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Wednesday, February 5, 2014

जब ज्योतिष में मेरे अविश्वास को चुनौती मिली

आप इसे मात्र एक तथ्य कथन के  रूप में लें  कि ज्योतिष  में मेरा तनिक भी विश्वास  नहीं है. कृपया इसे इस शास्त्र अथवा विज्ञान अथवा विद्या – यह जो भी हो, पर मेरी किसी टिप्पणी के रूप में न पढ़ें. हर इंसान की कुछ कमज़ोरियां और कुछ ज़िदें होती हैं, तो मेरी भी है, बस! मां-बाप ने मेरी जन्म पत्री बनवा दी, तो बनी हुई रखी है. मेरे परिवार वालों ने मेरे बच्चों की जन्म पत्रियां बनवा दीं, वो हमने अपने बच्चों को दे दीं. यदा-कदा बच्चे चाहते हैं तो उनकी इच्छानुसार उनकी जन्म पत्रियां दिखाकर जो बताया जाता है वो उन तक पहुंचा भी देते हैं. यानि ज्योतिष  को लेकर किसी तरह की नकारात्मक कट्टरता का भाव भी मन में नहीं है.  लेकिन जैसा मैंने कहा, मैंने कभी किसी ज्योतिषी को अपना हाथ नहीं दिखाया, और न कभी किसी पण्डित से अपना भविष्य पूछा.

बहुत मज़े की बात यह कि यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि जीवन में कम से कम एक अनुभव मुझे ऐसा हुआ जिसने मेरे इस अविश्वास को हिला डाला. 

बात करीब ढाई दशक पुरानी है. मेरा  ट्रांसफर एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में हो गया था और मैं उसे निरस्त कराने के लिए बार-बार राजधानी के चक्कर लगा रहा था. ऐसे ही एक चक्कर के दौरान तीन-चार दिन जयपुर में टिकना पड़ा. तब संयोग से मेरे साथ मेरे ही  कॉलेज के भौतिक शास्त्र के एक प्रोफेसर मित्र भी समान कष्ट के निवारण के लिए ठहरे हुए थे. ज्योतिष में उनकी बहुत अच्छी गति थी. अगर कोई पूछता तो वे  तर्क संगत व वैज्ञानिक तरह से गणना आदि करके भविष्य बता दिया करते थे. परेशानी के उस आलम में मैं भी उनसे पूछ बैठा कि मेरा ट्रांसफर कब तक निरस्त हो जाएगा! उन्होंने बाकायदा लम्बी चौड़ी गणना करके मुझे एक तारीख बताई, कि इस तारीख को, मान लीजिए बारह तारीख को,  मेरा काम हो जाएगा.

घटनाक्रम कुछ इस तरह चला कि दस तारीख को, यानि उनकी बताई तिथि से दो दिन  पहले मुझे मेरा इच्छित आदेश मिल गया. अपना मनचाहा हो जाने की खुशी के साथ-साथ मेरे मन में एक दुष्टतापूर्ण  खुशी यह भी थी कि ज्योतिष ग़लत साबित हो गया. मैं बड़ी खुशी-खुशी वो आदेश लेकर जब उस कॉलेज में पहुंचा जहां से रिलीव होकर मुझे फिर से अपने पसन्दीदा कॉलेज में पद भार ग्रहण करना था तो वहां के प्राचार्य ने उस आदेश को पढ़कर कहा कि उस आदेश के आधार पर तो वे मुझे रिलीव नहीं कर सकते. मैंने भी आदेश को ध्यान  से पढा  तो पाया कि एक  क्लर्कीय ग़लती की वजह से उसमें कॉलेजों के नाम में उलटफेर हो गई है और जहां से मुझे रिलीव होना है उस  कॉलेज की बजाय जहां मुझे ज्वाइन करना है उस कॉलेज का नाम लिख दिया गया है. मैंने प्राचार्य जी को समझाने की बहुत  कोशिश की कि यह महज़ एक क्लैरिकल मिस्टेक है, और इस आदेश का  कोई अन्य अर्थ निकल ही नहीं सकता है,  लेकिन वे मेरी बात से सहमत होकर भी उस आदेश को स्वीकार करने का ख़तरा  उठाने को  तैयार नहीं हुए. अब मेरे पास इस बात के सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं उस आदेश को लेकर फिर से पाँच  सौ किलोमीटर दूर राजधानी जाऊं और आदेश को संशोधित करवा कर लाऊं. तब तक इण्टरनेट आदि हमारी ज़िन्दगी में नहीं आए थे, और आज जब आ गए हैं तब भी सरकारी काम तो अपनी ही तरह से होते हैं.

रात भर की यात्रा कर जयपुर आया, सम्बद्ध अधिकारी के सम्मुख उपस्थित हुआ, उनसे अपनी पीड़ा बयान की, उस आदेश में संशोधन करवाया, उसे लेकर फिर पाँच  सौ किलोमीटर की यात्रा कर अपने अनचाहे कार्यस्थल पर पहुंचा, प्राचार्य जी के समक्ष वो नया आदेश पेश किया, उसके आधार पर वहां से अपने इच्छित कॉलेज में ज्वाइन करने के लिए रिलीव हुआ और वहां से रिलीव होते ही अस्सी किलोमेटर की यात्रा कर अपने इच्छित कॉलेज में पहुंचकर फिर से ज्वाइन किया. कहना अनावश्यक है कि यह काम उसी बारह तारीख को हुआ जिसकी भविष्यवाणी मेरे उक्त प्रोफेसर मित्र ने की थी.

अगर इस एक घटना को प्रमाण माना जा सके तो मैं मानने को विवश हो गया कि ज्योतिष एक विश्वसनीय शास्त्र है, बशर्ते कोई उसको बरतने की योग्यता रखता हो. क्योंकि इस घटना के बाद मेरे जीवन में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब मुझे  किसी भविष्यवक्ता की शरण में जाना पड़ा हो, इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि  मेरा उक्त अनुभव संयोग था या कुछ और!      

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अन्तर्गत दिनांक 4 फरवरी, 2014 को 'क्लर्क की भूल ने करा दिया ज्योतिष पर यकीन' शीर्षक से प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.