पिछले कुछ दिन बड़ी मानसिक ऊहापोह के रहे हैं. मैंने वादा कर लिया था कि हिंदी के बड़े रचनाकार श्री प्रबोध कुमार गोविल पर केंद्रित एक ग्रंथ के लिए अपना लेख ज़रूर दूंगा, लेकिन क्या पता था कि यही वादा मेरी मानसिक ऊहापोह का कारण बन जाएगा! ऐसा नहीं है कि मुझे श्री गोविल के बारे में एक लेख लिखना है और मेरे पास इस लेख के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है. बात इसके उलट है. और बात यह भी नहीं है. सामग्री तो बहुत है, और ऐसी भी कोई मज़बूरी नहीं है कि लेख छोटा रखा जाए. जितना बड़ा चाहे लिख सकता हूं! फिर क्या उलझन है?
श्री प्रबोध गोविल से मेरी आत्मीयता काफी पुरानी है. लेकिन उतनी भी पुरानी नहीं है जितना लेखक प्रबोध गोविल से परिचय है. उनके प्रारंभिक उपन्यासों में से एक, ‘देहाश्रम का मनजोगी' की समीक्षा मैंने लिखी थी. यह कोई चारेक दशक पुरानी बात होगी. तब मैं समीक्षाएं खूब ही लिखता था. गोविल जी का यह उपन्यास मेरे मन में कुछ ऐसा अटका कि अब तक अटका ही हुआ है. शायद यह इस उपन्यास का ही असर था कि इसके बाद मैं जब भी किसी रचना पर लेखक के रूप में प्रबोध कुमार गोविल का नाम पढ़ता, उसे पढ़े बग़ैर नहीं रहता. यह दावा कर सकता हूं कि उनका लिखा अधिकांश मैंने पढ़ रखा है. इन दिनों मेरा पढ़ना कम हो गया है लेकिन गोविल जी का लिखना बदस्तूर ज़ारी है. इसलिए बैकलॉग बढ़ता जा रहा है! बहरहाल. लम्बे समय तक मेरा परिचय लेखक प्रबोध गोविल से ही रहा. फिर, इस शताब्दी के प्रारंभ में जब मैं जयपुर आ बसा तो व्यक्ति प्रबोध गोविल से भी सम्पर्क हुआ और बहुत जल्दी वह सम्पर्क गहरी आत्मीयता में परिवर्तित हो गया. यह आत्मीयता अब तक जस की तस है - यह नहीं कहूंगा. इसलिए नहीं कहूंगा कि आत्मीयता जस की तस नहीं है. वह पहले से अधिक प्रगाढ़ हुई है.
अब जो व्यक्ति आपका आत्मीय हो और जिसके लिखे के आप प्रशंसक हो, उसके बारे में क्या लिखें और क्या न लिखें! सब कुछ लिख दें तो पाठक पर अत्याचार और न लिखें तो ख़ुद पर ज़्यादती. सोचा उनके व्यक्तित्व पर लिख दूं. लगा कि इतने बड़े लेखक के व्यक्तित्व पर लिख कर उनके साहित्य की अनदेखी करना तो भयंकर पाप होगा. और अगर केवल साहित्य पर लिखूं तो यह उनके साथ अपनी आत्मीयता के प्रति अन्याय होगा. यही रही मेरी ऊहापोह!
लेखना टलता रहा और कृष्णा (रावत) जी का आत्मीय मधुर आग्रह बार-बार धिक्कारता भी रहा. आखिर हार कर आज लिखने बैठ गया हूं. बग़ैर यह सोचे कि क्या लिखना है! जिधर कलम ले जाएगी, चला जाऊंगा. प्रबोध गोविल जी हिंदी के उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने लगातार लिखा है, बहुत लिखा है उसमें से ज़्यादातर अच्छा लिखा है. मुझे उनके लिखे में जो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है वह है उनके लेखन की ताज़गी. आप उनकी किन्हीं भी दो रचनाओं को एक जैसा नहीं पाएंगे. अगर दस साल पहले लिखी उनकी किसी रचना को पढ़ने के बाद उनकी हाल की किसी रचना को पढ़ेंगे तो आपको उनमें अंतर साफ़ नज़र आएगा. वे समय को अपने से आगे नहीं निकलने देते हैं. समय के साथ जुगलबंदी करते हैं. जैसे-जैसे समय बदलता है उनकी भाषा बदलती है, उनका वाक्य विन्यास बदलता है, उनका वस्तु चयन बदलता है, उनका ट्रीटमेण्ट बदलता है और बदलता है चीज़ों के प्रति उनका नज़रिया. इस मामले में वे उन लेखकों से बहुत भिन्न हैं जिनकी पहली और सबसे नई रचना में किसी भी तरह का अंतर करना नामुमकिन होता है. 1953 में जन्मे प्रबोध कुमार गोविल भले ही अस्सी के पास पहुचने वाले हों, उनका सोच और उनकी कलम अभी भी एकदम युवा है. और यही युवापन उन्हें हर पीढ़ी का प्रिय बनाता है. यह आकस्मिक नहीं है कि गोविल जी का लिखा जितना मुझ जैसे पुरानी पीढ़ी के पाठकों को लुभाता है उतना ही, बल्कि शायद उससे भी अधिक नई पीढ़ी के पाठकों को भी आकर्षित करता है. इस मामले में वे हिंदी साहित्यकारों में अलग से चीन्हे जा सकते हैं.
प्रबोध कुमार गोविल जी न केवल अपने लेखन में युवा हैं, उसे पाठकों तक पहुंचाने के नए तौर तरीकों के इस्तेमाल के मामले में भी युवा है. वे कम्प्यूटर और इण्टरनेट का खूब प्रयोग करते हैं और उन तमाम प्लेटफॉर्म्स पर अपनी रचनाओं के साथ मौज़ूद मिलते हैं जिन तक आज की पीढ़ी पहुंचती दिखाई देती है. शायद ही ऐसा कोई नया प्लेटफॉर्म हो जहां आपको गोविल जी की रचनाएं न मिलें. और केवल मिलती ही नहीं हैं, उस प्लेटफॉर्म के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक के रूप में गोविल जी चमकते दिखाई देते हैं. कहना अनावश्यक है, फिर भी कह देना चाहता हूं कि यह इसी वजह से मुमकिन हो पाता है कि गोविल जी अपने लेखन में हमेशा नए बने रहते हैं. लेखन में भी और सोच में भी.
प्रबोध जी के लेखन की एक और बड़ी ख़ासियत यह है कि उनके यहां कथ्य का विपुल वैविध्य है. जीवन के अनगिनत पहलुओं को वे अपने कथा साहित्य में छूते हैऔर न केवल छूते हैं, उसकी सूक्ष्म पड़ताल करते हैं. मनुष्य मन के अनगिनत अंधेरे कोनों तक वे हमें ले जाते हैं और फिर उसे अपनी संवेदनशील अभिव्यक्ति से आलोकित कर पाठक के अनुभव संसार को समृद्ध बनाते हैं. उनके लेखन में समाज का बदलता स्वरूप, परिवर्तित होती सामाजिक संरचना, मानवीय सम्बंधों में आती जा रही दरारें, स्त्री-पुरुष सम्बंधों की जटिलताएं, महानगरों का अकेलापन, राजनीति के अनेक चेहरे, चमक-दमक के पीछे का यथार्थ और भी न जाने क्या-क्या मिलता है! यही यह भी कह दूं कि वे केवल लिखने के लिए नहीं लिखते हैं. उनका सारा लेखन सोद्देश्य है लेकिन यह उद्देश्यपरकता आरोपित न होकर रचना में रची-बसी मिलती है. आप केवल रचना को पढ़ते हैं, उससे प्रभावित या आनंदित होते हैं और इसी बीच हौले से वह रचना आपकी मानसिकता को अपनी गिरफ़्त में लेकर उसे बदल देती है. आप चीज़ों को नए नज़रिए से देखते-समझते हैं और इस तरह आपका सोच नया और अधिक सकारात्मक रुख अख़्तियार कर लेता है. इस तरह प्रबोध कुमार गोविल का लेखन एक बेहतर समाज के निर्माण का सहयोगी बनकर हमारे सामने आता है.
प्रबोध गोविल जी भले ही हिंदी में लिखते हैं उनकी लगभग सारी ही रचनाएं अनेक विविध भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर पूरे देश में पहुंची हैं. उर्दू, सिंधी, पंजाबी, संस्कृत, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, अरबी, असमिया और मराठी के अलावा अंग्रेज़ी सहित अन्य कई विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए हैं. कई प्लेटफॉर्म्स पर उनकी रचनाएं सुनने और देखने के लिए भी सुलभ हैं. हिंदी के बहुत कम ऐसे वरिष्ठ लेखक हैं जिन्होंने संचार के नवीनतम माध्यमों को इस सहजता और उत्साह के साथ अपनाया व इस्तेमाल किया है.
अपने लेखन के अतिरिक्त भी जीवन के अनेक क्षेत्रों में श्री गोविल सक्रिय हैं. शिक्षा और पत्रकारिता से तो उनका गहरा रिश्ता रहा ही है. एक स्वैच्छिक ग़ैर सरकारी संस्था राही सहयोग संस्थान के माध्यम से वे समाज सेवा के अनेक प्रकल्प संचालित करते हैं. यही राही सहयोग संस्थान बहुत सारी साहित्यिक गतिविधियां भी आयोजित करता है. राही सहयोग संस्थान पिछले कुछ बरस से हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी के एक सौ रचनाकारों की एक सूची ज़ारी करता रहा है. हिंदी समाज में इस सूची को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं रही हैं. जहां कुछ लोग इसे स्वागत योग्य मानते हैं कुछ अन्य इसकी कटु आलोचना भी करते हैं. जो आलोचना करते हैं वे प्राय: इस चयन की प्रक्रिया की अनदेखी करते हैं और एक बनी-बनाई धारणा के आधार पर ऐसा करते हैं. लेकिन सारी आलोचनाओं से अप्रभावित श्री गोविल मौन भाव से अपना काम करते रहते हैं. असल में यही मौन भाव, ठहराव और दृढ़ संकल्प श्री गोविल की असल ताकत है. बिना किसी विवाद में उलझे, बिना किसी कटु बहस का हिस्सा बने वे चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. मैं ख़ुद बहुत बार सोचता रहा हूं कि उन्होंने इस आरोप का जवाब क्यों नहीं दिया, या उस टिप्पणी पर मौन क्यों रह गए? लेकिन बाद में महसूस किया कि अगर वे उस तरह की चीज़ों में ही अपना वक़्त खराब करते रहते तो फिर लिखते कब! उन्हें जो भी कहना था, अपने लेखन के माध्यम से कहा है. यह बहुत बड़ी बात है.
इधर श्री गोविल की आत्मकथा के चार भाग प्रकाशित हुए हैं: इज़्तिरार, लेडी ऑन द मून, तेरे शहर के मेरे लोग, और 44 पिंजरे तोड़ के भागा क़ैदी. गोविल जी की यह आत्मकथा हिंदी के अपेक्षाकृत कमज़ोर आत्मकथा खण्ड को समृद्ध करने वाली कृति है. यहां वे अपनी जीवन यात्रा को जीवन के संघर्षों को और जीवनानुभवों को जिस निर्मम तटस्थता के साथ सामने लाते हैं, वह विलक्षण और स्पृहणीय है. वे अपने अभावों और संघर्षों की बात करते हैं लेकिन इसलिए नहीं कि उन्हें किसी की सहानुभूति की ज़रूरत है. वे केवल तथ्य कथन करते हैं. यह तटस्थता विरल है. उनकी आत्मकथा एक लेखक की आत्मकथा मात्र न होकर एक ख़ास कालखण्ड का सजीव और प्रामाणिक चित्रण है.
मुझे गर्व है कि हिंदी के ऐसे बड़े लेखक श्री प्रबोध कुमार गोविल को मैं अपना मित्र कह सकता हूं. मुझे उनका अकुण्ठित स्नेह मिला है और यह स्नेह मेरी सबसे बड़ी पूंजी है. एक व्यक्ति के रूप में वे निहायत ही पारदर्शी, ईमानदार और अत्यधिक विश्वसनीय हैं. वे उन बहुत थोड़े से लेखकों में से हैं जिनका मित्र तो हर कोई है, शत्रु कोई भी नहीं है.
मेरा कामना है कि श्री गोविल स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और अपने लेखन से हम सबको स्मृद्ध करते रहें.




