमारे एक पुराने आत्मीय श्री रमेश चंद्र भार्गव जी का निधन हो गया. इस सूचना से जैसे यादों का एक पिटारा ही खुल गया.

असल में श्री भार्गव साहब सिरोही में, जहां मैं लगभग 25 बरस रहा, हमारे पड़ोसी और मित्र थे. वे उस समय सिरोही में खनन अभियंता (माइनिंग इंजीनियर) थे और उसी शांति नगर कॉलोनी में रहते थे जहां हम लोग भी एक किराये के मकान में रहते थे. भार्गव साहब भी किराये के घर में ही रहते थे. भार्गव साहब का और मेरा घर आमने-सामने था, एकदम आमने-सामने तो नहीं, बस इतनी दूरी पर कि पैदल जाएं तो तीन मिनिट में पहुंच जाएं. शांति नगर सिरोही की नई बसी कॉलोनी थी और तब तक उसकी बसावट बहुत सघन नहीं हुई थी. जो भी लोग उस समय उस कॉलोनी में रहते थे, उन सभी में आपस में अच्छा मेल-जोल था. वैसे भी वह समय मेल जोल का था. लोग एक दूसरे के घर आते-जाते थे. अब सब कुछ बदल चुका है. शायद सिरोही में भी बदला होगा.
फिर दोहरा देता हूं कि बात सत्तर के दशक के उत्तरार्ध या अस्सी के दश के पूर्वार्द्ध की होगी, जब हम लोग एक ही कॉलोनी के वासी थे. यहां उनसे जुड़ी जो स्मृति साझा करना चाह रहा हूं उसकी पृष्ठभूमि बता देना ज़रूरी है.
मुझे उस समय भी पढ़ने का बहुत शौक था, बल्कि सच तो यह है कि तब ज़्यादा शौक था. अब तो उम्र ने उस शौक को बहुत क्षीण कर दिया है. और तब अपने इस शौक को पूरा करने की सुविधा भी भरपूर थी. मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी बहुत समृद्ध थी. केवल इतना ही नहीं, कॉलेज के और मेरे घर के बीच स्थित सारणेश्वर जी ज़िला पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध और व्यवस्थित था. मैं वहां से भी खूब किताबें ला-लाकर पढ़ लेता था. अपने कॉलेज की लाइब्रेरी पर तो पूरा हक़ था ही. अब जब मैं कम पढ़ पाता हूं तो अपने मन को यह कहकर भी दिलासा देता हूं कि मैंने पहले ही बहुत पढ़ लिया है. अरे, मैं बात तो भार्गव साहब की करना चाह रहा था, भटक गया? नहीं, भटका बिल्कुल नहीं हूं. उनसे मेरी ट्यूनिंग बैठने का सबसे बड़ा कारण यही था कि वे भी किताबों के और पढ़ने के शौकीन थे. लेकिन इतना कहकर मुझे संतोष नहीं हो रहा है. वे पढ़ने के भयंकर वाले शौकीन थे. ज़्यादा उचित तो यह कहना होगा कि अत्यंत भयंकर वाले शौकीन थे. और मैं उनके शौक का पोषण करने में समर्थ था. उन्हें पढ़ने का शौक था और मेरे पास किताबों की कमी नहीं थी. वे हर दूसरे तीसरे दिन मेरे पास आते और दो-चार किताबें पढ़ने के लिए ले जाते. यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि अब तक की ज़िंदगी में वैसा रुचिवान पाठक मुझे दूसरा कोई नहीं मिला. भार्गव साहब कैसे गंभीर और रुचिवान पाठक थे, इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जब वे कोई किताब मुझे पढ़कर लौटाते तो उस पर अपनी टिप्पणी भी अवश्य साझा करते. कहने का आशय यह है कि वे वाकई किताब पढ़ते और मन से पढ़ते थे.
एक बार का प्रसंग मेरे मानस पटल पर अमिट है. उसी को साझा करने के लिए मैंने यह भूमिका बनाई है. शाम को वे मेरे यहां आए, चाय वगैरह पी और फिर जाते-जाते बोले कि “डीपी, पढ़ने के लिए कुछ दे”. अजीब संयोग कि उस दिन मैं बहुत ग़रीब था. मुझे लगा कि मेरे पास ऐसी कोई किताब नहीं है जो मेरे ख़याल से उनकी रुचि की हो. मैंने उनसे कह भी दिया कि आपकी रुचि की कोई किताब आज मेरे पास नहीं है. फिर भी उन्होंने इसरार किया, कि कोई तो किताब होगी! मैंने अपनी अलमारी टटोली और उन्हें बताया कि आज तो एक ही किताब मेरे पास है, और इसमें आपकी कोई रुचि होगी नहीं. उन्होंने पूछा कौन-सी किताब है, तो मैंने बताया कि डॉ रामविलास शर्मा की 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी’ का पहला खण्ड मेरे पास है. मैं उन दिनों. एमए के विद्यार्थियों को भाषाविज्ञान पढ़ाता था. जिन्हें जानकारी नहीं हो उन्हें बताता चलूं कि एमए के पाठ्यक्रम में भाषा विज्ञान को सर्वाधिक नीरस माना जाता है. यह एक तरह से हमारा तकनीकी विषय है. भार्गव साहब ने कहा कि मैं उन्हें वही किताब दे दूं. मुझे लगा कि वे इसे उलट-पलटकर मुझे लौटा देंगे. लेकिन मेरा अनुमान एकदम ग़लत साबित हुआ. वे अगली सुबह ही मेरे पास आए और बोले कि रात भर में मैंने यह पूरी किताब पढ़ ली है और अब तुमसे इसे डिस्कस करने आया हूं.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिस तरह उन्होंने उस किताब को समझा उस तरह से तो मैंने भी नहीं समझा था, हालांकि वह मेरा विषय था. उन्होंने मुझसे आग्रह करके उस किताब के शेष दो खण्ड भी मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी से मंगवाए और उन्हें भी उतनी ही दिलचस्पी से पढ़ा. पढ़ने के प्रति उनके अनुराग का यह तो एक प्रसंग है. उनकी रुचि दुनिया के हर विषय में थी और किताबों के मामले में वे सर्वभक्षी थे. ऐसे कई और प्रसंग मेरे स्मृति कोष में जमा हैं. लेकिन अभी इतना ही.
ऐसे विद्वान, ज्ञान पिपासु, और शानदार दोस्त के न रहने के समाचार से कितना व्यथित हूं, कल्पना की जा सकती है.
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

वे छवि निर्माण तकनीक के सफल प्रयोक्ता थे!

 कोई तो कारण होगा कि अस्सी के दशक का यह प्रसंग अब याद आ रहा है!

लगभग चालीस बरस कम नहीं होते हैं स्मृति के धूमिल हो जाने के लिए. और शायद हो ही गई थी, लेकिन अब जैसे यादों पर जमी धूल हट गई है और सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद आ रहा है. छोड़िये इस बात को कि यह बात अब ही क्यों याद आ रही है! आप तो बात का आनंद लीजिए!
मैंने अपनी नौकरी का बहुत बड़ा समय पश्चिमी राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे सिरोही के राजकीय महाविद्यालय में बिताया. जो लोग इस कस्बे को नहीं जानते उन्हें बता दूं कि राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल इसी सिरोही ज़िले में स्थित है. मेरा महाविद्यालय राजस्थान के पुराने और ऐसे महाविद्यालयों में से एक था जिसे कम से कम वे लोग बहुत आदर से स्मरण करते हैं जो वहां काम कर चुके हैं. असल में पूरा पश्चिमी राजस्थान ही बहुत शांत इलाका है इसलिए वहां स्थित यह महाविद्यालय प्रांत के अन्य कई इलाकों के बहुत अशांत और कुख्यात महाविद्यालयों से बहुत भिन्न था और है. मैंने क्योंकि वहां अपनी नौकरी के बीस से ज़्यादा साल गुज़ारे मेरे मन में इस महाविद्यालय के प्रति बहुत गहरा अनुराग है और यहां की अनेक खट्टी मीठी यादें मेरे स्मृति कोष में जमा हैं.
आज मैं जिस याद को साझा कर रहा हूं उसका संबंध एक हद तक इस बात से भी है कि मैं वहां हिंदी का व्याख्याता था. हमारे कॉलेजों में हिंदी व्याख्याता को पढ़ाने के अलावा अन्य बहुत सारे कामों के लिए भी अपरिहार्य और उपयुक्त माना जाता है. यह वृत्तांत पढ़ने वालों को भले ही इन कामों के बारे में पढ़कर कुछ अजीब लगे, लेकिन यह एक यथार्थ है कि हिंदी व्याख्याता को प्राचार्य का भाषण, संस्था की वार्षिक रिपोर्ट, अभिनंदन पत्र, शोक संदेश लिखने जैसे अनेक काम करने के लिए एकमात्र योग्य व्यक्ति माना जाता है. इन कामों में ऐसे ही और भी अनेक काम जुड़ते रहते हैं. कहना अनावश्यक है कि ये सारे काम मैंने भी किए हैं. मैं जिस समय को स्मरण कर रहा हूं उस समय मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य एक दबंग, अति उत्साही, महत्वाकांक्षी, आत्म प्रशंसा प्रिय व्यक्ति थे. उन्हें इस बात में ख़ास दिलचस्पी थी कि उनके महाविद्यालय की ख़बरें हर रोज़ अखबारों में छपे. और महाविद्यालय की ख़बरों में सबसे महत्वपूर्ण होता ख़ुद उन प्राचार्य जी का नामोल्लेख. अगर वह होता तो उन्हें ख़बर काम की लगती और अगर उनका नाम उस ख़बर में नहीं होता तो फिर वह ख़बर, चाहे उसमें महाविद्यालय की कितनी भी प्रशंसा क्यों न हो, बेकार लगती. उन्होंने मुझे महाविद्यालय का पीआरओ (जन सम्पर्क अधिकारी) बना दिया और मेरा काम यही था कि हर रोज़ कई अखबारों को ऐसी ख़बरें लिखकर भेजूं जिनमें अनिवार्यत: प्राचार्य जी का नामोल्लेख हो. स्वीकार करता हूं कि अध्यापन के अलावा यह काम भी मैंने निष्ठा से किया. अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो इसमें मुझे कोई ख़ास बुराई भी नज़र नहीं आती. कुल मिलाकर तो मैं अपने महाविद्यालय की छवि का ही निर्माण कर रहा था!
तो, ऐसे ही एक दिन प्राचार्य जी ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया और कहा कि मैं अखबारों को एक ख़बर उनके हवाले से भेजूं. ख़बर यह कि प्राचार्य अमुक जी ने बताया है कि हम अपने कॉलेज में 36 प्रतिशत पर एडमिशन देते हैं लेकिन हमारे कॉलेज का रिज़ल्ट अस्सी प्रतिशत रहता है. याद दिलाता चलूं कि न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत 36 होता है. वे दिन बहुत मारा मारी के नहीं थे इसलिए कुछ विद्यार्थियों को इस न्यूनतम प्रतिशत पर भी प्रवेश मिल जाता था. उनके इस बयान की विसंगति यह थी कि इस न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत और परिणाम के बीच कोई रिश्ता नहीं था. अगर रिश्ता ढूंढना ही चाहें तो यह बनता कि हम शत प्रतिशत उत्तीर्ण विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उनमें से अस्सी प्रतिशत उत्तीर्ण होते हैं. ज़ाहिर है कि यह एक नकारात्मक बात होती. मैंने प्राचार्य जी के सामने अपनी आपत्ति रखी, लेकिन उन्होंने इस आपत्ति को यह कहते हुए सिरे से खारिज़ कर दिया कि आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख दें. मैंने लिख दिया और जैसा प्रत्याशित था, अगले दिन कुछ अखबारों में यह ख़बर छप भी गई!
मैं किसी काम से बाज़ार गया तो अनायास एक अभिभावक से मुलाकात हो गई. उन्होंने कहा कि आपके प्राचार्य जी तो बहुत डायनैमिक हैं! मैंने कहा कि कैसे, तो वे बोले, आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा? अखबार ने लिखा है कि कैसे उन्होंने इस कॉलेज को इतना अच्छा बना दिया है कि छत्तीस परसेंट वाले अस्सी परसेंट तक जा पहुंचे हैं! मैं समझ गया कि उन अभिभावक जी को यह समझ में आया था कि हम बहुत औसत बुद्धि वाले विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उन्हें बहुत काबिल बना देते हैं. मेरे प्राचार्य जी शायद यही तो चाहते थे. अपने ज़माने में वे भी छवि निर्माण के उस्ताद थे!
और जब यह प्रसंग याद आया तो इससे जुड़ा एक और प्रसंग कैसे भूल सकता हूं? विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के परिणाम आने लगे थे. शायद बीए फाइनल का परिणाम आया था. यह परीक्षा देने वाले हमारे महाविद्यालय के पचास प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए थे. प्राचार्य जी ने मुझे बुलाया और आदेश दिया कि मैं इस परिणाम की एक ख़बर बनाकर अखबारों को भिजवा दूं. मैंने ख़बर बना कर उसे टाइप करवाया और जब वह ख़बर प्राचार्य जी के पास हस्ताक्षर के लिए पहुंची तो एक बार फिर मुझे बुलवाया गया. प्राचार्य जी ने बड़े प्यार से फरमाया, "डॉ साहब, इस पचास प्रतिशत को पैंसठ प्रतिशत कर दीजिए!" मैंने विनम्रता से कहा कि सर, यह तो ठीक नहीं होगा. हम ग़लत बयानी कैसे कर सकते हैं? मेरी आपत्ति से एकदम अप्रभावित प्राचार्य जी ने आदेशात्मक स्वर में कहा, "मैं जैसा कह रहा हूं वैसा कर दीजिए!" फिर अपने स्वर को मुलायम करते हुए बोले, "डॉ साहब, कौन चैक कर रहा है कि वास्तविक रिज़ल्ट क्या रहा है! आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख कर भेज दीजिए!" अगले दिन यह ख़बर भी छप गई और अभिभावकों ने फिर महसूस किया कि इस बार उनके शहर के महाविद्यालय में जो प्राचार्य आए हैं, वे बहुत कर्मठ हैं!
तब का अनुभव मुझे अब याद आ रहा है और मैं समझ पा रहा हूं कि छवि निर्माण ऐसे ही होता है! कोई नहीं देखता कि सच्चाई क्या है!
सब वही देखते हैं जो यत्नपूर्वक उन्हें दिखाया जाता है!

Saturday, October 17, 2026

अब कभी नहीं आएगा यश भाई का फ़ोन!

 


विश्वास नहीं होता कि आज डॉ. यश गोयल को स्मृतिशेष हुए पूरा एक साल बीत गया है. अब भी जैसे यह आस बनी रहती है कि कभी मोबाइल घनघनाएगा और हम बतियाने लगेंगे. लेकिन अब यह आस कभी पूरी नहीं होगी. यही जीवन का कटु सत्य है!
डॉ. यश गोयल से मेरा रिश्ता बहुत पुराना था. अस्सी के दशक में पहली बार उनसे मिला था. अब भी याद है, हमारी यह मुलाकात जालोर में हुई थी. राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई आयोजन था. मेरे गुरु डॉ. प्रकाश आतुर तब अकादमी के अध्यक्ष बने ही थे. यश जी उन दिनों शौकिया पत्रकारिता किया करते थे. उन्होंने डॉ. आतुर का एक साक्षात्कार किया था, जो शायद अकादमी का अध्यक्ष बनने के बाद उनका पहला साक्षात्कार था. उसके बाद यश जी से जो रिश्ता बना, वह लगातार गहरा और मजबूत होता गया.
वे जोधपुर में रहते थे और पारिवारिक कारणों से हमारा भी जोधपुर आना-जाना खूब होता था. संयोग यह था कि वहां उनके और हमारे घरों के बीच पैदल मुश्किल से दस मिनट की दूरी थी. सो, जब भी जोधपुर जाना होता, मैं उनके घर जरूर जाता. तब अम्मा और बाबूजी भी थे. पत्नी और मैं यश जी के विवाह में भी शामिल हुए थे. इस तरह हमारा रिश्ता केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा, उसमें परिवार भी शामिल होता गया.
वह चिट्ठियों का जमाना था. मुलाकात नहीं हो पाती तो चिट्ठियों के जरिए संवाद बना रहता. फिर वे पोस्ट डॉक्टोरल शोध के लिए अमेरिका चले गए. वहां से भी उनके पत्र आते रहे. अमेरिका में रहते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा और फ्रांज काफ्का पर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी. भारत लौटकर वे सक्रिय पत्रकारिता की दुनिया में आ गए. अनेक संस्थानों में काम किया, लेकिन हमारे बीच का संपर्क हमेशा बना रहा.
इसी बीच उन्होंने कहानियां और व्यंग्य लिखना भी शुरू कर दिया. अपने लेखन को लेकर वे हमेशा उत्साहित रहते थे और खूब छपे भी. अपनी किसी रचना को लेकर मन में कोई शंका उठती, तो मुझे फोन कर लेते. रचना पर बात शुरू होती और कब फिसलकर जिंदगी की बातों तक पहुंच जाती, पता ही नहीं चलता. हम अपने सुख-दुख साझा करते. उन बातचीतों में साहित्य भी होता था और जीवन भी, विचार भी होते थे और एक-दूसरे की फिक्र भी.
लेकिन अपनी परेशानियों के बारे में बात करने में वे बहुत संकोची थे. इतनी निकटता के बावजूद, और मेरे बार-बार पूछने पर भी, उन्होंने कभी अपनी रुग्णता के बारे में खुलकर बात नहीं की. उनकी गंभीर बीमारी के समाचार मुझे दूसरे सूत्रों से ही मिले. दरअसल, वे किसी को कष्ट नहीं देना चाहते थे. इसके उलट, अगर उन्हें आपके किसी कष्ट का पता चल जाए, तो उसके निवारण तक चैन से नहीं बैठते थे.
मुझ पर तो उनके अनेक उपकार हैं. जब भी कोई संकट आया, मैंने निस्संकोच उन्हें बताया और उन्होंने उसी तत्परता से मेरे संकट को दूर करने की कोशिश की. वे केवल आश्वासन देने वाले मित्र नहीं थे, जरूरत पड़ने पर आगे बढ़कर मदद करने वाले व्यक्ति थे. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसे बहुत-से प्रसंग याद आते हैं. एक-एक प्रसंग के साथ उनकी आत्मीयता, तत्परता और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव फिर से आंखों के सामने आ खड़ा होता है.
अपने लेखन को लेकर वे जितने संजीदा थे, अपने समकालीनों के लेखन को प्रोत्साहित करने के मामले में भी उतने ही उदार और सक्रिय थे. दूसरों की रचनात्मक उपलब्धियों को पहचानना, उनकी सराहना करना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना कोई छोटी बात नहीं है. लेखकों की दुनिया में, जहां कभी-कभी प्रशंसा भी उदारता मांगती है, यश जी इस मामले में बहुत खुले दिल के थे.
मैं उन्हें एक लेखक और एक मनुष्य, दोनों रूपों में याद करता हूं. व्यक्ति के रूप में वे विलक्षण थे. परदुखकातर. दूसरों के दुख से व्यथित होने और उसे दूर करने के लिए अपनी ओर से कुछ करने की बेचैनी उनमें थी. मुझे लगता है कि यही मानवीय संवेदना उनके लेखन को भी वजन देती थी. उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए और उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए यह बात बार-बार महसूस होती है कि लेखक की असली पहचान केवल उसकी प्रकाशित रचनाओं से नहीं बनती, उसके मनुष्य होने से भी बनती है.
उनका अंतिम समय बहुत कष्ट में बीता. इतना अधिक कष्ट कि मुझे बार-बार साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियां याद आती रहीं:
गुरेज़ का नहीं कायल हयात से लेकिन,
जो सच कहूं तो मुझे मौत भी नागवार नहीं!
आज ही के दिन, पिछले बरस, वे हम सबको छोड़कर दूसरी दुनिया में चले गए. लेकिन मेरा मन मानने को तैयार नहीं कि यश भाई का संसार अब समाप्त हो गया है. मुझे भरोसा है कि वहां भी वे नई कहानियों के बारे में सोच रहे होंगे, वहां के हालात पर व्यंग्य रच रहे होंगे, उस दुनिया के समाचार हम तक पहुंचाने की योजनाएं बना रहे होंगे और अपने आसपास के जीवों के संकट दूर करने में सक्रिय होंगे. उनकी कल्पनाशीलता, उनकी जिज्ञासा, उनकी लेखकीय बेचैनी और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव भला मृत्यु के साथ कैसे समाप्त हो सकता है!
यश भाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरी जिंदगी में वे हमेशा रहेंगे. और मुझे विश्वास है कि मेरी तरह बहुत-से लोगों की जिंदगी में भी उनकी जगह कोई नहीं ले सकेगा. कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं पड़ते, कुछ आवाजें स्मृति में लगातार सुनाई देती रहती हैं और कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे भीतर अपनी जगह बनाए रखते हैं. यश भाई मेरे लिए ऐसे ही लोगों में से एक हैं.
उनकी स्मृति को सादर नमन!

एस भाग्यम शर्मा: जीवन की खुली खिड़कियां

 


कुछ लोग अपनी उम्र के साथ चलते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो अपनी उम्र को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर देते हैं. भाग्यम एम. शर्मा दूसरी तरह के लोगों में हैं. उम्र के आठवें दशक में पहुँच चुकी इस वरिष्ठ लेखिका और अनुवादक से जब जयपुर के किसी साहित्यिक आयोजन में मुलाकात होती है, तो सहज ही लगता है कि उम्र के बारे में हमारी बनाई हुई धारणाएँ कितनी रूढ़ और भ्रांत हैं. उम्र बढ़ने के साथ जीवन की सक्रियता कम होनी ही चाहिए, नए काम करने की इच्छा मंद पड़ ही जानी चाहिए और कुछ नया सीखने का उत्साह तो लगभग समाप्त हो ही जाना चाहिए. भाग्यम जी को देखकर इन धारणाओं पर अविश्वास होने लगता है.

जयपुर के साहित्यिक आयोजनों में उनसे प्रायः भेंट हो जाती है. उनके व्यक्तित्व में एक सहज आत्मीयता है. न कोई अतिरिक्त आडंबर, न अपने अनुभवों और उपलब्धियों का प्रदर्शन और न ही वरिष्ठता का ऐसा दबाव, जो सामने वाले को संकोच में डाल दे. वे मिलती हैं तो एक ऐसे व्यक्ति की तरह, जिसके भीतर जीवन के प्रति उल्लास और उत्सुकता अब भी बने हुए हैं. उनकी सहजता और सरल हृदयता उन्हें अपने आसपास के लोगों से जोड़ती है. मैंने प्रायः उन्हें युवा लेखक-लेखिकाओं से घिरा हुआ ही देखा है. साहित्य में वरिष्ठता का एक अर्थ यह भी है कि व्यक्ति अपने अनुभवों से दूसरों को समृद्ध करे, लेकिन अपने व्यक्तित्व को इतना सहज बनाए रखे कि लोग उसके निकट आने में संकोच न करें. भाग्यम जी में यह गुण विशेष रूप से दिखाई देता है.

उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष तमिल से हिंदी में किया गया उनका विपुल अनुवाद-कार्य है. दो भाषाओं के बीच पुल बनाना केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में पहुँचा देना नहीं है. भाषा के साथ एक समाज की स्मृतियाँ, सांस्कृतिक मान्यताएँ, संवेदनाएँ और जीवन को देखने का विशिष्ट ढंग भी जुड़ा होता है. अनुवादक का दायित्व है कि वह इन सबको समझे और दूसरी भाषा में इस तरह व्यक्त करे कि मूल रचना की आत्मा सुरक्षित रहे और नए पाठक के लिए उसका अर्थ-संसार भी खुल सके.

भारत की भाषायी विविधता हमारी बड़ी सांस्कृतिक संपदा है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ही देश में रहने के बावजूद हम अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से बहुत कम परिचित होते हैं. हिंदी का पाठक जब तमिल साहित्य की किसी महत्त्वपूर्ण रचना तक पहुँचता है, तो उसके पीछे अनुवादक का श्रम, धैर्य और संवेदनशीलता होती है. इस दृष्टि से भाग्यम जी का काम केवल साहित्यिक कर्म नहीं, बल्कि भाषाओं और संस्कृतियों को निकट लाने वाला प्रयास भी है.

अनुवाद के लिए दोनों भाषाओं पर अधिकार आवश्यक है, लेकिन केवल भाषायी दक्षता पर्याप्त नहीं होती. इसके लिए धैर्य, सूक्ष्म दृष्टि और मूल रचना के भीतर उतरने की क्षमता चाहिए. कई बार अनुवादक को अपनी भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और मूल भाषा के विशिष्ट मुहावरे के बीच संतुलन बनाना पड़ता है. यह ऐसा श्रम है, जिसकी कठिनाई पाठक को अक्सर दिखाई नहीं देती. वह अनूदित रचना पढ़ता है, लेकिन उसके सहज पाठ के पीछे लगी मेहनत का उसे अहसास तक नहीं होता.

भाग्यम जी का लेखकीय संसार अनुवाद तक सीमित नहीं है. वे हिंदी में कहानियाँ लिखती हैं, लघुकथाएँ रचती हैं और प्रेरक लेखों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करती हैं. इस तरह उनका साहित्यिक व्यक्तित्व ग्रहण करने और देने, दोनों की प्रक्रियाओं से निर्मित हुआ है. एक ओर वे तमिल साहित्य की रचनात्मक उपलब्धियों को हिंदी के पाठकों तक पहुँचाती हैं, दूसरी ओर अपने अनुभवों, विचारों और संवेदनाओं को हिंदी में अभिव्यक्त करती हैं. यह दोतरफा संवाद उनके साहित्यिक जीवन को व्यापक अर्थ देता है.

इन साहित्यिक उपलब्धियों से इतर उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष ऐसा है, जो मुझे विशेष रूप से प्रभावित करता है. उन्होंने सत्तर वर्ष की आयु पार करने के बाद कार चलाना सीखा. यह बात सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसके भीतर जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण का एक महत्त्वपूर्ण संकेत छिपा है. हमारे समाज में एक निश्चित उम्र के बाद व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी गतिविधियाँ सीमित कर ले, नए प्रयोगों से बचे और धीरे-धीरे अपनी पुरानी उपलब्धियों के सहारे जीवन बिताने लगे. कई बार व्यक्ति स्वयं भी इन अपेक्षाओं को अपनी नियति मान लेता है और अपनी इच्छाओं को यह कहकर टाल देता है कि अब इस उम्र में क्या नया करना!

भाग्यम जी ने ऐसी धारणाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. कार चलाना सीखने का उनका निर्णय केवल एक नया कौशल अर्जित करना नहीं था. उसमें अपनी स्वतंत्रता का विस्तार करने, अपनी सुविधा के लिए दूसरों पर निर्भरता कम करने और जीवन को अधिक सक्रिय बनाने की इच्छा भी शामिल थी. इस निर्णय का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि अब वे जयपुर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर स्वयं कार चलाकर साहित्यिक समारोहों में आती हैं. यातायात की अव्यवस्था, लगातार बजते हॉर्न और अचानक सामने आ जाने वाले वाहनों के बीच गाड़ी चलाना आसान नहीं है. ऐसे में उनका इस तरह आयोजनों में पहुँचना मुझे उनकी जीवंतता और आत्मनिर्भरता का सुंदर प्रतीक लगता है.

मैं नहीं जानता कि कार चलाना सीखते समय उन्होंने मन में क्या सोचा होगा या पहली बार जयपुर की सड़कों पर स्वयं गाड़ी लेकर निकलते हुए उन्हें कैसा अनुभव हुआ होगा. लेकिन उनका यह सहज-सा व्यवहार अपने आप में एक संदेश बन जाता है. जीवन में नया कुछ करने के लिए किसी विशेष उम्र का इंतजार नहीं करना चाहिए और न ही किसी उम्र के आ जाने पर अपने लिए नए कामों के दरवाजे बंद कर लेने चाहिए. उम्र हमारी जीवन-यात्रा का एक तथ्य है, उसकी संभावनाओं की अंतिम सीमा नहीं.

कार चलाना सीखने के साथ ही उन्होंने कंप्यूटर का इस्तेमाल करना भी सीखा और उसमें इतनी निपुणता अर्जित कर ली कि अब अपना सारा काम स्वयं कंप्यूटर पर करती हैं. यह भी उसी सीखने की इच्छा का विस्तार है, जो उन्हें नए समय और उसकी सुविधाओं से जोड़ती है. वे अपने लिए तकनीक के दरवाजे बंद नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने जीवन का उपयोगी हिस्सा बना लेती हैं.

भाग्यम जी ने अपनी उम्र को कभी अपनी ढाल नहीं बनाया. हमारे यहाँ उम्र कई बार अनुभव की पहचान होने के बजाय विशेष रियायत पाने का साधन बन जाती है. व्यक्ति चाहता है कि उसकी उम्र को देखते हुए उससे कम अपेक्षा की जाए और उसकी निष्क्रियता को सहज मान लिया जाए. भाग्यम जी के व्यक्तित्व में ऐसी किसी मानसिकता का आग्रह दिखाई नहीं देता. वे अपने काम करती हैं, साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेती हैं और अपनी रुचियों को सक्रिय बनाए रखती हैं.

उनके जीवन का एक और पक्ष मुझे बहुत प्रभावित करता है. वे जयपुर में अकेली रहती हैं. अकेलापन बहुतों को आत्मदया का शिकार बना देता है. हम दूसरों से अपेक्षाएँ करने लगते हैं और उनके पूरा न होने पर भुनभुनाते रहते हैं. लेकिन भाग्यम जी टाइम बैंक जैसी गतिविधि से जुड़कर अपनी क्षमता भर दूसरों के जीवन को सुगम बनाने में लगी रहती हैं. मैं इसे बहुत बड़ी बात मानता हूँ. अपने अकेलेपन को दूसरों के लिए उपयोगी होने की संभावना में बदल देना आसान नहीं है. भाग्यम जी की सक्रियता में मुझे यही सकारात्मक जीवन-दृष्टि दिखाई देती है.

यह सब लिखते हुए मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सक्रिय बने रहने का अर्थ हर समय व्यस्त रहना या अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करते रहना नहीं है. जीवन की सार्थकता इस बात से भी तय होती है कि हमारे भीतर जीने की इच्छा कितनी प्रबल है, हम अपने आसपास की दुनिया में कितनी रुचि लेते हैं और दूसरों से हमारा संबंध कितना जीवंत है. भाग्यम जी की आत्मीयता और सरल हृदयता उनके व्यक्तित्व के उतने ही महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, जितना उनका साहित्यिक कर्म और उनकी आत्मनिर्भरता. स्वयं उन्होंने मुझे अनगिनत बार सपत्नीक अपने यहाँ आने और उनके हाथों से बनाए दक्षिण भारतीय व्यंजनों का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया है. सोशल मीडिया पर प्रायः उनके आतिथ्य की सूचनाएँ मिलती रहती हैं. उनके लिए लोगों से मिलना-जुलना केवल औपचारिक सामाजिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का आनंद लेने और दूसरों के साथ अपने सुख बाँटने का एक तरीका है. उनकी जीवंतता का यह पक्ष भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है.

उन्हें अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है. किसी भी लेखक के लिए उसके काम की सार्वजनिक स्वीकृति प्रसन्नता और संतोष का विषय होती है. पुरस्कार बताते हैं कि किसी व्यक्ति के योगदान को पहचाना गया है, लेकिन किसी लेखक के व्यक्तित्व का पूरा मूल्यांकन केवल पुरस्कारों की सूची से नहीं किया जा सकता. यह भी देखना होता है कि अपने काम के साथ-साथ उसने कैसा मनुष्य होना चुना है और अपने आसपास के लोगों से कैसा संबंध बनाया है.

भाग्यम जी के मामले में मुझे उनकी उपलब्धियों के साथ उनकी सहजता भी याद रहती है. वे उस तरह की वरिष्ठ लेखिका नहीं हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से औपचारिकता का वातावरण बन जाए. उनसे मिलना साहित्यिक आयोजनों की उस मानवीय ऊष्म का हिस्सा है, जिसके कारण ऐसे आयोजन केवल मंच, वक्तव्य, विमर्श और तालियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के अनुभवों से परिचित होने का अवसर भी देते हैं.

मुझे इस बात का गर्व है कि भाग्यम जी मुझे अपना विश्वासपात्र मानती हैं. अपनी छोटी-बड़ी जिज्ञासाएँ और समस्याएँ वे मुझसे साझा करती रहती हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि वे मेरी सलाह पर भरोसा करती हैं. ऐसे लोग कम ही मिलते हैं, जो दूसरों की राय को इतने खुले मन से स्वीकार करें. यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जो उनकी सहजता के साथ-साथ उनके खुलेपन को भी सामने लाता है.

साहित्य का संबंध अंततः मनुष्य से है. वह हमें जीवन को अधिक ध्यान से देखने, दूसरों के अनुभवों को समझने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देता है. भाग्यम जी का साहित्यिक कर्म हमें भाषाओं के पार देखने की दृष्टि देता है और उनका जीवन हमें उम्र के पार देखने का साहस देता है. उनके व्यक्तित्व में साहित्य और जीवन के बीच कोई अस्वाभाविक दूरी दिखाई नहीं देती. जिस जिज्ञासा और खुलेपन की अपेक्षा हम एक रचनाकार से करते हैं, वे उनके रोजमर्रा के व्यवहार में भी दिखाई देते हैं.

उम्र का बढ़ना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन उम्र के साथ जिज्ञासा, उत्साह और आत्मीयता का क्षीण हो जाना कोई अनिवार्यता नहीं है. कुछ लोग अपनी उपस्थिति से यह भरोसा दिलाते हैं कि बीते हुए वर्षों का हिसाब रखने के बजाय आने वाले दिनों के लिए भी उत्सुक रहा जा सकता है. भाग्यम एम. शर्मा जी को जयपुर के किसी साहित्यिक आयोजन में देखता हूँ, तो उनके बारे में यही विचार मन में आता है. वे केवल तमिल और हिंदी के बीच सेतु बनाने वाली वरिष्ठ अनुवादक नहीं हैं, न केवल कहानियों, लघुकथाओं और प्रेरक लेखों की रचनाकार हैं. वे अपने जीवन से यह भी बताती हैं कि सक्रियता की कोई एक निर्धारित उम्र नहीं होती और आत्मनिर्भरता का आनंद किसी भी उम्र में पाया जा सकता है.

अगली बार जयपुर के किसी साहित्यिक समारोह में उनसे मुलाकात होगी, तो संभव है कि मैं उनके अनुवादों, कहानियों या किसी नए लेख के बारे में बात करूँ. लेकिन मन के किसी कोने में उनकी वह छवि भी बनी रहेगी, जिसमें उम्र के आठवें दशक में पहुँची एक लेखिका अपनी कार स्वयं चलाकर आती है और अपनी सहज मुस्कान के साथ साहित्यिक दुनिया की हलचल में शामिल हो जाती है. यह दृश्य किसी उपदेश से अधिक प्रभावशाली है. यह हमें चुपचाप याद दिलाता है कि जीवन से विदा लेने की तैयारी में जुट जाने के बजाय, जब तक संभव हो, उसमें पूरी तरह रमे रहना चाहिए.

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Friday, October 9, 2026

सूरज पालीवाल : स्मृति में बसे एक आत्मीय


बहुत दिनों से याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि उनसे पहली मुलाकात कब, कहां और कैसे हुई थी, लेकिन कुछ भी याद नहीं आ रहा है. मैं उम्र के जिस मुकाम पर पहुंच गया हूं, वहां ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है. इतनी दूर की तो छोड़िए, बहुत नज़दीक की, बल्कि सामने की बातें भी कहां याद रहती हैं. स्मृति भी शायद अपनी सुविधा से काम करती है. वह बहुत कुछ बचाकर रखती है और बहुत कुछ, जाने क्यों, धीरे-धीरे धुंधला देती है. कुछ अनुमान लगाता हूं तो जो धुंधली-सी तस्वीर उभरती है, उसके अनुसार शायद अस्सी के दशक में उनसे पहली मुलाकात हुई होगी. उनसे अर्थात डॉ. सूरज पालीवाल से.

वे तब जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे और मैं उनसे लगभग दो सौ किलोमीटर दूर सिरोही नाम के एक छोटे-से कस्बे के राजकीय महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक था. वह समय राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के लिहाज से अनुपम था. राजस्थान साहित्य अकादमी एक के बाद एक कार्यक्रम किए जा रही थी और अलग-अलग जगहों पर बहुत-सी संस्थाएं अपने-अपने आयोजन भी करती थीं. जोधपुर में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद ऐसी ही एक संस्था थी, जो श्री नेमिचंद्र जैन ‘भावुक’ (अब स्वर्गीय) के वत्सल व्यक्तित्व की छांह में पूरे पश्चिमी राजस्थान में साहित्यिक आयोजन करती रहती थी.

इन सारे आयोजनों का एक अतिरिक्त लाभ यह था कि लेखकों को मिलने-जुलने के खूब अवसर मिलते थे और इन्हीं अवसरों के कारण उनके बीच आत्मीय रिश्ते बनते थे. तब के साहित्यिक आयोजन कम खर्च वाले, कम संसाधनों वाले और कम चमक-दमक वाले हुआ करते थे, लेकिन उनमें एक ऐसी गर्माहट होती थी जो अब शायद दुर्लभ हो गई है. वहां रचनाकार मुक्त भाव से सहजीवन का आनंद लेते हुए साहित्यिक चर्चाएं करते थे. किसी एक बड़े हॉल में गद्दे बिछे हुए हैं और बीस-तीस-चालीस-पचास लेखक उन पर लेटे-अधलेटे हुए गपशप कर रहे हैं. कोई अपनी नई कविता सुना रहा है, कोई किसी कहानी पर बहस कर रहा है, कोई किसी लेखक की नकल उतार रहा है और कोई बस चुपचाप दूसरों की बातें सुनकर आनंदित हो रहा है. साहित्य वहां केवल मंच पर नहीं होता था, जीवन में भी होता था. यह अनिर्वचनीय सुख था, जिसे बाद की सुविधा-संस्कृति ने हमसे जाने-अनजाने छीन लिया.

तो ऐसे ही किसी आयोजन में डॉ. सूरज पालीवाल से पहली मुलाकात हुई होगी. जोधपुर में, या बाड़मेर में, या जैसलमेर में या मेरे अपने सिरोही में. निश्चित रूप से कह पाना अब संभव नहीं है. तब हम दोनों युवा थे. (वे आज भी युवा हैं.) और शायद युवावस्था की यही खूबी होती है कि वह परिचयों को बहुत जल्दी आत्मीयताओं में बदल देती है.

एक संयोग यह भी बना कि उन दिनों मेरा जोधपुर जाना खूब होता था. तीन कारण थे. एक तो हम सिरोही वालों के लिए निकटतम आकाशवाणी केंद्र जोधपुर था, अत: प्रसारण के लिए वहां से निमंत्रण आते रहते थे. दूसरा यह कि पहले मेरा बेटा और फिर बेटी जोधपुर के एम.बी.एम. इंजीनियरिंग कॉलेज (अब विश्वविद्यालय) के विद्यार्थी रहे, तो उनसे मिल लेने, बल्कि उन्हें संभालने का चाव रहता. और तीसरा, मेरा ससुराल भी जोधपुर में ही था, इसलिए पारिवारिक कारणों से भी वहां जाना होता रहता था.

इन सब में एक बात और जोड़ दूं तो बात आगे बढ़े. मेरा ससुराल, बच्चों का कॉलेज और डॉ. सूरज पालीवाल का निवास—ये तीनों एक किलोमीटर से भी कम दूरी की परिधि में थे. तो जब भी जोधपुर जाना होता, मैं डॉ. सूरज पालीवाल के घर भी चला जाता. यह उनके व्यक्तित्व का ही कमाल था —उनके भी और डॉ. शोभा जी के भी— कि मुझे कभी भी उनके घर जाने में संकोच नहीं हुआ. ऐसा लगता ही नहीं था कि मैं किसी के घर ‘मिलने’ जा रहा हूं. लगता था, अपने ही किसी आत्मीय के यहां जा रहा हूं. खूब गपशप होती, थोड़ी साहित्यिक चर्चाएं भी होतीं. शोभा जी का आत्मीय आतिथ्य तो होता ही. चाय, खाना और बातचीत—इन तीनों का ऐसा मेल कि जाने का समय हमेशा कुछ पहले ही निकल जाता था.

फिर एक दिन पालीवाल जी का पहला कहानी-संग्रह आया—‘टीका प्रधान’—और जोधपुर में उस पर एक गोष्ठी की योजना बनी. पालीवाल जी ने मुझसे भी आग्रह किया कि मैं उस गोष्ठी के लिए जोधपुर आऊं और उनके कहानी-संग्रह पर अपनी बात कहूं. उन दिनों बहुत-सी गोष्ठियों में मैंने सिरोही से जाकर भागीदारी की थी. बड़े रोचक अनुभव हैं उन गोष्ठियों के. लेकिन वह चर्चा फिर कभी.

पालीवाल जी की किताब पर चर्चा के लिए मैं जोधपुर आया, गोष्ठी में भागीदारी की और शायद उस शाम पालीवाल जी के निवास पर शोभा जी के स्वादिष्ट आतिथ्य का सुख भी लिया. यह सुख बाद में भी अनेक बार मिला. पालीवाल जी पदोन्नत होते-होते विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर बने, संकाय के अधिष्ठाता बने और इन विभिन्न पदों पर रहते हुए कई बार उन्होंने मुझे वहां बुलाया भी — खास तौर पर पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में व्याख्यान देने के लिए. जब भी ऐसे किसी आधिकारिक और औपचारिक कार्यक्रम के लिए जोधपुर जाना हुआ, पालीवाल युगल का सायंकालीन आतिथ्य अवश्य ही प्राप्त हुआ. आधिकारिक कार्यक्रम समाप्त हो जाता था, लेकिन असली कार्यक्रम जैसे उसके बाद शुरू होता था.

समय बीतता गया और पालीवाल जी महात्मा गांधी केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफ़ेसर बनकर चले गए. उनके बाद, कुछ समय बाद शोभा जी भी अपनी सरकारी नौकरी छोड़ वहीं चली गईं. जोधपुर में मेरा एक घर कम हो गया. फिर धीरे-धीरे मेरा भी जोधपुर जाना कम होता गया और बाद में तो सिरोही छूट ही गया. इससे मेरे लिए जोधपुर और दूर हो गया. स्वाभाविक ही था कि हमारा मिलना-जुलना कम हो गया. लेकिन जब भी मिले, मन आश्वस्त हुआ कि हमारी आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई है. वह जस की तस है. रिश्तों की एक खूबी शायद यही होती है कि उनके लिए लगातार मिलते रहना जरूरी नहीं होता. कुछ रिश्ते समय के साथ बने रहते हैं, भले ही उनके बीच मुलाकातों का अंतराल बढ़ता जाए.

और फिर समय ने एक और करवट ली. मैं तो रिटायर होकर जयपुर में बस ही गया था, पालीवाल दंपती भी वर्धा से रिटायर होकर जयपुर ही आ बसे. लगा, हमारे अच्छे दिन आ गए. लेकिन ये अच्छे दिन तब आए जब पालीवाल लोग और अग्रवाल लोग इन अच्छे दिनों का सुख लेने की बहुत सारी क्षमताएं गंवा चुके थे. उम्र अपने साथ बहुत कुछ ले जाती है—समय, स्वास्थ्य, सहज आवागमन और कभी-कभी वह बेफिक्री भी, जिसके सहारे मित्र घंटों बैठे रह सकते थे.

इसके अलावा उन्होंने तो घर भी बहुत दूर लिया. इतनी दूर कि मुझ जैसे छोटे कस्बे में जिंदगी बिताने वाले को लगे कि एक से दूसरी कॉलोनी में नहीं, एक से दूसरे शहर जा रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद यह तसल्ली है कि हम जिस आकाश के नीचे सांस ले रहे हैं, वह एक ही शहर का है. भले ही अब उम्र जनित सीमाओं के कारण बहुत जल्दी-जल्दी मिलना नहीं होता, यह प्रतीति तो रहती है कि हम एक ही शहर में हैं. और कभी-कभी एक ही शहर में होना भी एक तरह की आत्मीय निकटता होती है.

पालीवाल जी सही अर्थों में वैसे शिक्षक हैं, जिनसे आदर्श शिक्षक की परिकल्पना हमारे मन में आकार लेती है. मैं तो यही तसव्वुर करता हूं कि एक उम्दा शिक्षक हर वक्त किताबों और नए विचारों से घिरा रहे. पालीवाल जी मेरी हिंदी के ऐसे ही विरल शिक्षक हैं. मैं ‘विरल’ क्यों लिख रहा हूं, यह समझने वाले समझ जाएंगे और जो न समझें, वे बहुत सहजता से मेरे लिखे इस शब्द को नज़रअंदाज कर सकते हैं.

पालीवाल जी नए से नया पढ़ते हैं और मुझे पिछले कई बरसों में उनसे हुई एक भी ऐसी मुलाकात याद नहीं है, जब उन्होंने अपनी ताजा पढ़ी किसी किताब की चर्चा न की हो. एक बार वे बता रहे थे कि उनका पढ़ने का समय सुबह तीन से छह बजे का तो फिक्स्ड है ही. सुबह के उन तीन घंटों में वे किस तरह अपने को किताबों के हवाले कर देते हैं, यह सुनना ही मेरे लिए आश्चर्य का विषय था. हममें से बहुत-से लोग किताबें पढ़ना चाहते हैं, पढ़ने की योजनाएं बनाते हैं, किताबें खरीदते हैं और फिर किसी सुविधाजनक समय की प्रतीक्षा करते रहते हैं. पालीवाल जी उन दुर्लभ लोगों में हैं जो अपने पढ़ने के लिए समय निकालते नहीं, समय बनाते हैं.

वे किसी किताब को पढ़ते हैं तो इतनी तन्मयता से पढ़ते हैं कि उस पर घंटों बात कर सकते हैं, बल्कि करते ही हैं. किसी भी नई किताब के बारे में उन्हें सुनना एक समृद्ध करने वाला अनुभव होता है. किताब के कथानक से आगे जाकर उसके भीतर के विचार, लेखक की दृष्टि, भाषा, शिल्प और उसके साहित्यिक संदर्भों तक वे सहजता से पहुंच जाते हैं. इस मामले में उनकी स्मृति भी विलक्षण है. मुझे तो कल पढ़ी हुई किताब के बारे में भी इस तरह चीजें याद नहीं रहतीं! वे नए से नए उपन्यास पढ़ते हैं और न केवल पढ़ते हैं, उन पर नियमितता से लिखते भी हैं. पढ़ना उनके लिए निजी आनंद भर नहीं है; वह उनके अध्यापक और आलोचक होने की जिम्मेदारी का भी हिस्सा है.

लेकिन पालीवाल जी की स्मृति का एक और आयाम है, और वह बहुत दिलचस्प भी है. उन्हें निजी जीवन की घटनाएं पूरे ग्राफिक डिटेल्स में याद रहती हैं. न केवल याद रहती हैं, वे उन्हें सुनाते भी बहुत मजे लेकर हैं. वही मिर्ज़ा ग़ालिब वाली बात—‘ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयां अपना...’ साहित्यिक दुनिया के लोगों के साथ उनके इतने लंबे और इतने विविध संबंध रहे हैं कि उनके पास प्रसंगों का एक पूरा चलता-फिरता संग्रहालय है.

अपने पद और साहित्यिक सक्रियता के कारण उनका साहित्य की दुनिया के बाशिंदों से बहुत नियमित रूप से मिलना-जुलना होता रहा है. ये मेल-मुलाकातें उनके स्मृति-कोश को निरंतर समृद्ध करती रही हैं. मैं तो उनसे जब भी मिलता हूं, इस बात का आकांक्षी रहता हूं कि वे ऐसे रोचक प्रसंग साझा करें, और वे कभी निराश भी नहीं करते. एक प्रसंग से दूसरा प्रसंग निकलता है, फिर तीसरा और देखते-देखते कोई पूरा समय खंड हमारे सामने जीवित हो उठता है. उनकी बातचीत में साहित्यिक दुनिया के लोग केवल नाम नहीं रह जाते, वे अपने स्वभाव, अपनी आदतों, अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ हमारे सामने चलने-फिरने लगते हैं.  

कहना अनावश्यक है कि ऐसे प्रसंगों में अधिकांश बहुत निजी, अंतरंग और प्रायः अनुद्धरणीय होते हैं. इसलिए उन्हें यहां लिख देना संभव भी नहीं और उचित भी नहीं. लेकिन मैं हमेशा यह सोचता हूं कि अगर पालीवाल जी इन प्रसंगों को लिख दें तो हम कांति कुमार जैन की अनुपस्थिति के त्रास से कुछ त्राण पा सकते हैं. कांति कुमार जैन ने जिस तरह संस्मरण को साहित्यिक गरिमा और निजी विनोद के अद्भुत मेल में बदल दिया था, वैसी ही संभावना मुझे पालीवाल जी में भी दिखाई देती है. उनके पास सामग्री है, स्मृति है, लोगों को निकट से देखने की दृष्टि है और सबसे बड़ी बात—उन्हें सुनाने की कला आती है.

शायद यही कारण है कि सूरज पालीवाल को याद करते हुए मुझे केवल एक कथाकार, आलोचक या शिक्षक याद नहीं आते. मुझे एक ऐसा आत्मीय व्यक्ति याद आता है, जिसके साथ बीते हुए समय का एक-एक  पल  भी याद आता है. जोधपुर के वे दिन, सिरोही से की गई यात्राएं, साहित्यिक गोष्ठियों के वे गद्दे, देर रात तक चलने वाली बातचीत, शोभा जी का आतिथ्य, किताबों पर होने वाली बहसें और बीच-बीच में जीवन के छोटे-बड़े किस्से—सब एक साथ लौट आते हैं.

और तब लगता है कि शायद पहली मुलाकात की तारीख, जगह और अवसर याद न रहना उतना महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि कोई व्यक्ति हमारी स्मृति में किस तरह और कितनी गहराई से बसा हुआ है. सूरज पालीवाल मेरे लिए ऐसे ही व्यक्ति हैं. पहली मुलाकात कब हुई, यह मुझे याद नहीं; लेकिन यह अच्छी तरह याद है कि वह मुलाकात धीरे-धीरे एक आत्मीय संबंध में बदल गई और वह संबंध इतने वर्षों और इतनी दूरियों के बाद भी बना हुआ है. उम्र ने भले ही मुलाकातों के बीच की दूरी बढ़ा दी हो, आत्मीयता की दूरी नहीं बढ़ाई है. शायद सच्चे रिश्तों की यही सबसे बड़ी पहचान है.

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Wednesday, August 12, 2026

आप शहर को छोड़ दें, शहर आपको नहीं छोड़ता है!

 इस बार एक लंबे अंतराल के बाद उदयपुर जाना हुआ.


उदयपुर—जहाँ मेरा जन्म हुआ, जहाँ मेरी पूरी पढ़ाई हुई, जहाँ मेरे जीवन के, -बचपन और किशोरावस्था के- इतने वर्ष बीते कि वह शहर कभी मेरे लिए केवल एक शहर रहा ही नहीं.  लेकिन फिर धीरे-धीरे वह शहर मेरे हाथों से फिसलता गया.  या शायद सच यह है कि मैं ही उससे दूर होता गया.  होते-होते एक दिन ऐसा आया कि मैंने पूरी तरह उस शहर को अलविदा कह दिया.

नौकरी के सिलसिले में पूरे पैंतीस वर्ष उदयपुर से बाहर रहा, लेकिन अपना मकान  वहाँ था, इसलिए शहर से एक रिश्ता बना रहा.  फिर वह मकान भी बेच दिया.  जो थोड़ा-बहुत सामान बचा था, उसे भी वहाँ से लेकर नए खरीददार को वह मकान  सौंप आया.  लगा कि अब शायद उदयपुर से मेरा रिश्ता पूरी तरह समाप्त हो गया.

लेकिन क्या अपने जन्म देने वाले शहर से कोई रिश्ता सचमुच समाप्त हो सकता है?

मेरा तो नहीं हुआ.

रह-रहकर वह शहर याद आता है.  और उसके साथ याद आता है वह मकान, जो कभी मेरा घर था, और जो अब लगभग पूरी तरह बदल चुका है.


उस मकान के नए मालिक सुरेंद्र वैष्णव से यदा-कदा व्हाट्सएप या फोन पर बात हो जाती है.  पिछले दिनों उन्होंने उस भवन के नवीनीकरण के बाद की कुछ तस्वीरें भेजीं.  तस्वीरें देखते ही मन एक बार फिर उस मकान को अपनी आँखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठा.  पता नहीं कब मैंने पत्नी या बेटी से इसका ज़िक्र कर दिया.  उसी का जो परिणाम हुआ, उसकी कहानी यहाँ लिख रहा हूँ.


इस बार उदयपुर जाना एक पारिवारिक विवाह के कारण हुआ.  मेरे भतीजे की बेटी का विवाह था. इन लोगों से हमारी आत्मीयता इतनी सघन है कि बेंगलुरु से बेटी ने भी अपनी व्यस्तता को किनारे रखकर उसमें आने का फैसला किया.  बेटा क्योंकि विदेश में है, उसके लिए चाह कर भी आना संभव नहीं हुआ. आने से पहले बेटी ने  हम दोनों से बात की और कहा कि विवाह के बाद एक दिन और उदयपुर में रहेंगे.  हमें भी यह प्रस्ताव अच्छा लगा.  परिवार के विवाह में तो स्वाभाविक ही बहुत व्यस्तता रहती है; उसके बाद का समय पूरी तरह हमारा अपना होगा.


बेटी ने मुझसे दो-तीन बार पूछा—विवाह के बाद हम कहाँ ठहरेंगे?

वह मुझसे किसी अच्छे होटल का सुझाव चाह रही थी.  मैंने जो सुझाव दिए, उसे पसंद नहीं आए.  मेरा कहना था कि या तो उसी रिसॉर्ट में जहां विवाह हो रहा है, एक दिन और रुक जाएंगे, या फिर उदयपुर पहुँचकर कोई उपयुक्त होटल देख लेंगे.  आखिर उदयपुर हमारे लिए कोई नया शहर तो है नहीं!

मेरा ध्यान इस बात की तरफ गया ही नहीं कि बेटी के मन में कुछ और चल रहा है.

विवाह के दौरान उसने अचानक बताया—“पापा, मैंने होटल शिव निवास पैलेस में कमरा बुक कर लिया है.”


मैंने इसका नाम तो सुना था, और मेरा अनुमान था कि यह बहुत महँगा होटल होगा.

वह मेरे अनुमान से भी कहीं अधिक महँगा निकला.

होटलों की मेरी सूची में तो वह था ही नहीं.  लेकिन बेटी ने बुक कर लिया था तो अब क्या कहा जा सकता था!


विवाह सानंद सम्पन्न हुआ.  सच कहूँ तो अपनी अब तक की जिंदगी में इतना शानदार और सुरुचिपूर्वक नियोजित विवाह मैंने नहीं देखा.  अच्छा लगा कि हमारे परिवार ने ऐसा आयोजन किया. हम सारे ही लोग निम्न मध्यमवर्ग की पैदाइश हैं. इसलिए यह सब और अधिक आनंदित करता है.


अगली सुबह बेटी ने टैक्सी बुलाई.  हम शहर से बाहर स्थित उस रिसॉर्ट से शिव निवास पैलेस की ओर चल पड़े.

जैसे ही टैक्सी उदयपुर के भीतरी हिस्से में पहुँची, मेरे मानस-पटल पर बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियाँ एक-एक करके झिलमिलाने लगीं.  उससे पहले अशोक नगर से गुजरते हुए बाईं ओर अपना कॉलेज—तब का एम.बी. कॉलेज— दिखा तो अचानक वह समय सामने आ गया जब मैं यहाँ विद्यार्थी था.  1967 के बाद इस परिसर में शायद एक-दो बार ही आया हूँ.


सूरजपोल से गुजरे तो बहुत-सी यादें ताजा हो गईं.  प्रयाग दास जी का स्थल नज़र आया तो महंत मुरली मनोहर शरण जी का स्नेह भी याद आया. बालकवि बैरागी के कारण उनसे परिचय हुआ था और फिर उनका अकुंठ स्नेह मुझे भी मिला. अमल का कांटा पार करते हुए जब एक जगह कालाजी गोराजी लिखा हुआ नज़र आया तो एकदम से यह बात याद आई कि यहीं तो मेरा जन्म हुआ था. मां जो बताया करती थीं, उसे याद किया तो अनुमान हुआ कि वह शायद कोई मिशनरी अस्पताल रहा होगा. वे किसी मिस साहब की खूब चर्चा किया करती थीं, जो कदाचित वहाँ की अंग्रेज़ नर्स रही होंगी. उससे थोड़ा आगे बढ़े तो शीतला माता का मंदिर आया और फिर गाड़ी चढ़ाई चढ़ने लगी. मैं पत्नी को बताने लगा कि हमारे समय में उदयपुर में कोई भी विवाह समारोह शीतला माता की पूजा के बिना शुरू नहीं होता था. ऐसी बहुत सारी यादें ताज़ा होती गईं.

शहर बदल गया था, लेकिन मेरे भीतर का उदयपुर अभी भी वैसा का वैसा था.

शिव निवास पैलेस उदयपुर के राजमहल का ही एक अंग है.  उदयपुर के दूरदर्शी महाराणा भगवत सिंह ने जगमंदिर को होटल (लेक पैलेस) में बदलकर जिस परंपरा की शुरुआत की थी, बाद में अनेक राजाओं-महाराजाओं ने उसका अनुकरण किया.  महाराणा भगवत सिंह वर्तमान महाराजा श्रीजी लक्ष्यराज सिंह के दादा थे.

मेरे पिता जी बताया करते थे कि उनका महाराणा भूपाल सिंह जी (जो भगवत सिंह जी के पिता थे) के यहाँ खूब आना-जाना था और उन्होंने भगवत सिंह जी को अपनी गोद में खिलाया था.  उन्हीं भगवत सिंह के पुत्र अरविंद सिंह उदयपुर के उसी एम.बी. कॉलेज में मेरे सहपाठी थे.


शिव निवास पैलेस सचमुच पैलेस है.  हमारा सुइट पिछोला झील के ठीक सामने था.  खिड़की से होटल लेक पैलेस दिखाई दे रहा था और उसके पीछे बादलों में से सज्जनगढ़ झाँक रहा था.  कमरे में थोड़ा व्यवस्थित होने के बाद बेटी ने कहा—“चलें, शहर घूम आते हैं.”

होटल की गोल्फ कार्ट से हम त्रिपोलिया तक आए और वहाँ से एक ऑटो किया कि जहाँ-जहाँ हम चाहें, वह हमें ले जाए.

और तभी मेरी ट्यूबलाइट जली. मुझे बेटी का ‘षड्यंत्र’ समझ में आया! षडयंत्र शब्द नकारात्मक है, लेकिन मुझे कोई और अभिव्यक्ति सूझ नहीं रही है, इसलिए इसका उपयोग कर लिया है.

उसके मन में यह बात बैठी हुई थी कि पापा अपना पुराना घर और अपना पुराना शहर फिर से देखना चाहते हैं.  उसने बहुत सावधानी से पूरी योजना बनाई थी और मुझे तनिक भी संदेह नहीं होने दिया.

उसने बाकी सारे विकल्पों को दरकिनार करके उसी होटल को चुना जो मेरे पुराने घर के इलाके में था.  उसकी योजना थी कि पापा अपने पुराने घर के आसपास ही रहें और अपने अतीत की स्मृतियों को फिर से जी सकें.

मैं अनजान बना रहा और वह अपना काम करती रही.

ऑटो में बैठने से पहले हमने अपने पुराने घर के नए स्वामी सुरेंद्र वैष्णव को फोन करके अनुरोध किया कि वे वहाँ पहुँच जाएँ, ताकि हम घर को भीतर से एक बार फिर देख सकें.  वह भला आदमी अपने सारे काम छोड़कर दौड़ा चला आया.

राजमहल के द्वार से जगदीश मंदिर के सामने होते हुए जब हम जगदीश रोड पर स्थित अपने पुराने घर के सामने पहुँचे, सुरेंद्र हमारा इंतजार कर रहे थे.


बाजार की शक्ल-सूरत काफी बदल चुकी थी.  बहुत-से पुराने मकान गायब हो गए थे और उनकी जगह नए मकानों ने ले ली थी.  लेकिन सड़क वही थी, मोहल्ला वही था.  पता नहीं अब वहाँ किसी को यह बात मालूम भी है या नहीं कि मेरे जमाने में इस जगह को ‘सेठों की ओळ’ कहा जाता था. वजह यह कि उस मुहल्ले में बहुत सारे घर सेठ कंदोई लोगों के थे. सेठ कंदोई, आज की भाषा में पारंपरिक शेफ़! शादी ब्याह में खाना बनाने वाले.

वहीं मेरी वह दुकान थी, जहाँ बैठकर मैंने 1959 में अपने पिता के देहावसान के बाद जैसे-तैसे अपना घर चलाया था.  वहीं घड़ीसाजी की थी.  पहले उस दुकान पर एक लम्बा साइनबोर्ड हुआ करता था – भगतराम रामप्रताप. बाद में जब नया साइनबोर्ड बना तो उस पर लिखवाया गया था – बाबू रामप्रताप दुर्गाप्रसाद. भगतराम मेरे दादाजी का नाम था. तो इस दुकान को 1967 में मेरी नौकरी लगने के बाद स्थायी रूप से बंद कर दिया गया —और शायद उसी दिन अपनी माँ के मन में एक स्थायी नाराजगी का बीज भी मैंने बो दिया था.  


अब उस दुकान का रूप बहुत बदल चुका था.  वहाँ बुटीक जैसी एक दुकान थी और उसे एक छोटी-सी लड़की संभाल रही थी.  जाहिर है, उसने वह जगह किराए पर ले रखी थी.

दुकान के बाजू में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ हुआ करती थीं.  उन्हीं सीढ़ियों पर बैठकर मेरी माँ और बाद में मौसी अपनी बेनूर जिंदगी का बहुत-सा समय बिताती थीं.  वे सीढ़ियाँ ही उनका ‘रामझरोखा’ थीं, जहाँ बैठकर वे दुनिया का मुजरा लेती थीं.  मोहल्ले की बुजुर्ग होने के नाते मुजरा लेने का उनका हक भी था.

सीढ़ियाँ अब भी थीं, मगर उनका स्वरूप बदल चुका था.

सुरेंद्र के साथ चारु और मैं ऊपर गए.  पत्नी नीचे ही खड़ी रहीं. वे इसी घर में दुल्हन बनकर आई थीं और तब भी उन सीढ़ियों  से घबराती थीं, इस बार और ज़्यादा घबरा गईं.  मेरा मन उन कमरों को देखने का था जिनमें रहकर मैंने बी.ए. और एम.ए. की पढ़ाई की थी और जिनका विस्तृत वर्णन मैंने श्री सुरेश उनियाल द्वारा संपादित खूबसूरत पुस्तक ‘मेरा कमरा’ (काव्यांश प्रकाशन, ऋषिकेश) के दूसरे भाग में किया है.

मेरे उस मकान के खरीददार सुरेंद्र वैष्णव के परिवार में भी इन वर्षों में काफी उथल-पुथल हुई थी. कई सदस्य दिवंगत हो गए. अब वही इस भवन का मालिक है और उसने इसकी व्यावसायिक संभावनाओं का पूरा उपयोग किया है.  उसने बताया कि ऊपर की तीन मंजिलों पर उसने दो-दो कमरे बना दिए हैं, जिन्हें पर्यटकों को किराए पर दिया जा सकता है.  हर कमरे में जरूरी सुविधाएँ हैं.  एसी और टीवी भी हैं.

मैं कल्पना भी नहीं कर पा रहा था कि मेरे उस पुराने घर में यह सब संभव हो सकता है.

लेकिन सुरेंद्र ने कर दिखाया था.

हाँ, इसका एक परिणाम यह हुआ कि जिस कमरे में बैठकर मैंने पढ़ाई की थी, वह अब अस्तित्व में ही नहीं था.  वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे मेरे उस समय की याद दिला सके.

बस एक कल्पना थी—

कि मैं अपने ही पुराने घर में खड़ा हूँ. वहां खड़ा हूं जहां कभी टेबल लैम्प की रोशनी में रात-रात भर पढ़ा करता था.

चौथी मंजिल के बाद खुली छत थी.  पहले तो मैं तीसरी मंज़िल पर ही रुक गया, लेकिन फिर मन नहीं माना तो हाँफते-हाँफते वहाँ भी गया.  क्या पता फिर कभी आना हो या न हो!  ‘बाज़ार’ फ़िल्म का वो गाना जेहन में गूंजा – देख लो आज हमको जी भर के.


वहाँ से सामने अपना कंवरपदा स्कूल देखा.  घर के ठीक सामने के जैन मंदिर की छत देखी. और देखी वह बदली हुई सड़क भी, जिस पर कभी मेरा रोज का आना-जाना हुआ करता था.

सुरेंद्र ने घर का सामने वाला रूप लगभग जस का तस रखा है.  यह उसकी व्यावसायिक बुद्धि भी है.  उस मोहल्ले की पुरानी इमारतें अब भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं.


थोड़ी देर ऊपर खड़ा रहा.  अपने अतीत को जैसे साँसों में भरता रहा.  फिर आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतर आया.

मेरे घर से लगी हुई कपड़ों की एक दुकान थी. पता चला, उसके मालिक कैलाश जी अब नहीं रहे.  उसके आगे एक धोबी का घर था.  उस परिवार का लड़का कन्हैयालाल मेरा सहपाठी था और उसकी एक बहन मेरे साथ खेला करती थी.  उनके बारे में भी ऐसे ही समाचार मिले.

सामने के एक सेठ परिवार से हमारी बड़ी आत्मीयता थी. उनका नाम नंद लाल जी था और वे उदयपुर के उस ज़माने के नामी हलवाई थे. झकोरमा पूड़ी (जो अब लुप्त प्राय: है!) बनाने में उनको महारत हासिल थी और उनका कौशल हम प्राय: अपने घर से देखा करते थे. एक ख़ास तरह (जिसे काठा गेहूं कहा जाता था) के आटे से बहुत बड़े आकार की रोटी बेली जाती और फिर उसे आज की रूमाली रोटी की तरह हवा में उछाल-उछाल कर और फैलाया जाता. असल कमाल इसके बाद होता. तेज़ खौलते तेल (या घी) में उस रोटी को तलने के लिए फेंका जाता. क्या मज़ाल कि तेल/घी की एक बूंद भी उछल जाए! उसका स्वाद दैवीय होता था. नंद लाल जी का  बेटा अंबा लाल बाद में सरकारी नौकरी में लग गया. पता चला, वे लोग भी अब दूसरे लोक के वासी हो चुके हैं. अंबा लाल का बेटा ज़रूर मिला.

इतने लंबे अंतराल में यह तो होना ही था.

फिर भी यह ‘होना ही था’ को स्वीकार करना आसान नहीं होता.

मकान की दूसरी तरफ, मेरे घर से सटा हुआ एक टाइपिंग इंस्टीट्यूट था, जिसके मालिक एक मास्टर साहब थे.  पता चला, वे खासे वृद्ध हो गए हैं, लेकिन शाम को वहाँ आते हैं.  उनके बेटे को अपना परिचय दिया और कहा कि उन्हें मेरी याद दिलाए.

एक दुकान छोड़कर पालीवाल जी की कचौरी की दुकान थी.  उदयपुर की अनगिनत इंस्टाग्राम रीलों में अब उसका जिक्र अनिवार्यत: मिलता है.  लोकप्रिय तो वह मेरे जमाने में भी थी, लेकिन अब वह एक ‘क्रेज’ बन चुकी है.

मेरी तमन्ना थी कि इस दुकान की एक कचौरी जरूर खाऊँ.

उस समय गरम कचौरी नहीं निकल रही थी.  जैसी थी, वैसी ही खा ली.

पैसे देने लगा तो दुकान के युवा स्वामी ने लेने से मना कर दिया.

शायद वह मुझे जानता था.


पता नहीं उसने मुझे पहचाना था या केवल मेरे अतीत को.

मेरी आँखें नम हो गईं.

अपने घर को एक बार फिर देखकर और निदा फ़ाज़ली की उस ग़ज़ल को मन ही मन गुनगुनाते हुए, जिसे जगजीत सिंह ने बहुत खूबसूरती से गाया है, हम लोग हाथी पोल की ओर बढ़ गए.

उस ग़ज़ल का एक-एक शेर जैसे मेरी ही बात कह रहा था.

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से

किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब

सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं

हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार

अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

 

उदयपुर में जन्मा, वहीं बड़ा हुआ, वहीं पढ़ा-लिखा और अब उसी उदयपुर में एक पर्यटक की तरह आना होता है!

यही तो जीवन है.

लेकिन इस कहानी में बेटी के उस ‘षड्यंत्र’ का एक सिरा अभी बाकी है.

यह बात लगभग एक दशक पुरानी है.  तब भी बेटी ने एक दिन कहा था—“पापा, क्यों न इस बार हम उदयपुर घूमने चलें?” बेटी हमें घुमाती रहती है. कभी यहां, कभी वहां. खूब ही घुमाया है उसने हमें.

हम दोनों ने हामी भर दी.

उसने बहुत सोच-समझकर फिर उसी इलाके में एक होटल चुना. शायद लेक पिछोला होटल.  मंशा वही थी—पापा को लगे कि वे अपने पुराने घर के आसपास ही रह रहे हैं.

तब हमने सिटी पैलेस देखा, जगदीश मंदिर गए, गणगौर घाट पहुँचे, पिछोला की सैर की, फतहसागर घूमे और जैसे एक बार फिर उदयपुर को जी भरकर जिया. एक पारंपरिक रेस्तरां में जाकर उदयपुर का पारंपरिक खाना भी खाया. झकोरमा पूड़ी भी.

तब भी हम अपने पुराने घर के सामने से गुजरे थे.  कुछ तस्वीरें भी ली थीं. घर के भीतर नहीं जा पाए थे.  उस समय घर का इस तरह नवीनीकरण नहीं हुआ था.

और क्या गजब का संयोग था कि जब हम घर के सामने से होते हुए घंटाघर की तरफ जा रहे थे, यही सुरेंद्र हमें यकायक सड़क पर मिल गए.  उन्होंने हमें पहचान लिया और लगभग जबरन घंटाघर के पास की बहुत विख्यात लाला हलवाई की दुकान पर ले जाकर गुलाब जामुन खिलाए.

उस दिन भी शायद उदयपुर ने हमें पहचान लिया था.

हमारी बेटी इस मामले में विलक्षण है.

उसे बस इतना पता चल जाए कि पापा की कोई इच्छा है.  फिर वह जैसे भी हो, उस इच्छा को पूरा किए बिना चैन नहीं लेती.  और पूरा भी ऐसे ढंग से करती है कि हमें भनक तक नहीं लगती.

वह कभी यह नहीं कहती—“आपने चाहा था, इसलिए मैंने ऐसा किया. ”

शायद यही उसके प्रेम का सबसे सुंदर ढंग है.

वह हमारी इच्छाओं को हमारे कहने से पहले सुन लेती है.

और फिर चुपचाप उन्हें पूरा कर देती है.

यही कौशल उसने अपने भाई के साथ मिलकर हमारी लंदन-पेरिस यात्रा को संभव बनाने में भी इस्तेमाल किया था.

उसकी चर्चा फिर कभी. भाई अर्थात हमारे बेटे विश्वास के प्यार जताने के तरीकों की बात भी कभी अलग से करूंगा. आज तो विचारों की रेल इस पटरी पर चल निकली, तो चलने दिया है.

फिलहाल इतना ही कि उदयपुर से लौटते हुए मुझे लगा—शहर भले ही हाथ से निकल जाए, मकान  भले ही किसी और का हो जाए, गलियाँ बदल जाएँ, परिचित चेहरे एक-एक करके स्मृति में बदल जाएँ, लेकिन आदमी अपने शहर से पूरी तरह कभी विदा नहीं होता.

वह शहर उसके भीतर कहीं रह जाता है.

और कभी-कभी कोई बेटी उस भीतर छिपे शहर का दरवाजा चुपचाप खोल देती है.

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