Friday, October 9, 2026

सूरज पालीवाल : स्मृति में बसे एक आत्मीय


बहुत दिनों से याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि उनसे पहली मुलाकात कब, कहां और कैसे हुई थी, लेकिन कुछ भी याद नहीं आ रहा है. मैं उम्र के जिस मुकाम पर पहुंच गया हूं, वहां ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है. इतनी दूर की तो छोड़िए, बहुत नज़दीक की, बल्कि सामने की बातें भी कहां याद रहती हैं. स्मृति भी शायद अपनी सुविधा से काम करती है. वह बहुत कुछ बचाकर रखती है और बहुत कुछ, जाने क्यों, धीरे-धीरे धुंधला देती है. कुछ अनुमान लगाता हूं तो जो धुंधली-सी तस्वीर उभरती है, उसके अनुसार शायद अस्सी के दशक में उनसे पहली मुलाकात हुई होगी. उनसे अर्थात डॉ. सूरज पालीवाल से.

वे तब जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे और मैं उनसे लगभग दो सौ किलोमीटर दूर सिरोही नाम के एक छोटे-से कस्बे के राजकीय महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक था. वह समय राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के लिहाज से अनुपम था. राजस्थान साहित्य अकादमी एक के बाद एक कार्यक्रम किए जा रही थी और अलग-अलग जगहों पर बहुत-सी संस्थाएं अपने-अपने आयोजन भी करती थीं. जोधपुर में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद ऐसी ही एक संस्था थी, जो श्री नेमिचंद्र जैन ‘भावुक’ (अब स्वर्गीय) के वत्सल व्यक्तित्व की छांह में पूरे पश्चिमी राजस्थान में साहित्यिक आयोजन करती रहती थी.

इन सारे आयोजनों का एक अतिरिक्त लाभ यह था कि लेखकों को मिलने-जुलने के खूब अवसर मिलते थे और इन्हीं अवसरों के कारण उनके बीच आत्मीय रिश्ते बनते थे. तब के साहित्यिक आयोजन कम खर्च वाले, कम संसाधनों वाले और कम चमक-दमक वाले हुआ करते थे, लेकिन उनमें एक ऐसी गर्माहट होती थी जो अब शायद दुर्लभ हो गई है. वहां रचनाकार मुक्त भाव से सहजीवन का आनंद लेते हुए साहित्यिक चर्चाएं करते थे. किसी एक बड़े हॉल में गद्दे बिछे हुए हैं और बीस-तीस-चालीस-पचास लेखक उन पर लेटे-अधलेटे हुए गपशप कर रहे हैं. कोई अपनी नई कविता सुना रहा है, कोई किसी कहानी पर बहस कर रहा है, कोई किसी लेखक की नकल उतार रहा है और कोई बस चुपचाप दूसरों की बातें सुनकर आनंदित हो रहा है. साहित्य वहां केवल मंच पर नहीं होता था, जीवन में भी होता था. यह अनिर्वचनीय सुख था, जिसे बाद की सुविधा-संस्कृति ने हमसे जाने-अनजाने छीन लिया.

तो ऐसे ही किसी आयोजन में डॉ. सूरज पालीवाल से पहली मुलाकात हुई होगी. जोधपुर में, या बाड़मेर में, या जैसलमेर में या मेरे अपने सिरोही में. निश्चित रूप से कह पाना अब संभव नहीं है. तब हम दोनों युवा थे. (वे आज भी युवा हैं.) और शायद युवावस्था की यही खूबी होती है कि वह परिचयों को बहुत जल्दी आत्मीयताओं में बदल देती है.

एक संयोग यह भी बना कि उन दिनों मेरा जोधपुर जाना खूब होता था. तीन कारण थे. एक तो हम सिरोही वालों के लिए निकटतम आकाशवाणी केंद्र जोधपुर था, अत: प्रसारण के लिए वहां से निमंत्रण आते रहते थे. दूसरा यह कि पहले मेरा बेटा और फिर बेटी जोधपुर के एम.बी.एम. इंजीनियरिंग कॉलेज (अब विश्वविद्यालय) के विद्यार्थी रहे, तो उनसे मिल लेने, बल्कि उन्हें संभालने का चाव रहता. और तीसरा, मेरा ससुराल भी जोधपुर में ही था, इसलिए पारिवारिक कारणों से भी वहां जाना होता रहता था.

इन सब में एक बात और जोड़ दूं तो बात आगे बढ़े. मेरा ससुराल, बच्चों का कॉलेज और डॉ. सूरज पालीवाल का निवास—ये तीनों एक किलोमीटर से भी कम दूरी की परिधि में थे. तो जब भी जोधपुर जाना होता, मैं डॉ. सूरज पालीवाल के घर भी चला जाता. यह उनके व्यक्तित्व का ही कमाल था —उनके भी और डॉ. शोभा जी के भी— कि मुझे कभी भी उनके घर जाने में संकोच नहीं हुआ. ऐसा लगता ही नहीं था कि मैं किसी के घर ‘मिलने’ जा रहा हूं. लगता था, अपने ही किसी आत्मीय के यहां जा रहा हूं. खूब गपशप होती, थोड़ी साहित्यिक चर्चाएं भी होतीं. शोभा जी का आत्मीय आतिथ्य तो होता ही. चाय, खाना और बातचीत—इन तीनों का ऐसा मेल कि जाने का समय हमेशा कुछ पहले ही निकल जाता था.

फिर एक दिन पालीवाल जी का पहला कहानी-संग्रह आया—‘टीका प्रधान’—और जोधपुर में उस पर एक गोष्ठी की योजना बनी. पालीवाल जी ने मुझसे भी आग्रह किया कि मैं उस गोष्ठी के लिए जोधपुर आऊं और उनके कहानी-संग्रह पर अपनी बात कहूं. उन दिनों बहुत-सी गोष्ठियों में मैंने सिरोही से जाकर भागीदारी की थी. बड़े रोचक अनुभव हैं उन गोष्ठियों के. लेकिन वह चर्चा फिर कभी.

पालीवाल जी की किताब पर चर्चा के लिए मैं जोधपुर आया, गोष्ठी में भागीदारी की और शायद उस शाम पालीवाल जी के निवास पर शोभा जी के स्वादिष्ट आतिथ्य का सुख भी लिया. यह सुख बाद में भी अनेक बार मिला. पालीवाल जी पदोन्नत होते-होते विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर बने, संकाय के अधिष्ठाता बने और इन विभिन्न पदों पर रहते हुए कई बार उन्होंने मुझे वहां बुलाया भी — खास तौर पर पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में व्याख्यान देने के लिए. जब भी ऐसे किसी आधिकारिक और औपचारिक कार्यक्रम के लिए जोधपुर जाना हुआ, पालीवाल युगल का सायंकालीन आतिथ्य अवश्य ही प्राप्त हुआ. आधिकारिक कार्यक्रम समाप्त हो जाता था, लेकिन असली कार्यक्रम जैसे उसके बाद शुरू होता था.

समय बीतता गया और पालीवाल जी महात्मा गांधी केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफ़ेसर बनकर चले गए. उनके बाद, कुछ समय बाद शोभा जी भी अपनी सरकारी नौकरी छोड़ वहीं चली गईं. जोधपुर में मेरा एक घर कम हो गया. फिर धीरे-धीरे मेरा भी जोधपुर जाना कम होता गया और बाद में तो सिरोही छूट ही गया. इससे मेरे लिए जोधपुर और दूर हो गया. स्वाभाविक ही था कि हमारा मिलना-जुलना कम हो गया. लेकिन जब भी मिले, मन आश्वस्त हुआ कि हमारी आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई है. वह जस की तस है. रिश्तों की एक खूबी शायद यही होती है कि उनके लिए लगातार मिलते रहना जरूरी नहीं होता. कुछ रिश्ते समय के साथ बने रहते हैं, भले ही उनके बीच मुलाकातों का अंतराल बढ़ता जाए.

और फिर समय ने एक और करवट ली. मैं तो रिटायर होकर जयपुर में बस ही गया था, पालीवाल दंपती भी वर्धा से रिटायर होकर जयपुर ही आ बसे. लगा, हमारे अच्छे दिन आ गए. लेकिन ये अच्छे दिन तब आए जब पालीवाल लोग और अग्रवाल लोग इन अच्छे दिनों का सुख लेने की बहुत सारी क्षमताएं गंवा चुके थे. उम्र अपने साथ बहुत कुछ ले जाती है—समय, स्वास्थ्य, सहज आवागमन और कभी-कभी वह बेफिक्री भी, जिसके सहारे मित्र घंटों बैठे रह सकते थे.

इसके अलावा उन्होंने तो घर भी बहुत दूर लिया. इतनी दूर कि मुझ जैसे छोटे कस्बे में जिंदगी बिताने वाले को लगे कि एक से दूसरी कॉलोनी में नहीं, एक से दूसरे शहर जा रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद यह तसल्ली है कि हम जिस आकाश के नीचे सांस ले रहे हैं, वह एक ही शहर का है. भले ही अब उम्र जनित सीमाओं के कारण बहुत जल्दी-जल्दी मिलना नहीं होता, यह प्रतीति तो रहती है कि हम एक ही शहर में हैं. और कभी-कभी एक ही शहर में होना भी एक तरह की आत्मीय निकटता होती है.

पालीवाल जी सही अर्थों में वैसे शिक्षक हैं, जिनसे आदर्श शिक्षक की परिकल्पना हमारे मन में आकार लेती है. मैं तो यही तसव्वुर करता हूं कि एक उम्दा शिक्षक हर वक्त किताबों और नए विचारों से घिरा रहे. पालीवाल जी मेरी हिंदी के ऐसे ही विरल शिक्षक हैं. मैं ‘विरल’ क्यों लिख रहा हूं, यह समझने वाले समझ जाएंगे और जो न समझें, वे बहुत सहजता से मेरे लिखे इस शब्द को नज़रअंदाज कर सकते हैं.

पालीवाल जी नए से नया पढ़ते हैं और मुझे पिछले कई बरसों में उनसे हुई एक भी ऐसी मुलाकात याद नहीं है, जब उन्होंने अपनी ताजा पढ़ी किसी किताब की चर्चा न की हो. एक बार वे बता रहे थे कि उनका पढ़ने का समय सुबह तीन से छह बजे का तो फिक्स्ड है ही. सुबह के उन तीन घंटों में वे किस तरह अपने को किताबों के हवाले कर देते हैं, यह सुनना ही मेरे लिए आश्चर्य का विषय था. हममें से बहुत-से लोग किताबें पढ़ना चाहते हैं, पढ़ने की योजनाएं बनाते हैं, किताबें खरीदते हैं और फिर किसी सुविधाजनक समय की प्रतीक्षा करते रहते हैं. पालीवाल जी उन दुर्लभ लोगों में हैं जो अपने पढ़ने के लिए समय निकालते नहीं, समय बनाते हैं.

वे किसी किताब को पढ़ते हैं तो इतनी तन्मयता से पढ़ते हैं कि उस पर घंटों बात कर सकते हैं, बल्कि करते ही हैं. किसी भी नई किताब के बारे में उन्हें सुनना एक समृद्ध करने वाला अनुभव होता है. किताब के कथानक से आगे जाकर उसके भीतर के विचार, लेखक की दृष्टि, भाषा, शिल्प और उसके साहित्यिक संदर्भों तक वे सहजता से पहुंच जाते हैं. इस मामले में उनकी स्मृति भी विलक्षण है. मुझे तो कल पढ़ी हुई किताब के बारे में भी इस तरह चीजें याद नहीं रहतीं! वे नए से नए उपन्यास पढ़ते हैं और न केवल पढ़ते हैं, उन पर नियमितता से लिखते भी हैं. पढ़ना उनके लिए निजी आनंद भर नहीं है; वह उनके अध्यापक और आलोचक होने की जिम्मेदारी का भी हिस्सा है.

लेकिन पालीवाल जी की स्मृति का एक और आयाम है, और वह बहुत दिलचस्प भी है. उन्हें निजी जीवन की घटनाएं पूरे ग्राफिक डिटेल्स में याद रहती हैं. न केवल याद रहती हैं, वे उन्हें सुनाते भी बहुत मजे लेकर हैं. वही मिर्ज़ा ग़ालिब वाली बात—‘ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयां अपना...’ साहित्यिक दुनिया के लोगों के साथ उनके इतने लंबे और इतने विविध संबंध रहे हैं कि उनके पास प्रसंगों का एक पूरा चलता-फिरता संग्रहालय है.

अपने पद और साहित्यिक सक्रियता के कारण उनका साहित्य की दुनिया के बाशिंदों से बहुत नियमित रूप से मिलना-जुलना होता रहा है. ये मेल-मुलाकातें उनके स्मृति-कोश को निरंतर समृद्ध करती रही हैं. मैं तो उनसे जब भी मिलता हूं, इस बात का आकांक्षी रहता हूं कि वे ऐसे रोचक प्रसंग साझा करें, और वे कभी निराश भी नहीं करते. एक प्रसंग से दूसरा प्रसंग निकलता है, फिर तीसरा और देखते-देखते कोई पूरा समय खंड हमारे सामने जीवित हो उठता है. उनकी बातचीत में साहित्यिक दुनिया के लोग केवल नाम नहीं रह जाते, वे अपने स्वभाव, अपनी आदतों, अपनी खूबियों और कमजोरियों के साथ हमारे सामने चलने-फिरने लगते हैं.  

कहना अनावश्यक है कि ऐसे प्रसंगों में अधिकांश बहुत निजी, अंतरंग और प्रायः अनुद्धरणीय होते हैं. इसलिए उन्हें यहां लिख देना संभव भी नहीं और उचित भी नहीं. लेकिन मैं हमेशा यह सोचता हूं कि अगर पालीवाल जी इन प्रसंगों को लिख दें तो हम कांति कुमार जैन की अनुपस्थिति के त्रास से कुछ त्राण पा सकते हैं. कांति कुमार जैन ने जिस तरह संस्मरण को साहित्यिक गरिमा और निजी विनोद के अद्भुत मेल में बदल दिया था, वैसी ही संभावना मुझे पालीवाल जी में भी दिखाई देती है. उनके पास सामग्री है, स्मृति है, लोगों को निकट से देखने की दृष्टि है और सबसे बड़ी बात—उन्हें सुनाने की कला आती है.

शायद यही कारण है कि सूरज पालीवाल को याद करते हुए मुझे केवल एक कथाकार, आलोचक या शिक्षक याद नहीं आते. मुझे एक ऐसा आत्मीय व्यक्ति याद आता है, जिसके साथ बीते हुए समय का एक-एक  पल  भी याद आता है. जोधपुर के वे दिन, सिरोही से की गई यात्राएं, साहित्यिक गोष्ठियों के वे गद्दे, देर रात तक चलने वाली बातचीत, शोभा जी का आतिथ्य, किताबों पर होने वाली बहसें और बीच-बीच में जीवन के छोटे-बड़े किस्से—सब एक साथ लौट आते हैं.

और तब लगता है कि शायद पहली मुलाकात की तारीख, जगह और अवसर याद न रहना उतना महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि कोई व्यक्ति हमारी स्मृति में किस तरह और कितनी गहराई से बसा हुआ है. सूरज पालीवाल मेरे लिए ऐसे ही व्यक्ति हैं. पहली मुलाकात कब हुई, यह मुझे याद नहीं; लेकिन यह अच्छी तरह याद है कि वह मुलाकात धीरे-धीरे एक आत्मीय संबंध में बदल गई और वह संबंध इतने वर्षों और इतनी दूरियों के बाद भी बना हुआ है. उम्र ने भले ही मुलाकातों के बीच की दूरी बढ़ा दी हो, आत्मीयता की दूरी नहीं बढ़ाई है. शायद सच्चे रिश्तों की यही सबसे बड़ी पहचान है.

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Wednesday, August 12, 2026

आप शहर को छोड़ दें, शहर आपको नहीं छोड़ता है!

 इस बार एक लंबे अंतराल के बाद उदयपुर जाना हुआ.


उदयपुर—जहाँ मेरा जन्म हुआ, जहाँ मेरी पूरी पढ़ाई हुई, जहाँ मेरे जीवन के, -बचपन और किशोरावस्था के- इतने वर्ष बीते कि वह शहर कभी मेरे लिए केवल एक शहर रहा ही नहीं.  लेकिन फिर धीरे-धीरे वह शहर मेरे हाथों से फिसलता गया.  या शायद सच यह है कि मैं ही उससे दूर होता गया.  होते-होते एक दिन ऐसा आया कि मैंने पूरी तरह उस शहर को अलविदा कह दिया.

नौकरी के सिलसिले में पूरे पैंतीस वर्ष उदयपुर से बाहर रहा, लेकिन अपना मकान  वहाँ था, इसलिए शहर से एक रिश्ता बना रहा.  फिर वह मकान भी बेच दिया.  जो थोड़ा-बहुत सामान बचा था, उसे भी वहाँ से लेकर नए खरीददार को वह मकान  सौंप आया.  लगा कि अब शायद उदयपुर से मेरा रिश्ता पूरी तरह समाप्त हो गया.

लेकिन क्या अपने जन्म देने वाले शहर से कोई रिश्ता सचमुच समाप्त हो सकता है?

मेरा तो नहीं हुआ.

रह-रहकर वह शहर याद आता है.  और उसके साथ याद आता है वह मकान, जो कभी मेरा घर था, और जो अब लगभग पूरी तरह बदल चुका है.


उस मकान के नए मालिक सुरेंद्र वैष्णव से यदा-कदा व्हाट्सएप या फोन पर बात हो जाती है.  पिछले दिनों उन्होंने उस भवन के नवीनीकरण के बाद की कुछ तस्वीरें भेजीं.  तस्वीरें देखते ही मन एक बार फिर उस मकान को अपनी आँखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठा.  पता नहीं कब मैंने पत्नी या बेटी से इसका ज़िक्र कर दिया.  उसी का जो परिणाम हुआ, उसकी कहानी यहाँ लिख रहा हूँ.


इस बार उदयपुर जाना एक पारिवारिक विवाह के कारण हुआ.  मेरे भतीजे की बेटी का विवाह था. इन लोगों से हमारी आत्मीयता इतनी सघन है कि बेंगलुरु से बेटी ने भी अपनी व्यस्तता को किनारे रखकर उसमें आने का फैसला किया.  बेटा क्योंकि विदेश में है, उसके लिए चाह कर भी आना संभव नहीं हुआ. आने से पहले बेटी ने  हम दोनों से बात की और कहा कि विवाह के बाद एक दिन और उदयपुर में रहेंगे.  हमें भी यह प्रस्ताव अच्छा लगा.  परिवार के विवाह में तो स्वाभाविक ही बहुत व्यस्तता रहती है; उसके बाद का समय पूरी तरह हमारा अपना होगा.


बेटी ने मुझसे दो-तीन बार पूछा—विवाह के बाद हम कहाँ ठहरेंगे?

वह मुझसे किसी अच्छे होटल का सुझाव चाह रही थी.  मैंने जो सुझाव दिए, उसे पसंद नहीं आए.  मेरा कहना था कि या तो उसी रिसॉर्ट में जहां विवाह हो रहा है, एक दिन और रुक जाएंगे, या फिर उदयपुर पहुँचकर कोई उपयुक्त होटल देख लेंगे.  आखिर उदयपुर हमारे लिए कोई नया शहर तो है नहीं!

मेरा ध्यान इस बात की तरफ गया ही नहीं कि बेटी के मन में कुछ और चल रहा है.

विवाह के दौरान उसने अचानक बताया—“पापा, मैंने होटल शिव निवास पैलेस में कमरा बुक कर लिया है.”


मैंने इसका नाम तो सुना था, और मेरा अनुमान था कि यह बहुत महँगा होटल होगा.

वह मेरे अनुमान से भी कहीं अधिक महँगा निकला.

होटलों की मेरी सूची में तो वह था ही नहीं.  लेकिन बेटी ने बुक कर लिया था तो अब क्या कहा जा सकता था!


विवाह सानंद सम्पन्न हुआ.  सच कहूँ तो अपनी अब तक की जिंदगी में इतना शानदार और सुरुचिपूर्वक नियोजित विवाह मैंने नहीं देखा.  अच्छा लगा कि हमारे परिवार ने ऐसा आयोजन किया. हम सारे ही लोग निम्न मध्यमवर्ग की पैदाइश हैं. इसलिए यह सब और अधिक आनंदित करता है.


अगली सुबह बेटी ने टैक्सी बुलाई.  हम शहर से बाहर स्थित उस रिसॉर्ट से शिव निवास पैलेस की ओर चल पड़े.

जैसे ही टैक्सी उदयपुर के भीतरी हिस्से में पहुँची, मेरे मानस-पटल पर बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियाँ एक-एक करके झिलमिलाने लगीं.  उससे पहले अशोक नगर से गुजरते हुए बाईं ओर अपना कॉलेज—तब का एम.बी. कॉलेज— दिखा तो अचानक वह समय सामने आ गया जब मैं यहाँ विद्यार्थी था.  1967 के बाद इस परिसर में शायद एक-दो बार ही आया हूँ.


सूरजपोल से गुजरे तो बहुत-सी यादें ताजा हो गईं.  प्रयाग दास जी का स्थल नज़र आया तो महंत मुरली मनोहर शरण जी का स्नेह भी याद आया. बालकवि बैरागी के कारण उनसे परिचय हुआ था और फिर उनका अकुंठ स्नेह मुझे भी मिला. अमल का कांटा पार करते हुए जब एक जगह कालाजी गोराजी लिखा हुआ नज़र आया तो एकदम से यह बात याद आई कि यहीं तो मेरा जन्म हुआ था. मां जो बताया करती थीं, उसे याद किया तो अनुमान हुआ कि वह शायद कोई मिशनरी अस्पताल रहा होगा. वे किसी मिस साहब की खूब चर्चा किया करती थीं, जो कदाचित वहाँ की अंग्रेज़ नर्स रही होंगी. उससे थोड़ा आगे बढ़े तो शीतला माता का मंदिर आया और फिर गाड़ी चढ़ाई चढ़ने लगी. मैं पत्नी को बताने लगा कि हमारे समय में उदयपुर में कोई भी विवाह समारोह शीतला माता की पूजा के बिना शुरू नहीं होता था. ऐसी बहुत सारी यादें ताज़ा होती गईं.

शहर बदल गया था, लेकिन मेरे भीतर का उदयपुर अभी भी वैसा का वैसा था.

शिव निवास पैलेस उदयपुर के राजमहल का ही एक अंग है.  उदयपुर के दूरदर्शी महाराणा भगवत सिंह ने जगमंदिर को होटल (लेक पैलेस) में बदलकर जिस परंपरा की शुरुआत की थी, बाद में अनेक राजाओं-महाराजाओं ने उसका अनुकरण किया.  महाराणा भगवत सिंह वर्तमान महाराजा श्रीजी लक्ष्यराज सिंह के दादा थे.

मेरे पिता जी बताया करते थे कि उनका महाराणा भूपाल सिंह जी (जो भगवत सिंह जी के पिता थे) के यहाँ खूब आना-जाना था और उन्होंने भगवत सिंह जी को अपनी गोद में खिलाया था.  उन्हीं भगवत सिंह के पुत्र अरविंद सिंह उदयपुर के उसी एम.बी. कॉलेज में मेरे सहपाठी थे.


शिव निवास पैलेस सचमुच पैलेस है.  हमारा सुइट पिछोला झील के ठीक सामने था.  खिड़की से होटल लेक पैलेस दिखाई दे रहा था और उसके पीछे बादलों में से सज्जनगढ़ झाँक रहा था.  कमरे में थोड़ा व्यवस्थित होने के बाद बेटी ने कहा—“चलें, शहर घूम आते हैं.”

होटल की गोल्फ कार्ट से हम त्रिपोलिया तक आए और वहाँ से एक ऑटो किया कि जहाँ-जहाँ हम चाहें, वह हमें ले जाए.

और तभी मेरी ट्यूबलाइट जली. मुझे बेटी का ‘षड्यंत्र’ समझ में आया! षडयंत्र शब्द नकारात्मक है, लेकिन मुझे कोई और अभिव्यक्ति सूझ नहीं रही है, इसलिए इसका उपयोग कर लिया है.

उसके मन में यह बात बैठी हुई थी कि पापा अपना पुराना घर और अपना पुराना शहर फिर से देखना चाहते हैं.  उसने बहुत सावधानी से पूरी योजना बनाई थी और मुझे तनिक भी संदेह नहीं होने दिया.

उसने बाकी सारे विकल्पों को दरकिनार करके उसी होटल को चुना जो मेरे पुराने घर के इलाके में था.  उसकी योजना थी कि पापा अपने पुराने घर के आसपास ही रहें और अपने अतीत की स्मृतियों को फिर से जी सकें.

मैं अनजान बना रहा और वह अपना काम करती रही.

ऑटो में बैठने से पहले हमने अपने पुराने घर के नए स्वामी सुरेंद्र वैष्णव को फोन करके अनुरोध किया कि वे वहाँ पहुँच जाएँ, ताकि हम घर को भीतर से एक बार फिर देख सकें.  वह भला आदमी अपने सारे काम छोड़कर दौड़ा चला आया.

राजमहल के द्वार से जगदीश मंदिर के सामने होते हुए जब हम जगदीश रोड पर स्थित अपने पुराने घर के सामने पहुँचे, सुरेंद्र हमारा इंतजार कर रहे थे.


बाजार की शक्ल-सूरत काफी बदल चुकी थी.  बहुत-से पुराने मकान गायब हो गए थे और उनकी जगह नए मकानों ने ले ली थी.  लेकिन सड़क वही थी, मोहल्ला वही था.  पता नहीं अब वहाँ किसी को यह बात मालूम भी है या नहीं कि मेरे जमाने में इस जगह को ‘सेठों की ओळ’ कहा जाता था. वजह यह कि उस मुहल्ले में बहुत सारे घर सेठ कंदोई लोगों के थे. सेठ कंदोई, आज की भाषा में पारंपरिक शेफ़! शादी ब्याह में खाना बनाने वाले.

वहीं मेरी वह दुकान थी, जहाँ बैठकर मैंने 1959 में अपने पिता के देहावसान के बाद जैसे-तैसे अपना घर चलाया था.  वहीं घड़ीसाजी की थी.  पहले उस दुकान पर एक लम्बा साइनबोर्ड हुआ करता था – भगतराम रामप्रताप. बाद में जब नया साइनबोर्ड बना तो उस पर लिखवाया गया था – बाबू रामप्रताप दुर्गाप्रसाद. भगतराम मेरे दादाजी का नाम था. तो इस दुकान को 1967 में मेरी नौकरी लगने के बाद स्थायी रूप से बंद कर दिया गया —और शायद उसी दिन अपनी माँ के मन में एक स्थायी नाराजगी का बीज भी मैंने बो दिया था.  


अब उस दुकान का रूप बहुत बदल चुका था.  वहाँ बुटीक जैसी एक दुकान थी और उसे एक छोटी-सी लड़की संभाल रही थी.  जाहिर है, उसने वह जगह किराए पर ले रखी थी.

दुकान के बाजू में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ हुआ करती थीं.  उन्हीं सीढ़ियों पर बैठकर मेरी माँ और बाद में मौसी अपनी बेनूर जिंदगी का बहुत-सा समय बिताती थीं.  वे सीढ़ियाँ ही उनका ‘रामझरोखा’ थीं, जहाँ बैठकर वे दुनिया का मुजरा लेती थीं.  मोहल्ले की बुजुर्ग होने के नाते मुजरा लेने का उनका हक भी था.

सीढ़ियाँ अब भी थीं, मगर उनका स्वरूप बदल चुका था.

सुरेंद्र के साथ चारु और मैं ऊपर गए.  पत्नी नीचे ही खड़ी रहीं. वे इसी घर में दुल्हन बनकर आई थीं और तब भी उन सीढ़ियों  से घबराती थीं, इस बार और ज़्यादा घबरा गईं.  मेरा मन उन कमरों को देखने का था जिनमें रहकर मैंने बी.ए. और एम.ए. की पढ़ाई की थी और जिनका विस्तृत वर्णन मैंने श्री सुरेश उनियाल द्वारा संपादित खूबसूरत पुस्तक ‘मेरा कमरा’ (काव्यांश प्रकाशन, ऋषिकेश) के दूसरे भाग में किया है.

मेरे उस मकान के खरीददार सुरेंद्र वैष्णव के परिवार में भी इन वर्षों में काफी उथल-पुथल हुई थी. कई सदस्य दिवंगत हो गए. अब वही इस भवन का मालिक है और उसने इसकी व्यावसायिक संभावनाओं का पूरा उपयोग किया है.  उसने बताया कि ऊपर की तीन मंजिलों पर उसने दो-दो कमरे बना दिए हैं, जिन्हें पर्यटकों को किराए पर दिया जा सकता है.  हर कमरे में जरूरी सुविधाएँ हैं.  एसी और टीवी भी हैं.

मैं कल्पना भी नहीं कर पा रहा था कि मेरे उस पुराने घर में यह सब संभव हो सकता है.

लेकिन सुरेंद्र ने कर दिखाया था.

हाँ, इसका एक परिणाम यह हुआ कि जिस कमरे में बैठकर मैंने पढ़ाई की थी, वह अब अस्तित्व में ही नहीं था.  वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे मेरे उस समय की याद दिला सके.

बस एक कल्पना थी—

कि मैं अपने ही पुराने घर में खड़ा हूँ. वहां खड़ा हूं जहां कभी टेबल लैम्प की रोशनी में रात-रात भर पढ़ा करता था.

चौथी मंजिल के बाद खुली छत थी.  पहले तो मैं तीसरी मंज़िल पर ही रुक गया, लेकिन फिर मन नहीं माना तो हाँफते-हाँफते वहाँ भी गया.  क्या पता फिर कभी आना हो या न हो!  ‘बाज़ार’ फ़िल्म का वो गाना जेहन में गूंजा – देख लो आज हमको जी भर के.


वहाँ से सामने अपना कंवरपदा स्कूल देखा.  घर के ठीक सामने के जैन मंदिर की छत देखी. और देखी वह बदली हुई सड़क भी, जिस पर कभी मेरा रोज का आना-जाना हुआ करता था.

सुरेंद्र ने घर का सामने वाला रूप लगभग जस का तस रखा है.  यह उसकी व्यावसायिक बुद्धि भी है.  उस मोहल्ले की पुरानी इमारतें अब भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं.


थोड़ी देर ऊपर खड़ा रहा.  अपने अतीत को जैसे साँसों में भरता रहा.  फिर आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतर आया.

मेरे घर से लगी हुई कपड़ों की एक दुकान थी. पता चला, उसके मालिक कैलाश जी अब नहीं रहे.  उसके आगे एक धोबी का घर था.  उस परिवार का लड़का कन्हैयालाल मेरा सहपाठी था और उसकी एक बहन मेरे साथ खेला करती थी.  उनके बारे में भी ऐसे ही समाचार मिले.

सामने के एक सेठ परिवार से हमारी बड़ी आत्मीयता थी. उनका नाम नंद लाल जी था और वे उदयपुर के उस ज़माने के नामी हलवाई थे. झकोरमा पूड़ी (जो अब लुप्त प्राय: है!) बनाने में उनको महारत हासिल थी और उनका कौशल हम प्राय: अपने घर से देखा करते थे. एक ख़ास तरह (जिसे काठा गेहूं कहा जाता था) के आटे से बहुत बड़े आकार की रोटी बेली जाती और फिर उसे आज की रूमाली रोटी की तरह हवा में उछाल-उछाल कर और फैलाया जाता. असल कमाल इसके बाद होता. तेज़ खौलते तेल (या घी) में उस रोटी को तलने के लिए फेंका जाता. क्या मज़ाल कि तेल/घी की एक बूंद भी उछल जाए! उसका स्वाद दैवीय होता था. नंद लाल जी का  बेटा अंबा लाल बाद में सरकारी नौकरी में लग गया. पता चला, वे लोग भी अब दूसरे लोक के वासी हो चुके हैं. अंबा लाल का बेटा ज़रूर मिला.

इतने लंबे अंतराल में यह तो होना ही था.

फिर भी यह ‘होना ही था’ को स्वीकार करना आसान नहीं होता.

मकान की दूसरी तरफ, मेरे घर से सटा हुआ एक टाइपिंग इंस्टीट्यूट था, जिसके मालिक एक मास्टर साहब थे.  पता चला, वे खासे वृद्ध हो गए हैं, लेकिन शाम को वहाँ आते हैं.  उनके बेटे को अपना परिचय दिया और कहा कि उन्हें मेरी याद दिलाए.

एक दुकान छोड़कर पालीवाल जी की कचौरी की दुकान थी.  उदयपुर की अनगिनत इंस्टाग्राम रीलों में अब उसका जिक्र अनिवार्यत: मिलता है.  लोकप्रिय तो वह मेरे जमाने में भी थी, लेकिन अब वह एक ‘क्रेज’ बन चुकी है.

मेरी तमन्ना थी कि इस दुकान की एक कचौरी जरूर खाऊँ.

उस समय गरम कचौरी नहीं निकल रही थी.  जैसी थी, वैसी ही खा ली.

पैसे देने लगा तो दुकान के युवा स्वामी ने लेने से मना कर दिया.

शायद वह मुझे जानता था.


पता नहीं उसने मुझे पहचाना था या केवल मेरे अतीत को.

मेरी आँखें नम हो गईं.

अपने घर को एक बार फिर देखकर और निदा फ़ाज़ली की उस ग़ज़ल को मन ही मन गुनगुनाते हुए, जिसे जगजीत सिंह ने बहुत खूबसूरती से गाया है, हम लोग हाथी पोल की ओर बढ़ गए.

उस ग़ज़ल का एक-एक शेर जैसे मेरी ही बात कह रहा था.

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से

किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब

सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं

हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार

अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

 

उदयपुर में जन्मा, वहीं बड़ा हुआ, वहीं पढ़ा-लिखा और अब उसी उदयपुर में एक पर्यटक की तरह आना होता है!

यही तो जीवन है.

लेकिन इस कहानी में बेटी के उस ‘षड्यंत्र’ का एक सिरा अभी बाकी है.

यह बात लगभग एक दशक पुरानी है.  तब भी बेटी ने एक दिन कहा था—“पापा, क्यों न इस बार हम उदयपुर घूमने चलें?” बेटी हमें घुमाती रहती है. कभी यहां, कभी वहां. खूब ही घुमाया है उसने हमें.

हम दोनों ने हामी भर दी.

उसने बहुत सोच-समझकर फिर उसी इलाके में एक होटल चुना. शायद लेक पिछोला होटल.  मंशा वही थी—पापा को लगे कि वे अपने पुराने घर के आसपास ही रह रहे हैं.

तब हमने सिटी पैलेस देखा, जगदीश मंदिर गए, गणगौर घाट पहुँचे, पिछोला की सैर की, फतहसागर घूमे और जैसे एक बार फिर उदयपुर को जी भरकर जिया. एक पारंपरिक रेस्तरां में जाकर उदयपुर का पारंपरिक खाना भी खाया. झकोरमा पूड़ी भी.

तब भी हम अपने पुराने घर के सामने से गुजरे थे.  कुछ तस्वीरें भी ली थीं. घर के भीतर नहीं जा पाए थे.  उस समय घर का इस तरह नवीनीकरण नहीं हुआ था.

और क्या गजब का संयोग था कि जब हम घर के सामने से होते हुए घंटाघर की तरफ जा रहे थे, यही सुरेंद्र हमें यकायक सड़क पर मिल गए.  उन्होंने हमें पहचान लिया और लगभग जबरन घंटाघर के पास की बहुत विख्यात लाला हलवाई की दुकान पर ले जाकर गुलाब जामुन खिलाए.

उस दिन भी शायद उदयपुर ने हमें पहचान लिया था.

हमारी बेटी इस मामले में विलक्षण है.

उसे बस इतना पता चल जाए कि पापा की कोई इच्छा है.  फिर वह जैसे भी हो, उस इच्छा को पूरा किए बिना चैन नहीं लेती.  और पूरा भी ऐसे ढंग से करती है कि हमें भनक तक नहीं लगती.

वह कभी यह नहीं कहती—“आपने चाहा था, इसलिए मैंने ऐसा किया. ”

शायद यही उसके प्रेम का सबसे सुंदर ढंग है.

वह हमारी इच्छाओं को हमारे कहने से पहले सुन लेती है.

और फिर चुपचाप उन्हें पूरा कर देती है.

यही कौशल उसने अपने भाई के साथ मिलकर हमारी लंदन-पेरिस यात्रा को संभव बनाने में भी इस्तेमाल किया था.

उसकी चर्चा फिर कभी. भाई अर्थात हमारे बेटे विश्वास के प्यार जताने के तरीकों की बात भी कभी अलग से करूंगा. आज तो विचारों की रेल इस पटरी पर चल निकली, तो चलने दिया है.

फिलहाल इतना ही कि उदयपुर से लौटते हुए मुझे लगा—शहर भले ही हाथ से निकल जाए, मकान  भले ही किसी और का हो जाए, गलियाँ बदल जाएँ, परिचित चेहरे एक-एक करके स्मृति में बदल जाएँ, लेकिन आदमी अपने शहर से पूरी तरह कभी विदा नहीं होता.

वह शहर उसके भीतर कहीं रह जाता है.

और कभी-कभी कोई बेटी उस भीतर छिपे शहर का दरवाजा चुपचाप खोल देती है.

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Tuesday, August 11, 2026

प्रबोध कुमार गोविल: एक लेखक जो चिर युवा और अजातशत्रु है!



पिछले कुछ दिन बड़ी मानसिक ऊहापोह के रहे हैं. मैंने वादा कर लिया था कि हिंदी के बड़े रचनाकार श्री प्रबोध कुमार गोविल पर केंद्रित एक ग्रंथ के लिए अपना लेख ज़रूर दूंगा, लेकिन क्या पता था कि यही वादा मेरी मानसिक ऊहापोह का कारण बन जाएगा! ऐसा नहीं है कि मुझे श्री गोविल के बारे में एक लेख लिखना है और मेरे पास इस लेख के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है. बात इसके उलट है. और बात यह भी नहीं है. सामग्री तो बहुत है, और ऐसी भी कोई मज़बूरी नहीं है कि लेख छोटा रखा जाए. जितना बड़ा चाहे लिख सकता हूं! फिर क्या उलझन है?

श्री प्रबोध गोविल से मेरी आत्मीयता काफी पुरानी है. लेकिन उतनी भी पुरानी नहीं है जितना लेखक प्रबोध गोविल से परिचय है. उनके प्रारंभिक उपन्यासों में से एक, ‘देहाश्रम का मनजोगी' की समीक्षा मैंने लिखी थी. यह कोई चारेक दशक पुरानी बात होगी. तब मैं समीक्षाएं खूब ही लिखता था. गोविल जी का यह उपन्यास मेरे मन में कुछ ऐसा अटका कि अब तक अटका ही हुआ है. शायद यह इस उपन्यास का ही असर था कि इसके बाद मैं जब भी किसी रचना पर लेखक के रूप में प्रबोध कुमार गोविल का नाम पढ़ता, उसे पढ़े बग़ैर नहीं रहता. यह दावा कर सकता हूं कि उनका लिखा अधिकांश मैंने पढ़ रखा है. इन दिनों मेरा पढ़ना कम हो गया है लेकिन गोविल जी का लिखना बदस्तूर ज़ारी है. इसलिए बैकलॉग बढ़ता जा रहा है! बहरहाल. लम्बे समय तक मेरा परिचय लेखक प्रबोध गोविल से ही रहा. फिर, इस शताब्दी के प्रारंभ में जब मैं जयपुर आ बसा तो व्यक्ति प्रबोध गोविल से भी सम्पर्क हुआ और बहुत जल्दी वह सम्पर्क गहरी आत्मीयता में परिवर्तित हो गया. यह आत्मीयता अब तक जस की तस है - यह नहीं कहूंगा. इसलिए नहीं कहूंगा कि आत्मीयता जस की तस नहीं है. वह पहले से अधिक प्रगाढ़ हुई है.

अब जो व्यक्ति आपका आत्मीय हो और जिसके लिखे के आप प्रशंसक हो, उसके बारे में क्या लिखें और क्या न लिखें! सब कुछ लिख दें तो पाठक पर अत्याचार और न लिखें तो ख़ुद पर ज़्यादती. सोचा उनके व्यक्तित्व पर लिख दूं. लगा कि इतने बड़े लेखक के व्यक्तित्व पर लिख कर उनके साहित्य की अनदेखी करना तो भयंकर पाप होगा. और अगर केवल साहित्य पर लिखूं तो यह उनके साथ अपनी आत्मीयता के प्रति अन्याय होगा. यही रही मेरी ऊहापोह!
लेखना टलता रहा और कृष्णा (रावत) जी का आत्मीय मधुर आग्रह बार-बार धिक्कारता भी रहा. आखिर हार कर आज लिखने बैठ गया हूं. बग़ैर यह सोचे कि क्या लिखना है! जिधर कलम ले जाएगी, चला जाऊंगा. प्रबोध गोविल जी हिंदी के उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने लगातार लिखा है, बहुत लिखा है उसमें से ज़्यादातर अच्छा लिखा है. मुझे उनके लिखे में जो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है वह है उनके लेखन की ताज़गी. आप उनकी किन्हीं भी दो रचनाओं को एक जैसा नहीं पाएंगे. अगर दस साल पहले लिखी उनकी किसी रचना को पढ़ने के बाद उनकी हाल की किसी रचना को पढ़ेंगे तो आपको उनमें अंतर साफ़ नज़र आएगा. वे समय को अपने से आगे नहीं निकलने देते हैं. समय के साथ जुगलबंदी करते हैं. जैसे-जैसे समय बदलता है उनकी भाषा बदलती है, उनका वाक्य विन्यास बदलता है, उनका वस्तु चयन बदलता है, उनका ट्रीटमेण्ट बदलता है और बदलता है चीज़ों के प्रति उनका नज़रिया. इस मामले में वे उन लेखकों से बहुत भिन्न हैं जिनकी पहली और सबसे नई रचना में किसी भी तरह का अंतर करना नामुमकिन होता है. 1953 में जन्मे प्रबोध कुमार गोविल भले ही अस्सी के पास पहुचने वाले हों, उनका सोच और उनकी कलम अभी भी एकदम युवा है. और यही युवापन उन्हें हर पीढ़ी का प्रिय बनाता है. यह आकस्मिक नहीं है कि गोविल जी का लिखा जितना मुझ जैसे पुरानी पीढ़ी के पाठकों को लुभाता है उतना ही, बल्कि शायद उससे भी अधिक नई पीढ़ी के पाठकों को भी आकर्षित करता है. इस मामले में वे हिंदी साहित्यकारों में अलग से चीन्हे जा सकते हैं.

प्रबोध कुमार गोविल जी न केवल अपने लेखन में युवा हैं, उसे पाठकों तक पहुंचाने के नए तौर तरीकों के इस्तेमाल के मामले में भी युवा है. वे कम्प्यूटर और इण्टरनेट का खूब प्रयोग करते हैं और उन तमाम प्लेटफॉर्म्स पर अपनी रचनाओं के साथ मौज़ूद मिलते हैं जिन तक आज की पीढ़ी पहुंचती दिखाई देती है. शायद ही ऐसा कोई नया प्लेटफॉर्म हो जहां आपको गोविल जी की रचनाएं न मिलें. और केवल मिलती ही नहीं हैं, उस प्लेटफॉर्म के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक के रूप में गोविल जी चमकते दिखाई देते हैं. कहना अनावश्यक है, फिर भी कह देना चाहता हूं कि यह इसी वजह से मुमकिन हो पाता है कि गोविल जी अपने लेखन में हमेशा नए बने रहते हैं. लेखन में भी और सोच में भी.

प्रबोध जी के लेखन की एक और बड़ी ख़ासियत यह है कि उनके यहां कथ्य का विपुल वैविध्य है. जीवन के अनगिनत पहलुओं को वे अपने कथा साहित्य में छूते हैऔर न केवल छूते हैं, उसकी सूक्ष्म पड़ताल करते हैं. मनुष्य मन के अनगिनत अंधेरे कोनों तक वे हमें ले जाते हैं और फिर उसे अपनी संवेदनशील अभिव्यक्ति से आलोकित कर पाठक के अनुभव संसार को समृद्ध बनाते हैं. उनके लेखन में समाज का बदलता स्वरूप, परिवर्तित होती सामाजिक संरचना, मानवीय सम्बंधों में आती जा रही दरारें, स्त्री-पुरुष सम्बंधों की जटिलताएं, महानगरों का अकेलापन, राजनीति के अनेक चेहरे, चमक-दमक के पीछे का यथार्थ और भी न जाने क्या-क्या मिलता है! यही यह भी कह दूं कि वे केवल लिखने के लिए नहीं लिखते हैं. उनका सारा लेखन सोद्देश्य है लेकिन यह उद्देश्यपरकता आरोपित न होकर रचना में रची-बसी मिलती है. आप केवल रचना को पढ़ते हैं, उससे प्रभावित या आनंदित होते हैं और इसी बीच हौले से वह रचना आपकी मानसिकता को अपनी गिरफ़्त में लेकर उसे बदल देती है. आप चीज़ों को नए नज़रिए से देखते-समझते हैं और इस तरह आपका सोच नया और अधिक सकारात्मक रुख अख़्तियार कर लेता है. इस तरह प्रबोध कुमार गोविल का लेखन एक बेहतर समाज के निर्माण का सहयोगी बनकर हमारे सामने आता है.

प्रबोध गोविल जी भले ही हिंदी में लिखते हैं उनकी लगभग सारी ही रचनाएं अनेक विविध भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर पूरे देश में पहुंची हैं. उर्दू, सिंधी, पंजाबी, संस्कृत, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, अरबी, असमिया और मराठी के अलावा अंग्रेज़ी सहित अन्य कई विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए हैं. कई प्लेटफॉर्म्स पर उनकी रचनाएं सुनने और देखने के लिए भी सुलभ हैं. हिंदी के बहुत कम ऐसे वरिष्ठ लेखक हैं जिन्होंने संचार के नवीनतम माध्यमों को इस सहजता और उत्साह के साथ अपनाया व इस्तेमाल किया है.

अपने लेखन के अतिरिक्त भी जीवन के अनेक क्षेत्रों में श्री गोविल सक्रिय हैं. शिक्षा और पत्रकारिता से तो उनका गहरा रिश्ता रहा ही है. एक स्वैच्छिक ग़ैर सरकारी संस्था राही सहयोग संस्थान के माध्यम से वे समाज सेवा के अनेक प्रकल्प संचालित करते हैं. यही राही सहयोग संस्थान बहुत सारी साहित्यिक गतिविधियां भी आयोजित करता है. राही सहयोग संस्थान पिछले कुछ बरस से हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी के एक सौ रचनाकारों की एक सूची ज़ारी करता रहा है. हिंदी समाज में इस सूची को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं रही हैं. जहां कुछ लोग इसे स्वागत योग्य मानते हैं कुछ अन्य इसकी कटु आलोचना भी करते हैं. जो आलोचना करते हैं वे प्राय: इस चयन की प्रक्रिया की अनदेखी करते हैं और एक बनी-बनाई धारणा के आधार पर ऐसा करते हैं. लेकिन सारी आलोचनाओं से अप्रभावित श्री गोविल मौन भाव से अपना काम करते रहते हैं. असल में यही मौन भाव, ठहराव और दृढ़ संकल्प श्री गोविल की असल ताकत है. बिना किसी विवाद में उलझे, बिना किसी कटु बहस का हिस्सा बने वे चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. मैं ख़ुद बहुत बार सोचता रहा हूं कि उन्होंने इस आरोप का जवाब क्यों नहीं दिया, या उस टिप्पणी पर मौन क्यों रह गए? लेकिन बाद में महसूस किया कि अगर वे उस तरह की चीज़ों में ही अपना वक़्त खराब करते रहते तो फिर लिखते कब! उन्हें जो भी कहना था, अपने लेखन के माध्यम से कहा है. यह बहुत बड़ी बात है.

इधर श्री गोविल की आत्मकथा के चार भाग प्रकाशित हुए हैं: इज़्तिरार, लेडी ऑन द मून, तेरे शहर के मेरे लोग, और 44 पिंजरे तोड़ के भागा क़ैदी. गोविल जी की यह आत्मकथा हिंदी के अपेक्षाकृत कमज़ोर आत्मकथा खण्ड को समृद्ध करने वाली कृति है. यहां वे अपनी जीवन यात्रा को जीवन के संघर्षों को और जीवनानुभवों को जिस निर्मम तटस्थता के साथ सामने लाते हैं, वह विलक्षण और स्पृहणीय है. वे अपने अभावों और संघर्षों की बात करते हैं लेकिन इसलिए नहीं कि उन्हें किसी की सहानुभूति की ज़रूरत है. वे केवल तथ्य कथन करते हैं. यह तटस्थता विरल है. उनकी आत्मकथा एक लेखक की आत्मकथा मात्र न होकर एक ख़ास कालखण्ड का सजीव और प्रामाणिक चित्रण है.


मुझे गर्व है कि हिंदी के ऐसे बड़े लेखक श्री प्रबोध कुमार गोविल को मैं अपना मित्र कह सकता हूं. मुझे उनका अकुण्ठित स्नेह मिला है और यह स्नेह मेरी सबसे बड़ी पूंजी है. एक व्यक्ति के रूप में वे निहायत ही पारदर्शी, ईमानदार और अत्यधिक विश्वसनीय हैं. वे उन बहुत थोड़े से लेखकों में से हैं जिनका मित्र तो हर कोई है, शत्रु कोई भी नहीं है.
मेरा कामना है कि श्री गोविल स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और अपने लेखन से हम सबको स्मृद्ध करते रहें.

Wednesday, December 31, 2025

राजकीय महाविद्यालय, सिरोही: आज रंग है!



आज मेरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. महाविद्यालय के प्राचार्य डो अजय शर्मा ने इस अवसर पर महाविद्यालय के पूर्व शिक्षकों को भी आमंत्रित किया है. मेरे लिए यह स्वर्णिम अवसर था अपने खूबसूरत अतीत को एक बार फिर से जी लेने का, लेकिन मैं इस अवसर को लपक लेने से वंचित रह गया. डॉ अजय शर्मा ने बहुत आग्रह किया, और अगर वे न भी करते तो मुझे इस आयोजन में होना ही था. लेकिन.... सब कुछ अपने वश में कहां होता है! मैं सिरोही से 400 किलोमीटर दूर, जयपुर में हूं और कल्पना कर रहा हूं कि वहां क्या-क्या हो रहा होगा! इस कॉलेज में और इस कस्बे में मैंने अपनी उम्र के बेशकीमती ढाई दशक गुज़ारे हैं! स्मृतियों का एक पूरा कोठार है मेरे पास. भले ही अब मैं सिरोही में नहीं रहता हूं, सिरोही अब भी मुझ में सांस लेता है! हमेशा लेता रहेगा. 


जब भी सिरोही याद आता है, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ भी साथ-साथ याद आ जाते हैं. उनकी एक  बहुत लोकप्रिय ग़ज़ल के मतले की दूसरी पंक्ति (मिसरा-ए-सानी) है: अपनी ख़ुशी न आए न अपनी खुशी चले! मेरे बारे में यह बात सौ फ़ीसदी सही है. 06 अगस्त 1974 को जब चित्तौड़ छोड़कर सिरोही आना पड़ा था तो वह मेरी मज़बूरी थी. अच्छा ख़ासा वहां जमा हुआ था. लेकिन तत्कालीन विधायक (अब स्वर्गीय) प्रो निर्मला सिंह को मुझसे जाने  क्या नाराज़गी हुई कि उन्होंने मेरा तबादला वहां से सिरोही करा दिया. मज़े की बात यह कि तबादला कराने के बाद वे मुझे आश्वस्त भी करती रहीं कि मैं आपका ट्रांसफर कैंसल करा दूंगी. निर्मला जी मेरी सहकर्मी थीं और उनसे सघन पारिवारिक आत्मीयता थी. उनके बारे में मैंने विस्तार से अपनी किताब 'गए दिनों का सुराग़ लेकर' में लिखा है. समय और सुविधा हो तो ज़रूर पढ़ें. अच्छा लगेगा. तो अनचाहे सिरोही आया, और आया तो फिर उर्दू के एक और मशहूर शायर को मन में बसा लिया: हज़रते दाग़ जहां बैठ गए, बैठ गए! 1974 में सिरोही आया और 1996 तक तो यहां बना ही रहा, इसके बाद भी कुछ और वक़्त टुकड़ों-टुकड़ों में  यहां गुज़ारा. य्हां गुज़ारे  वक़्त की चर्चा आगे कर रहा हूं. सिरोही से बाकायदा मेरा रिश्ता ख़त्म हुआ 17 जुलाई, 2000 को और इस बार भी कारण एक राजनेता ही बने. 21 मार्च 2000 को मैं राजकीय महाविद्यालय सिरोही का प्राचार्य बन कर आया और इसके दूसरे ही दिन तत्कालीन स्थानीय विधायक संयम लोढ़ा ने फ़ोन पर मुझे कहा, "अग्रवाल साहब, आप यहां आ तो गए हो, मैं आपको यहां रहने नहीं दूंगा." और उन्होंने नहीं ही रहने दिया. मात्र चार माह बाद 18 जुलाई को मैंने सिरोही को अलविदा कहा. लेकिन इन दोनों प्रसंगों का दूसरा पहलू यह भी है कि ये दोनों अप्रिय प्रसंग अंतत: मेरे लिए वरदान साबित हुए. अनचाहे सिरोही आया, लेकिन यहां लगभग 25 वर्ष रहा और इसने मुझे जितना दिया, उसका वर्णन नामुमकिन है. कुछ बातों की चर्चा आगे करूंगा. सिरोही से अनचाहे धकियाया गया, तो इसकी परिणति इस बात में हुई कि जयपुर पदस्थापित हुआ और अंतत: यहां का निवासी भी बना. कहां तो मेरा सपना यह था कि सिरोही कॉलेज से रिटायर होकर सिरोही में ही बस जाएंगे और कहां यह हुआ कि जयपुर से रिटायर होकर जयपुर में बस गए! लेकिन जयपुर में अपने विभाग के (लगभग) सर्वोच्च पर पर रहना और फिर यहां बस जाना मेरे व्यक्तित्व के विकास के लिए जितना  सकारात्मक रहा, उसको बताने के लिए बहुत सारे शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी. यहां रहकर साहित्य कला संस्कृति की दुनिया से मेरा रिश्ता और मज़बूत हुआ और अपने बहुत सारे सपने पूरे करने के मौके मिले. तो मुझे इन दोनों राजनेताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए! 


जैसा मैंने कहा, मैं अनचाहे सिरोही आया था. आया क्या, फेंका गया था. यहां का पहला दिन मुझे अब भी याद है. रात तीन बजे सिरोही के बस स्टैण्ड पर उतरना और भौंकते कुत्तों से जैसे-तैसे बचते हुए डाक बंगले पहुंचना. लेकिन कॉलेज में पहुंचने के बाद जैसे बहुत तेज़ी से सब कुछ बदलता गया. हिंदी विभाग के श्री सोहन लाल पटनी (तब वे डॉ नहीं हुए थे) ने अपने स्कूटर, जिसे उन्होंने गरुड़ नाम दे रखा था, पर मुझे शहर का एक चक्कर लगवाया और फिर अपने घर ले जाकर घी में डूबी रोटी खिलाई. तब उनसे जो रिश्ता कायम  हुआ वह उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा. वे विलक्षण व्यक्ति थे. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, और अपरिमित दुलार पाया. कॉलेज में और बहुत ज़बर्दस्त शख्सियतें थी, जैसे प्रो अमरलाल माथुर, प्रो गणपत लाल बोहरा, प्रो एम एल एच शाह, प्रो बीके गौड़ और भी बहुत सारे विद्वान शिक्षक गण. हरेक से अपार स्नेह मिला, और मिला मार्गदर्शन. कॉलेज का ऑफिस - उसके तो कहने ही क्या. श्री मोहम्मद शब्बीर ख़ान, श्री अब्दुल लतीफ - ये तो इंसान के रूप में फरिश्ते थे. काम में एक सौ दस फीसदी दक्ष. पूरे राजस्थान के उच्च शिक्षा जगत में इनकी धाक थी. लाइब्रेरियन मूल चंद सेठ - इनका तो कहना ही क्या! इन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया. 


एक से बढ़कर एक प्राचार्य-उपाचार्य यहां रहे. सबको याद करना संभव नहीं होगा, लेकिन प्रो श्याम लाल माथुर, प्रो महेश कुमार भार्गव, प्रो डी सी कृष्णानी, प्रो एचके रावत, डॉ जीसी छाजेड़ हरेक अपनी तरह से अप्रतिम. प्रो एचबी सक्सेना का व्यक्तित्व अलग ही था. उन जैसा रौब दाब वाला  प्राचार्य मैंने अपने पूरे सेवा काल में नहीं देखा, हालांकि मैंने कभी वैसा बनना नहीं चाहा.   इन सब प्राचार्यों ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि जब मुझे प्राचार्य की उसी कुर्सी पर बैठने का मौका मिला तो बैठने से पहले बहुत देर तक सोचता रहा कि जिस कुर्सी पर ऐसे महान लोग बैठ चुके हैं, क्या मैं उस कुर्सी पर बैठने के काबिल भी हूं? 


सिरोही में पढ़ाने का बहुत सुख मिला. मैंने अपने अध्यापन को यहां तराशा भी खूब. पुस्तकालय बहुत समृद्ध था, और हमने इसे और अच्छा बनाया. खूब पढ़ा, और कोशिश की कि उसका लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचे. विद्यार्थियों से मुझे अपार अपनापन मिला. छोटा कॉलेज था, इसलिए अगर कोई बाकायदा मेरा विद्यार्थी न भी रहा तो उसने गुरु वाला मान दिया. एक से ज़्यादा पीढ़ियां विद्यार्थी के रूप में मुझसे जुड़ीं.  अब सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत सारे पूर्व विद्यार्थी मुझसे जुड़े हैं. कॉलेज में खूब गतिविधियां कीं, और कॉलेज से बाहर शहर की गतिविधियों में भी सक्रिय सहभागिता की. बरसों मैंने विभिन्न ज़िला स्तरीय समारोहों का संचालन किया और इस निमित्त ज़िला प्रशासन ने मुझे अनेक बार सम्मानित भी किया. 


आज सिरोही कॉलेज में जो आयोजन हो रहा है उसका सबसे बड़ा आकर्षण हैं श्री शैलेश लोढ़ा. शैलेश लोढ़ा ने भारतीय मनोरंजन की दुनिया में जैसी पहचान बनाई है वह हम सबके लिए, विशेष रूप से इस पूरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही परिवार के लिए अत्यधिक गर्व की बात है. शैलेश ने साहित्य और मनोरंजन इन दो दुनिया में समान ख्याति अर्जित की है. जब मैं इस कॉलेज में पढ़ाता था, तभी शैलेश भी यहां के विद्यार्थी थे. शैलेश अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे. मुझे याद है कि तब मैं अपने कॉलेज के वार्षिक समारोहों का संचालन किया करता था, और बरस दर बरस मुझे शैलेश की उपलब्धियों की बहुत लम्बी सूची पढ़नी पड़ती थी. वैसे तो वे विज्ञान के विद्यार्थी थे, साहित्य में गहरी रुचि रखने के कारण उनका मुझसे भी नियमित सम्पर्क था. बल्कि इस कॉलेज के वे छात्र बने उससे पहले से, जब वे बालकवि शैलेश के रूप में जाने जाते थे, हमारा पारस्परिक सम्पर्क रहा. सम्पर्क के और भी कारण रहे, मसलन यह कि उनके पिता जी, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, मेरे प्रिय मित्र थे. शैलेश की दो बहनें एमए हिंदी की मेरी प्रिय छात्राएं थीं. शैलेश में जो सबसे बड़ा गुण मैं पाता हूं वह है उनकी अध्ययन वृत्ति. अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच वे नया से नया पढ़ते हैं और उन्हें उस पर बात करना भी अच्छा लगता है. मैं आज सिरोही में नहीं हूं इसमें मेरा यह मलाल भी शामिल है कि शैलेश से मिलने का एक अवसर मैं खो रहा हूं. उनके लिए मेरी शुभ कामनाएं! 


सिरोही कॉलेज के सारे स्टाफ में ग़ज़ब का भाईचारा था. किसी भी एक का सुख या दुख पूरे स्टाफ़ का सुख दुख होता था. होली दिवाली हरेक हरेक के घर जाता था. कोई ईद ऐसी नहीं बीती जब हम लोग शब्बीर साहब और लतीफ़ साहब के यहां न गए हों, और कोई होली दिवाली ऐसी नहीं बीती जब वे हमारे घर न आए हों. तब जो रिश्ते बने वे अब तक बरक़रार हैं. लम्बे समय तक यहां कम ही शिक्षक रहे, अत: सबमें भाई चारा रहा. बाद में जब उनकी संख्या बढ़ी तब भी यही आत्मीयता बनी रही. यह बहुत स्वाभाविक है कि कुछ लोगों से मेरी आत्मीयता ज़्यादा रही और वे मेरे सारे सुख दुखों के साथी रहे, अब भी हैं. व्यक्तिगत चर्चा यहां नहीं करूंगा.


सोहन लाल पटनी के कारण, और इस कारण भी कि उस काल खण्ड में राजस्थान साहित्य अकादमी बहुत सक्रिय थी, सिरोही में खूब सारी साहित्यिक गतिविधियां आयोजित हुईं और इस कारण हम राजस्थान के तो करीब-करीब सारे भी ख्यात साहित्यकारों को अपने कॉलेज में भी ला सके. हिंदी के बड़े कथाकार स्वयं प्रकाश उन दिनों सुमेरपुर में पद स्थापित थे, और मेरे आत्मीय थे. वे  मेरे कॉलेज में न जाने कितनी बार आए होंगे. विद्यार्थी भी उनसे घुल मिल गए थे और अगर वे महीना भर कॉलेज में नहीं आते तो विद्यार्थी इसरार करते कि सर, स्वयं प्रकाश जी को बुलाइये ना! और वे आ जाते. स्वयं प्रकाश ने मेरे ही कॉलेज से स्वयं पाठी विद्यार्थी के रूप में हिंदी में एम ए किया, और फिर इसी कॉलेज की लाइब्रेरी का लाभ उठाते हुए मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. भी की. मेरे कॉलेज से अपने लगाव का और यहां के अनुभवों का बहुत रोचक वर्णन उन्होंने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक 'धूप में नंगे पांव' में किया है. अद्भुत किताब है यह. 


जब मैं सिरोही आया तब परिवार में हम तीन प्राणी थे- पत्नी बेटा और मैं. यहां मेरा परिवार बड़ा हुआ. बेटी का जन्म यहीं हुआ. यहीं से बेटे ने पीईटी में सफलता प्राप्त कर अपनी जीवन राह चुनी. जब मैं उपाचार्य था, तब यहीं से उसका विवाह हुआ. सिरोही में जन्मी मेरी बेटी ने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सैकण्डरी परीक्षा में मेरिट में स्थान पाया और फिर उसने भी अपने भाई वाली ही राह चुनी. बाद में बेटी नौकरी करने अमरीका चली गई और बेटा ऑस्ट्रेलिया. बेटी के जीवन से सिरोही इस तरह भी जुड़ा कि सिरोही का निकटवर्ती गांव वराड़ा उसका ससुराल बना. यहां रहते हुए ही मेरी मां और फिर मौसी ने प्राण त्यागे. 


हम लोगों के जीवन में सिरोही ऐसा घुला मिला है कि हमारे बच्चे कहते हैं कि जब भी उन्हं घर का कोई सपना आता है, सपने में वही शांति नगर का किराये वाला घर आता है! 


सिरोही कथा अनंत है. अपनी दो किताबों - ‘समाज का आज’ और ‘गए दिनों का सुराग लेकर’ में मैंने सिरोही के बहुत सारे प्रसंग लिखे हैं. लेकिन जितने लिखे हैं उससे अधिक अभी लिखे जाने हैं! 


जीवन की इस  संध्या वेला में सिरोही में बिताए दिन बहुत याद आते हैं! वे दिन लौट कर नहीं आएंगे, लेकिन उनकी यादें मन को हमेशा प्रफुल्लित करती रहेंगी. 


मेरे मन में डॉ अजय शर्मा और उनकी पूरी टीम के प्रति असीम कृतज्ञता का  भाव है जिनंने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है. मेरा सुझाव है कि इसे महाविद्यालय कैलेण्डर का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए.   जो मित्र सिरोही कॉलेज के इस आयोजन में भाग ले पा रहे हैं, उन सबको मेरा सप्रीत अभिवादन और हार्दिक शुभ कामनाएं! 


मान लें कि मैं भी इस समय आपके साथ हूं.