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Tuesday, June 12, 2018

बहुत तेज़ी से नकदी रहित होता जा रहा है स्वीडन


भारतीय अर्थव्यवस्था को नकदी विहीन बनाने के सरकारी प्रयासों पर ज़ारी बहस-मुबाहिसे के बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि स्वीडन बहुत तेज़ी से नकदी रहित  अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है और अनुमान लगाया गया है कि सन 2030 तक यह देश पूरी तरह नकदी मुक्त हो जाएगा. स्वीडन में नकदी विहीन होने की शुरुआत सन 2005 में हुई थी जब वहां की सरकार ने कुछ बैंकों को नकदी और भुगतान की व्यवस्थाओं के बारे में निर्णय करने का दायित्व सौंपा था. इसी क्रम में सन 2012 में वहां के केंद्रीय बैंक, रिक्सबैंक ने बैंकनोट्स का एक नया डिज़ाइन लागू किया लेकिन वह बहुत सारे स्वीडन वासियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने पुराने तथा चलन से बाहर हो चुके नोट तो बैंक में जमा करा दिये लेकिन उनके बदले में ये नए नोट नहीं लिये. उसी बरस दिसम्बर में वहां के छह बड़े बैंकों ने स्विश नाम से एक भुगतान व्यवस्था लागू की जिसका उपयोग कर लोग तुरंत धन का आदान प्रदान कर सकते थे. उसके बाद से वहां नकदी विहीन लेन देन में बहुत तेज़ी आई और अब  हालत यह है कि पिछले बरस स्वीडन में कुल भुगतान के मात्र एक प्रतिशत में ही नकदी का प्रयोग हुआ. वहां की बसों में कई बरस पहले से सिक्कों और नोटों का प्रयोग होना बंद हो चुका है और अब तो ऐसे बैंकों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है जिनके बाहर स्थानीय भाषा में यह अंकित होता है कि यहां नकदी उपलब्ध नहीं है. छोटी-छोटी कॉफी शॉप्स तक में यह लिखा मिलने लगा है कि हमारी दुकान नकदी मुक्त है, या यहां केवल क्रेडिट कार्ड स्वीकार किये जाते हैं. देश के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर भी प्रवेश शुल्क केवल कार्ड्स से ही स्वीकार किया जाने लगा है. एक व्यक्ति  ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि उसने देखा कि गुब्बारे बेचने वाला भी कार्ड से भुगतान प्राप्त कर रहा था. स्वीडन के धार्मिक स्थल भी तेज़ी से नकदी विहीन होते जा रहे हैं.

हमारे लिए यह विशेष रूप से ग़ौर तलब है कि स्वीडन के इतनी तेज़ी से नकदी विहीन होते जाने के मूल में कई बातें हैं. पहली तो यह कि उस देश का आकार बहुत छोटा और जनसंख्या बहुत कम है. इस कारण वहां कोई भी नई व्यवस्था आसानी से चलन में लाई जा सकती है. वहां का क्षेत्रफल मात्र  447,435 वर्ग किलोमीटर  और जनसंख्या लगभग 99 लाख है. देश में भ्रष्टाचार बहुत ही कम है और वहां के नागरिकों को अपनी बैंकिंग और प्रशासनिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है. ज़्यादातर लोगों को इस बात की भी कोई आशंका नहीं है कि उनकी सरकार उनके लेन-देन के मामले में अनावश्यक रुचि लेगी. लोगों का शैक्षिक स्तर भी अच्छा है इसलिए नई व्यवस्था उनके लिए असुविधाजनक नहीं साबित  होती है. स्वीडन तकनीकी रूप से भी काफी उन्नत है और वहां इण्टरनेट की सुलभता, पहुंच और गति बहुत उम्दा है.

लेकिन जहां स्वीडन के अधिकांश नागरिकों को इस नकदी विहीनता से कोई आपत्ति नहीं है, वहां की आबादी का एक छोटा-सा हिस्सा  विभिन्न कारणों से इस नकदी विहीनता के विरोध में आवाज़ उठाने लगा है. आश्चर्य की बात यह कि विरोध के ये स्वर लगातार तेज़ होते जा रहे हैं. स्वीडिश नेशनल पेंसनर्स असोसिएशन ऐसा ही एक समूह है जो अपने साढ़े तीन लाख सदस्यों की तरफ से इसके खिलाफ आवाज़ उठा रहा है. इस संगठन के प्रवक्ता का कहना है कि हम नकदी विहीन समाज के खिलाफ़ नहीं हैं, लेकिन जिस तेज़ गति से यह सब किया जा रहा है उस पर नियंत्रण चाहते हैं. इनका कहना है कि अगर देश में नकदी का उपयोग प्रतिबंधित नहीं किया गया है तो लोगों को उसका उपयोग करने की सुविधा भी मिलनी चाहिए. स्वीडिश समाज के बहुत सारे लोग, विशेषकर 75 वर्ष या  उससे अधिक वाले बुज़ुर्ग विभिन्न कारणों से नई भुगतान व्यवस्था को नहीं अपना पा रहे हैं. कुछ को इण्टरनेट सुलभ नहीं है, कुछ कार्ड का इस्तेमाल करने में सहज अनुभव नहीं करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें नकदी का  प्रयोग करने में ही सुख  मिलता है. बहुतों की आपत्ति यह भी है इस नई भुगतान व्यवस्था के कारण उन्हें अनावश्यक व्यय भार वहन करना पड़ता है. जो लोग अधिक सजग हैं उनकी आपत्ति यह भी है कि सत्ता तंत्र इस नकदी विहीन व्यवस्था का दुरुपयोग भी कर सकता है और अगर वह चाहे तो किसी को भी इसके उपयोग से वंचित कर उसे पूरी तरह असहाय बना सकता है. इस व्यवस्था के कारण व्यक्ति की निजता में सेंध की बात भी बहुतों को नागवार गुज़रती है. उनका कहना है कि इस व्यवस्था से वो अनाम रहकर तो कुछ खरीद ही नहीं सकते हैं.

स्वीडन में नकदी विहीनता के खिलाफ़ जो आवाज़ें उठ रही हैं वे सितम्बर 2018 में होने वाले देश के आम चुनावों को भी प्रभावित करेंगी, ऐसा माना जा रहा है.

ये तमाम बातें हमारे लिए भी विचारणीय तो हैं ही.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, November 21, 2017

पश्चिम ने डिजिटल से किनारा करना शुरु किया

भारतीय टेलीविज़न के बहुत लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक कौन बनेगा करोड़पति के अंत में अमिताभ बच्चन कहते थे, यह डिजिटल का ज़माना है, और फिर वे अपने हाथ में लिये हुए टेबलेट के माध्यम से विजेता को आनन-फानन में उसकी जीती हुई धन राशि ट्रांसफर कर देते थे. भारत सरकार ने भी डिजिटलीकरण पर काफी ध्यान दिया है. और इतना ही  क्यों, हम सबकी ज़िंदगी में काफी कुछ डिजिटल हो गया है. पश्चिम से आई इस नई तकनीक ने शुरु-शुरु में अपने नएपन से हमें आकर्षित किया, हालांकि अनेक आशंकाएं भी इसने जगाईं, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता इसकी सुगमता, तेज़ी और कम खर्च बालानशींपन ने हम सबको अपना मुरीद बना लिया. आज हालत यह है कि हमारी ज़िंदगी का शायद ही कोई पक्ष ऐसा बचा हो जिसमें डिजिटल का प्रवेश न हो चुका हो.

लेकिन बहुतों को शायद यह बात अविश्वसनीय भी लगे, लेकिन है सच, कि जिस पश्चिम से यह डिजिटल आंधी हमारी ज़िंदगी में आई है उसी पश्चिम ने अब डिजिटल से दूरी बनाना शुरु कर दिया है.  अमरीका में हाल में ऐसी अनेक किताबें बाज़ार में आई हैं जिनमें डिजिटल तकनीक के हानिप्रद प्रभावों पर सप्रमाण और विस्तार से चर्चा की गई है. इन किताबों में यह चर्चा भी है कि कैसे स्मार्टफोन्स हमारे बच्चों की मानसिकता को विकृत कर रहे हैं और सोशल मीडिया किस तरह हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को क्षति पहुंचा रहा है. वहां इस बात की भी चर्चाएं हैं कि डिजिटल तकनीक एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को पुष्ट करती हैं. हाल में अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि लगभग सत्तर प्रतिशत अमरीकी डिजिटलीकरण के कारण हुए कामकाज के यंत्रीकरण से रोज़गार के अवसरों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर से चिंतित हैं. मात्र इक्कीस प्रतिशत  अमरीकी फेसबुक को दी जाने वाली  अपनी व्यक्तिगत जानकारियों की गोपनीयता के प्रति आश्वस्त पाए गए और लगभग आधे उत्तरदाता यह मानते  पाए गए कि सोशल मीडिया हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर डालता है. इस बात की पुष्टि अमरीकी साइकीऐट्रिक एसोसिएशन ने भी कर दी.

और बातें केवल फिक्र करने तक ही सीमित नहीं हैं.  अपने देश में जहां हम हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि ई बुक्स का चलन बढ़े, अमरीकी प्रकाशकों के संघ के अनुसार यह लगातार तीसरा बरस है जब अमरीका में पारम्परिक मुद्रित किताबों की बिक्री में वृद्धि नोट की गई है. यही नहीं वहां किताबों की दुकानें भी पिछले कई सालों से बढ़ती जा रही हैं. और बात सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है. भारत में चलन से करीब-करीब बाहर हो चुकीं विनाइल वाली एलपी रिकॉर्ड्स का चलन वहां बढ़ता जा रहा है और बताया जाता है कि अकेले अमरीका में हर सप्ताह कोई दो लाख विनाइल रिकॉर्ड्स बिक रही हैं. फिल्म वाले कैमरे, कागज़ की बनी नोटबुक्स, बोर्ड गेम्स आदि भी पहले से ज़्यादा खरीदे जाने लगे हैं.

संशयालु लोग कह सकते हैं कि यह सब पुराने के प्रति मोह यानि नोस्टाल्जिया की वजह से हो रहा है. लेकिन यही सच नहीं है. सच यह भी है कि बावज़ूद इस बात के कि डिजिटल सामग्री बहुत सस्ती होती है, लोग किताबों की तरफ इसलिए लौट रहे हैं कि उन्हें लगने लगा है कि किताब हाथ  में लेकर उसके स्पर्श, उसकी गंध, उसकी ध्वनि आदि का जो मिला-जुला अनुभव  आप पाते हैं वह डिजिटल में मुमकिन ही नहीं है. किसी किताब  को आप खरीद, बेच और भेंट में दे सकते हैं, उसके बहाने दोस्ती कर सकते हैं, और अगर पुरानी हिंदी फिल्मों को याद करें तो किताबों में ख़तों का आदान-प्रदान कर मुहब्बत तक कर सकते हैं. यह सुख डिजिटल में कहां?  इतना ही नहीं, गूगल जैसी अग्रणी और भविष्यवादी कम्पनी में भी  पिछले कई बरसो से यह रिवायत है कि वेब डिज़ाइनर्स को अपने किसी भी नए प्रोजेक्ट की पहली योजना कागज़ पर कलम से ही बनानी होती है. कम्पनी का सोच यह है कि स्क्रीन पर काम करने की तुलना में इस तरह से अधिक और बेहतर नए विचार उपजते हैं.

पश्चिम में डिजिटल से पीछे हटने के पक्ष में कुछ और बातों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है, जैसे यह कि इससे संचालित सोशल मीडिया में बुरी भाषा का जितना प्रयोग होने लगा है वैसा प्रयोग पारम्परिक माध्यमों में नहीं होता है. इस बात को तो अब पूरी तरह स्वीकार कर ही लिया गया है कि डिजिटल माध्यम मानवीय सम्पर्क के खिलाफ़ जाते हैं, जबकि हमारी बेहतरी के लिए मानवीय सम्पर्कों का होना बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद  यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि डिजिटल का पूरी तरह त्याग मुमकिन नहीं है. इसलिए अब एक ही विकल्प बचा है और वह यह कि इसका इस्तेमाल विवेकपूर्वक किया जाय और इसके अतिप्रयोग  से बचा जाए. पश्चिमी देश इसी दिशा में  प्रयासरत हैं.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्ग्त मंगलवार, 21 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 22, 2016

हर कोई त्रस्त है डिजिटल दुनिया के नए वायरस से

आजकल डिजिटल दुनिया में एक वायरस ने सबके नाकों में दम कर रखा है. उस वायरस  का नाम है –फ़ेक न्यूज़. यानि मिथ्या समाचार. यह वायरस इतना अधिक फैल चुका है कि लोग बरबस एक पुरानी कहावत को फिर से याद करने लगे हैं. कहावत है – झूठ तेज़ रफ़्तार  से दौड़ता है जबकि सच लंगड़ाता हुआ उसका पीछा  करने की कोशिश करता है.  हाल में सम्पन्न हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी ऐसा ही  हुआ, और खूब हुआ. सामाजिक मीडिया पर यह बात खूब चली कि पोप फ्रांसिस ने डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन किया है, या कि लोकप्रिय मतदान में ट्रम्प महाशय हिलेरी क्लिण्टन से आगे चल रहे हैं. कहना अनावश्यक है कि ये ख़बरें आधारहीन  थीं. लेकिन इन और इनकी तरह की अन्य ख़बरों के प्रसार का आलम यह था कि अमरीका में समाचारों का विश्लेषण करने वाली एक संस्था को यह कहना पड़ा कि फेसबुक पर बीस शीर्षस्थ वास्तविक और प्रमाणिक खबरों की तुलना में बीस शीर्षस्थ मिथ्या खबरों को शेयर्स, लाइक्स और कमेण्ट्स के रूप में अधिक समर्थन हासिल हुआ. आम तौर पर माना जाता है कि इस तरह की मिथ्या खबरों को फैलाने का काम या तो कुछ लालची स्कैमर्स करते हैं और या फिर भोले-भाले नासमझ लोग. लेकिन अमरीका में तो विभिन्न प्रत्याशियों और निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को भी इस तरह की आधारहीन खबरों को फैलाते हुए पाया गया है. मसलन नेब्रास्का के एक रिपब्लिकन सीनेटर ने हाल में ट्वीट करके कहा कि कुछ लोगों को पैसे देकर उनसे ट्रम्प के खिलाफ दंगे करवाए गए. यह एक झूठ था जिसे जान-बूझकर प्रचारित किया गया था. इस तरह की अनेक झूठी खबरों के निर्माता एक व्यक्ति ने तो वॉशिंगटन पोस्ट में यह बात लिख ही दी कि उसकी रची हुई बहुत सारी क्लिण्टन विरोधी खबरों को, बिना उनकी उनकी प्रमणिकता जांचे,  ट्रम्प के समर्थकों और उनके चुनाव अभियान के आयोजकों ने बढ़ चढ़कर प्रसारित किया. इस लेखक ने यह भी कयास लगाया है कि उसके  द्वारा रची गई इन मिथ्या  खबरों का भी रिपब्लिकन विजय में कुछ न कुछ योगदान अवश्य रहा है. 

लेकिन विचारणीय  बात यह है कि क्या झूठ के इस फैलाव के लिए सिर्फ इनके निर्माता ज़िम्मेदार हैं, या कि कुछ ज़िम्मेदारी उस सोशल मीडिया की भी है जिसके मंच का इस्तेमाल झूठ के फैलाव के लिए किया जाता है. यहीं यह बात भी याद कर लेना  उचित होगा कि सामाजिक मीडिया के मंचों के माध्यम से झूठ के प्रचार-प्रसार का यह कारोबार केवल अमरीका में ही नहीं चल रहा है. म्यांमार जैसे देश में शरारतपूर्ण खबरों की वजह से जातीय हिंसा फैलाई गई तो इण्डोनेशिया, फिलीपींस वगैरह में चुनाव जीतने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया. पश्चिमी अफ्रीका में इबोला वायरस  के बारे में झूठ फैलाया गया तो कोलम्बिया में शांति स्थापना प्रयासों के पक्ष में किए जाने वाले जनमत संग्रह के बारे में दुष्प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल  किया गया. खुद अपने देश में इसके इस्तेमाल के बारे में कुछ भी लिखना  इसलिए अनावश्यक है कि हम सब उससे भली-भांति परिचित हैं. सच और झूठ के  बीच फर्क़ करना ही मुश्क़िल होता जा रहा है. कभी-कभी तो लगता है कि भूसे के ढेर में जैसे सुई खो जाया करती है वैसे ही झूठ  के ढेर  में सच खो गया है. 

ऐसा वायरस फैलाने से जिनके किसी भी तरह के कोई हित सधते हैं, यानि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है या वे अपने पक्ष को सबल करने के उत्साहितिरेक में ऐसा करते हैं, उनको छोड़ शेष लोग तो स्वाभाविक रूप से इस प्रवृत्ति से चिंतित हैं और इसके खिलाफ़ हैं. ऐसे लोगों ने बार-बार सोशल मीडिया के नियंताओं के आगे गुहार लगाकर उनसे मदद भी मांगी है. और ऐसा भी नहीं है कि वे लोग इस बार में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. मार्क ज़ुकरबर्ग ने तो सन 2012 में ही अपने निवेशकों को लिखे एक पत्र में यह कहा था कि वे चाहते हैं कि सोशल मीडिया समाज के उत्थान में सहयोगी बने. अब भी फेसबुक के संचालक झूठ के खिलाफ़ लामबंद हैं. आर्थिक क्षति उठाकर भी वे मिथ्या ख़बरों वाली साइट्स पर फेसबुक पॉवर्ड  विज्ञापन नहीं दे रहे हैं. गूगल वाले भी ऐसा ही कर रहे हैं. इन्हीं गर्मियों में फेसबुक ने तकनीकी रूप से ऐसा करने का भी प्रयास किया है कि हमें अपनी न्यूज़ फ़ीड्स में समाचार संगठनों की फ़ीड्स की तुलना में दोस्तों और परिवार जन की ज़्यादा फ़ीड्स देखने को मिलें. ज़ाहिर है कि इस प्रयास से झूठ के फैलाव को रोकने में कुछ तो कामयाबी हासिल होगी. लेकिन लड़ाई लम्बी है और प्रतिपक्ष बहुत चालाक. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Sunday, July 26, 2009

आने वाला समय मुफ़्त का है


2006 की बेस्ट सेलर द लोंग टैल के लेखक, वायर्ड पत्रिका के सम्पादक क्रिस एंडरसन की स्थापना है कि हमारी अर्थव्यवस्था की नियति है मुफ़्त, यानि फ्री. अपनी सद्य प्रकाशित किताब फ्री: द फ्यूचर ऑफ अ रेडिकल प्राइस के शुरू में ही वे लिखते हैं कि देर-सबेर हर कंपनी को किसी न किसी तरह यह देखना पड़ेगा कि वह अपने व्यापार के विस्तार के लिए फ्री का प्रयोग कैसे करे, या कैसे फ्री से प्रतिस्पर्धा करे. यह बात वे मुख्यत: डिजिटल अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में करते हैं, लेकिन समझा जा सकता है कि अंतत: इससे शेष अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहने वाली है.

डिजिटल दुनिया में आज बहुत कुछ मुफ़्त में उपलब्ध है. आप मुफ्त में अपना ई मेल खाता बनाते हैं, आप मुफ्त में फेस बुक, यू ट्यूब वगैरह का इस्तेमाल करते हैं. टेलीविज़न तो आप बहुत पहले से मुफ्त में देख ही रहे थे. एंडरसन इसे इस तरह समझाते हैं. वे कहते हैं कि तकनीक निरंतर सस्ती होती जा रही है. 1961 में जहां एक ट्रांज़िस्टर की कीमत दस डॉलर थी, आज इंटेल आपको दो बिलियन ट्रांज़िस्टर सिर्फ़ 1100 डॉलर में दे रहा है, यानि एक ट्रांज़िस्टर का मूल्य आज घट कर सिर्फ .000055 सेंट रह गया है. इसी तरह आज एक घण्टे का वीडियो कार्यक्रम एक व्यक्ति तक पहुंचाने का खर्च मात्र 0.25 डॉलर है और अगले साल तक यह घट कर 0.15 डॉलर ही रह जायेगा. कीमतों के घटने की परिणति मांग के बहुत ज़्यादा बढने में होती है और इस मुफ्त से अभाव की जगह इफरात का दौर शुरू होता है. लेकिन, यहीं से एंडरसन एक खास बात कहते हैं. वे कहते हैं कि उपभोक्ता के लिहाज़ से सस्ते और मुफ्त में बड़ा फर्क़ है. बहुत सारे उदाहरणों से वे साफ करते हैं कि कोई चीज़ चाहे कितनी ही सस्ती क्यों ना हो, वह उतने लोगों को आकृष्ट नहीं करती जितनी कोई मुफ्त चीज़ करती है. क्यों?

एंडरसन समझाते हैं कि हम सब मानसिक रूप से आलसी हैं और यही बात मुफ्त को प्रोत्साहित करती है. जब आपको किसी वस्तु का मूल्य चुकाना होता है, चाहे वह एक पैसा ही क्यों ना हो, आप सोचते हैं कि कहीं यह क़ीमत अधिक तो नहीं है. जब कोई चीज़ मुफ्त में मिलती है तो आपके दिमाग को सोचने की यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती और आप तुरंत उस चीज़ को ले लेने के लिए तैयार हो जाते हैं. दो प्रख्यात चाकलेटों के उदाहरण से वे इस बात को पुष्ट करते हैं. जब किसेज़ नाम की चॉकलेट 1 सेंट और ट्रफल्स नाम की चॉकलेट 15 सेंट में दी गई तो 75 प्रतिशत लोगों ने ट्रफल्स को चुना. इसके बाद एक और प्रयोग किया गया. दोनों की कीमत एक सेंट घटा दी गई. यानि किसेज़ मुफ्त में और ट्रफल्स 14 सेंट में दी गई. परिणाम चौंकाने वाले थे. 69 प्रतिशत ने किसेज़ को चुना. अब देखिए, कीमत का फर्क़ तो सिर्फ एक सेंट था, लेकिन पसंद बदल गई.

एंडरसन कहते हैं कि सारी दुनिया में पीढिगत दृष्टि से मूल्य को लेकर एक बड़ा परिवर्तन आ रहा है. 30 साल से कम उम्र के लोग अब सूचना के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना चाहते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह कहीं न कहीं तो मुफ़्त में मिल ही जायेगी. विचारों से निर्मित उत्पाद प्राय: मुफ्त उपलब्ध होने लगे हैं. मज़े की बात यह है कि यह मुफ़्त भी चिंताजनक नहीं है. चीन में जितने संगीत का उपभोग होता है, उसका 95% पाइरेसी से होता है. लेकिन कलाकार फिर भी खुश हैं. उन्हें प्रचार मिलता है और इससे उनके कंसर्ट और दूसरी आय में इज़ाफा होता है.

एंडरसन अपनी इस चर्चा को पत्रकारिता की दुनिया तक भी ले जाते हैं और भविष्यवाणी करते हैं बहुत जल्दी पत्रकारिता एक व्यवसाय के साथ-साथ शौक़ भी बन जाने वाली है. लोग आजीविका के लिए पत्रकारिता पर निर्भर नहीं रह पायेंगे. पत्रकारों को पेट भरने के लिए पढ़ाने या दूसरों से बेहतर लिखवाने के काम में लगना पड़ेगा. हम देख ही रहे हैं कि आज ब्लॉग़्ज़ के प्रचलन के साथ शौकिया पत्रकार व्यावसायिक पत्रकारों को कड़ी टक्कर देने लगे हैं और प्रकाशन की दुनिया पर भी भी पेशेवर लोगों का एकाधिकार नहीं रह गया है. पत्रकारों और प्रकाशकों के लिए चुनौतियां बढती जा रही है. लेकिन एंडरसन इसे पत्रकारों के लिए बुरा नहीं बताते. वे इसे उनकी मुक्ति का नाम देते हैं.

एंडरसन ने अपनी किताब का ढांचा कुल चार स्थापनाओं पर खड़ा किया है: तकनीकी(डिजिटल संरचना प्रभावी रूप से मुफ्त में उपलब्ध है), मनोवैज्ञानिक(हर उपभोक्ता मुफ्त में पाना पसंद करता है), प्रक्रियात्मक(मुफ्त के लिए आपके दिमाग को कोई तक़लीफ नहीं करनी पड़ती) और व्यावसायिक(मुफ्त की तकनीक और मनोवैज्ञानिक मुफ्त की परिणति भरपूर मुनाफे में होती है).

और अंत में यह और बताता चलूं कि एंडरसन की यह किताब इंटरनेट पर मुफ्त में पढ़ी जा सकती है.

Discussed book:
Free: The Future of a Radical Price
By Chris Anderson
Published by: Hyperion
288 pages, Hardcover
US $ 26.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 26 जुलाई, 2009 को प्रकाशित.








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